चिंतनशील कवि रंजीता सिंह की प्रेमार्द्र कविताएँ

- मनोहर अभय


समालोच्य कृति: प्रेम में पड़े रहना (कविता संकलन )
रचनाकार: रंजीता सिंह फ़लक
प्रकाशक: संभावना प्रकाशन, हापुड़-245101 
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये

नारी सशक्तिकरण को समर्पित प्रख्यात साहित्य सेवी, सम्पादक और संवेदनशील कवि रंजीता सिंह की चौवन कविताओं का संकलन है '' प्रेम में पड़े रहना''। ये कविताएँ प्रेम को परिभाषित नहीं, प्रेमानुभूति की गहराई को मापती हैं। प्रेम -सिंधु में गहरी और गहरी डुबकियाँ लेती नारी के आह्लाद ,उल्लास ,उसकी उमंगों -मन:स्थितियों को बुनती और उधेड़ती हैं। इनमें कहीं आषाढ़ की पहली फुहारों का संस्पर्श है, तो घटाओं के बरसने के बाद निरभ्र – नभ पर छिटके सप्तवर्णी - इन्द्रधनु की छटा। या फिर दो चट्टानों के बीच अंकुरित होते कुटज की कोमलता। 

आज के खुरदरे जीवन और पथरीले मन में तरह- तरह के विमर्शों की ऊहापोह है,जबकि पहाड़ियों की कोख से फट पड़ने वाले झरझराते निर्झर पथरा गए हैं। ऐसे समय में रंजीता जी का कवि कहता है-"किसी भी \विमर्श से ज्यादा जरूरी है \प्रेम में होना \क्योंकि प्रेम ही \बचाये रखता है \इंसान को निराशा \और पतन के अँधेरे \और विनाश के \क्षणों में"। कवि की मान्यता है कि ''एक ख़ूबसूरत दुनिया को \बचाए रखने के लिए \बहुत जरूरी है\ हमारा प्रेम में पड़े रहना''। 

प्रेम में पड़े रहने का अर्थ यह नहीं कि दिन-रात प्रेमास्पद के बाहुपाश में आबद्ध पड़े रहो। अपितु ,विराट जगत के हर जीव के प्रति सहिष्णु और प्रेमाद्र हो। यह न तो गोकुल की गोपियों वाला अदैहिक है। न ही मीरा की आध्यात्म परक दीवनगी है ''हे री मैं तो प्रेम-दिवानी \मेरो दरद न जाणै कोय''। । वस्तुतः यह है स्त्री -पुरुष के बीच का नैसर्गिक लगाव ,आकर्षण-विकर्षण ,संयोग – वियोग का आदिम राग। कवि के बोल हैं "मेरा इश्क तुम्हारे वजूद पर जैसे एक तिल रहूँगी \हमेशा तुम्हारे होने तक ,मिलूँगी हमेशा \तुम्हें \बेलिबास पलों में। किन्तु ये बेलिबास (निर्वसना) अपने अनिंद्य अस्तित्व के परकोटे से चाहती है उतरना: ''एक नदी की तरह \तुम्हारी आँखोँ में \दिल में\और जरूरतों में''। उसे चाहिए सच्चा इश्क। किताबों या ख्वाबोँ वाला नहीं"।

ऐसा कब और कैसे होगा पता नहीं। क्योंकि, प्रेम ''दबे पाँव जीवन में आ जाता है\ कि हम उसे देख कर \हैरत में पड़ जाते हैं \और \अपनी पूरी चेतना को टटोलने लगते हैं। आप पूछते रह जायेंगे ''मधुमय वसंत जीवन वन के\ बह अंतरिक्ष की लहरोँ में \कब आए थे\ तुम चुपके से \रजनी के पिछले प्रहरों में (कामायनी )। उसके आने से रोम- रोम में गुदगुदी सी मचल उठती है। शब्द नहीं, चितवनें बोलतीं हैं। ख़लील जिब्रान के शब्द हैं-- ''प्रेम न तो स्वयं के अतिरिक्त कुछ देता है\न ही प्रेम स्वयं के अलावा कुछ लेता है\प्रेम किसी पर नियंत्रण नहीं रखता\न ही प्रेम पर किसी का नियंत्रण होता है \चूँकि प्रेम के लिए, बस प्रेम ही पर्याप्त है''। इस के बाहुपाश में आबद्ध होना जितना सहज है, मुक्त होना उतना ही कठिन- ''ज्योँ -ज्योँ सुरझि भज्यो चहत\ त्यों -त्यों उरझत जात''। विश्वकवि रविन्द्र कहते हैं ''जो मुझ से प्रेम करता है \वह प्रेम के पाश में बाँध लेता है मुझे \तेरा प्रेम मेरे प्रेम की सदा प्रतीक्षा करता रहता है''। क्षण दो क्षण की नहीं, अनवरत प्रतीक्षा है। मीलों दूर है प्रतीक्षा- रत। किन्तु मन से विलग नहीं होता। मोह- मुग्धा पेड़ की पत्तियों पर लिखती है उसका नाम -'’पर्वतों के बीच \झरनों के सामने देती है आवाज कि''शायद किसी आने वाले मौसम में \ जब भी तुम यहाँ पहुँचो कभी\तो सुन सको\ मेरी आवाज--पढ़ सको किसी पत्ते \पर लिखा अपना नाम''।

मनोहर अभय
लेकिन, उसके रास्ते कठिन और दुर्गम हैं। ये दुस्साहसी भी कम नहीं--''पार कर लेता है \डर की सारी हदें \वर्जनाओं के समंदर \अन्देशों के पर्वत \और ढीठ की तरह टिका रहता है \अपनी जगह''। प्रेम में पड़ी स्त्री के लिए प्रेमास्पद की उपस्थिति 'एक कप गर्म चाय सी ताजगी भर' देती है। कवि के शब्दों में ''सुबह कई बार \चुपचाप चाय बना कर \जब खड़े होते हो तुम \तो मेरे साथ होता है मुस्कराता हुआ सूरज \मन के गीलेपन और खुरदरे जीवन में सीलन से\ कई अवांछित पल जैसे गायब हो जाते हैं .... मन की सरहदों से बढ़तीहुई \संवेदना \पूरी चेतना में पसर जाती है''।

प्रेम में डूबी स्त्री के लिए संदेह या शक का काँटा भीतर ही भीतर कसकता है-- ''वह खत्म नहीं होता \मरता नहीं\ रोज सुबह हो जाता है \ कुछ और बड़ा। सपने में भी यदि प्रणयी के अधरों पर परकीया के नाम की बुदबुदाहट हो तो "उनके मुँह से निकला \सिर्फ एक नाम नहीं \आ गिरता है\ किसी एटम बम सा \और ध्वस्त कर देता है \उनकी पत्नी के\ प्रेम और विश्वास का हिरोशिमा''। इसलिए प्रेमी और प्रेमास्पद के 'मन का\ बच्चा बने रहना\ जरूरी है\ क्योंकि इश्क है\ पानी का चाँद''। बच्चे का मन होता है निर्मल, स्वच्छ,धवल, सात्विक,सामाजिक छल- प्रपंचों से मुक्त। प्रणयी को चाहिए ऐसा ही मन।

प्रेम की गहनता के लिए सामीप्य ही नहीं, दूरी भी आवश्यक है--'' कभी- कभी प्रेम को ठीक- ठीक \जानने परखने के लिए बहुत जरूरी है \ऐसा एक विरह \ऐसी एक जुदाई"। पुनः याद आगए ख़लील जिब्रान, “अपनी निकटता में कुछ दूरी बनाए रखना\ जिससे स्वर्ग की हवाएँ तुम्हारे मध्य नृत्य कर सकें''।

एक ओर इन रचनाओं में प्रेम की सरलता, सहजता और सार्द्रता है, तो दूसरी ओर उसे पाने की दुर्गमता भी (सूली ऊपर सेज पिया की केहि विधि मिलना होये )। प्रेम की विडंबना तो देखिए"मैंने \तुम्हारी मनुष्यता से प्रेम किया \और तुम \मुझे देव से लगने लगे \मेरे प्रेम ने की तुम्हारी आराधना \और तुम खुद को देवता मान कर \आजमाने लगे \मुझ पर ही \सर्जना और विनाश के\ नियम"। कहने को प्रेम प्रतिदान नहीं माँगता। फिर भी कहीं न कहीं कसकती रहती हैं अतृप्त अभीप्साएँ। प्रणयी को लगता है कि उसके सारे उत्सर्ग चिन्दी- चिन्दी हो कर रह गए (कभी किया था तुम्हारा इंतजार \उतनी ही शिद्द्तों से\ जितनी\ शिद्द्तों से भूले थे तुम मुझे ) घनानंद कहते हैं-- तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला\ मन लेहु \पै देहु छटाँक नहीं। कवि कथन है "गीली आँखोँ और सूखी प्रार्थनाओं के बीच एक समुद्र( है) प्रार्थनाएँ तपते सहरा सी --और उमड़ता है आँखोँ से एक सैलाब\सब कुछ डूबने लगता है बची रहती हैं \दो आँखें \--वे तैरती रहती हैं शव की मानिन्द और आ पहुँचती हैं उस जजीरे पर जहाँ प्रेम है। प्रेम विवश ये नहीं डूबतीं। प्रिय को देखना चाहती हैं अंतिम बार-- ''बिना प्रान प्यारे\ भए दरस तुम्हारे\ हाय!मरेहू पै आँखें \ ये खुली ही रहि जायँगी(भारतेन्दु हरिशचंद्र)।

ये कविताएँ स्त्री से जुड़े अनेक प्रश्नों के उत्तर खंगालती हैं। यानी भुलाई गई ,छोड़ी हुई ,संत्रस्त या पीहर की याद, भाई -बहिनों के स्नेहिल संबंधों के मधुवन में टहलती स्त्रियाँ की जिंदगी। कवि के शब्द हैं हर छोड़ी हुई औरतोँ पर ''सभ्यताएँ झुँझलातीहैं \तिलमिलाती हैं ,बौखलाती हैं -- \नियति से लड़ती ये औरतें \जो किसी की नहीं होतीं \वे \जितनी निर्ममता से ठुकराई जाती हैं \उतनी ही दृढ़ता से \पकड़ लेती हैं अपनी ही ऊँगलियाँ और चल देती हैं एक चपल चाल -- वे बे-खबर हो जाती हैं \बे-असर हो जाती हैं\ठीक वैसे \जैसे उन्हें छोड़ते \और भूलते वक्त वे तमाम लोग बे-असर थे \--- हो जाती है आत्ममुग्धा ''खुद से करने लगती है प्रेम \खुद पर करने लगती हैं विश्वास \खुद को सहेजने ,समेटने में हो जाती है व्यस्त। थूक देती है सारी आप बीती\ किसी किरकिरी की तरह \वे ,अब बार- बार नहीं खराब करतीं जीवन का स्वाद''। ऐसा ही कहा गया है दुःख में हँसती हुई औरत के संदर्भ में जिसे सिखाये जाते हैं \संस्कार \दुःख में रोने के \दुःख में रोती स्त्री \दुलराई जाती है \चुप कराई जाती है --पर दुःख में हँसती हुई औरत \पैदा करती है \बड़ा बवाल --दुःख में हँसती हुई औरत\काली सी विहँसती है \और \ धर देती है पाँव \रिवाजों की छाती पर''। रनजीता सिंह एक संघर्षशील महिला हैं। जीवन जीने का उनका सलीका, उनकी कशिश अद्वितीय है। यही कारण है कि कविताओं में वर्णित स्त्रियाँ साहसी ,जुझारू और समय की विभीषिका का सामना करने में हिचकती नहीं। कवि ने किसी भी स्तर गिरने नहीं दी उनकी गरिमा। 
 प्रेम की नदी से बाहर आते ही बदल जाती कवि की चिंता। उसे कविता के नाम पर हो रही शिविर- बद्धता और वैचारिक प्रतिबद्धता करती है आहत --''मैंने \सरकार को गाली नहीं दी \और उन्होंने \मुझे कहा --फासिस्ट ---\फासिस्टों के समूह ने मुझे दुत्कारा \वामपंथियों की तरफ \और मार्क्सवादियों ने मुझे लौटाया फासिस्टों की तरफ \मुझे रहना था केवल \मनुष्य\लिखनी थी \जीवन ,प्रेम और मानवता की चंद कविताएँ \पर \मेरे लिखने से ज्यादा \जरूरी था खुद को वाम या दक्षिण का साबित करना --और तब मैंने जाना कि\साहित्य की सत्ता सबसे \ ज्यादा खतरनाक है और साहित्य की सियासत \सबसे संगीन''। फिर याद आगए खलील जिब्रान ''जाओ एक प्रार्थना के साथ\ उन प्रियजनों के लिए \जो तुम्हारे दिलों में रहते हैं\और अपने होंठों पर प्रेम का गाना गाते हैं''। कविताएँ अनेक हैं। अनेक हैं प्रश्न। अनेक उत्तर ,अनुत्तर भी। सधे शिल्प में व्यंजित रंजीता सिंह की कविताओं की अपनी पहचान है; जैसे भीड़ में कोई अपना मिल जाए। अपने मुहावरे ,अनगढ़ उपमान,नए बिम्ब ,नूतन प्रतीक और कथ्य की नव्यता। यहाँ मिलेंगे संकोच के नाखून हैं ,यादों की मखमली पैरहन , ख्वाहिशों की गौरिया ,एक कप गर्म चाय सी ताजगी ,गीतों की करधनी। उपमाएँ हैं 'गैर जरूरी कविता की तरह',''भूले हुए किस्से या नाजायज बच्चे की तरह'', ''पहाड़ियों सी बाँहें। कहावत भी अपनी ''उम्मीदें बाँझ नहीं होतीं''। एक नमूना बिम्ब का ''ऊन की लच्छी घुटनों के बीच''। आपने सूरजमुखी तो देखी होगी। किन्तु ,''हजार चाँद की रोशनी में सूरजमुखी खिले ''तो कैसा लगेगा? जो भी हो रंजीता सिंह का प्रस्तुत काव्य- संकलन आनंद का सरोवर है,असंख्य प्रेमार्द्र कमल दलों से भरा -पूरा पठनीय है, संग्रहणीय भी। 

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