कहानी: खिड़की

नमिता सचान सुंदर

5/138 विकासनगर, लखनऊ - 226022

उन दिनों उदय की पुरानी किताबों की दुकान मेरी पसंदीदा जगह हुआ करती थी। दुकान भी कहाँ, एक बहुत पुराने बड़े से पेड़ के नीचे बाँस लगा कर कपड़े तान कर छत और दीवारें बनायी हुई थीं। बस वहीं कुछ गड्डियों में लगी, कुछ ढेर में पड़ी रहती थी किताबें। उदय ये किताबें रद्दी वालों से खरीदता था। स्कूल, कॉलेज के पाठ्यक्रम की कोई पुस्तक नहीं होती थी वहाँ। हाँ, इंगलिश, हिंदी के उपन्यास, कविता संकलन, आत्मकथा, ललित लेख गरज की हर विधा की पुस्तकें कौड़ियों के मूल्य उपलब्ध हो जाती थी उसके पास। मैं उदय की नियमित ग्राहक थी तो हमारी बात-चीत भी काफी होती थी और कभी-कभी अगर उसे लगता था कि कोई किताब मुझे पसंद आ सकती है तो वह उसे बेचने वाली किताबों से अलग कर के रख लेता था और मेरे न खरीदने पर ही उसे बेचने वाली पुस्तकों में मिलाता था। एक छोटी सी मचिया भी रहती थी उदय की दुकान में जिस पर बैठ कर मैं कई बार बहुत देर तक किताबों को उलटती पलटती रहती थी और उदय से बतियाती भी रहती थी। पिता की असमय मृत्यु के कारण उदय स्कूली पढ़ाई तो बहुत अधिक नहीं कर पाया था पर किताबों के बीच रहते-रहते उसे किताबें पलटने-पढ़ने की आदत पड़ गयी थी। इसी वजह से उसकी बातों मे परिपक्वता, संवेदनशीलता आ गयी थी। उससे बात करना किसी मनचीती किताब में ऊब-चूब होने से कम सुखकर नहीं होता था।

तो ऐसी ही एक फुरसतिया दोपहरी मैं मचिया पर जमी हुई किताबों को खंगाल रही थी और उदय से बतियाती भी जा रही थी कि मेरी दृष्टि पीछे की तरफ किताबों से हट कर रखी एक बहुत पुरानी थोड़ी फटी सी डायरी पर पड़ी।

"उदय वह वहाँ पर क्या है?" मैंने डायरी की ओर उंगली दिखा कर कहा

"दीदी वह किताब नहीं है।"

"हाँ, वह तो मुझको भी दिख रहा है पर है क्या? कहाँ से आयी?"

"दीदी दो दिन पहले एक रद्दी वाले से किताबें छांट कर ले रहा था तो अचानक ही यह डायरी हाथ में आ गयी। किसी की व्यक्तिगत डायरी लगती है। पता नहीं मुझे क्यों लगा कि किसी का मन यूँ ठेले में धेले भाव बिकने के लिए तो नहीं होता न और मैंने किताबों के साथ इसे भी खरीद लिया।"

"फिर पढ़ी क्या?"

उदय के चेहरे पर इक अजब सा संकोच उतर आया। "झूठ नहीं बोलूंगा दीदी। थोड़ी सी पढ़ी तो थी पर किसी लड़की की डायरी है कैसी तो झिझक होती है पढ़ने में, जैसे चोरी कर रहा हूँ। मन तो करता है पर पढ़ नहीं पा रहा।" अचानक से उसके चेहरे पर चमक आयी, "दीदी, आप तो पढ़ सकती हो। आप तो लड़की हो, सहेली से बात करने जैसा होगा न आपके लिए तो।" 

"अच्छा फिर?" मैंने मुस्कुरा कर उसे देखा

"फिर, कुछ नहीं..." और उसने डायरी उठा कर मेरी ओर बढ़ा दी।

मेरे भीतर भी उत्सुकता तो खदबदाने लगी थी। मैंने धीरे से हाथ बढ़ा डायरी पकड़ ली और उसे अपने पैरों पर रख लिया। धीरे से डायरी पर हाथ फिराया।

"बहुत धूल से अटी थी दीदी। मैंने साफ की है।" 

"हूँ!" कभी शायद रही होगी चमकीले कत्थई रंग की और सुनहरे अक्षरों से लिखा होगा उस पर कुछ, शायद किसी संस्था का नाम और सन् पर अब साफ करने के बाद भी धूल के कण चिपक कर बैठे थे कहीं-कहीं, समय की धूल, उसी समय की धूल और सुनहरे लिखे हुए का एहसास कराते इक्का-दुक्का कण, छोटी लकीरें दिख रहीं थीं। मैं हाथ फिराती बैठी रही थोड़ी देर। उदय एक आध ग्राहकों को निपटा मुड़ा मेरी ओर, "दीदी इतना आसान नहीं है न!"

"हाँ रे, कैसा तो मन कर रहा है। लग रहा है किसी के घर में सेंध लगाने की तैयारी कर रहे हैं।"

"हूँ, सच, अच्छा दीदी कितनी पुरानी डायरी है?"

मुझे लगा उदय ने रास्ता खोल दिया हो जैसे, वरना अकेले तो मैं इसे ऐसे ही लिए बैठी रहती शायद पहला पन्ना पलटने की हिम्मत ही नहीं कर पाती। मैंने धीरे से कवर खोला तिरपन साल पहले का सन् छपा हुआ था। पन्ने भुरभुरे से होने की कगार पर थे।

"अच्छा उदय, अगर यह डायरी जिस साल की है उसी साल लिखनी शुरू की गयी होगी और जिसने लिखी है उनकी उम्र उस समय सोलह-सत्रह भी मान लें तो अगर वे होंगी तो सत्तर के आस पास तो होंगी ही न?"

"होंगी... नहीं... पता नही।" उदय भी जैसे मेरी तरह कहीं बहुत दूर, बहुत पीछे चला गया हो।

"तो मैं इसे ले जाऊँ?"

"हाँ।"

"मैं तुम्हें बताती रहूँगी।"

उसने सिर हिला दिया। बोला कुछ नहीं। कुछ मनःस्थितियों के लिए शब्द बने ही नहीं हैं।

मैंने सँभाल कर डायरी पर्स में रखी और खरीदी हुई किताबें ले चल पड़ी। मन भी थोड़ा भारी हो गया था और कदम भी धीरे-धीरे उठ रहे थे। कौन होगी वह. क्या उसने कभी सोचा होगा कि उसके मन की खुली किताब एक दिन किसी अनजान अपरिचित लड़की के हाथ होगी। कौन, क्या कैसे कब क्यों... न जाने कितने सवाल भीतर ही भीतर गड्ड-मड्ड हो रहे थे। 

और फिर उस रात अपने कमरे के एकांत में मैंने पलटा डायरी का पहला पन्ना। स्याही धूमिल पड़ गयी थी पर कितने सुगढ़ अक्षर थे। कैसी रहीं होगी लिखने वाली, जरूर सुकोमल कमनीय रही होगी। अगर बहुत ज्यादा नहीं भी पढ़ पायीं होगी तो भी किताबों की संगत में तो जरूर रही होगी कभी न कभी। सरस, सहज और भावपूर्ण अभिव्यक्ति तो ऐसा ही कुछ इंगित करती थी।

न तारीखें दर्ज थीं, न सन्, न ही बहुत नियमित तरीके से लिखी गयी थी डायरी। शायद इतनी सुविधा, समय ही नहीं था लिखने वाली के पास कि अपने हिस्से का इत्ता सा सुख भी वे सलीके से जी लेतीं। टुकड़े-टुकड़े में जोड़ कर जो तस्वीर बनी उससे मैं यह समझ पायी कि वे एक भरेपूरे घर की सबसे छोटी जवान विधवा बहू थीं। सारे दिन चकरघिन्नी की तरह घर के काम से ऊपर नीचे करती रहतीं और देर रात दुमंज़िली छत की छोटी सी कुठरिया में आ पड़ती। छत भी क्या, उस चौकोर से हिस्से के चारों ओर बहुत ऊँची-ऊँची दीवारें थीं। आस-पास के किसी घर का कोई हिस्सा वहाँ से नजर ही नहीं आता था सिवा कुछ दूरी पर बने संकरे, बहुत ऊँचे घर की एक दीवार के जिसमें जड़ी एक खिड़की कभी खुलती ही नहीं थी।

और फिर एक दिन जब दोपहर वह छत के उस हिस्से के एक कोने में घुटनों में सिर डाले हिलक-हिलक कर रो रही थी तो पता नहीं उसे कैसे आभास हुआ कि कोई उसे कहीं से देख रहा है। मुँह उठाया तो सामने दीवार वाली खिड़की खुली थी और दो आँखें लगातार उसे देख रहीं थीं। पता नहीं उसे क्यों लगा कि ये आँखें उसे पहली बार नहीं देख रहीं हैं, उसने कभी ध्यान नहीं दिया। कहाँ समय ही रहता है उसके पास ध्यान देने का। उसने हाथ अपनी आँखों तक ले जा आँसू पोंछ लेने का इशारा किया। पता नहीं क्या था इस छोटी सी बात में कि उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गयी और उसने आँसू पोंछ लिये। 

आगे के कुछ पन्नों में कुछ कुछ पंक्तियाँ लिखी गईं थी और फिर बहुत जोर से आगे पीछे लाइन्स कर के काटी गयीं थी। जैसे होता है न कभी-कभी कि मन जो कुछ कह रहा होता है वह हम समझ रहे होते हैं पर सुनना बिल्कुल नहीं चाहते। कुछ जो उग रहा होता है हल्का-हल्का, उस पर कस कर बुलडोजर चलाने जैसा।

एक पन्ने पर था कि कैसे नीचे तुलसी के घेरे में एक नया नन्हा सा पौधा निकल आया था और वह सास से अनुरोध कर छत पर गमले में लगाने को ले आयी थी। बात धार्मिक मान्यताओं की थी तो सास मना नहीं कर पायी थी और फिर कुछ देर को शाम को भी छत पर जाने का नियम बन गया। वह इधर दिया जलाती थी तो दो हाथ उधर भी जुड़ जाते थे। रिश्ते भी न जाने कैसे-कैसे जुड़ जाते हैं।

य़ही बात हमने कही थी उदय से उस दिन और उसने ललक कर समर्थन किया था। "सो तो है दीदी। अब देखिये न, दीदी, जिनकी डायरी है उन्हें तो हम आप बिल्कुल भी नहीं जानते लेकिन उनसे भी तो कैसा रिश्ता जुड़ गया है। जब आप डायरी में लिखी उनके थोड़ा सा भी खुश होने की बात बताती हैं तो उस दिन मन खुश रहता है और उनका दुख सोच कर मन दुखी हो जाता है।"

किताबों की संगत, सच आदमी को बहुत संवेदनशील और समझदार बना देती है।

बाल खोलने के अनुरोध वाली उस घटना मैं उदय से साझा नहीं कर पायी थी। कुछ संकोच सा हुआ था पर उस दिन मेरे अपने मन में सारे दिन जैसे फुहारें झरती रहीं थीं।

लिखा था... क्या उतनी दूर से मेरे कसे बंधे जूड़े के बावजूद उसको यह आभास हो गया था कि मेरे बाल लम्बे, घने हैं। पता नहीं, पर उस दिन इशारे से बाल खोलने का अनुरोध आया। पहले तो मैं समझ ही नहीं पाई और जब समझ में आया तो थोड़ी देर को एकदम हतप्रभ सी हो गई। मना किया मैंने सिर हिला कर कई बार, पर अनुरोध, आग्रह, जिद, मनुहार का सिलसिला जारी रहा। कभी-कभी मुझे अचरज भी होता कि इतनी दूर से वह अपने हर मनोभाव को केवल इशारों से कैसे व्यक्त कर लेता है या फिर यह मेरे ही मन की कलाकारी है। पता नहीं, पर उस दिन सब लोग गाँव गए थे, परिवार की किसी शादी में तो मेरे पास समय था बहुत। मैंने बाल धोए भी थे पर आदतन कस कर जूड़ा बांधा था। छत पर गई। यूँ अमूमन उस समय खिड़की खुलती नहीं थी पर उस दिन खुली थी। उसने फिर अपना अनुरोध दोहराया। उसे पता नहीं था उसका वह अनुरोध मेरे भीतर कितना दर्द जगाता था। आकाश को भी मेरे खुले बाल कितने पसंद थे। वे जब सामने होते थे तो मेरे बाल बंधे रह ही नहीं पाते थे। मेरे खुले बालें में चेहरा छिपाना, जोर की साँस ले गुनगुनाना, आकाश के प्रिय शगल थे। आकाश के न रहने पर अम्मा जी ने कितने ताने दिए थे कि सधवा औरतों का खुले बाल घूमना कितना बड़ा अपशकुन होता है। यही सब हरकतें डस गयीं उनके लड़के को और भी न जाने कितना और क्या-क्या। वो तो आकाश के आखिरी शब्द थे और वह भी उन्होंने अपनी अम्मा से ही सबके सामने कहे थे कि अगर मेरे बालों को कुछ नुकसान पहुँचाया गया तो उनकी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी। बड़बड़ाती रहीं थीं अम्मा बहुत दिन कि पता नहीं यह लड़का कैसे मन पढ़ लेता था। जा रहा था पर चिंता थी बालों की। जैसे उन्हीं में जान बसती हो। पर इन सब के बावजूद उन्होंने मेरे बालों के बारे में उस दिन के बाद कुछ नहीं कहा था। आखिर माँ हैं न, जाते हुए बेटे के शब्द तो सूनी रातों में उनके कानों में भी गूंजते होंगे। बल्कि कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी पीठ, मेरे बालों पर उनकी नजर काफी देर तक ठहर कर रह जाती है अब। क्या अपने बेटे के होने को महसूस करने का उनका तरीका है। कभी-कभी मुझे लगता है कि दुख उनके भीतर भी कहीं बहुत गहरे ठहरा हुआ है। और बेटों और उनके बच्चों से भरे पूरे परिवार में वे अपने सबसे लाड़ले छोटे बेटे के जाने के दुख को खुल कर व्यक्त भी तो नहीं कर सकती थीं न, बात-बेबात पर।

अरे लो, कहाँ भटक गयी मैं, ऐसा ही होता है मेरे साथ। इस मन का भी न, कहाँ से शुरू होता है, कहाँ दौड़ जाता है। हाँ तो, फिर बाल खोलने का अनुरोध किया उसने। मैंने नजर उठा आसमान की ओर देखा। खूब चटक नीला आसमान और मेरी छत पर टिका बादल का एक टुकड़ा। मुझे लगा जैसे वह टुकड़ा मेरे लिए ही रुका है वहाँ। मैंने कहा उस बादल से, खोल लूँ क्या. जैसे कि आसमान के सीने में वह मेरा आकाश हो और लो धीरे से उस बादल में एक फांक सी हो गयी, बिल्कुल मुस्कुराते चेहरे सी। जैसे आकाश ने ही किलक कर हामी भर दी हो। मैंने धीरे से खोल दिया अपना जूड़ा और सिर घूमा कर देखा खिड़की की ओर। सच कहूँ, उस चेहरे पर आकाश का चेहरा जैसे गड्ड-मड्ड होने लगा। फिर धीरे-धीरे वही चेहरा अपनी पूरी सौम्यता और गाम्भीर्य के साथ स्थिर हो गया। और मेरे भीतर भी हमेशा के लिए स्थिर हो गया एक टुकड़ा सुख।

यह उस डायरी का सबसे लम्बा वृत्तांत था। शायद वह उस दिन सच में फुरसत में थी। घटनाक्रम जैसा तो कुछ नहीं था उस डायरी में। पर हाँ, फुटकर वाक्य थे खुशी झलकाते।

एक पन्ने में था, आजकल मेरी छत की धूप में चमक बढ़ गयी है। मुझे लगा था लिखते समय वह जरूर हल्का-हल्का मुस्कुरा रही होगी या फिर हो सकता है कुछ गुनगुना भी रही हो।

हाँ, एक पन्ना और था। चांद की रौशनाई में कलम डुबो कर लिखा गया। सर्दियों के महीने की पूरे चांद वाली रात थी और उधर खिड़की बंद ही नहीं हो रही थी। इधर से ये अनुरोध कर रही थी, खिड़की बंद कर लेने का पर उधर तो जैसे न सुनने की कसम खाई हो। ऐसे भी कोई करता है, भला। कैसी तो ठंड है। तबियत खराब हो जायेगी पर उधर से, न तो न। य़े अपनी कुठरिया के अंदर चारपाई पर आ बैठी थी। दरवाजा भी भेड़ दिया हार कर। पर मन कहाँ माना। फिर झांक कर देखा तो खिड़की वैसी ही खुली और वह खिड़की के सामने वैसे ही। हार कर इसने अपनी खटिया दरवाजे तक खिसकाई और रजाई ओढ़ बैठ गयी। उधर भी एक कुर्सी खिसकाई गई और कम्बल सिर से लपेट जम गये साहब। फिर रात सरकती रही। और फिर उसके बाद कुछ दिन जब छत और खिड़की पर एक साथ छींकें आती थीं तो दोनों मुस्कुरा उठते थे। 

सच है न, साथ यूँ भी तो निभाया जाता है।

फिर एक दिन उसने इशारा किया खिड़की बंद करने का, जाने का। कहाँ समझ पायी थी ये कुछ भी ठीक से और समझने का जरिया भी तो नहीं था। मन को तसल्ली दी थी कि किसी काम से कुछ दिनों के लिए शायद कहीं जाना हो पर फिर वह खिड़की कभी नहीं खुली थी। इसे दिखा कर खिड़की की छड़ से जो तारे का आकार का कुछ बांध गया था वह। रोज देखती थी उसे वह। अंधेरे में रोशनी के बिंदु सा चमकता था और हर सांझ तुलसी पर दिया बार वह लौ को उस ओर बढ़ा देती थी।

और बस फिर कुछ नहीं... डायरी खत्म। मैं ठगी सी बैठी रह गयी। बहुत झुंझलाहट हो रही थी। रोना भी आ रहा था। यह भी कोई बात हुई। ऐसे कैसे, न नाम, न पता, न कोई सिरा, क्यों भला लगी यह डायरी मेरे हाथ। जीवन भर एक कचोट सी रहेगी पता नहीं कभी मिल भी पाये वे दोनों या नहीं। कभी क्या बदली होंगी परिस्थितियाँ। कहाँ चला गया होगा वह अचानक। कब तक प्रतीक्षा की होगी उसने। कहाँ ले गयी होगी जिन्दगी उन दोनों को। अलग-अलग ही कहीं गुम हो गये होंगे इत्ती बड़ी दुनिया में। हर रात सोने के लिये लेटते ही मेरे मन में बंद खिड़की पर चमकता सितारा और छत पर की तुलसी में जलते इकलौते दिये की लौ हल्के-हल्के कंपकंपाने लगती... कुछ कहानियाँ खत्म होने के लिए बनी ही नहीं होती शायद।।


कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता-12 में पुरस्कृत नमिता सचान सुंदर पूर्व बैंक अधिकारी हैं।

4 comments :

  1. बहुत खूबसूरत कहानी..... बधाई...

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    1. बहुत बहुत आभार,

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  2. Lovely story Namita..........enjoyed it thoroughly!

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  3. Padh ker bahut achha laga..

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