विकास की भूल-भुलैया: [3] गाया-संकट और गांधी-दर्शन की प्रासंगिकता

चंद्र मोहन भण्डारी
धीरे-धीरे ही सही यह बात स्पष्ट होती जा रही है कि एक अध्याय जिसका आरम्भ पश्चिम में हुआ हो उसका समापन भारतीय तरीकों से ही होना होगा यदि मानव को आत्म विनाश से रोकना है। मानव इतिहास की इस अत्यंत संकटपूर्ण स्थिति में अगर कोई समाधान संभव है तो भारतीय तरीके से ही।
- आर्नाँल्ड टायनबी, इतिहासविद
 
आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता में ही उसके विनाश के बीज निहित हैं।
- महात्मा गांधी

डगमगाती नैया
कल्पना करें एक जहाज की जिसपर दुनिया के सारे इंसान और जीव-जंतु सवार हैं। जहाज पर बहुत अधिक वजन के कारण, कुछ लहरों के थपेड़ों से और अन्य कारणों से भी जहाज डगमगाने लगा है। अधिकतर यात्री निश्चिंत हैं। पर कुछ को चिंता है कि नाविक कहाँ ले जाना चाहता है जहाज को? सब ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे सकुशल अपनी मंजिल तक पहुँचें। यह बात एकदम कल्पना की उड़ान भले लगती हो पर है एकदम सही आज के हालात बयाँ करने के लिये। यह धरती ही वह जहाज है और कुछ जानकार समझ रहे हैं कि समस्या गंभीर है और वे इसका आकलन करने में प्रयासरत हैं।

ग्रीक पौराणिक आख्यानों में चर्चित ‘गाया’ जो हमारे लिये धरती माता है आज नये संदर्भों में अचानक गहन व गंभीर चर्चा का विषय बन चुकी है जिसके विषय में विस्तृत चर्चा पिछले लेखों [1, 2] में की गई है और जो आज की  तारीख में पूरे विश्व के लिये जीवन-मरण का सवाल बनता जा रहा है। गाया ही वह जहाज है जिस पर विश्व के जीव सवार हैं और लहरों में जहाज का डगमगाना बढ़ता ही जाता है। गाया को अस्थिर करने वाले कारणों व उनसे जुड़े संदर्भों की विस्तृत चर्चा पहले लेख में हो चुकी है; यहाँ हमारा प्रयास होगा उसे भारतीय संदर्भ में समझने का, ताकि जब भी उचित कार्यवाही का अवसर होगा हम स्वयं को तैयार पा सकेंगे।

हम भारतवासियों की कुछ लाक्षणिकताएँ हैं जिनमें मुख्य है इतिहास से कुछ सीखना नहीं; वैसे भी विश्वगुरु जो हैं (यह दूसरी मुख्य लाक्षणिकता है) हमें सिखा सकने लायक योग्यता किसमें है? इतिहास न सही हम भूगोल से ही अगर सीख लेते तो उत्तराखंड में नंदादेवी ग्लेशियर वाली त्रासदी न होती या होती भी तो नुकसान अपेक्षाकृत  कम होता। इन बातों की भी चर्चा पिछले लेखों में हो चुकी है। फिर भी संक्षेप में ही कुछ बिंदुओं की पुनरावृत्ति  अन्यथा न होगी।

गाया – ग्रीक पौराणिक आख्यानों में जीवित धरती का प्रतीक, जिसमें जीवन को अस्तित्ववान करने और उसके संरक्षण की क्षमता पिछले लगभग तीन अरब सालों से लगातार रही है मात्र तीन सौ सालों में उस बिंदु पर पहुँचने की ओर अग्रसर है जहाँ उसकी जीवनदायिनी व जीवन-रक्षक क्षमता समाप्त होने के कगार पर है अगर विकास की तथाकथित अंधी दौड़ [3, 4] इसी प्रकार चलती रही। यह समस्या पूरे विश्व की है और तय है कि कोई भी सार्थक प्रयास अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही होना होगा। साथ ही कुछ स्थानीय स्तर की भी समस्याएँ हैं जिन्हें उसी स्तर पर आकलन कर निपटना होगा।

गाया संकट और भारत
वैश्विक ताप वृद्धि और प्रदूषण कुछ दशक पहले तक मानव मात्र की समस्या माने जाते रहे पर पिछले दो दशकों में यह स्पष्ट हो चुका है कि संकट गाया के अस्तित्व पर भी छाया है और अगर सही समय में आवश्यक कदम न उठाये जायें तो गाया की स्व-नियोजन प्रणाली [2,3] बिखर सकती है। हमारी अब तक की जानकारी में यह अकेला ग्रह है जिसमें जीवन की संभावना अरबों सालों से बनी रही है। इसके बावजूद यह कहना मुश्किल होगा कि भविष्य में हालात ऐसे ही बने रहेंगे।

वैश्विक ताप वृद्धि का सबसे अधिक असर जिन बड़े देशों पर होगा उनमें भारत अग्रणी है और उसकी समस्या की गंभीरता का आकलन करना तो दूर हमने उस दिशा में सोचना भी आरम्भ नहीं किया। हाल की त्रासदियों से संदर्भ लेकर भारतीय भूभाग से जुड़ी मुख्य समस्या का जिक्र पहले लेख में किया गया था। हिमालय जो न केवल नदियों का स्रोत है अपितु वह इस भूभाग के पर्यावरण का भी संतुलन बनाये रखता है।

आजकल चर्चा में है ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी हिमरेखा पीछे  खिसकती जाती है। गंगोत्री ग्लेशियर हो या कोई और, उत्तरी ध्रुव हो या दक्षिणी, हर कहीं हिम रेखा पीछे खिसक रही है औेर घनीभूत अब द्रवीभूत होता जा रहा है। वैश्विक ताप का बढ़ना जारी है और यही हाल रहा तब उन सरिताओं का क्या होगा जो ग्लेशियरों से अवतरित होती आई हैं। जब भारी बारिश होगी तब बाढ़ की तबाही और जब नहीं होगी तब सूखे की मार। वह धीरे-धीरे बारहों मास जल आपूर्ति की बात इतिहास बन चुकेगी और बच्चे किताबों में पढ़ेंगे कि कभी ऐसी सरिताऐं भी हुवा करती थीं जिनमें जल-प्रवाह निरंतर बना रहता था।

 पूरा हिमालय क्षेत्र जिस सीसमिक जोन में आता है वहाँ भूकम्प का खतरा सदा बना रहता है और उच्च तीव्रता वाले भूकम्प आने की संभावना बनी हुई है। सब मिलाकर यह बात उभर कर आती है कि संवेदनशील क्षेत्र में कोई बड़ी परियोजना बहुत सोच-समझकर ही लेनी चाहिये।

बात केवल परियोजनाओं की ही नहीं और भी है। जिस तरह बद्रीनाथ केदारनाथ क्षेत्र में निर्माण कार्य हो रहा, पर्यटन को अनावश्यक बढ़ावा दिया जा रहा वह भी चिंता का विषय है।

दूसरी बात यह कि हमारी आबादी क्षेत्रफल के हिसाब से विश्व में अधिकतम की सीमारेखा में है और इतनी बड़ी आबादी के लिये न केवल संसाधन एकदम अपर्याप्त हैं अपितु उसकी मूलभूत जरूरतें भी पूरी कर पाना आसान नहीं। लेकिन हम हैं कि वही शुतुर्मुर्गी मुद्रा धारण किये हैं और आने वाली विकराल समस्या को देखना ही नहीं चाहते। हमारा विकास का मौडल वही है जो यूरोप या अमेरिका का है लेकिन वह दूरद्दष्टि नहीं जो अपेक्षित है। 
विश्व की ७ अरब से अधिक आबादी उस सीमा रेखा से बहुत ऊपर है जिसकी जरूरतें धरती के संसाधन पूरा कर सकें। भारत की स्थिति औसतन और भी कठिन जान पड़ती है। वजह यह कि हम कल की बात सोच सकने की हालत में नहीं, बस केवल आज भर की सुध ले सकते हैं। हमारी आबादी और हमारी जरूरतें सुरसा के मुँह की तरह फैलती जाती हैं और धरती के संसाधन कम होते जाते हैं। समस्या की विकरालता का कुछ अनुमान वर्तमान (2020-21) के संक्रमण काल में दिखाई दिया विशेषकर संक्रमण की दूसरी लहर के साथ जब हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। ऐसी विराट त्रासदी में तबाही तो होती ही है और विश्व के अन्य देशों में भी हुई है पर जिस तरीके से हम लाचार एवं मजबूर दिखाई दिये वैसा कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिला।
पेडों की छायाएँ जमीन में धंसती हैं
बढ़ती जरूरतें जिन्दगी को डसती हैं
लेकिन चिन्ता किसे है कल की
‘आज’ एकदम सामने जो खडा
मुँह बाये, हाथ फैलाये
उम्मीद से देखता, टकटकी लगाये!
खाली हाथ उसे कैसे लौटाएं?
कल की कल देखेंगे
वो चाहे लौटे, चाहे ठहर जाए।
(सेतु, मार्च 2021)

संक्रमण-काल मे ऐसा दौर भी देखा जब कल की तो दूर हम आज की सुध ले सकने में भी नाकाम रहे।
कैसी विड़म्बना है आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन नसीब नहीं जबकि दूसरी ओर उपभोक्ता संस्कृति भी अपने पैर पसार रही है। स्वच्छ हवा और पेय जल सबके लिये मुहैया कराना वैसे भी आसान न था जरूरतमंद लोगों के लिये प्राणवायु आक्सीजन की आपूर्ति में विकास का वर्तमान प्रारूप चरमरा गया। कुछ सीमा तक इस तरह की बात अन्य देशों में भी विद्यमान है पर जिस स्तर पर यह विरोधाभास हमारे देश में परिलक्षित होता है वह हमारे राष्ट्रीय चरित्र की कमी को उजागर करता है। जो विकराल समस्याऐं हमारे सामने खड़ी हैं हम उनकी अनदेखी कर एक सब्जबाग का सपना परोस रहे हैं, यह जानते भी कि यह असंभव है। कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में:

प्रश्न जितने बढ़ रहे हैं
घट रहे उतने जवाब
होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है। 

होश में बेहोशी का आलम संक्रमण काल में अच्छी तरह देखने को मिल गया। कुव्यवस्था एवं अदूरदर्शिता वाली  बात अपनी जगह पर है पर सबसे दु:खद तो यह है कि आबादी की अनियंत्रित वृद्धि एक टाइम-बम की तरह है जिसका आकलन करने को कोई तैयार नहीं। आश्चर्य होता है यह देख कर कि इस स्तर की त्रासदी से गुजरते हुए भी हमारा जनमानस और नेतृत्व दोनों ही आबादी विस्फोट की समस्या को नजरअंदाज करते आ रहे हैं। साथ ही हर स्तर पर अदूरदर्शिता एवं कुव्यवस्था हमारी मानसिकता में गहरे समा चुके हैं।

द्वि-स्तरीय प्रयास
समस्या समाधान के लिए हमें दो स्तरों पर विचार करना होगा -- बाह्य एवं आंतरिक। पर्यावरण की चिंता अपनी जगह है पर उस दिशा में भी बाधा आने का एक कारण आंतरिक भी है यानि हमारी सोच। हमें विकास  संबंधी अपनी सोच में आमूल परिवर्तन करने होंगे। काम कठिन जरूर होगा पर इसके सिवा कोई रास्ता भी नहीं दिखाई देता। 

कुदरत से रिश्ता
बेकनी सोच का जिक्र पहले किया गया है जिसमें कुदरत को जंजीरों में बांधना और प्रताड़ित कर उसके राज उगलवाने की बात है। आधुनिक विज्ञान के आधार में यह सोच विद्यमान है। हमारी पारम्परिक सोच ‘माता भूमि:, पुत्रोहं पृथिव्या’ की रही है। बेकनी सोच और पारम्परिक सोच के अलावा भी क्या हमारा कोई रिश्ता कुदरत से जोड़ा जा सकता है? याद आता है अलबर्ट कामू का कथन: ‘मेरे आगे मत चलो, मैं तुम्हारा अनुगमन न कर सकूंगा, मेरे पीछे भी मत चलना, क्योंकि मैं मार्ग दर्शक नहीं बन पाऊंगा। चाहूंगा मेरे साथ चलो, एक दोस्त बनकर। कामू का कथन कुदरत के संदर्भ में नहीं था पर उसे इस तरह भी लिया जा सकता है। वैसे कुछ लोग जिनमें कामू शामिल हैं यह मानते हैं कि कुदरत तटस्थ है और हमें उसे इसी रूप में स्वीकारना होगा।

वैसे कुदरत के संबंध में कई तरह के सोच लेकर चला जा सकता है: मातृ रूप (पारम्परिक), दासी रूप (बेकन) और सखा रूप (कामू)। पहली और तीसरी सोच में आधारभूत अंतर नहीं है क्योंकि पुत्र भी बड़ा होने पर मित्र या सखा ही होता है। यह तो हुई आधारभूत सोच की बात; असली दिक्कत तो अब आरम्भ होती है कि क्रियान्वयन के स्तर पर उन मानवीय कमजोरियों से कैसे निपट सकेंगे जिनकी वजह से अंधे युगों की परम्परा [1] समाप्त होने का नाम नहीं ले रही।

हालात बेहद मुश्किल हैं रास्ता भी नहीं सूझता; लेकिन रास्ता है और वह रास्ता हमारे अपने ही बीच से किसी द्दष्टा ने दिया है जिसे हम और सारी दुनिया अब तक नकारती रही; अगर कोई विकल्प है तो वही सादा जीवन और उच्च विचार का; वही रास्ता जो कभी गांधी जी सहित अनेक मनीषियों ने सुझाया था लेकिन हमने कभी उसपर गौर तक नहीं किया। विकास का जो मौडल सारी दुनिया लेकर चलती रही और आज भी चल रही है उसमें कैसे और क्या बदलाव करने होंगे? और उसे जमीनी हकीकत में बदलना कितना मुश्किल होगा? आज गाया संकट के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं गांधी-दर्शन से बहुत कुछ लिया जा सकता है।
हम जिस भावी समाज के लिये विकल्प  खोज रहे हैं उसके लिये यह आवश्यक नहीं कि किसी भी विचार या अवधारणा को जस-का-तस ले लिया जाय। देश-काल की जरूरत के अनुसार हमें कई अवधारणाओं का मिश्रण लेकर चलना होगा। हम अपनी जरूरतों के अनुरूप वांछित मिश्रित व्यवस्था का आकलन क्यों नहीं कर सकते? 
क्या चुनाव जीतना और सत्ता में बने रहना इतनी बड़ी  मजबूरी है कि हम राष्ट्रीय हितों व जीवन के बीहड़ यथार्थ की अनदेखी करने लगें। 

मामला केवल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं
यह मुमकिन नहीं कि कोई एक देश अपने दम पर इतने बड़े कदम उठा सकेगा। जिस जीवन शैली के हम आदी हो चुके हैं उसमें आमूल परिवर्तन करना कैसे संभव होगा? क्या ऐसे आमूल परिवर्तन के लिये जनमानस को तैयार कर पाना संभव होगा? साथ ही यह देखना होगा कि नया मौडल जो हम अपनाना चाहते हैं उसकी रूपरेखा क्या होगी?
प्रौद्योगिकी का संतुलित उपयोग
गांधी जी अधिक औद्योगीकरण का विरोध करते थे। लेकिन हमारी जरूरत की सभी चीजें उद्योगों के विकास से जुड़ी हैं। बढती आबादी, बढती जरूरतें, बढता प्रदूषण और गाया की सिमटती जाती काया। कुछ तो करना ही होगा जरूरतों एवं संसाधनों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए।

[क] सबसे पहले आबादी का प्रसार पूरी तरह रोकना अत्यंत आवश्यक है। भारत में इस विषय पर कभी कुछ सोचा ही नहीं जाता। खबरों पर नजर डालिये तो हर तरह की खबरें दिखाई देती हें पर आबादी की समस्या पर कोई बात नहीं होती और भूले-भटके कभी हो भी जाती है तो जमीनी स्तर पर कुछ करने का प्रयास नहीं होता। जागरूक नागरिक के नाते हम सभी का फर्ज है कि इसे प्राथमिकताओं की सूची में शीर्ष पर रखें।

(ख) प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करना निहायत जरूरी होगा। महासागर भी प्लास्टिक प्रदूषण के शिकार होते जा रहे हैं।  प्लास्टिक कचरा जीव-जंतुओं और मत्स्य जीवन एवं उद्योग के लिए खतरा है। इससे जलचर जीवन के फंसने, सांस रुकने का खतरा है। कई समुद्री जीव या इन पर निर्भर करने  वाले जीव कचरे को निगल लेते हैं। अंतत: यह प्रदूषण दीर्घ अंतराल में मानव जीवन को भी प्रभावित करेगा।

(ग) सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना एक सही कदम होगा। भारत जैसे देशों में यह आसान होगा क्योंकि देश के अधिकांश क्षेत्रों में साल में लगभग नौ महीने मौसम साफ रहता है। फोटोवोल्टाइक प्रभाव के तहत कुछ प्रावधान हो रहा है जिसे बड़े पैमाने पर लागू करने की आवश्यकता है। साथ ही सौर-चूल्हा जिसमें सूर्य-किरणों को फोकस करने के साथ ग्रीनहाउस प्रभाव का भी उपयोग होता है कम दाम पर उपलब्ध हो सकता है और विशेष रूप से कम्यूनिटी किचन के रुप में बहुत प्रभावकारी सिद्ध हो सकता है। ऐसा नहीं कि इस संबंध में समुचित जानकारी का अभाव है; समस्या अपनी जीवन शैली में कुछ आवश्यक बदलाव लाने की है।

इस विषय पर अंतहीन चर्चाएँ, गोष्ठियाँ, शोध सभी सामने हैं समस्या क्या है और उसका निदान क्या हो सकता है यह भी सामने है, लेकिन जमीनी स्तर पर कैसे क्रियान्वयन हो? बस, असली मुद्दा अब यहाँ आकर अटक जाता है। तब फिर क्या हो? क्या कोई बीच का रास्ता हो सकता है?

बीच के एक से अधिक रास्ते हो सकते हैं उनकी सविस्तार चर्चा का अभी कोई लाभ नहीं लेकिन मोटे तौर पर  कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।

1. अर्थव्यवस्था व उसके विकास के वर्तमान मौडल उन परिस्थितियों के लिये प्रभावी थे जहाँ विश्व के संसाधन इंसानी आबादी व जरूरतों की तुलना में बहुत अधिक थे। तब पर्यावरणीय स्व-नियोजन क्षमता भी औद्योगीकरण के हानिकर प्रभावों को  निरस्त कर सकती थी। आज के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। विकास मौडल का विकल्प खोजना जरूरी होगा। संभवत: बाह्य जगत के विकास पर बहुत जोर न देकर आंतरिक जगत के विकास पर ध्यान देना भी जरूरी होगा।

2. आज की उपभोक्ता संस्कृति न केवल संसाधनों पर एक बड़ा बोझ है अपितु अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग के लिये भी ईर्ष्या व विद्वेष का कारण बन जाती है जिसके कारण अवांछित तनाव बढ़ जाते हैं। इस पर भी समुचित व ठोस निर्णय लेना जरूरी है।   

एक जन-आंदोलन की दरकार
गांधी पर्यावरण समस्या का जिक्र कम ही करते थे क्योंकि उस समय यह उनकी प्राथमिकता थी भी नहीं; आजादी की लड़ाई एवं साम्प्रदायिक समस्याओं के समाधान खोजने में ही उनका फोकस होना स्वाभाविक था पर इसके बावजूद उनकी जीवनचर्या में वे सब बातें शामिल थीं जो किसी पर्यावरणविद की सोच के बहुत करीब थीं। दरअसल उनका अहिंसा का सिद्धांत सभी बातों को शामिल करता था फिर चाहे वह राजनैतिक आंदोलन हो, धार्मिक सद्भाव हो या पर्यावरण की बात हो। गौर से देखें तो साफ लगता है प्रदूषण भी एक तरह की हिंसा ही है जो  प्रकृति को हानि पहुँचाती है। गांधी द्वारा अधिक औद्योगिकीकरण का विरोध इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिये।

उन्होंने कहा था: “हम तब तक प्रकृति के विरुद्ध हिंसा को रोकने वाला पारिस्थितिकी आंदोलन नहीं बना सकते जब तक अहिंसा का सिद्धांत मानव संस्कृति की नीति का केंद्र नहीं बनता।”  यह बात आज के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक है जिसकी चर्चा यहाँ करना होगा।

गांधी जी ने हिंद स्वराज नामक पुस्तक [5] में आधुनिक सभ्यता, औद्योगिकीकरण एवं स्वराज जैसे मुद्दों पर अपने विचार स्पष्ट किये थे। लेकिन सबसे खास बात यह है कि वे अपनी जीवन शैली में उन बातों को चरितार्थ भी करते थे। आज कमी विचारों की नहीं अपितु उनको जमीनी हकीकत तक पहुँचा सकने की है। उनका सादा जीवन जीने पर आग्रह और स्वयं वैसे जीने का प्रयास एक रास्ता सुझा सकता है बशर्ते हम उसपर पूरी ईमानदारी से मनन  करें और धीरे-धीरे ही सही जमीनी स्तर पर (छोटे स्तर पर ही) कोई प्रारूप पेश कर सकें जो स्थानीय परिस्थितियों, पर्यावरणीय जानकारियों व जन-आकांक्षाओं को आत्मसात कर चल सके।

उथल-पुथल का दौर
भारत में तब विराट उथल-पुथल का दौर था स्वतंत्रता संग्राम, साम्प्रदायिक तनाव, जातीय संघर्ष, सामाजिक व आर्थिक न्याय का संघर्ष – बहुत कुछ था चुनौती देता  हमारे अस्तित्व और स्वाभिमान को; यह चुनौतियां सब बाहरी ही नहीं आंतरिक भी थी और गांधी ने इन सारी चुनौतियों को लिया –उनकी समग्रता में, एकदम मौलिक अंदाज में, सैद्धांतिक आधार को क्रियान्वित करने के अनथक प्रयास के रूप में। सत्याग्रह की ही बात लें, यह विचार या अवधारणा कुछ सीमा तक अमेरिकी विचारक थोरो से प्रभावित थी पर  यहाँ परिस्थिति  अलग थी आकार में और  गुणवत्ता में भी। लेकिन सत्याग्रह की अवधारणा का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन करने का उनका अपना अंदाज था  जो मौलिक था।

उस समय गांधी जी की प्राथमिकताऐं थी आजादी की लड़ाई और साम्प्रदायिक सौहार्द जो उस देश-काल की परिस्थितियों  के अनुकूल थीं और जिनके बारे में जन सामान्य को जानकारी थी। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक और प्रयोग कर रहे थे और संदेश दे रहे थे एक प्रकृतिविद-पर्यावरणविद की तर्ज पर, जबकि उनकी इस दिशा में कोई जिम्मेदारी न थी और न ही कोई यह अपेक्षा उनसे करता था। आज से करीब सौ साल पहले  उनका कथन कि आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता में उसके विनाश के बीज निहित हैं आज की गाया-संकट पर छिड़ी बहस के निष्कर्षों के एकदम करीब दिखाई देता है। नये वैज्ञानिक परीक्षण इस बात की ओर संकेत कर रहे  हैं कि गाया का स्व-नियोजी स्वरूप लड़खड़ा रहा है या उसके कगार पर है [3,4]। याद आते हैं इतिहासविद टायनबी के शब्द: मानव इतिहास की इस अत्यंत संकटपूर्ण स्थिति में अगर कोई समाधान संभव है तो भारतीय तरीके से ही।
टायनबी ने जिस बात को भी ध्यान में रख यह बात कही हो हम उसे गांधी के बहुआयामी अहिंसा सिद्धांत से जोड़ सकते हैं जो भविष्य में मानव की विकास-यात्रा का एक स्वस्थ विकल्प प्रस्तुत कर सकता है जिसमें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों व साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ गाया संकट का समाधान भी मिल सकता है। देखना यह है कि कब हमारी नींद टूटेगी और हम उस द्दष्टा की बात की गहराई को समझ सकेंगे। यह भी हो सकता है तब तक बहुत देर हो चुकी हो:
देर हो चुकी कुछ करने के लिये 
आबादी का प्रसार, जरूरतों का अंबार
धरती उतनी ही पहले जैसी;
कुदरत की फिक्र मत करो दोस्त
कुछ देर भले हो जाए
वह खुद को फिर संभाल लेगी
इंसान के चले जाने के बाद।
                          -  रस्किन बाँन्ड [6]

संदर्भ: 
[1] चन्द्रमोहन भंडारी, विकास की भूल-भुलैया: [1] अंधे-युगों की परम्परा, सेतु, फरवरी 2021.
[2] चन्द्रमोहन भंडारी, विकास की भूल-भुलैया: [2] गाया की सहमती काया, सेतु
[3] James Lovelock, Gaia, Oxford University Press, 1979.
[4] James Lovelock, The Vanishing Face of Gaia, Penguin Books, 2010.  
[5] महात्मा गांधी , द हिंद स्वराज, प्रकाशन 1909 ( original in Gujarati) published in Gujarati Columns of Indian Opinion, December 1909; English translation published by International printing Press, Natal, South Africa, 1910.  
[6] Ruskin Bond’s poem: It is too late now/for we are too many/and the earth is no bigger/ Do-gooders do not depair/the earth will repair her own/long after we are dust.

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।