कविताएँ और रेखाएँ: तन्वी गौरव श्रीवास्तव

तन्वी गौरव श्रीवास्तव
ज्ञेय बनाम अज्ञेय …

विकराल जामुन की गीली टहनी पे
प्रेम पनपना संभवतः
जीव में कसैलापन छोड़ गया हो,
पर प्रेम में तुम जब वृक्ष हुई, सदु!
ये ही खिड़की से टुकुर-टुकुर झाँकती
चमेली की बेलें साक्षी रहीं।
तब फूलों का टूटना, उन्हें आँचल में समेटना
उनका यत्नपूर्वक गिरना और बीन लिया जाना और
जतन से उन्हें वेदी पे भेंट चढ़ाने का स्वांग
भले ही विकासक्रम के सिद्धांत से विलग हो, सदु!
पर कभी सुना है, मैले फूलों को किसी देवता ने
सहर्ष स्वीकारा हो?

करेले भात और अंबल मात्र से सम्पन्न हो जाने वाले
किसी वैष्णव का भलमन अनुसंधान का विषय है।
पर तुम्हें तो चकित करता है उसके चेहरे का परमसंतोष और
वितृष्णा से भर देता है उसपे हो रहे अत्याचार।
स्वीकारा तुमने भी नहीं ईश्वर के होने को कभी
ऊपर-ऊपर ही सही।
फिर वैष्णव स्त्री होने की दुविधा
स्त्री होने के अपराध से प्रबल क्यूँ? सदु!
जो चरमदुःख होने पे सद्गामी हो चले;
के सहसा तुम अज्ञेयवाद पे मौन हो जाओ
अपने नास्तिक होने को नकारो, खूब कोसो
अपने ईश्वर में परम आस्था की बात करो और
तुम्हारा इष्ट तुम्हें उन मैले फूलों सा सहर्ष स्वीकारे।
है न? सदु!
***

माँ!


रसोई के बेढब बर्तनों में पकते;
जो खट्टे-मीठे स्वाद हैं, मेरी आँच के हैं!
उनकी जुगाड़ में,
कुछ खर्च दी मैंने ज़िन्दगी।

तुम्हारे बटुए से चुराए;
जो सिक्के हैं, मेरे बचत के हैं!
उनकी जुगाड़ में,
कुछ खर्च दी मैंने ज़िन्दगी।

आँचल के खूँटे से बंधे;
जो बनते बिगड़ते रिश्ते है, मेरे खपत के है!
उनकी जुगाड़ में,
कुछ खर्च दी मैंने ज़िन्दगी।

मेरे बच्चों के माथे से रिसता
जो सुकून है, मेरे जतन का है!
उसकी जुगाड़ में,
कुछ खर्च दी मैंने ज़िन्दगी।
***



ताक़ का घोड़ा


एक करवट की चोट;
और रसोईघर की खिड़की से झाँकू तो
नीला हरा समुद्र बाहें नहीं फैलाता
ना ही ऊँचाई से ऊँचा मैं
अपने धवल धावक से प्रतिबिम्ब को देख इतरा पाता,
लहरों पे चलने वाली रेलगाड़ी
मेरी मंजिल का ढोल नहीं पीटती
ना उसमे लदे वे बदसूरत लोग
मेरे हिस्से का विदागीत गाते,
जिन्हे पहचानने की हर मुमकिन कोशिश की मैंने।
एक करवट की चोट;
और कागज़ की हल्की- नीली सी
जंग -ए-मैदान पे दफ़अतन उकेरा गया मैं,
किसी वीरांगना के प्रिय सा
भाल -कृपाण -ज़ब्त और एक दुधमुंहे से लेस।
पर टिकता नहीं, मैं चल पड़ता हूँ
हुंकार भरते अगले पड़ाव को, जोखिम उठाने,
पर थकन से पस्त वे बदसूरत लोग
अब भी, मेरे अंश का शौर्यगीत नहीं गा पाते
जिन्हे पहचानने की हर मुमकिन कोशिश की मैंने।
एक करवट की चोट;
"मैं अपनी आजमाइश पर, टूटने को बेसबर
नामुमकिन बड़ा, बेकदरी में पूरा-पूरा "
हर शाम ताक़ पे एक लौ जला करती है
सिर जोड़े मेरी परछाइयां बगावत पे उतरती हैं
फिर कहीं सिमट के वे रात का इशारा करती है।
खुद में उबलता वो लाल सूरज
अपनी आखिरी टहल भी पूरी करता है और
रात बिखरे मोतियों की
मैं माला गढ़ता हूँ
एक अपने प्रतिबिम्ब को
एक उस वीरांगना को भेंट करता हूँ और
बाकी बने उन बदसूरत लोगों के कब्रों पे चढ़ा आता हूँ,
जिन्हे पहचानने की हर मुमकिन कोशिश की मैंने।
मैं ताक़ से सुन्दर कब्रिस्तान से
हर रात सच्चे सपने मढ़ता हूँ
इसी लहद पे इतराता, हुंकारे भरता
मैं गीत मिलन के
लिखता और मिटाता हूँ।

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