सूक्ष्म अनुभूतियों के पुष्पों से महकता बियाबान

- अनु शर्मा कौल


पुस्तक: अपेक्षाओं के बियाबान (कहानी संग्रह)
लेखक: डॉ. निधि अग्रवाल
मूल्य: ₹ 250 रूपये 
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर 

'अपेक्षाओं के बियाबान' कहानी संग्रह कहने को डॉ. निधि अग्रवाल जी का पहला कहानी संग्रह है परंतु ऐसा कहीं भी प्रतीत नहीं होता कि वह एक मंझी हुई कथाकारा नहीं हैं। निस्संदेह कथा संग्रह में शामिल 12 कहानियों में से एक भी कहानी ऐसी नहीं जो पाठक को बांध न ले। एक एक भाव का ऐसा सूक्ष्म निरीक्षण कि लगता है जैसे हर कहानी उनके अपने अनुभवों का निचोड़ हो। हर कहानी का हर पन्ना, पन्ने का हर वाक्य और वाक्य का हर शब्द बहुत कुछ कहता है। हर कहानी पढ़ने के बाद मन में चुभी फाँस की तरह हलचल मचाती रहती है।
पहली कहानी 'अपेक्षाओं के बियाबान" एक भाई बहन के रिश्ते को उजागर करती है। दूर-दूर रहते हुए भी मानसिक रूप से दोनों एक दूसरे से इतने जुड़े हुए हैं, इतने पास है कि पत्रों के माध्यम से ही ना केवल एक दूसरे की कही-अनकही व्यथा को समझ लेते हैं बल्कि एक दूसरे का मनोपचार करते हुए भी दीखते हैं। एक ओर सिलीगुड़ी में रहने वाली पाखी अपने घर परिवार के होते हुए भी स्वयं को नितांत अकेली और अवसादग्रस्त अनुभव करती है तो दूसरी ओर मेदिनीपुर में  पाखी के बड़े भाई शुभेंदु अपनी पत्नी गार्गी की असाध्य बीमारी के कारण अत्यंत चिंतित हैं। बारह पत्रों के माध्यम से एक दूसरे को सांत्वना देने का जो सिलसिला इस कहानी में दीख पड़ता है वह सचमुच भाई बहन के अनमोल रिश्ते को बड़ी सच्चाई से उजागर करता है। आखिरी पत्र में तो शुभेंदु का यह कथन दांपत्य जीवन का पूरा सार स्पष्ट कर देता है-

"दांपत्य में प्रेम, जल में घुली शक्कर है दिखती नहीं पर मिठास विद्यमान होती है और बिना देखे अनुभूति कैसे हो सकती है?"

अनु शर्मा कौल
दूसरी कहानी "यमुनाबैंक की मेट्रो' में 58 साल के विधुर द्वारा मेट्रो में सफर करते यात्रियों को पढ़ना और उनके व्यक्तित्व के अनुसार उनके मनोभावों और काम के क्षेत्र को समझना-बूझना बहुत खूब है फिर वह चाहे कंजी आँखों वाले युवक की प्रेम में बेईमानी हो या कौशांबी से चढ़ने वाली अधेड़ उम्र की अध्यापिका, आनंद विहार से चढने वाली उम्र से पहले गंभीरता का आवरण ओढ़ लेने वाली सलोनी-सी लड़की हो या चंचल पंछियों के समूह-सा कलरव करता नवयुवकों का झुंड, प्रीत विहार से नीले बॉर्डर वाली साड़ी पहने किसी आभूषण की दुकान की सेल्सगर्ल हो या दूधिया चांदनी-सा लड़का जो कि मार्केटिंग एजेंट-सा लगता है, बिना किसी से एक भी शब्द कहे, पूछे या सुने कथानायक अपने जीवन के अनुभव से ही न केवल उनसे जुड़े कयास लगाता है बल्कि उन सब को कुछ कहना चाहते हुए उनसे मानसिक रूप से जुड़ा भी रहता है। कहानी लयबद्ध रूप से चलती जाती है और पाठक एक-एक शब्द की झरती झींसी को बूंद-बूंद पीता जाता है यहाँ तक कि निर्माण विहार से मेट्रो में चढ़ी लड़कियाँ विभु और रिट्ज़ भी इसका एक सामान्य हिस्सा नजर आती है लेकिन बात बात पर गालियों की बौछार उगलने वाली रिट्ज़ अपनी दोस्त विभु के साथ जब दो बुजुर्गों के लिए जगह छोड़ देती है तो सबके मन में वितृष्णा की जगह स्नेहिल आशीर्वाद उमडने लग जाता हैं और तब तो हद ही हो जाती है जब कम उम्र वाले कुछ लड़के उनसे छेड़छाड़ करने की कोशिश में मुँह की खाते हैं और कहानी का अंतिम हिस्सा बहुत रोचक और रोमांचक बन जाता है बानगी देखिए-

'कुछ अपमान, कुछ क्षोभ और कुछ दर्द के मिले-जुले भाव लिए वह लड़का इन दोनों को देख रहा था। "आँखें नीचे रख, हरामखोर ! अब इस तरफ नजर उठाई तो आँखें नोच लूंगी।"  एक पल को लगा कि पूरे कंपार्टमेंट में उपस्थित सभी स्त्री पुरुषों की आँखें शायद इसी दंड के योग्य हैं।'

यह पंक्तियाँ हमारे समाज की असलियत बताती हैं और अंत में चुपचाप सब की दिनचर्या का अवलोकन  करने वाले मुख्य पात्र द्वारा अपना गूंगापन त्याग कर 'शाबाश रिट्ज़' कहने पर पाठक भी जानते हैं कि आज कहना ज़रूरी था।

 तीसरी कहानी फैंटम लिंब की परिभाषा गढती हुई यह बताती है कि जैसे लिंब यानि शरीर का कोई हिस्सा काट दिए जाने पर भी दिमाग शरीर को उस कटे हिस्से का दर्द महसूस कराता रहता है वैसे ही कुछ अनचाहे ही कटे रिश्तों का दर्द सालता है और उनके न रहने पर भी उनके होने का भ्रम बनाए रखता है। कथानायिका समिधा स्वयं डॉक्टर होते हुए भी इसी विडंबना की शिकार है। हाँ, एक बात जो दिल को सुकून देती है वह है समिधा और डॉ शैल की आपसी समझ जो कहानी के अंत को सुखद बना देती है यह कथा संग्रह में 'उफ़' से 'आह' तक लाने का मोड़ रचती हुई कहानी है जिसमें पाठक गढ़वाली भाषा के शुद्ध और सटीक प्रयोग और गढ़वाली संस्कृति के सुमेल को देखकर अचंभित रह जाता है। कथानायिका समिधा अपने दिलफेंक आशिक अंबर के द्वारा विश्वासघात करके डायना के पास चले जाने पर  जब टूटकर बिखरने लगती है तब डॉक्टर शैल उसे ना केवल सहारा देते हैं बल्कि उसके साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताने की इच्छा जता कर उसके मर्मस्थल को भी छू लेते हैं सचमुच यह कहानी इस बात को व्याख्यायित करती है कि किसी को जान लेने के लिए कई बार तमाम उम्र का सफर भी नाकाफी़ होता है और किसी समय कोई अनजाने और अनचाहे ही पल भर में अपना हो जाता है।

अगली कहानी 'अति…...रिक्त' जरूरत से अधिक रिक्त लड़के सिद्धार्थ की कहानी है जो डाउन सिंड्रोम का शिकार है। उसकी माँ आनंदी को दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर अपने लड़के का ध्यान रखने के लिए एक बाई सुदर्शन को घर में रखना पड़ता है जो अपने पति के कहने पर लालच में आकर सिद्धार्थ पर गलत आरोप लगाती है और उसे बदनाम करके आनंदी से पैसे लेने की फिराक में दिखाई देती है है। आनंदी और पुलिस इंस्पेक्टर जिस प्रकार अपनी समझ बूझ से सुदर्शन का झूठ पकड़ कर सिद्धार्थ पर आए हुए खतरे से उसे बचाते हैं तथा समाज में उसके अस्तित्व को बिखरने से बचा लेते हैं उससे पाठक के मन में भी विखंडित होते मानव मूल्यों के प्रति एक आस्था जागृत होती है।यह कहानी ना केवल हमारे समाज के विश्वासघाती और अवसरवादी नौकरों पर  एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह छोड़ जाती है बल्कि कहानी की अंतिम पंक्तियाँ इससे भी बड़ा यक्षप्रश्न हमारे सामने रखती हैं।जब इंस्पेक्टर महेश आनंदी को सलाह देते हैं कि आज के समय में दुष्टों के संहार के लिए प्रभु शंकर के तीसरे नेत्र के खुलने की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती, यही तीसरा नेत्र अर्थात सीसीटीवी कैमरा सजा निर्धारित करने में सहयोग करता है इसलिए अब अपने घर में कैमरा जरूर लगवा लीजिएगा। लेखिका कहती है - 
इंस्पेक्टर महेश जा चुके थे और आनंदी सोच रही थी कि क्या उसके नेत्र बंद हो जाने पर भी यह आधुनिक तीसरा नेत्र सिद्धार्थ को स्वार्थी नजरों से न्याय दिला पाएगा। 

कहानी 'परजीवी'  तो पाठक की आँखों में बरबस ही आंसू भर देती है। किसी को स्वयं पर आश्रित कहते कहते हम अपने अहम् में इस वहम को पाल लेते हैं कि कोई हम पर आश्रित है और उसी 'कोई' के सदा के लिए चले जाने पर सारे परिवार का असहाय हो जाना दिल को बहुत कचोटता है।कहानियों का क्रम भी एक मधुर संभ्रम में डालता है जैसे कथा संग्रह की पांचवी कहानी परजीवी जहाँ आँखों में बरबस ही आंसुओं की झड़ी लगा देती हैं वही 'मोहर' कहानी बरसों के बाद मिले नटखट प्रेम के माध्यम से राधा-कृष्ण की याद कराकर होठों पर मुस्कान ले आती है। बरसों पहले एक लड़की के हाथों माथे पर चोट लगवाकर उसके निशान के साथ जीवन बिताने वाला सुंदर सजीला नवयुवक किस प्रकार उसी लड़की को दिल दे बैठता है और अंततः उसे शादी के लिए राजी भी कर लेता है, यह सारा घटनाक्रम एक बहुत ही रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। 

'दंड निर्धारण' कहानी जयशंकर प्रसाद के कथा लोक की सहगामिनी प्रतीत होती है। रहस्य से भरी इस कहानी में जयश्री और श्रीप्रदा दो अलग-अलग व्यक्तित्व होकर भी अंत में एकरूप  हो जाती हैं और आदित्य महर्षि आदित्यनाथ होकर भी अनेक खंडों में विभक्त दिखाई देता है। 

अगली कहानी 'हरसिंगार जानता है उत्तर' जीवन की सीवन और उधडन को दर्शाती हुई एक कहानी है जो पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ती हुई रिद्धि के उद्वेगों का दर्पण बनने के साथ-साथ कई एक प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ जाती है। नीलांजना के घर में टर्टल का आना, टूटू कहलाना और कुछ पलों का प्रेम संबंध स्थापित करके मृत्यु की गोद में सो जाना, नीलांजना की असंमजस, दूसरों को समझाने और खुद समझने का असफल प्रयास- एक मर्मांतक पीड़ा की पुष्टि करता है। 

'आईना कभी झूठ नहीं बोलता' कहानी एसिड अटैक की शिकार लड़कियों की मनोस्थिति का सूक्ष्म विवेचन करते हुए एक तथ्य उजागर करती है कि कैसे लोग एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के सहारे अपनी राजनीति चमकाते हैं। एक ओर पद्मा अपने चेहरे के कुरूप हो जाने पर मर्माहत है फिर भी जीवन में दूसरों की हिम्मत बनने की कोशिश करती है तो वहीं दूसरी ओर नेताजी, लेखक महोदय और उसके अपने पति श्रेयस उसकी मर्मांतक पीड़ा का लाभ अपने तरीके से उठाते हैं यह देखकर वह अपने जैसी अन्य लड़कियों के लिए स्वयं ही कुछ कर गुजरने की बात मन में  ठान लेती है। कहानी का अंतिम अंश पढ़िए, आप खुद जान जाएंगे-
 'कार के वैनिटी मिरर में अपना चेहरा देख उसने स्वयं से प्रश्न किया, " क्या कोई इस चेहरे से प्यार कर सकता है?" 
आईने में उभर आए रूपा के अक्स ने उत्तर दिया, " तुम्हारे प्रश्न का उत्तर कुछ संशय भरा भले हो लेकिन सत्य है कि यह चेहरा कई चेहरों को स्वयं से प्यार करने की हिम्मत अवश्य दे सकता है।" पद्मा ने संतुष्टि का एक श्वास भर सिर पीछे टिका लिया। वह जानती है कि आईना कभी झूठ नहीं बोलता।'

 अति यथार्थवादी विचारधारा की अनसुलझी  उलझनों को बहुत खूबसूरती से उभरती है कहानी-तितली और तिलचट्टा।कहानी की नायिका का यह कहना कि मैं शीशे के सामने खड़ी होती हूँ तो अनिकेत को शीशे में तिलचट्टा दिखता है और मुझे उड़ने को आतुर तितली, नायिका की मनोदशा के साथ-साथ इस बात की ओर भी संकेत करता है कि एक ही स्थिति को देखने का सब का नज़रिया अलग-अलग हो सकता है। ग्रेगर के महान नॉवल 'मेटा मार्फिसम' से प्रेरित नायिका का कथा के अंत में तिलचट्टे को मारे जाने के बाद व्यथित होकर यह कहना कि कुछ स्नेह और हिम्मत दे हम उसे तितली भी बना सकते थे, कायापलट की एक नई परिभाषा गढ़ता है। 

'दूसरी पायदान' कहानी स्पष्ट करती है कि कुछ रिश्तों की कोई परिभाषा नहीं होती जैसे कथा नायिका अरुजा डॉ विभोर की पत्नी और अनिकेत की माँ होने के साथ-साथ कौस्तुभ सर के जीवन में भी एक विशिष्ट भूमिका निभाती है।अपने पति के तथा पुत्र के अधिकारों के प्रति पूर्ण रूप से सजग अरु के मन में रंगों के चितेरे कौस्तुभ सर के अपनेपन से अनेकों प्रश्न उपजते हैं जिनका निराकरण डॉ विभोर अपनी समझदारी और विश्वास से पूरी तरह करते हैं। डॉ विभोर अपनी व्यस्तता में भी जिस प्रकार पत्नी और माँ के बीच तालमेल स्थापित करते हैं वह सचमुच अनुकरणीय है।जिन कौस्तुभ सर का व्यवहार अरु को असमंजस में डालता है उन्हीं कौस्तुभ सर की जिंदगी को अरु अपनी समझदारी से संवारती है। एक ओर कौस्तुभ सर उसे अकेलेपन से मनोरोगी होने से बचाते हैं तो दूसरी ओर अपने बेटे के प्रेम को अपनी स्वीकृति देकर वह एक पायदान नीचे उतर आने की बात कहती है। सच कहूं तो यह कहानी मुझे एक आम भारतीय नारी  के  विचारों और संस्कारों में अंतर्द्वंद की कहानी लगी।

 अंतिम कहानी 'फलक तक चल साथ मेरे' पाठक में एक ऊहापोह, एक अंतर्द्वंद  जगाती है कि क्या वनिता के जीवन में आभास वास्तव में था? या आभास का आभास मात्र ही था लेकिन यह तय है कि दुखों के समंदर में डूबते हुए भी किसी के साथ होने का एहसास या आभास जीवन को ही नहीं, मौत को भी सुखद बना देता है। कथानायिका के निकट यह सत्य और भी अधिक जीवंत होकर घटित होता है जब आभास के साथ मौत को गले लगा लेने वाली केवल वनिता की खबर अखबार में छपती है।अप्रत्यक्ष रूप से यह आभास और वनिता के एकाकार हो जाने का प्रतीक रूप है लेखिका  का यह कथन इस प्रतीकात्मकता की पुष्टि करता है-

 'वनिता ने अपनी पूरी ताकत समेट उसकी  ओर करवट ले अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया दोनों को क्षत-विक्षत कर ट्रेन गुजर चुकी थी अगले दिन अखबार में खबर छपी थी एक महिला ने ट्रेन के नीचे कटकर जान दी जिसे पढ़कर देश के अलग-अलग कोनों में अलग-अलग समुदाय की  रमणी, कामिनी, कांता, प्रज्ञा, कात्यायनी और प्रजाता आदि ने एक साथ सोचा कि सुखद स्वप्निल अनुभूतियों के, आभास के भी मर जाने पर भला कोई स्त्री किसके सहारे जिंदा रहे?'

यदि कहानी लेखन के सभी  बिंदुओं  का विवेचन किया जाए तो हर  कहानी का कथानक आरोह-अवरोह की परिधि में बांधकर पाठक को अंत तक जोड़े रखता है। देश काल और वातावरण का बहुत सुंदर चित्रण हर कहानी में हुआ है। पात्रों  के मनोभावों पर लेखिका की बहुत गहरी पकड़ दिखाई देती है। यही नहीं वर्तनी संबंधी अशुद्धियाँ बिल्कुल भी नहीं है। इसके अतिरिक्त भाषा शैली की सरलता, लयबद्धता तथा ताजगी  मन को मोह लेती है।  हर कहानी का शीर्षक अपने आप में विशिष्ट तथा कहानी की संपूर्ण व्याख्या करता हुआ प्रतीत होता है। यदि पुस्तक के बाहरी कलेवर की बात करें तो अनुप्रिया जी द्वारा बनाया गया आवरण भी मानव मस्तिष्क की जटिल  प्रक्रियाओं की पुष्टि करता हुआ बताता है कि मानव मस्तिष्क की  विभिन्न परतों में कितनी कितनी सामाजिक अपेक्षाओं के बड़े-बड़े बियाबान जंगल उगे हुए हैं। कुल मिलाकर कथा संग्रह बहुत प्रभावी बन पड़ा है और यहाँ मैं लमही पत्रिका के प्रधान संपादक श्री विजय राय जी का कथन उद्धृत करना चाहूंगी- 

'निधि अग्रवाल गहन जीवनावलोकन की अप्रतिम कथाकार हैं। उन्होंने जहाँ अपनी निजी कथा शैली का विकास किया है वहीं वे लंबे समय तक याद की जाने वाली कहानियों की सतत रचना में संलग्न है।'

 आदरणीय के विचारों से पूर्णतः सहमति जताते हुए  ईश्वर से ऐसी कामना करती हूँ कि वह इनकी लेखनी की धार को इसी तरह प्रज्वल बनाए रखें। निस्संदेह निधि जी हिंदी साहित्य को अपनी साहित्यिक निधियों से आपूरित करने की अनंत संभावनाएँ रखती हैं।


समीक्षक परिचय:
डॉ. अनु शर्मा कौल लुधियाना के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में पिछले 23 वर्ष से कार्यरत हैं।  हिंदी और पंजाबी कविता, लघु कथा एवं आलेख लेखन में रुचि रखती हैं।।
  

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