विविध रंगी फूलों का गुलदस्ता: कुछ एहसास, कुछ इल्जाम

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: कुछ एहसास, कुछ इल्जाम (काव्य संग्रह)
लेखक: विश्वभूषण
पृष्ठ: 104
मूल्य: ₹ 150.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2014
ISBN: 978-93-82004-08-0
प्रकाशक: पुण्य प्रकाशन, दिल्ली-95


हिन्दुस्तानी अकादमी प्रयाग और उत्तर प्रदेश सरकार के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित, जिलाधिकारी के पद पर कार्यरत युवा विश्वभूषण मिश्र जी का पहला गजल-गीत-कविता संग्रह-‘कुछ एहसास, कुछ इल्जाम’ अवलोकनार्थ मिला। कविता का उद्गम हृदय से होता है। यद्यपि उसे सायास लिखा तो जा सकता है लेकिन तब वह निर्जीव सा आभास ही करायेगी, और उसमें किसी के हृदय में गहरे उतर जाने की शक्ति का नितान्त अभाव ही दृष्टिगोचर होगा।

और यह भी सत्य है कि कविता पर किसी वयविशेष का अधिकार नहीं होता। समय की भट्टी में तपकर जिसने भी यथार्थ के खुरदरे धरातल पर चलकर अनुभवों की गठरी बांधी होती है या प्रेम के संयोग-वियोग की पीड़ा का डूबकर आनन्द लिया होता है, वही राधा, मीरा और सूरदास या कबीरा की श्रेणी में अपने को लाने में सफल हो जाता है।

बहुत कम साहित्यकार होते हैं जो उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचने के बावजूद अपनी रचनाओं में पूर्ण परिपक्वता का पुट दे पाते हैं लेकिन श्री विश्वभूषण मिश्र की इस पुस्तक को पढ़ते हुए अनुभव होता है कि जीवन के अनुभवों और अनुभूतियों को कसकर पकड़ने और उन्हें अभिव्यक्त करने की पूर्ण क्षमता विश्वभूषण जी में विद्यमान है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
कम उम्र में ही अपने गहन अनुभवों को इस काव्य-संग्रह में उकेरने वाले विश्वभूषण जी की 24 गजलें तथा 34 गीत और कविताएँ इस पुस्तक में समाहित की गई हैं।

प्रेम आस्था और विश्वास पर जीवित रहता है। व्यापारिक दृष्टिकोण से किया गया प्रेम, प्रेम नहीं होता व्यापार होता है जो रिश्तों का महत्व समझते हैं वे व्यापारिक दृष्टिकोण से सम्बन्ध नहीं बनाते। इसी बात को विश्वभूषण जी ने बड़ी खूबसूरती से व्यक्त किया है-

जिन्हें बदलना आये साथी, उनको जाने से क्या रोकें
हम रिश्तों में जीते हैं, करते इनका व्यापार नहीं। (पृष्ठ-18)

तथा-

यहाँ जब दिल में भी दुकानें सजने लगीं
कुछ यादें समेट हम बेघर चले आये। (पृष्ठ -22)

मनुष्य आज इतना स्वार्थी और चालाक हो गया है कि उसकी नीयत और वास्तविकता को भी समझ पाना मुश्किल हो गया है। कवि हृदय चूंकि भावुक एवं अति संवेदनशील प्राणी होता है, छोटी से छोटी बात भी कवि हृदय को चोट पहुँचाती है। इसी बात को व्यक्त करने का प्रयास किया गया है इस गजल में-

बड़े शहरों की ऐसी शराफत से तौबा
नकली वादें औ झूठी नजाकत से तौबा।

ना सच का पता न गुमान-ए-जमीर
उनकी मोहब्बत-अदावत से तौबा।

सहूलियत के मुताबिक अहसास बदलें
रिश्तों की ऐसी मिलावट से तौबा। (पृष्ठ -23)

तथा-

मोहब्बतों में जब दांव चलने लगते हैं
जिन्दगी के मकसद बदलने लगते हैं। (पृष्ठ -29) 

आज अधिकांश लोगों में अपने आप को बड़ा सिद्ध करने और दूसरे को छोटा सिद्ध करने की होड़ सी लगी है। कवि हृदय इसे उचित नहीं समझता। भारतीय संस्कृति की अनुपमता कवि को लुभाती है। इसीलिए लिखा है-

किसी का कद घटाकर के बड़ा होना नहीं आता
हमें अब तक कतारों में खड़ा होना नहीं आता। (पृष्ठ -37)

तथा-

बुजुर्गों की ये तालीम मुझको याद रहती है
खाना खुद नहीं खाना, अगर मेहमान बाकी है।

नाइंसाफी की जानिब कलम नहीं झुकती
फकीराना तवियत है और ईमान बाकी है। (पृष्ठ -38)

टूटा बहुत मर्तबा लेकिन झुका नहीं
उसूलों से बढ़ के कभी कुछ लगा नहीं। (पृष्ठ -41)

तीन खण्डों में विभाजित इस संग्रह के दूसरे खण्ड में 29 गीत और कविताएँ समाहित हैं। विश्वभूषण जी की जितनी अच्छी पकड़ गजल पर है उससे कहीं अधिक मार्मिकता और सौन्दर्य उनकी कविता और गीतों मे परिलक्षित होता है। चाँद-रजनी शीर्षक से पूरी पद्य कथा को बहुत सलीके से बांधा गया है-

रजनी उर में झाँक-झाँक मैंने देखा है स्पंदन
श्वेत अभिर्भावित चंदा का है देखा शीतंल क्रंदन।

.........

तारक-विहीन आँचल हो तुम, आभा विहीन मैं चंद्र तुम्हारा
साथी नयनों में झाँको परखो अब शीतल प्रेम हमारा। (पृष्ठ -47)

राष्ट्र-अभिव्यक्ति, राष्ट्र-आव्हान और राष्ट्र-पुनर्स्थापना जैसी कविताओं में राष्ट्र के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया है कवि ने जो निश्चित ही कवि की राष्ट्रवादी विचारधारा की पुष्टि करती हैं-

आत्मोत्सर्ग का प्रतिबद्ध राग
हर भारतवासी अब रहा जाग

रण भेरी बजती जागो अचेत
दो मातृ भूमि पर शीश त्याग।


अब परिवेश बदलना होगा
बहुत सम्हलकर चलना होगा
प्रत्यक्ष शिखण्डी लाख खड़े हों
अप्रत्यक्षों से लड़ना होगा। (पृष्ठ -67)

पत्थर-पत्थर शिवलिंग यहाँ
दीप-दीप ज्योतिर्मय है।
यही आर्यावर्त है जिसका
इतिहास बड़ा महिमामय है। (पृष्ठ-75)

जिन्दगी की दौड़, दिल चैराहा, मन की हार आदि कई कविताएँ हैं जो कवि की दार्शनिकता की ओर इशारा करती प्रतीत होती हैं।

जीवन में सकारात्मकता का बहुत महत्व होता है। निराशा व्यक्ति को कमजोर करती है इसलिए कवि ने कविता-‘फिर भी फूल खिले जीवन में’ कविता में आशावान बने रहने का उद्घोष किया है-

द्वन्द्व यहाँ
संघर्ष यहाँ
मानवता के क्रंदन पर भी
लेाग मनाते हर्ष यहाँ
रेत उड़ा करती मरुवन में
फिर भी फूल खिले जीवन में। (पृष्ठ-70)

एक सौ चार पृष्ठीय संग्रह कुछ ‘एहसास, कुछ इल्जाम’ में कुल 58 रचनाएँ संग्रहीत हैं। प्रत्येक रचना अपनी उत्कृष्टता सिद्ध करती प्रतीत होती है।

संग्रह का आवरण मोहक एवं मुद्रण त्रुटिहीन है।

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