काव्य: राहुल द्ववेदी

राहुल द्विवेदी 'स्मित'

शिक्षक, ऐंकर (अकाशवाणी लखनऊ)
पता: ग्राम- करौंदी, पोस्ट- इटौंजा, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
चलभाष: 8299494619/7499776241

1-
छोड़ प्रलय के राग पुराने, चलो सृजन के गान सुनायें।
बैठ रात की इस चौखट पर, आओ गीत भोर के गायें।।

किसने फूँकी सारी बस्ती, यह विचार का विषय नहीं है।
कितने घर, दालान जल गए, चर्चाओं का समय नहीं है।
इस विनाश के दामन में ही, नव निर्माण छुपा होता है...
विध्वंसों की राख उठाकर, चलो सृजन के खेत उगायें।
बैठ रात...

सूरज चाँद सितारों को भी, बदली आकर ढक लेती है।
शक्तिमान को पल दो पल में, शक्तिहीन सा कर देती है।
इसका अर्थ नहीं है उनका, तेज शून्य ही रह जाता है..
आओ हाथ बढ़ाकर अपने, हम बदली की परत हटायें...
बैठ रात की चौखट ....

समय मिला तो पृष्ठ पलटकर, पीड़ा का अनुवाद करेंगे।
बीते कल का रुदन उठाकर, टूटे सपने याद करेंगे।
किन्तु अभी तो समय नहीं है, हमको कुछ सपने गढ़ने हैं..
चलो समय की ईंटें चुनकर, हम भविष्य का महल बनायें...
बैठ रात...
***


2-
राम आज भी वनवासी हैं, बदले कितने दौर।

घूम रही हैं सूर्पणखा अब, लेकर ऊँची नाक।
चिंतित, व्याकुल, बेकल सी हैं, छान-छान कर खाक।
किन्तु न लक्ष्मण जैसा जग में, दिखता कोई और....
राम आज...

सीता सी प्रतिमाएँ दिखतीं, जग उठती है आस।
किन्तु वहाँ कल्पित ही लगता, सीता का आभास..।
मन में भरी कलुषता दिखती, तन दिखता है गौर....
राम आज...

बजरंगी, सुग्रीव, जटायू, कहाँ गए सब पात्र।
रंगमंच या ग्रन्थों में ही, दिखते हैं ये मात्र।
संत विभीषण को कलयुग में, नहीं सूझता ठौर.....
राम आज...

मंदिर में भी केवल पत्थर, करते हैं आराम।
गाय और गङ्गा भी लगते, केवल कल्पित नाम।
किसे लगायें भोग पूछते, रोटी के सब कौर...
राम आज...

जंगल, झरने, पर्वत, नदियाँ और हजारों ग्राम।
खोज-खोज कर हार गये सब, नहीं दिखे सुखधाम।
कहाँ गए अब आ भी जाओ, जगती के सिरमौर....
राम आज...


3-
जीवन के इस रंगमंच ने अब भी सार नहीं बदले हैं।
केवल चेहरे बदल गये हैं पर किरदार नहीं बदले हैं।।

भले मुखौटे गढ़े गए हों, मर्यादा की सीमाओं में।
किन्तु कंस के कृत्य वहीं हैं, कलाकार की लीलाओं में।
बदले कितने ही दरबारी, पर दरबार नहीं बदले हैं .....।
केवल चेहरे...

कृष्ण सुदर्शन छोड़ बाँसुरी लिए हाथ में मुसकाते हैं।
नहीं सुनाते दिखते गीता, रास रचाते दिख जाते हैं।
बदल गए युग, बदले दर्शन, पालनहार नहीं बदले हैं...
केवल चेहरे...

स्वार्थ ओढ़कर दुबक गए हैं, रिश्तों के अनुबंध अकेले।
बिन मौसम आँखों का बहना, आखिर हृदय कहाँ तक झेले।
दीवारें, छत बदल गये हैं पर आधार नहीं बदले हैं....
जीवन के...
***


4-
छोड़ धुन हठधर्मिता की, प्रेम की धुन गुनगुनाते..
काश तुम अब लौट आते...

प्राण लेकर तन दिया तो क्या दिया है।
चैन लेकर मन दिया तो क्या दिया है।
आत्मा की पीर सुनकर, तुम जरा तो ठिठक जाते...
काश तुम अब लौट आते...

एक चंदन बिन तुम्हारे जी रहा है।
विष विषैले विषधरों का पी रहा है।
दूर से ही इस हृदय की, जलन को भी जान पाते...
काश तुम अब लौट आते...

साथ मिलकर साधना का व्रत लिया था।
प्रेम की सद्भावना का व्रत लिया था।
चार दिन विश्वास देकर, यों नहीं नजरें चुराते...
काश तुम अब लौट आते...

था वचन मेरे बिना जीना नहीं है।
यों गरल छल छद्म का पीना नहीं है।
प्रेम के बंधन हमारे, प्राण लेकर भी निभाते...
काश तुम अब लौट आते...
***

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