कहानी: टूटे हुए कंधे

अंजना वर्मा
       अतुल सोफा पर निढाल पड़ा हुआ था। यादों की उथल-पुथल उसे चैन नहीं लेने दे रही थी। जो बीत गया वह अपने हाथ में नहीं था और जो बीत रहा था वह भी हाथ में नहीं।  ले- देकर अपने हाथ में कुछ भी नहीं।अपने को उसने इतना नगण्य कभी नहीं महसूस किया था। यह कैसा समय चल रहा था कि अपना कोई वश नहीं? पिता चले गए थे, लेकिन किस तरह? यह ठीक है कि कोई अमर नहीं होता। उनकी उम्र भी ऐसी थी कि  उनका जाना असमय नहीं कहा जाएगा। पर कुछ तो था जो उसे साल रहा था।ख्यालों की मँझधार से वह जूझ रहा था कि तभी  बुआ का कॉल आने लगा। रिंग हो रहा था , परंतु उसका मन नहीं हो रहा था कि वह उनका कॉल उठाये। इधर जितने भी कॉल आ रहे थे, सबको रिसीव करने के बाद उसका मन खिन्न हो जाता था। इसलिए पहली बार तो उसने उनका कॉल नहीं रिसीव किया। वह जानता था कि बुआ क्या बोलेंगी? लेकिन थोड़ी देर बाद जब फिर उनका फोन आया तो उठाना ही पड़ा। अतुल ने‌ मोबाइल कान से लगाकर धीमी आवाज में  कहा," हलो!"
"हाँ, हेलो! यह मैं क्या सुन रही हूँ अतुल? व्हाट्सएप पर देखा तो पता चला। ऐसी दु:खद खबर और तुमने मुझे फोन करना भी जरूरी नहीं समझा? "
"....."
अतुल चुप रहा। वह इसका क्या जवाब देता कि वह क्यों बुआ को व्यक्तिगत रूप से यह खबर नहीं दे पाया? जिस मुश्किल से वह जूझ रहा था और अभी भी जूझ रहा है, उसमें क्या करता वह? इतने बड़े परिवार में  किस-किस को वह फोन उठाकर ऐसी खबर देता? कोई खुशी की खबर तो थी नहीं। लेकिन सच्चाई यही है कि दुनिया में दु:ख की खबरें भी सबसे साझा करनी पड़ती हैं, ख़ासकर नजदीकी रिश्तेदारों से। यही रस्म है और यह सोचते हुए उसने पारिवारिक व्हाट्सएप ग्रुप पर पिता के निधन की खबर डालकर अपनी ओर से रस्म अदायगी कर दी थी। वह जानता था कि इस समय महामारी से दुनिया त्रस्त है और सारी औपचारिकताएँ बंद  हैं- मिलना-जुलना पर्व-त्योहार सब बंद। घर से बाहर निकलना तक बंद है। अभी तो न कोई पूछने आएगा , न देखने। एक खबर ही तो देनी थी जो दे दी गई। बुआ को उसी से मालूम हुआ था।
      बुआ का  ऐसा प्रश्न सुनकर अतुल चुप हो गया। दोनों मोबाइलों के बीच कुछ पलों का मौन पसर गया। परंतु बुआ को सुनने और जानने की जल्दी थी। उधर से बुआ ने कहा," क्या हुआ अतुल? मुझे बताओ। क्या हुआ था शैलेश भैया को? "
"जी...वो... पापा बीमार थे।...कोविड हो गया था उन्हें।" पता नहीं क्यों अतुल की ज़बान लड़खड़ा रही थी और वह अपने आप को बोलने में असमर्थ पा रहा था।  भीतर से आवाज क्यों नहीं निकल पा रही थी? शब्द सूझ नहीं रहे थे उसे।  क्या बोले और किस तरह बताये पापा के बारे में कि वे कैसे चले गए?
कोविड होने की बात सुनकर बुआ ने तुरंत अपना प्रश्न दागा, "कोविड था? ... कब हुआ? हमें तो कुछ मालूम ही नहीं हुआ। "
"मालूम तो हमें भी नहीं हुआ। पहले तो केवल बीमार थे और कमजोरी थी।" अतुल ने कहा।
"तो तुम लोगों ने किसी डॉक्टर की सलाह नहीं ली? डॉक्टर से नहीं दिखाया उन्हें?" बुआ पूरी बात जानना चाहती थीं कि उनके लिए क्या किया गया और क्या नहीं किया गया?
"हाँ, ली।  तुरंत डॉक्टर से संपर्क  किया तो डॉक्टर ने कोविड की जाँच कराने के लिए कह दिया। दवाइयाँ भी चलीं।...इधर मीता को भी कोविड हुआ है और वह अभी अस्पताल में भर्ती है।"
"अच्छा! तब?... भैया कैसे चले गये?" बुआ ने दोबारा बातों का सूत्र पकड़ा।
"बीमार होने के दो दिनों बाद अचानक उनके अटेंडेंट ने खबर दी कि वे जाग नहीं रहे हैं।.. जाकर देखा तो...वह सच ही बोल रहा था। ..हम लोग तो कुछ समझ भी नहीं पाए कि कैसे इतनी जल्दी चले गए? डाक्टर की बताई दवाएँ भी तुरंत शुरू कर दी गई थीं।"
"अच्छा? भैया को तकलीफ क्या थी?" बुआ ने जरूरी सवाल किया।
"तकलीफ कुछ खास नहीं थी। बुखार था और खाना खा नहीं पा रहा थे। दो दिनों बाद ही तो वे चल  बसे।"अतुल जैसे अपनी ओर से सफाई देने की कोशिश कर रहा था। वह बुआ को क्यों इस तरह सफाई दे रहा था? उसकी समझ में स्वयं ही नहीं आ रहा था।
बुआ ने बात को उपसंहार तक पहुँचाते हुए कहा, "अब क्या किया जाये? जीवन और मृत्यु पर तो किसी का अधिकार नहीं है। अंत समय में कुछ बात भी ना हो सकी शैलेश भैया से। बेचारे कितने अच्छे थे! किसको पता था कि ऐसा घटित हो जायेगा? कोई नहीं जानता कि कब क्या हो जाएगा। बड़ा दु:ख लगा सुनकर। चलो, तुम लोग अपने आप को सँभालो।"
          यह कहकर बुआ ने फोन बंद कर दिया। एक बार यह भी पूछने की जरूरत नहीं समझी कि मीता को भी कोविड हो गया है तो अभी उसकी हालत कैसी है? आधी बात सुनकर इस तरह चटपट बात खत्म कर दी उन्होंने। आगे-पीछे कुछ कहने-सुनने और जानने की आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई उन्हें!
         ‌  इस तरह के  काल्स में लगभग इसी तरह के सवाल होते थे। पूछने वालों की आवाज में संवेदना का एक तंतु भी नहीं होता था। बस औपचारिकता-भर और बातों को विस्तार से जान लेने की प्रबल इच्छा। शैलेश जी कैसे गए? क्यों गए? इसका जवाब क्या हो सकता था? ऐसी जिज्ञासा अतुल को कटघरे में खड़ा कर देती थी जिसके कारण वह अपने को ही अपराधी समझने लगता था। ऐसी बातों से एक अजीब तरह की गंध आती थी जो उसे भीतर तक बेचैन करके रख देती थी।आखिर लोग क्या सोच रहे हैं उसके बारे में? क्या कहना चाह रहे हैं? वह पूछे गए सवालों के साथ वे  सवाल भी सुन लेता था जो उससे पूछे तो नहीं जाते थे , लेकिन उच्चरित  प्रश्नों के साथ अस्तर की तरह चिपके होते थे।
       अतुल अपनी तथा अपनी परिस्थितियों की समीक्षा करने में लगा हुआ था। जो पूछने वाले लोग थे वे उसकी मानसिक हालत नहीं समझ सकते थे। पिता बीमार हुए और जब तक बीमारी बढ़ती या रिपोर्ट आती, उसके पहले ही विदा भी  हो गए। कुछ सोचने और करने का मौका ही उन्होंने नहीं दिया।लोगों के लिए कैसे और क्यों पूछ लेना बहुत आसान था ,लेकिन कोई वास्तविक स्थिति  नहीं समझ पा रहा था।  यह अतुल ही अनुभव कर रहा था कि निरंतर हारने का एहसास करते हुए लड़ाई जारी रखना कितना मुश्किल होता है। मीता जानलेवा बीमारी से जूझती हुई और उसके दो किशोर बच्चे हर्षित और प्रिया डरे-सहमे हुए कि यह सब क्या हो रहा है? उन्हें अपनी जिंदगी में अगर किसी महामारी को पहली बार देखने का मौका भी मिला तो ऐसी महामारी को जो पूरे विश्व में खतरनाक मौत-भरा इतिहास लिख रही थी। हर्षित और प्रिया कोरोना वायरस  की भयावहता को अपनी आँखों से देख रहे थे। खबरों में सुन रहे थे, जिसके कारण वे  अपनी माँ के विषय में भी नकारात्मक ही सोच रहे थे। वे अतुल से पूछते कि मम्मी कैसी है? और इसके बाद जो  पूछना चाहते थे वह उनके मुँह से नहीं निकल पाता था। मम्मी बच तो जाएगी ना? यह सवाल उनके पूछे बिना ही उनकी आँखों से झाँकता रहता था जिसे वह आसानी से देख लेता था। कैसे दिलासा देता वह अपने किशोर बच्चों को जिनके मन में कल्पनाओं और संवेदनाओं का अछोर संसार बसा हुआ था। कहने से अधिक वे समझते थे। इसलिए तरह-तरह की डरावनी कल्पनाएँ उन्हें निरंतर बेचैन किए हुई थीं।
     अभी कुछ दिनों पहले की बात है कि सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था।  वह अपने बीवी-बच्चों और पिता के साथ आराम से जीवन जी रहा था। और यदि  इस महामारी के समय पाबंदियाँ थीं तो सबके लिए थीं। उनका पालन करते हुए तो सारा समाज जीना सीख चुका है। नौकरी, खरीददारी, पढ़ाई-लिखाई, डाक्टरी सलाह -  सब तो ऑनलाइन ही हो रहा था। घर में बंद रहते हुए भी सारी जरूरतें पूरी हो रही थीं और सारे काम हो रहे थे।
           एक दिन मीता ने बताया कि उसे बुखार है तो अतुल ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया,पर जब उसकी कोविड जाँच की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गयी तो वह बुरी तरह घबरा गया। कुछ ही दिनों में मीता की तबीयत अधिक बिगड़ने लगी तो उसे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा।
घर में  उसके दो बच्चे थे और बूढ़े पिता। इनको तो खुद ही देखभाल की जरूरत थी। इन तीनों को छोड़कर ऐसा कोई नहीं था जो इस संकट काल में  उसका साथ देता। उसके पिता मधुमेह के मरीज होने के कारण  काफी कमजोर हो चुके थे। दो वर्ष पहले उसकी मम्मी के निधन के बाद से पिता की देखरेख में कमी होने लगी‌ थी और उनका स्वास्थ्य भी  बिगड़ने लगा था  तो अतुल ने उनकी देखरेख के लिए दिन-रात का एक अनुचर बहाल कर दिया था।  पता नहीं कब  गिर-पड़ जायें और कब उनके साथ क्या घटित हो जाये?  क्योंकि उनके शरीर में शुगर का स्तर भी ऊपर-नीचे होता रहता था। उनके लिए सीढ़ियाँ चढ़ना -उतरना न संभव था और न ही निरापद।अतः वे घर के निचले हिस्से में ही रहते थे।
मीता को कोविड होने तक तो वे बिल्कुल स्वस्थ थे, पर कमजोर। उनके लिए रखा गया अनुचर राकेश चौबीसों घंटे उन पर तैनात रहता था। थोड़ा पढ़ा-लिखा होने के कारण वह शैलेश जी को सारी दवाएँ समय पर दे दिया करता था। अपने पिता को उसी पर छोड़कर अतुल निश्चिंत भी रहता था।
       मीता को कोविड होने का जब खुलासा हुआ तो अतुल ने घबराकर सबसे पहले मीता की बड़ी बहन चैताली को खबर दी जो उसी शहर में थोड़ी दूर पर रहती थी। सुनकर वह सारी बाधाएँ पार करते हुए अतुल के पास आ पहुँची। मानसिक और शारीरिक रूप से टूटते हुए अतुल को बहुत बल मिला। लेकिन तब तक मीता को आईसीयू में भर्ती कराया जा चुका था।  चैताली ने आकर घर और रसोई की लगाम अपने हाथों में ले ली थी और इस कठिन समय में उसके पिता और बच्चों को बहुत सहारा मिल गया था।  अतुल चैताली दी को सबका ख्याल रखते देख दिल की गहराई से दुआएँ दे रहा था।  उनके होने से बच्चों की उदासी भी छँट गई थी और पापा की दिनचर्या में भी कोई व्यवधान नहीं आया था। राकेश ऊपर वाले माले में जाकर रसोई से  उनका नाश्ता-खाना ले आता और उन्हें खिला देता।
     ‌          अतुल को अपना परिवार टूटता और बिखरता नजर आ रहा था। उसे लगता कि मीता के चारों ओर मौत मँडरा आ रही है। पता नहीं साँसों की कच्ची डोर कब टूट जाए? और यदि उसे कुछ हो गया तो वह इन दो बच्चों को किस तरह सँभालेगा?  वह हर दिन जंग लड़ रहा था। एक दिन बीत जाता तो सोचता कि जिंदगी का एक दिन तो मीता के हिस्से में आया! कल का दिन भी शायद हाथ में आ जाये। कुछ दिनों बाद मीता को आईसीयू से निकालकर जब  सामान्य वार्ड में रख दिया गया तो उसका तनाव थोड़ा कम हुआ। फिर भी जब तक मीता घर लौटकर नहीं आती तब तक निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता था।
उसीके दूसरे दिन उसे राकेश ने आकर खबर दी  कि शैलेश जी को बुखार हो गया है तो वह  घबराया हुआ उनके कमरे में गया और जाकर उसनेे पिता से पूछा, "पापा!सुना कि आपको बुखार है।"
"हाँ, अतुल! अभी बुखार हो गया है मुझे।" शैलेश जी ने कहा।
"आप कैसे हैं? आपको क्या तकलीफ है?"
"तकलीफ तो कुछ खास नहीं है। लेकिन बुखार के कारण कमजोरी जरूरत से ज्यादा ही लग रही है। कुछ खाने की इच्छा भी नहीं हो रही है। "
"ठीक है। मैं राकेश से कह देता हूँ वह आपका ख़ास तौर से ख्याल रखेगा। आप आराम कीजिए। और आपको किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है।"
शैलेश जी ने हँसकर कहा,"चिंता? मैं किस बात की चिंता करूँगा? पर शरीर ही बहुत शिथिल लग रहा है। कुछ करने की तबीयत नहीं हो रही है और मन भी उखड़ा-उखड़ा लग रहा है।"
अतुल बोला, "तो कुछ किताबें पढ़िए। दिल लगेगा।"
फिर उसने राकेश की ओर घूमकर उससे कहा," राकेश! पापा का बुखार समय-समय पर देख लिया करो और मुझे खबर करते रहो। पापा के खाने का ख़ास ध्यान रखो।"
राकेश ने सिर हिलाकर कहा,"  जी...हाँ।"
         फिर अतुल ने पिता के बुखार के बारे में डॉक्टर से सलाह ली और उनके नुस्खे पर कुछ दवाएँ एहतियात के तौर पर शुरू करवा दी गईं। दूसरे दिन कोविड की जाँच के लिए एक व्यक्ति आया। पीपीई सूट पहने अंतरिक्ष यात्री की तरह लगते हुए उस व्यक्ति ने बड़ी सावधानी से सैंपल लिया और सैंपल बैग में बंद करता हुआ तुरंत  चला गया। अब स्थिति यह थी कि परिवार के दो सदस्य बीमार थे। मीता अब भी अस्पताल में थी। बच्चों की उतरी हुई सूरतें अतुल से देखी नहीं जातीं थीं। यह तो चैताली थी जिसने घर का मोर्चा सँभाल रखा था।
        तीसरे दिन अचानक वह घटित हुआ जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। सुबह-सुबह राकेश भागता हुआ उसके पास आया और उसने उसे पिता के न रहने की खबर दी। सुनकर अतुल दौड़ते हुए पिता के कमरे में गया। उसने देखा कि पिता आँखें मूँदे निश्चल पड़े  हुए थे। उसे अनुमान भी नहीं था कि इन दो दिनों के ज्वर में ही उसके कि पिता चल बसेंगे। अचानक उसे कुछ याद आया। मोबाइल पर कोविड की रिपोर्ट आ चुकी थी। देखते ही वह चौंक गया। रिपोर्ट पॉजिटिव थी।
अतुल ने अपने बड़े भाई अपराजित को पिता के न रहने की खबर दी ," भैया! एक खबर है। घबराइएगा नहीं।"
मोबाइल पर थोड़ी देर तक चुप्पी छाई रही।फिर अपराजित ने सहमे हुए पूछा,"क्या बताना चाह रहे हो?... बोलो।"
"पापा नहीं रहे...भैया।"
अपराजित बोला," क्या?... यह क्या कह रहे हो?  पापा नहीं रहे? कब हुआ ऐसा?"
"आज ही  सुबह की तो बात है। "
"परसों ही तो तुमने बताया था कि पापा को बुखार है?....तो इतना जल्दी वे चल दिए?...क्या उन्हें कोविड हो गया था? यह तो तुमने हमें नहीं बताया।"
"वही तो। पता चलने तक भी वे न रहे। आज ही तो रिपोर्ट देख रहा हूँ।और बहुत तकलीफ भी नहीं थी उन्हें , न लक्षण ही थे। इतनी जल्दी सब कुछ घटित हो गया, भैया!"
"यह क्या हो गया अतुल? उधर मीता अस्पताल में है और इधर पापा चले गए। ... तुम क्या-क्या करोगे और कैसे सब सँभालोगे? मैं आ रहा हूँ, अतुल!"
"नहीं भैया! तुम मत आओ। अब जैसे हो पायेगा , होगा। मैं ही करूँगा। तुम्हें आने की जरूरत नहीं है।"
"क्यों?"
"आकर भी क्या करोगे? अब समय नहीं है....।  शरीर का अंतिम संस्कार जल्दी कर देना ज़रूरी है। तुम समझ सकते  हो मैं ऐसी कठोर बातें क्यों कह रहा हूँ? पर अभी इस बेरहम समय के आगे हम बहुत बेबस हैं। फिर तुम भी तो कितना खतरा उठाकर आओगे और यहाँ से लौटोगे तो भाभी और बच्चों के लिए भी कोविड का खतरा उत्पन्न हो जायेगा। अब तो जो होना था, वह हो गया। अपने मन को समझाओ और दिलासा दो, भैया!"
"तो अब मैं उनके पार्थिव शरीर को कंधा भी नहीं दे पाऊँगा?"
"क्या करोगे? अब परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी हैं। यहाँ पूरे शहर में कोविड भयंकर रूप से फैला हुआ है। हर कोई डरा हुआ है। रोज मौत की खबरें आ रही हैं। अपने को तो समझाना ही होगा।"
"ओह....! यह सब क्या हो गया?" यह कहते हुए अपराजित फफक पड़ा था।
             बुआ से बात करने के बाद भी अतुल के मन पर पिता की परछाइयाँ हिलती-डोलती रहीं। वे उससे ‌बिना कुछ कहे-सुने, बिना अपनी दु:ख-तकलीफ बताए चले गए।इतनी जल्दी  भी कोई चुपचाप चला जाता है! मन बार-बार उसीको दोषी ठहरा रहा था।
पिता का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए पड़ा हुआ था और पता चला कि श्मशान घाट में जगह नहीं थी।  अतुल जानता था शहर में लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। हर गली, हर मुहल्ले में रोज किसी न किसी की जान जा रही है तो दाह-संस्कार की समस्या तो उत्पन्न होगी ही! खबरों में भी यही आ रहा था। वक्त का ऐसा क्रूर चेहरा उसे दिखाई पड़ा था उस समय! थोड़ी देर के लिए अतुल सन्नाटे में आ गया कि क्या करे? फिर उसने साथियों,  दोस्तों और रिश्तेदारों को , जिनसे भी उसे कुछ सहायता की उम्मीद थी उनको फोन किया।  फोन पर ही जो सलाह-मशवरा देना था, लोगों ने  दिया। लेकिन फिर भी कुछ रास्ता नहीं सूझा तो उसे प्रभाकर की याद आई जो कोरोना काल में अपनी नौकरी छूटने के बाद कोविडग्रस्त लोगों की सहायता करने वाली संस्था से जुड़ गया था और दिन भर घूम-घूम कर यही काम करता रहता था। किसी मरीज के पास जाकर उसे समझाता। कोविडग्रस्त मृतकों का दाह-संस्कार भी करता। उसने प्रभाकर को फोन मिलाया, "हलो,प्रभाकर!"
प्रभाकर ने कहा, "कौन अतुल? क्या हुआ?अच्छा तो है ना तू? क्योंकि लोगों को जब कोरोना वायरस पकड़ता है तभी मुझे फोन करते हैं।"
"हाँ, मैं ठीक हूँ। पर मेरे पिता नहीं रहे। "
प्रभाकर ने कहा, "क्या?...क्या कह रहा है तू? कब हुआ यह?"
"आज सवेरे। "
"क्या कोविड हुआ था उन्हें?"
"हाँ। अभी रिपोर्ट देखी। बीमार पड़ने के दो ही दिन बाद चल बसे।"
"यह तो अच्छा नहीं हुआ, अतुल! पर धैर्य रख। "
अतुल ने कहा, "भाई! अब पता चला है कि श्मशान में जगह नहीं है। बता, मैं क्या करूँ? किस तरह उनका दाह-संस्कार होगा?"
प्रभाकर ने कहा, "तू चिंता मत कर। मैं आ रहा हूँ।"
       कुछ घंटों बाद एक गाड़ी जब उसके दरवाजे पर आकर लगी तो भाँय-भाँय करता हुआ निर्जन माहौल और भी भारी और भयावह हो उठा।  संपूर्ण सुरक्षा कवच धारण किये एक वालेंटियर, ड्राइवर और प्रभाकर गाड़ी से उतरकर उसके सामने खड़े हो गये। उदास खड़े अतुल से प्रभाकर ने कहा,"अपने को समझा अतुल! जो चीज अपने हाथों में नहीं है उसके लिए क्या करेगा? अंकल का समय पूरा हो चुका था। उन्हें जाना ही था और जाने वाले को कौन रोक सकता है?"
दोनों बच्चे  हर्षित और प्रिया दूर खड़े सहमे हुए विस्फारित आँखों से यह सारा दृश्य देख रहे थे। किसीकी हिम्मत नहीं हो रही थी आगे बढ़ने की और अतुल भी मजबूर था। वह कह नहीं सकता था कि वे दोनों आकर अपने दादाजी के पैरों का स्पर्श कर लें। उनके निष्प्राण शरीर के चारों ओर जैसे मौत का घेरा बना हुआ था। जो करीब जाएगा वह मौत के पंजे में दबोच लिया जाएगा।
            वह पिता के शरीर को अंतिम बार देख रहा था, बिल्कुल असहाय बना हुआ। उनसे लिपट कर रोना मना था।  पिता अपनी अंतिम यात्रा पर जा रहे थे, जिस यात्रा पर लोग अपने पैरों से नहीं दूसरों के कंधों पर  चढ़कर जाते हैं। पर वह पिता को अपने सबल कंधे देने में हिचकिचा रहा था। आज उसे लग रहा था कि उसके कंधे टूट गए हैं। उसके पिता अपने बेटों के कंधों के बिना ही अपनी आखिरी यात्रा शुरू करने जा रहे थे।
जल्दी से शरीर को ठिकाने लगा देने की भावना से भरे हुए, पैरों से लेकर अपने सिर और चेहरे तक को पूरी तरह से ढँके अनजाने लोक के निवासियों की तरह वे तीनों जन बड़ी तत्परता से आगे आये। जब वे शैलेश जी के पार्थिव शरीर को अर्थी पर उठाने के लिए झुके तो अतुल अपने को रोक नहीं पाया। वह  अचानक ही आगे बढ़ गया। बाकी तीन लोगों के साथ उसने भी काँपते हाथों से अर्थी उठायी। बरामदे से लेकर गाड़ी तक दस कदम चलकर उसने पिता को  कंधा दे दिया और उसके बाद खड़ा-खड़ा वह सजल आँखों से गाड़ी को जाते हुए देखता रहा।
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