पं. माधवराव सप्रे और उनकी कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’

डॉ. सितारे हिन्द

- सितारे हिन्द


हिन्दी साहित्येतिहासकारों ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु युग के बाद के युग को द्विवेदी युग के नाम से अभिहित किया है। कुछ इतिहासकारों ने इसे जागरण सुधारकाल कहना भी उचित समझा है। इन दोनों प्रकार के नामकरणों के पीछे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व तथा उनके साहित्यिक कर्मों की छाप है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के विशाल व्यक्तित्व के सामने उस समय के कई बड़े साहित्यकारों का उस तरह से मूल्यांकन नहीं हो पाया जिसके वो हकदार थे! दुर्भाग्य से माधवराव सप्रे जी का व्यक्तित्व और कृतित्व भी ऐसा ही है, जिनके महत योगदान के बावजूद उन्हें न के बराबर याद किया जाता है। साधु चरित्र के माधवराव सप्रे ने अपना पूरा जीवन साहित्य-सेवा में लगाते हुए हिन्दी-संसार को कई महत्वपूर्ण तथा अमूल्य रचनाएँ दीं। संतोष कुमार शुक्ल ने माधवराव सप्रे के विषय में लिखा है कि “सप्रे जी चाहते तो राजनीति में, साहित्य में, संपादक या प्रकाशक के रूप में, आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वयं को स्थापित कर ठाठ-बाट से जीवन-यापन कर सकते थे। परंतु उन्होंने ऐसा करना ठीक नहीं समझा, यह उनके स्वभाव की विपरीत बात थी। ... ... उन्होंने भाषण, कीर्तन, प्रवचन, और सत्संग कर लोगों में सद्प्रवृत्ति, सदाचरण और सुरुचि उत्पन्न की, मानवीय मूल्यों की स्थापना पर जोर दिया। अपने शरीर की चिंता किए बिना उन्होंने अथक परिश्रम किया।”1 हिन्दी साहित्य के अनुरागी माधवराव सप्रे का जन्म 19 जून, 1871 को छत्तीसगढ़ के दामोह जिले के पथरिया गाँव में हुआ था। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी सप्रे जी हालाँकि हिन्दी, संस्कृत, मराठी तथा अँग्रेजी के अच्छे जानकार थे, लेकिन इन्होंने अपना सारा लेखन हिन्दी में ही किया।

पं. माधवराव सप्रे
19 जून 1871 - 26 अप्रैल 1926
माधवराव सप्रे जी भी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ही तरह सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर जनवरी, 1900 से श्री रामराव चिंचोलकर के साथ संयुक्त संपादकत्व में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ मासिक पत्रिका निकालनी शुरू की थी। यह पत्रिका बिलासपुर से निकल रही थी। हिन्दी साहित्य की उन्नति हेतु समर्पित पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के पहले अंक के संपादकीय पृष्ठ में घोषणा की गई थी कि “सुसंपादित पत्रों द्वारा हिन्दी भाषा की उन्नति हुई है। अतएव यहाँ भी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ हिन्दी भाषा की उन्नति करने में विशेष प्रकार से ध्यान दे। आजकल भाषा में बहुत–सा कूड़ा करकट जमा हो रहा है। यह नहीं हो पाए; इसीलिए प्रकाशित ग्रंथों पर प्रसिद्ध मार्मिक विद्वानों के द्वारा समालोचना भी कहें।”2  इस घोषणा से ज्ञात होता है कि सप्रे जी हिन्दी भाषा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के महत्व को भली-भाँति समझ रहे थे। इस उद्धरण से यह भी स्पष्ट होता है कि सप्रे जी आलोचना के पक्षधर थे और अच्छे साहित्य के लेखन के लिए आलोचना/समालोचना की भी जरूरत समझते थे। 
हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी समाज के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था कि यह पत्रिका सिर्फ दो वर्षों तक ही निकल सकी। धन के अभाव के कारण यह पत्रिका दिसंबर,1902 ई. में बंद हो गई। सप्रे जी महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक से बेहद प्रभावित थे। अतः लोकमान्य तिलक के लेखों को हिन्दी में प्रकाशित करने के उद्देश्य से इन्होंने 1907 ई. से नागपुर से ‘हिन्दी केसरी’ नामक राष्ट्रीय पत्र निकालना शुरू किया। इसमें लोकमान्य तिलक के पत्र ‘केसरी’ के लेखों का हिन्दी अनुवाद रहता था। “सन 1908 में लिखे लोकमान्य तिलक के लेख ‘ये उपाय टिकाऊ नहीं हैं’ (जिसे ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोहात्मक लेख करार देकर तिलक को छह साल की कैद की सजा दी थी) ‘हिन्दी केसरी’ में छपने के कारण इसके संपादक माधवराव सप्रे पर राजद्रोह का मुकदमा चला था।”3 देखा जाय तो माधवराव सप्रे जी का साहित्यिक व्यक्तित्व अनुकरणीय था। इनकी प्रेरणा से हिन्दी के साहित्याकाश में मध्यप्रदेश के कई लेखक आए। इन्होंने युवा लेखकों को खूब प्रोत्साहित भी किया। इनकी प्रेरणा से माखनलाल चतुर्वेदी, सेठ गोविंददास, द्वारिकाप्रसाद मिश्र जैसे बड़े लेखक हिन्दी साहित्य की ओर प्रवृत्त हुए। इतना ही नहीं उस समय की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘कर्मवीर’ के निकलने के पीछे सप्रे जी की ही प्रेरणा थी। 
माधवराव सप्रे अपने समय और समाज से पूर्णतः जुड़े हुए लेखक थे। वो जानते थे कि देश में आजादी का माहौल पैदा करने और उसे बनाए रखने में शिक्षा की स्थायी भूमिका है। अतः इसे ही ध्यान में रखते हुए उन्होंने 1905 ई. में नागपुर में ‘हिन्दी ग्रंथ प्रकाशन मंडली’ की स्थापना की। इस प्रकाशन मंडली से कई महत्वपूर्ण पुस्तकें छपीं। 1921 ई. में इन्होंने रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय तथा रायपुर में ही पहले कन्या महाविद्यालय जानकी देवी पाठशाला की स्थापना की। ये विद्यालय अभी भी चल रहे हैं। अपने समकालीनों के बीच सप्रे जी के यश और महत्व का पता इस तथ्य से भी चलता है कि इन्होंने 1924 ई. में देहरादून में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।  
      माधवराव सप्रे जी एक उच्च आदर्श को लेकर चलने वाले लेखक थे। इन्होंने लगातार उपनिवेशवाद के विरुद्ध लिखा है। उपनिवेशवाद का विरोध उस समय नवजागरण का केन्द्रीय तत्व था। सप्रे जी के संबंध में माखनलाल चतुर्वेदी ने 11 सितंबर 1926 के ‘कर्मवीर’ में लिखा था “पिछले पच्चीस वर्षों तक पं. माधवराव सप्रे जी हिन्दी के एक आधार स्तंभ, साहित्य, समाज और राजनीति की संस्थाओं के सहायक उत्पादक तथा उनमें राष्ट्रीय तेज भरने वाले, प्रदेशों के गाँवों में घूम-घूम कर, अपनी कलम को राष्ट्र की जरूरत और विदेशी सत्ता से जकड़े हुए गरीबों का करूण क्रंदन बना डालने वाले, धर्म में धँस कर, उसे राष्ट्रीय सेवा में विवश करने वाले तथा अपने अस्तित्व को सर्वथा मिटाकर, सर्वथा नगण्य बनाकर अपने आसपास के व्यक्तियों और संस्थाओं के महत्व को बढ़ाने और चिरंजीवी बनाने वाले थे।”4 अपने लेखन में माधवराव सप्रे जी अपने युग के आदर्शों के साथ दिखाई देते हैं। चूँकि उनका युग राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना के जागरण का युग था अतः इसकी छाया इनकी तमाम रचनाओं पर भी दिखाई देती है। 
माधवराव सप्रे जी एक बेहतरीन अनुवादक थे। अनुवादक की हैसियत से इन्होंने अनेक मराठी पुस्तकों और लेखों का अनुवाद हिन्दी में किया है। इन्होंने गुरु रामदास की पुस्तक ‘दासबोध’, लोकमान्य तिलक की पुस्तक ‘गीता रहस्य’, चिंतामणी विनायक वैद्य की पुस्तक ‘महाभारत के उपसंहार’ का अनुवाद ‘महाभारत मीमांसा’ नाम से किया। इनके द्वारा अनूदित ग्रंथों में ‘शालोपयोगी भारत वर्ष’ तथा ‘दत्त भार्गव संवाद भी उल्लेखनीय है। 
सप्रे जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के लिए अर्थशास्त्र की मानक शब्दावली तैयार करने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। ये शब्दावलियाँ ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की ‘विज्ञान कोश योजना’ में शामिल हैं। अतः यह कहना गलत न होगा कि माधवराव सप्रे जी ने हिन्दी में अर्थशास्त्रीय परंपरा की शुरुआत की थी। बाद में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक ‘सम्पत्तिशास्त्र’, राधामोहन गोकुल की पुस्तक ‘देश का धन(1910 ई.) तथा पारसनाथ द्विवेदी की पुस्तक ‘देश की दशा’ आती हैं। 
माधवराव सप्रे जी ने बहुत सारे निबंधों का भी प्रणयन किया है। इनके द्वारा लिखे गए निबंधों में ‘स्वदेशी आंदोलन और बॉयकाट’ (1906 ई.), ‘इटालियन देशभक्त मेजिनी’ (1907 ई.), यूरोप के इतिहास से सीखने योग्य बातें(1913 ई., यह एक निबंधमाला के रूप में ‘सरस्वती’ पत्रिका में छह निबंध के रूप में छपे थे।), राष्ट्रीय जागृति की मीमांसा (सितंबर,1915 को ‘मर्यादा’ पत्रिका में), ‘स्त्रियाँ और राष्ट्र’(1915 ई. में ‘मर्यादा’ पत्रिका में), ‘हमारे सामाजिक ह्रास के कुछ कारणों पर विचार’ आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा भी इनके कई निबंध जो ज्योतिष, विज्ञान, अर्थशास्त्र, देशप्रेम, स्त्री शिक्षा आदि पर हैं जो कि उस दौर की कई महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ जैसे कि ‘मर्यादा’, ‘सरस्वती’, ‘अभ्युदय’, ‘श्री शारदा’ आदि में प्रकाशित हुए। इनकी अपनी पत्रिका जैसे ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिन्दी केसरी’ तथा ‘कर्मवीर’ में तो इनके द्वारा सृजित विपुल सामग्री आज भी शोध तथा अनुसंधान की माँग कर रही हैं। 
सप्रे जी का युग, साहित्य की कई विधाओं के आरंभ होने का भी युग रहा है। इसी युग में कहानी विधा का भी आरंभ होता है। हिन्दी कहानी को पृष्ठभूमि के रूप में संस्कृत, अँग्रेजी तथा बांग्ला की मौलिक तथा अनूदित कहानियाँ मिली थीं। अतः इसका प्रभाव इस युग के हिन्दी लेखकों पर कुछ न कुछ जरूर पड़ा है। सप्रे जी के लेखन कर्म पर भी यत्र–तत्र यह प्रभाव दिखाई देता है। यह बेहद निराशाजनक है कि हिन्दी के आरंभिक कथाकार होने के बावजूद प्रारम्भिक हिन्दी साहित्येतिहास में माधवराव सप्रे जी की चर्चा तो दूर नामोल्लेख तक नहीं हुआ है। जबकि इनकी कहानियाँ कई वर्षों तक ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में छपती रहीं। काफी बाद में देवीप्रसाद वर्मा जी ने इनकी कहानियों का सम्पादन किया। ‘माधवराव सप्रे की कहानियाँ’ नाम से इनके द्वारा संपादित किताब सन् 1982 में हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद से प्रकाशित हुई थी। इसमें जिक्र है कि माधवराव सप्रे की छह कहानियाँ 1900 ई. से लेकर 1901 ई. तक ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित हुई थीं। ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के पाँच अंकों में छपी इन कहानियों का उचित मूल्यांकन अबतक न हो सका है। इन छह कहानियों के क्रम इस प्रकार हैं – 
   1. सुभाषित-रत्न – जनवरी,1990   
   2. सुभाषित-रत्न – फरवरी, 1900 
   3. एक पथिक का स्वप्न- मार्च-अप्रैल, 1900
   4. सम्मान किसे कहते हैं? 
   5. आजम – जून, 1900 
   6. एक टोकरी भर मिट्टी 

            ये सभी कहानियाँ द्विवेदीयुगीन आदर्श और नैतिकता से परे नहीं हैं। फरवरी, 1968 में कमलेश्वर के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘सारिका’ में हिन्दी कहानी में माधवराव सप्रे के योगदान पर काफी बहस हुई। इस बहस पर आलोचक गोपाल राय लिखते हैं –“सारिका के इस अंक में देवी प्रसाद वर्मा का लेख ‘हिन्दी की पहली कहानी : एक महत्वपूर्ण प्रश्न’ देते हुए संपदाक ने टिप्पणी दी, ‘हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी कौन सी है?.... सन् 1901 में प्रकाशित यह कहानी (एक टोकरी भर मिट्टी) कालक्रमानुसार भी हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी ठहरती है। 
आचार्य लोग सप्रे जी की इस कहानी की ओर ध्यान न दे पाए, क्योंकि यह ‘सरस्वती’ में न छपकर ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में छपी थी। हिन्दी को अहिंदी भाषी लेखकों का बराबर सहयोग प्राप्त होता रहा है। यह हिन्दी के लिए गर्व की बात है और हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी लिखने का श्रेय यदि मराठी भाषी सप्रे जी को जाता है, तो यह भी गर्व की बात होनी चाहिए……।5  देखा जाय तो कथा-पत्रिका ‘सारिका’ ने हिन्दी की पहली कहानी के रूप में माधवराव सप्रे जी की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को स्थापित करने का कार्य किया है।
‘एक टोकरी भर मिट्टी’ अपनी संरचना में काफी छोटी कहानी है, लेकिन सिर्फ एक पृष्ठ की कहानी होते हुए भी यह बेहद मार्मिक एवं मजबूत अंतर्वस्तु को लिए हुए है। संक्षेप में कहानी इस प्रकार है कि एक जमींदार है जिसके अहाते में एक वृद्ध विधवा की झोपड़ी होती है। जमींदार की इच्छा है कि वह किसी भी तरह उस वृद्ध विधवा की जमीन ले ले ताकि जमींदार की जमीन का विस्तार हो जाय। इसके लिए वह तमाम हथकंडे अपनाता है और अंत में विधवा को हटाने में सफल हो जाता है। बाद में विधवा के एक कथन से जमींदार का हृदय परिवर्तित होता है और वह पुनः उसकी झोपड़ी वापस कर देता है। 
इतनी छोटी सी कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है जितनी कि अपने रचनाकाल में रही होगी। इस कहानी में मुख्य रूप से दो पात्र हैं जमींदार तथा अनाथ विधवा, लेकिन कहानी के वितान के लिए कुछ गौण पात्र जैसे – वकील, विधवा की पोती तथा नौकर की भी सृष्टि की गई है। कहानी में संवाद भी एकतरफा है। विधवा ही बोलती है। जमींदार बोलता नहीं है वह सिर्फ शारीरिक, मानसिक या कानूनी चेष्टाएं करता नजर आता है, लेकिन एकतरफा संवाद के बावजूद अर्थबोध में कहीं भी बाधा उत्पन्न नहीं होती है। 
‘एक टोकरी भर मिट्टी’ वर्ग भेद को बखूबी रेखांकित करती है तथा इस बिडम्बना को साफ़तौर पर दिखाती है कि जिस न्यायालय एवं न्यायिक व्यवस्था का निर्माण अन्याय तथा असिहिष्णुता को दूर करने के लिए किया गया है उसी न्यायालय एवं न्याय दिलाने वाले वकील अन्यायी तथा अत्याचारी की मदद ही नहीं करते, बल्कि उसके पक्ष में मनचाही जीत भी दिला देते हैं। 
देश-काल की दृष्टि से यह कहानी और भी व्यापक संदर्भ का प्रतिनिधित्व करती है। जिस समय यह कहानी लिखी गई वो गुलाम भारत का समय था। बहुत संभव है कि यहाँ एक पात्र के रूप में जमींदार अंग्रेजों का प्रतिनिधित्व कर रहा हो तथा विधवा भारतीयों का और यह एक प्रतीकात्मक कहानी हो। कहानी की इसी प्रतिकात्मकता को ध्यान में रखकर सत्यकाम जैसे बड़े आलोचक भी इस कहानी को जमींदार के जुल्म की कहानी से ज्यादा मातृभूमि के प्रति लगाव की कहानी मानते हैं। कहानी की एक टोकरी भर मिट्टी पूरे देश की मिट्टी बन जाती है।
हृदय परिवर्तन करवाकर अपनी बात मनवाने का सिद्धांत भी इस कहानी का महत्वपूर्ण पक्ष है। ऐतिहासिक रूप से गांधी जी की नीति मीमांसा के अंदर आने वाले ‘हृदय परिवर्तन’ का सिद्धांत तथा सत्याग्रह तो बहुत बाद में आया, लेकिन इस कहानी में इसकी मजबूत झलक ही नहीं मिलती, बल्कि माधवराव सप्रे के द्वारा इसे स्थापित भी किया जाता है। 
यह कहानी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति में बेजोड़ है। एक ओर नियति निर्णय का मारा हुआ मनुष्य और उसपर भी अन्य मनुष्य के द्वारा उसका शोषण। स्थिति इससे अधिक विद्रूप क्या हो सकती है। वह गरीब है, अनाथ है, विधवा है तथा वृद्धा है। घर में कोई कमाने-खटाने वाला नहीं है। कहानी में ब्योरा है “ वह(विधवा) तो कई जमाने से वहीं बसी थी; उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी पाँच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी।”6 अब यहाँ एक प्रमुख सवाल यह उभरता है कि इतनी पीड़ा और तकलीफ के बाद भी उसके ऊपर अत्याचार हो रहा है, लेकिन समाज कहाँ है? सप्रे जी ने समाज की कोई चर्चा नहीं की है। ऐसा लग रहा है कि शायद समाज अन्याय के सामने नतमस्तक है, झुका हुआ है, उसमें जुल्मी के साथ लड़ने का साहस नहीं है और इसलिए सप्रे जी जमींदार का हृदय परिवर्तन करवाने का काल्पनिक रूपक गढ़ते हैं। जबकि यथार्थ में ऐसा बिलकुल नहीं होगा। 
वैश्विक रूप से माधवराव सप्रे का समय उपनिवेश तथा साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ इसके विरोध का भी समय था। नवजागरण के प्रति जागरूक योद्धा चाहे वो राजनीतिक हो अथवा सामाजिक या फिर साहित्यिक, उसके अंदर साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक लहर चल रही थी। एक राष्ट्र के रूप में भारत भी उसे झेल रहा था। यहाँ जमींदार के द्वारा विधवा की जमीन हड़पने की नीति को सप्रे जी ने सामने लाकर उस समय के प्रभुत्वशाली देशों की नीति को ही सामने लाया है। कहानी की संवेदना उस जगह अत्यधिक प्रौढ़ हो जाती है जब विधवा वृद्धा अपने पुराने दिनों को याद कर रोती है। रोने की क्रिया इस कहानी में दो बार आयी है। रोने की क्रिया दोनों बार तब आयी है जब विधवा को अपने पुराने दिनों का स्मरण होता है। प्रसंग है – 
     “जब उसे अपनी पूर्व स्थिति की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट-फूट रोने लगती थी।”7  
     “विधवा झोपड़ी के भीतर गई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आखों से आँसू की धारा बहने लगी।”8   
        
         आज भी देश तथा देश से बाहर जल, जंगल तथा जमीन की लड़ाई चल रही है। आज भी लोग इस पीड़ा के कारण आँसू बहाने पर मजबूर हैं। हम सब इस बात को जानते हैं कि आज के जमीन छीनने वाले पं. माधवराव सप्रे की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ के जमींदार नहीं हैं कि पीड़ित की बात सुनकर उनके हृदय में परिवर्तन होगा और वो लोगों को उनकी अपनी जमीन से बेदखल नहीं करेंगे। अपनी आदर्शवादी सोच के कारण सप्रे जी चाहते थे कि किसी को भी इस तरह का कष्ट ही न हो। इन्होंने बिलकुल सरल कथानक के द्वारा पाठकों को संदेश देना चाहा है कि जरूरत से अधिक की इच्छा आपको पथ से भ्रष्ट कर देती है। अतः जरूरत से ज्यादा की इच्छा पर लगाम जरूरी है।
        

 संदर्भ सूची  
1. पत्रकारिता के युग निर्माता माधवराव सप्रे, संतोष कुमार शुक्ल, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष – 2008, पृष्ठ संख्या – 26 
2. हिन्दी साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास (द्वितीय खंड), डॉ. कुसुम राय, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, वर्ष -2012(प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या -259 (उद्धृत) 
3. हिन्दी साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास (द्वितीय खंड), डॉ. कुसुम राय, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, वर्ष -2012 (प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या -263 
4.  पांडेय मैनेजर. “ माधवराव सप्रे का महत्व .” हिन्दी समय , M G A H V, Wardha, 24 June 2021, 01:28 p.m. , www.hindisamay.com/content/3678/1/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%AF-%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5.cspx#:~:text=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%AF%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%20%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87,%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80%20%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6%20%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A5%A4.(उद्धृत) 
  5. हिन्दी कहानी का इतिहास, गोपाल राय, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष-2008, पृष्ठ संख्या – 45 (उद्धृत)
   6. हिन्दी गद्य-पद्य संग्रह(भाग-2), दिनेश प्रसाद सिंह(सं.) , ऑरियंट ब्लैकस्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद, वर्ष -2012, पृष्ठ संख्या – 4 
   7. वही 
   8. वही 

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