संस्मरणात्मक कहानी: ड्राई फ्रूट्स

प्रियांकी मिश्रा
"अचार बना रही, बीस किलो आँवला लेकर आये थे तुम्हारे पापा," थकी सी आवाज़ आ रही थी फोन के दूसरी ओर से।

"क्या मम्मी, क्यों इतनी मेहनत करती हैं आप, इतना ज्यादा बनाने की जरूरत क्या है?अब आपको ये सब क्यों करना है ...", इस छोर से मैं बोल रही थी। तकलीफ हो रही थी मम्मी को इतना कष्ट करते देख। 
"अरे, ये कष्ट नहीं, इसी मे सुख मिलता है..थोड़ा तुम्हारे लिए, थोड़ा तुम्हारे भाई के लिए ... और पापा को तो जानती ही हो, कितना पसंद है उन्हे यह अचार ...", इसके आगे मौन हो जाने की बारी मेरी थी। फिर भी मैं बोली, "अब तो हम लोगों को खुद बनाने दो, जैसा भी बने, सीखेंगे भी, थोड़ा बोझ भी कम होगा तुम्हारा।"

मुझे पता था, बेमानी हैं मेरे शब्द, वे कभी नहीं मानेंगी। हमारे घर बड़ी और अचार के मर्तबान भेज कर ही संतोष का मुख देखेगी। अंततः, बोलबाल कर चुप हो गई मैं।

व्यस्त दिनचर्या में थक हार कर बैठ जाती थी मैं जब तब। सलाह दी किसी ने, "कुछ ताकत के लिए लिया करो। " बहुत सोच समझ कर बाजार से एक दिन कुछ काजू, किशमिश और डेट्स खरीद लाई थी मैं। बैठी बैठी चबाया करती थी फुरसत में, अक्सर याद नहीं रहता था मुझे। रसोई में काम करती हुई, मेरी मददगार, कभी-कभी उसे भी पकड़ा दिया करती तो खुश हो जाती थी वह। "बहुत अच्छा लगता है मुझे दीदी", बोल कर मुस्कुरा देती थी वह। 

पापा कुछ दिनों के लिये मेरे छोटे भाई के पास आये हुए थे, अपने दाँतों का इलाज करवाने। भाई भी उसी शहर में रहता है जहाँ मैं। बस, अभी इलाज खत्म ही हुआ था कि कोरोना का कहर हमारे देश, शहर पर भी बरपा। हठात् लॉकडाउन हो गया। पापा को भी वापस अपने शहर जाने की मनाही हो गई। सभी अपने अपने घरों में नजरबंद थे। मेरी भाभी उन दिनों उम्मीद से थी। उसका छह साल का लड़का दिन रात पापा की गोद में चिपका रहता। इतिहास, भूगोल से संबंधित कितनी ही जानकारी उसे अंक मे बैठे बैठे ही हासिल हो गई। वीडियो कॉल करती तो कई ऐसे प्रदेश और उनके प्रतिनिधियों के नाम साधारण बातचीत के क्रम में वो बोल जाता कि मैं हैरत में पड़ जाती थी। कई बार तो मुझे भी कई बातें इतनी नई सी लगतीं कि मैं भी पापा से उनके बारे पूछ बैठती। उसके सामान्य ज्ञान की वृद्धि आश्चर्यजनक थी और उसका अंतर्मुखी सा व्यक्तित्व सहसा परिवर्तित हो गया था। मैं महसूस कर पा रही थी कि पापा के साथ ने सहसा उसे बहुत खुशमिजाज और बातूनी बना दिया था। 

लॉकडाउन बढ़ता ही जा रहा था। छोटे भतीजे का जब जन्म हुआ, उस समय भी पापा ही उसके सहचर बने रहे। मेरे भाई का भी मानसिक संबल बना हुआ था कि पापा उसके साथ हैं। उसी बीच, बड़े भतीजे को गले में एक गिल्टी हो गई जो काफी तकलीफदेह था और उसका एक छोटा आपरेशन भी करवाना पड़ा। कुल मिलाकर, वह भारी समय पिता के साथ रहने की वजह से थोड़ा कम दुष्कर प्रतीत हुआ। 

वैसे, यह मेरी निजी राय है, पुत्री होने की वजह से मैं यह सब अपने नजरिये से कह रही हूँ। हो सकता है, पुत्र या पुत्रवधु का नजरिया कुछ और हो। जो भी हो, मतांतर स्वाभाविक है; मतभेद हो सकता है, मतभेद होना कष्टदायी होता है। पर वैसे भी, पाँचों अँगुलियाँ बराबर नहीं होती। परिस्थितिजन्य स्वभाव परिवर्तन मानव स्वभाव का नियम है और इसे जितनी शांति से मान लिया जाए, उतना श्रेयस्कर होता है। 

बहरहाल, लॉक डाउन समाप्त हो गया था। छोटा भतीजा  भी दो तीन महीने का हो चला था। लॉकडाउन होने की वजह से माँ का इतने जतन से समेटा हुआ वह बैग समेटा ही रह गया था जिसमें उसने अपनी पुरानी, नर्म, मुलायम सूती साड़ियाँ रखीं थीं बच्चे को जन्म के तुरंत पश्चात उसे ओढ़ाने, पहनाने के लिए और भाई के पुराने छोटे कपड़े भी। वह बैग उसी तरह धरा रह गया था और साथ में उसके अरमान भी। माँ भी उसे देखने को छटपटाई हुई थी तो छोटी बहन के साथ भाई के यहाँ आई। कुछ दिन सब के साथ आनंदपूर्वक बिता जब वह वापस लौटी तो पिता भी साथ में चले गए।

कुछ दिनों के पश्चात जब मैं पुनः भाई के यहाँ पहुँची तो मेरा बड़ा भतीजा बहुत उदास लगा मुझे। ऐसा लगा जैसे कोई खिला हुआ फूल सहसा कुम्हला गया हो। "आप को मैं नहीं जाने दूंगा अपने घर", मेरे ही दुपट्टे से मुझे बांधते हुए बोला, "बांध कर रख लूंगा अपने पास मैं।" 
"फिर भइया को कौन देखेगा", मैंने पूछा। 
"मैं उन्हें भी बांध लूंगा और पीसाजी को भी", वह अपनी धुन में बोले चला जा रहा था। हाय रे बालमन, मानवीय रिश्तों की गुत्थियों को तुम क्या समझ पाओगे। तुम तो शायद अभी परमात्मा के ही जीते जागते स्वरूप हो। उसके निश्छल प्रेम पर मैं वारी-वारी जा रही थी।

एक दिन जब मैं पुनः अपने लिए ड्राई फ्रूट्स खरीद कर लाई तो मेरी कामवाली बोल पड़ी, "पहले वाला खत्म हो गया क्या भाभी"। मेरे हामी भरने पर वह बोल पड़ी, "अच्छा किया, मुझे तो गीला और सूखा दोनों ही खजूर बहुत पसंद हैं।"

मैं चौंक उठी, "गीला...सूखा....मतलब...मैं ठीक से तुम्हारा मतलब समझी नहीं।" 
"हाँ, भाभी, गीला मतलब खजूर और सूखा मतलब छुहारा, ठीक बोल रही न...आप क्या कहती हैं अंग्रेजी में ...डेट्स...उसको हम गीला खजूर कहते हैं।"
 
वाकई, सोच में पड़ गई मैं। सच ही तो बोल रही थी वह। जब ताजा हो तो खजूर और जब कड़ी धूप कई दिनों तक झेले, तो ड्राई फ्रूट बन जाता है यह साधारण फल। जरा और गहरे सोचने लगी तो लगा, अरे, शायद इसी लिए इन सबों को ड्राई फ्रूट्स बोलते हैं। सूर्य का कड़ा ताप सह कर, अपनी सारी नमी खोकर ये बाकी फलों से कितनी उच्च श्रेणी पा जाते हैं। मेवा बन जाते हैं ...स्वाद खुद का भी बढ़ जाता है...जिस भी पकवान में डालो, सोने पे सुहागा कर देते हैं। कई दिनों तक बंद कर, सहेज कर रख दो, खराब नहीं होते, दो चार रोज फाँक लो, कहते हैं, यौवन और बल, दोनों में वृद्धि कर जाते हैं।
 
सोच रही थी बैठे बैठे भतीजे के बारे, क्योंकर इतना विचलित, कितना एकाकी लगा वह। फिर याद आने लगे थे ड्राई फ्रूट्स... जब तक थे, कितना चंचल, कितना हँसमुख...था वह बच्चा। गिल्टी के लिए जब उसे इंजैक्शन मिलने वाला था, दादाजी को अपना संबल बना कर लाया था वह। "डॉक्टर ने यदि इंजैक्शन दिया, अपनी छड़ी से उसकी पिटाई कीजियेगा", उसने कहा था। दादाजी से पूर्ण आश्वासन मिलने के पश्चात ही वह हॉस्पिटल आया था। जब इंजैक्शन दिया जा रहा था उसे, वह सचमुच चीख रहा था, "दादाजी, अपनी छड़ी लेकर आइये।" दादाजी बाहर सबों से नजरें चुराकर अपनी आँखें पोंछ रहे थे। सच...ड्राई फ्रूट्स ही तो हैं  ये। 

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