रहस्यमयी देवनागरी लिपि*

वागीशा शर्मा
(vsipdlin@gmail.com) इन्द्रप्रस्थ महाविद्यालय, दिल्ली

(*हंसराज कॉलेज की इंटरनेशनल हिन्दी कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत शोध-पत्र का परिवर्धित व संशोधित रूप)

सारांश: किसी भी जिज्ञासु बुद्धि का यह एक स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है कि देवनागरी लिपि का उद्गम क्या है? इन वर्णों की आकृतियाँ किसने गढ़ीं? इन विशिष्ट बनावटों का क्या कोई रहस्य है? इनके उच्चारण किसने निर्धारित किए? ये वर्ण अस्तित्व में कैसे आए? आदि-आदि। यह तो सर्वविदित है कि देवनागरी के मूल में संस्कृत भाषा है पर वहाँ भी संभवतः कोई विशेष वर्णन इन प्रश्नों के रूप में देखने को नहीं मिलता। प्रस्तुत शोध-पत्र इस दिशा में एक प्रयत्न है। वर्णमाला की सार्थकता का जितना बखान कर लो उतना ही कमतर है पर फिर भी, वर्तमान में, हिन्दी भाषा तथा हिन्दी-भाषी दोनों ही अधिकतर दोयम स्थान पर रक्खे जाते हैं। ऐसे में प्रस्तुत शोध-पत्र देवनागरी की सार्थकता तथा रहस्यात्मकता को उजागर करने का एक नन्हा सा प्रयास है। इस प्रयास में सहायक बने हैं- व्याकरणग्रन्थ, तन्त्र-शास्त्र, योग-शास्त्र, ज्योतिष-शास्त्र इत्यादि।


बीज शब्द: वर्णमाला, स्वर, व्यञ्जन, व्यापक वर्ण, व्याकरण, तन्त्र, कुण्डलिनी, यौगिक-चक्र, योग।


भूमिका: बचपन से ही हम सभी ने भाषा की परिभाषा भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है” के रूप में पढ़ी है। स्पष्ट है कि यहाँ अभिव्यक्ति विचारों की होती है। पर ये विचार क्या किसी भाषा में नहीं होते? यदि होते हैं तो, अभिव्यक्ति अपने विचारों की स्वयं अपने से ही!! यदि विचाराभिव्यक्ति किसी अन्य के लिए है तो विचारों की भाषा क्या थी? क्या अभिव्यक्त विचार भाषा में परिवर्तित विचारों से अलग होते हैं? घुमावदार पहेली बन गई ना यहाँ। पहले विचार या पहले भाषा? यदि विचार भाषा पर आधारित हैं तो गूँगे-बहरे या शिशु विचारहीन होने चाहिएँ। पर माना जाता है कि इस प्रकार के लोगों की कमतर ज्ञानेन्द्रियों को यदि छोड़ दिया जाए तो अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ सामान्य व्यक्तियों से कहीं अधिक सक्रिय और सक्षम होती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भाषा हो या न हो, विचार तो हैं ही । पर क्या कोई विचार बिन भाषा के भी हो सकता है? शिशु ने  बिस्किट शब्द अभी सीखा नहीं है पर यह एक स्वादिष्ट खाद्य है इससे वह भली भाँति परिचित है। यह परिचय अनुभव-जन्य है। बिस्किट देख कर बालक किस भाषा में उसे पहचानता होगा? अचानक ही किसी के सामने आने पर हम बेशक उसका नाम न याद कर पाएँ पर उसे पहचान कर वार्तालाप या परिचर्चा तो कर ही लेते हैं। बहुत सी ऐसी वस्तुएँ भी हम देखते हैं जिनका नाम हम नहीं जानते पर पहचान ज़रूर जाते हैं। ऑफिस या कॉलेज जाते हुए दिखाई देने वाले व्यक्तियों को हम जानते बेशक नहीं हैं परन्तु पहचानते अवश्य हैं। यह पहचान क्या है? किस रूप में है? हो सकता है कि किसी व्यक्ति विशेष की भाषा दूसरे को समझ ना आए पर उस व्यक्ति के मन मस्तिष्क में कोई तरीका तो है जो पहचान को बरकरार रखता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि विचारों की कोई निश्चित भाषा नहीं है। लेखिका का मानना है कि भाषा का प्रशिक्षण सिर्फ हमारे सुप्त संस्कार को जगाता है, वे संस्कार जो हमारे अन्तःस्थल में पहले से ही उपस्थित रहते हैं, जन्मजात हैं या यों कहिए जन्म-जन्मान्तरों से हमारे भाव-शरीर में सँजोते चले गए हैं। ये संस्कार पूर्वजन्म-सञ्चित भी हो सकते हैं और अनुभव-जन्य भी। इनकी अभिव्यक्ति के माध्यम का चयन व्यक्ति-विशेष का विवेक है, विकल्प है। कोई साहित्यिक भाषा का चयन करता है तो कोई निहायत ही अभद्र भाषा को उचित समझता है। कोई परिस्थितिवश या दिव्याङ्गता के कारण साङ्केतिक भाषा का प्रयोग करता है तो कोई सिर्फ मुखमुद्रा या हाव-भाव से ही संवाद स्थापित कर लेता है भरे भौन में क़रत है नैनन ही सौं बात। भाषा कोई भी हो, विचार गुह्य अन्तःस्थल में स्वतः विद्यमान अनाहत नाद का ही कृत्रिम रूप है। हर भाषा इन्हीं भावों का प्रतिपादन करती है, अभिव्यक्ति करती है। इस भाव-अभिव्यक्ति के लिए इस आलेख में हिन्दी भाषा को चुना गया है।


संसार में अनेकानेक भाषाएँ हैं। सभी भाषाओं की जानकारी सभी को हो यह कोई आवश्यक नहीं। पर हर क्षेत्र की भाषा का एक इतिहास होता है जिसे समय के साथ जनसाधारण भूल जाता है और भाषा अपने रूढ़ अर्थों में ही अपना अस्तित्व बनाने लगती है। परन्तु यदि किसी भी पौधे को उसकी जड़ से अलग कर दिया जाये तो वह धीरे-धीरे सूखने लगता है। ऐसा ही हश्र मातृ-भाषा हिन्दी का भी हो रहा है। हिन्दी भाषा संस्कृत भाषा से अलग हो कर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व तो लिए है परन्तु उसकी सारगर्भिता से जनसाधारण अछूता ही रहता जा रहा है। इस आलेख में उसी लुप्त-प्रायः गुह्य रहस्य को सामान्य शब्दों  में प्रकाशित करने का लेखिका का मुख्य ध्येय है।


हिन्दी-भाषा को देवनागरी लिपि के माध्यम से विकास मिला है। यह लिपि देवनागरी यानि देवों की नगरी की लिपि क्यों कहलाती है, यह विचारणीय प्रश्न है। देव शब्द देने के अर्थों को लिए है। यह लिपि जहाँ अभिव्यक्ति का उपहार देती हैं वहीं अति-सारगर्भित अर्थों को अपनाए हुए अनायास ही अन्य बहुत-कुछ भी दे देती है जिसका हमें भान तक नहीं होता। योग-शास्त्र, तन्त्र-शास्त्र, व्याकरण शास्त्र, ज्योतिष-शास्त्र इत्यादि सभी इन रहस्यों को छिपाये हैं। इन्हीं के माध्यम से इस विषय को प्रतिपादित करने का यहाँ प्रयास किया गया है। यहाँ प्रयुक्त तन्त्र-शास्त्र कोई जादू-टोनों से सम्बन्ध नहीं रखता। सही मायनों में तन्त्र शब्द तन् धातु से बना है जो कि विस्तार के अर्थ में प्रयुक्त होती है। यह विस्तार ज्ञान और बुद्धि का विस्तार है जो कि सुचारू जीवन के आधारभूत पहलू हैं।  


हिन्दी भाषा के मूल में वर्णमाला है जो कि स्वर और व्यञ्जनों में वर्गीकृत है। व्यावहारिक शिक्षण में हिन्दी-भाषा से परिचय वर्णमाला के माध्यम से ही होता है भले ही उससे पहले मातृभाषा के रूप में हम हिन्दी या कोई भी अन्य क्षेत्रीय भाषा से काफी हद तक परिचित रहते हैं। विश्लेषणात्मक परिपक्व बुद्धि का यह स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है कि ये वर्णमाला क्या है? इसका उद्गम कैसे हुआ? यही वर्ण क्यों? इन वर्णों की ये आकृतियाँ क्यों और कैसे बनीं? आदि-आदि। इन्हीं प्रश्नों की समीक्षा से चर्चा आरम्भ की जाएगी।


हिन्दी वर्णमाला 49 (उनचास) वर्णों का समूह मानी जाती है। इसमें अ,,,,,,,,,,, अं, अः तेरह स्वर हैं; कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, तथा पवर्ग में समाहित 5 X 5 = पच्चीस व्यञ्जन हैं तथा य,,,,,,,, क्ष, त्र, ज्ञ के रूप में ग्यारह व्यापक वर्ण हैं। आर्ष ग्रन्थों में क्ष’, ज्ञ तथा त्र को संयुक्त वर्णों की श्रेणी में रखकर उनके स्थान पर या रखा गया है जिससे व्यापक वर्णों की संख्या दस रह जाती है। यदि हिन्दी की जननी संस्कृत भाषा को लें तो यहाँ तीन और स्वरों ॠ,, ॡ को जोड़ कर स्वरों की संख्या सोलह होने से कुल वर्णों की संख्या इक्यावन हो जाती है। सर वुडरोफ ने स्वविरचित गारलैंड ऑफ वर्णमाला नामक पुस्तक में माँ काली की मुण्डमाल और वर्णमाला के इन इक्यावन वर्णों का गहरा सम्बन्ध दिखाया है जो इन वर्णों की रहस्यात्मकता को प्रमाणित करता है।


जप के लिए प्रयुक्त माला में भी इक्यावन मनकों का प्रयोग ऋग्वेदीय अक्षमालिकोपनिषत् [5] के अनुसार ही किया जाता है। माला का प्रत्येक मनका एक वर्ण को धारण किए रहता है। इन वर्णों के प्रतीक्यार्थकों का वर्णन ही अक्षमालिकोपनिषत् का प्रतिपाद्य है। इसके अतिरिक्त परात्रीशिका [7], प्रत्यभिज्ञाहृदयम् [4], रुदयामल-तन्त्रम् [3] आदि अनेकों आर्ष ग्रन्थ ऐसे हैं जो वर्णों के महात्म्य को प्रतिबिम्बित करते हैं। जयदेव सिंह [8] तो वर्णमाला के स्वरों ’; ’;,;,;,,,; को शिव की प्रमुख पाँच शक्तियों क्रमशः चित्त, आनन्द, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया का द्योतक मानते है तथा अन्य व्यञ्जनों को इन्हीं शिव-शक्तियों की प्रतिच्छायाएँ स्वीकारते हैं। 

 

वैयाकरणिक दृष्टिकोण: भारतीय दर्शन में शब्द या नाद आकाश का गुण माना गया है। यहाँ शब्द सार्थक वर्ण-समूह का पर्याय न होकर सिर्फ और सिर्फ ध्वनि का ही द्योतक है और इसीलिए इस शब्द में अक्षर वर्ण होना आवश्यक नहीं माना गया। पञ्च भूतों में मूर्धन्य स्थान पाने के कारण यह आकाश-गुण शब्द वर्णाभाव में भी अस्तित्व-हीन नहीं होता। तो स्वाभाविक प्रश्न है कि फ़िर यह शब्द क्या है? संस्कृत व्याकरण के आर्ष ग्रन्थ वाक्यपदीय ([1] से उद्धृत) के अनुसार वक्ता की इच्छा के अनुरूप जब आन्तरिक वायु सक्रिय हो कर कण्ठ, तालु आदि से टकराती है तो अभिघात से यह वायु शब्द बन जाती है:

                   लब्धक्रियः प्रयत्नेन वक्तुरिच्छानुवर्तिना।

                   स्थानेष्वभिहतो वायुः शब्दत्वं प्रतिपद्यते॥

तात्पर्य यह हुआ कि शब्द अन्तःस्थल में पहले ही अनाहत नाद के रूप में विद्यमान था जिसे विचार माना जा सकता है पर उसे श्रवणीय बनाने के लिए, अभिव्यक्त करने के लिए वायु-निर्मित अभिघात की आवश्यकता हुई। इस अभिघात-प्रणीत शब्द या नाद को आहत नाद कहा गया। यह आहत नाद ही वैख़री वाणी है जो इस लौकिक संसार के सभी कार्यकलापों में प्रयुक्त होती है। नाद या शब्द का ही पर्याय होने से रूढ़ अर्थ में ध्वन्यात्मक शब्द और वर्णात्मक शब्द एक ही माने जाने लगे जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। एक ही ध्वनि के लिए विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न वर्णों का प्रयोग सम्भव है। अतः ध्वनि का रूपान्तरण वर्ण माना जा सकता है पर पर्याय नहीं।

संस्कृत व्याकरण के आप्त्प्रमाण ग्रन्थ कारिकावलि ([1] से उद्धृत) के अनुसार शब्द (ध्वन्यात्मक) जिस क्षण उत्पन्न होता है उसके अगले क्षण स्थिर रहता है और तीसरे क्षण विनष्ट हो जाता है। इसीलिए वर्णमाला में सभी व्यञ्जन हलन्त के साथ तो क्षणिक ही रहते हैं परन्तु उनको स्थायित्व प्रदान करने के लिए उन्हें स्वरों से समायोजित किया जाता है यथा, क् + अ = क, ख् + अ = ख, आदि। दूसरे शब्दों में, व्यञ्जनों की स्थिरता बनाए रखने के लिए स्वरों की आवश्यकता है जबकि स्वर स्व और के मिश्रण से बना होने से स्वयं ही रञ्जित रहता है- स्वयमेव रञ्जति इति स्वरः

 

वर्णमाला के वर्णों को अक्षर भी कहा जाता है। वैयाकरणिकों के मतानुसार अक्षरं न क्षरं विद्यात् – न क्षीयते, न क्षरतीति वाsक्षरम् अर्थात् जो कभी क्षरित या विनष्ट न होवे वह अक्षर है। अक्षर अक्ष और के सायुज्य से बना है। वर्ण प्रकाशित करने के अर्थों में प्रयुक्त होता है तथा अक्ष से क्ष पर्यन्त वर्णों का द्योतक माना जा सकता है। इन मायनों में अक्षर से क्ष पर्यन्त वर्णों से निर्मित शब्दों के अर्थों को प्रकाशित करने का भाव लिए है। इसीलिए शिव-सूत्र [8] वर्णों अर्थात अक्षरों को मातृका का स्थान देते हैं क्योंकि यही वर्ण समस्त जगत् को विचार-विनिमय की सामर्थ्य देते हैं, या यों कहिए कि समस्त वाङ्मय की जननी ही ये मातृकाएँ हैं। इन अक्षरों के सार्थक समूह से भाषा-विषयक शब्दों का निर्माण होता है जो लौकिक संसार में विचार विनिमय का सशक्त माध्यम है।

 

व्युत्पत्यार्थक दृष्टिकोण से वर्णो वृणोतेःअर्थात् वर्ण वह है जिसका वरण किया जाए। वर्ण के इस अर्थ के सन्दर्भ से ही वर्ण रङ्ग का पर्यायवाची बनता है। यहाँ शब्द रङ्ग लाल, पीला, नीला इत्यादि लौकिक अर्थों को सम्बोधित नहीं करता अपितु वरण करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसी अर्थ के तहत ही  वर्णव्यवस्था रूपी सामाजिक वर्गीकरण सम्भव हो सका था। जिस गुण व कर्म को प्राणी अपनाता था यानि वरण करता था, उसी में लिपायमान हो जाता था तो वही उसका वर्ण माना जाता था। इसीलिए वास्तविक वर्णव्यवस्था गुण व कर्म पर आधारित होती है बजाय कि आज के मायनों के अनुसार, जहाँ वर्ण का सही अर्थ भुलाकर जन्म तथा जाति ही इसका आधार माना जाने लगा है। यह सर्वथा अमान्य व्यवस्था है तथा समाज को गलत ढङ्ग से बाँटने की व्यवस्था है।

 

यौगिक दृष्टिकोण: प्राणी का जीवन श्वास-उच्छवास प्रक्रिया का परिणाम है। प्राणों का धारक होने से वह प्राणी कहलाता है। पञ्च-महाभूतों में से वायु महाभूत प्राणों का नियामक है। श्वास-प्रश्वास से उत्पन्न स्वाभाविक ध्वनि सोsहम् या ‘(अ)हंसः के समान होती है। यौगिक ग्रन्थ यहाँ प्रयुक्त सः को शिव रूप तथा अहम् को (मैं) प्राणी रूप में देखते हैं। हरेक श्वासोच्छ्वास में मैं शिव हूँ या शिव मैं हूँ की प्रतिध्वनि इस बात की द्योतक है कि हर प्राणी शिव रूपी ब्रह्म की ही प्रतिच्छाया है। यहाँ प्रयुक्त अहम् (मैं) शब्द वर्णमाला के पहले वर्ण तथा अन्तिम वर्ण को लेकर बना है, म् सिर्फ ध्वनिकारक है। अतः अहम् शब्द इस बात को दर्शाता है कि से लेकर तक की सम्पूर्ण वर्णमाला मैं यानि जीव या प्राणी में समाहित है, जो अनाहत नाद है। यह अस्वैच्छिक ध्वनि जीव तथा प्राणी का अद्वैत सम्बन्ध उद्घोषित करती है।   


नाड़ी-शास्त्र में वर्णित लाखों नाड़ियों में प्रमुख तीन नाड़ियों है- इड़ा, पिङ्गला तथा सुषुम्ना। शिवस्वरोदय [6] के अनुसार इड़ा वामा है और दक्षिण नासिका से सम्बन्धित है जबकि पिङ्गला दक्षिण-नाड़ी है लेकिन सम्बन्ध वाम-नासिका से रखती है। सुषुम्ना मध्य-नाड़ी है जो कुण्डलिनी शक्ति को समेटे रहती। यह दक्षिण और वाम नाड़ियों का नासिका से विपरीत सम्बन्ध कुछ वर्ण की सी आकृति को जन्म देता है जो मूलार्ण कहलाता है। मन्त्र-सिद्धि विद्या में इस मूलार्ण का विशिष्ट स्थान है। यह वर्ण की सी आकृति कुछ हद तक शरीर-स्थित ड़ी॰एन॰ए॰ की आकृति से भी मिलान रखती है इसलिए चिकित्सा जगत में भी यह शोध का एक रोचक विषय बना है। 


वर्णों की बनावट: शरीर में प्राण-ऊर्जा अनेक वाहिकाओं के रूप में क्रियमाण रहती है। इन वाहिकाओं का स्थूल रूप भले ही दृश्यमाण न हो परन्तु सूक्ष्म रूप अवश्यम्भावी है क्योंकि उसके बिना शारीरिक ऊर्जा-वहन असम्भव है। यह प्राण-वायु चलायमान अवस्था में आन्तरिक अंगों के साथ घर्षण-प्रक्रिया के फलस्वरूप विभिन्न आकृतियों और शब्दों को जन्म देती है, मर्म-स्थान, सन्धि-स्थान, चक्र तथा दल का निर्माण करती है। यही आकृतियाँ और शब्द ही वर्णमाला के इक्यावन वर्ण हैं। ये वर्ण ही यौगिक चक्रों में विभिन्न दलों पर प्रतिस्थापित पाए गए है-


“....इसी प्रकार पराशक्ति कुण्डलिनी स्वयं को पचास कुण्डलों से कुण्डलित कर, मूलाधार में अपने अधिष्ठान रूप पुरुष तत्व से दिव्यभाव प्राप्त कर नाद (हकार) के साथ सुषुम्ना के मार्ग से कण्ठ आदि स्थानों का स्पर्श करती हुई अ से क्ष तक के पचास वर्णों के रूप में अभिव्यक्त होती है”। [2]


योग-शास्त्रानुसार इन वर्णों की स्थिति चक्र-दलों पर इस प्रकार है:

 

चक्र

दल

वर्ण

बीजवर्ण

आज्ञा

2

, क्ष

विशुद्ध

16

,,,,,,,, लृ,,,,,, अं, अः

हं

अनाहत

12

,,,,,,,,,,,

यं

मणिपूर

10

,,,,,,,,,

रं

स्वाधिष्ठान

6

,,,,,

वं

मूलाधार

4

,,,

लं

 

उपरलिखित बीजवर्ण चक्र-साधना में विशेष स्थान रखते हैं। बीजवर्ण अनुनासिक मकारान्त बनाए गए हैं  क्योंकि तन्त्र-शास्त्रानुसार संसार में केवल एक ही वर्ण है और वह है: ॐ (ओ३म्)। ये ही अविभाजित रूप में सभी वर्णों में उपस्थित रहता है। इसीलिए ॐ (ओ३म्) की साधना की परम्परा है। ॐ (ओ३म्) की उच्चारण विधि में अनुनासिकता की प्रधानता सभी बीज-वर्णों की झङ्कार का अङ्ग है।


मान्यता है कि सृष्टि ब्रह्मा की मानस कल्पना है। इसके परिशीलन के समय ब्रह्मा ने ही पुरुष और प्रकृति का रूप धारण कर सृष्टि को बनाया और विस्तार दिया। यहाँ पुरुष शब्द पुरिशेते अर्थ में है अर्थात् जो काया रूपी आवरण में विवश पड़ा है और प्रकृति यहाँ माया या शक्ति की प्रतीक है। हरेक प्राणी ब्रह्मा की प्रतिच्छाया होने से ब्रह्मा की सर्जकता को भी धारण किए है जो कि मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी शक्ति ही है। प्रपञ्चसारतन्त्र [2] के अनुसार:


“कुण्डलिनी की गति ऊर्ध्वोन्मुखी होती है, जो श्वास-प्रश्वास, प्राण-अपान को गति प्रदान करती है। ..... मध्यानाड़ी में स्थित बिना क्रम के स्वभाविक रूप से उच्चरित होने वाली यह प्राण-शक्ति ही अनच्क कला कहलाती है”।


यह अनच्क कला, बिना स्वर-सानिध्य के वर्णोच्चारण करना है अर्थात् ककार, हकार इत्यादि को बिना स्वर के उच्चरित करना यानि क्, ह्, प्, त्  इत्यादि का उच्चारण। स्पष्ट है कि यहाँ यह अनच्क यानि वर्णाक्षर अनाहत नाद के रूप में प्राणी का अभिन्न अङ्ग हैं। वे कुण्डलिनी की गति का परिणाम हैं। यहाँ आवश्यक होगा कुण्डलिनी को जानना।


वर्णमयी देवी शारदा: इस पराशक्ति कुण्डलिनी को अक्षरात्मिका रूप में देवी शारदा का नाम दिया गया है जिसके विभिन्न अङ्ग-प्रत्याङ्ग वर्णमयी है। शार सांसारिक कर्म हैं जो क्षरणशील हैं तथा दान का समानार्थक है। अतः वर्णमयी देवी शारदा ब्रह्म-विद्या के रूप में अक्षर-ज्ञान द्वारा लौकिक कर्मों को विनष्ट कर के ज्ञान की वृद्धि करती है। सभी इक्यावन वर्णों का देवी-शरीर में एक निर्दिष्ट स्थान है जो इस प्रकार है [2]:


वर्ण

अङ्ग

ब्रह्मरन्ध्र

सम्पूर्ण मुख

दक्षिण नेत्र

वाम नेत्र

दक्षिण कर्ण

वाम कर्ण

दक्षिण नासापुट

वाम नासापुट 

दक्षिण कपोल

वाम कपोल

ऊर्ध्व ओष्ठ

अधः ओष्ठ

ऊर्ध्व दन्तपङ्क्ति

अधः दन्तपङ्क्ति

अं

तालु

अः

जिह्वा

कवर्ग

दक्षिण बाहु के

बाहुमूल

कर्पूर

मणिबन्ध

अङ्गुलिमूल

अङ्गुल्यग्र भाग

चवर्ग

वाम बाहु के

बाहुमूल

कर्पूर

मणिबन्ध

अङ्गुलिमूल

अङ्गुल्यग्र भाग

टवर्ग

दक्षिण पाद की

जङ्घा

जानु (घुटना)

गुल्फ (टखना)

अङ्गुलिमूल

अङ्गुल्यग्र भाग

तवर्ग

वाम पाद की

जङ्घा

जानु (घुटना)

गुल्फ (टखना)

अङ्गुलिमूल

अङ्गुल्यग्र भाग

पवर्ग

मध्य अङ्ग

दक्षिण कुक्षि

वाम कुक्षि

पृष्ठ

नाभि

जठर

व्यापक वर्ण

हृदयप्रदेश

हृदय

दक्षिण स्कन्ध

गर्दन

वाम स्कन्ध

हृदय से दक्षिण कर पर्यन्त

हृदय से वाम  कर पर्यन्त

हृदय से दक्षिण  पाद पर्यन्त

हृदय से वाम   पाद पर्यन्त

ळ / ॐ

हृदय से नाभि पर्यन्त

क्ष

हृदय से भ्रूमध्य पर्यन्त


 

ये निर्धारित स्थान चिकित्सा क्षेत्र में एक्यूपञ्क्चर तथा एक्यूप्रेशर विधियों में प्रयुक्त बिन्दुओं के आसपास ही हैं। इस दिशा में लेखिका का शास्त्रीय सङ्गीत संबंधित एक शोध-पत्र [9] पूर्व प्रकाशित भी है। स्पीच थेरेपी में भी संभवतः कुछ नए प्रयोग इन वर्ण-स्थानों के मद्देनजर किए जा सकते हैं।


ज्योतिष-शास्त्र में प्रयुक्त स्वर-विज्ञान भी वर्णों की गूढ़ता को ही परिचायक है। जहाँ एक ओर वर्णमाला में वर्णों की निर्धारित स्थान-सङ्ख्या के आधार पर अङ्क-ज्योतिष के तहत फलादेश की परम्परा है तो वहीं दूसरी और वर्णमाला के स्वरों की पाँच अवस्थाएँ- बाल, कुमार, युवा, वृद्ध एवं मृत्यु के अनुसार भी फलादेश प्रतिपादित किया जाता है। किसी भी व्यक्ति के नाम के प्रथम स्वर को बाल रूप मान कर वृत्ताकार रूप में स्वर की सभी पाँच अवस्थाएँ देख कर भविष्य वाणी करना भी स्वर-विज्ञान का प्रतिपाद्य है। ज्योतिष सबन्धित स्वर-विज्ञान में सत्ताईस नक्षत्रों के हर एक चरण के लिए एक स्वर-युक्त व्यंजन निर्धारित किया गया है जिसके अनुरूप ही व्यक्ति का नामकरण करने की परम्परा आज भी अनेकों परिवारों की मान्यता है। क्योंकि हर राशि तथा ग्रह का हर एक नक्षत्र से भी सम्बन्ध रहता है अतः फलादेश में नाम राशि का महत्व रहता है। इसी तरह के लगभग बीस स्वर चक्रों का वर्णन स्वर-विज्ञान में फलादेश हेतु किया जाता है। इनमें से कुछ व्यंजनों को भी महत्व देते हैं पर अधिकतर सिर्फ और सिर्फ पाँच हृस्व स्वरों-  अ,,,,, को आधार मानकर ही फलादेश का प्रारूप बनाते हैं। ज्योतिषान्तर्गत स्वर-विज्ञान की जटिलताओं का सम्पूर्ण विवरण यहाँ सम्भव तो नहीं है पर इंगित यही है कि वर्णमाला की सार्थकता अनन्त है।


निष्कर्षतः हिन्दी वर्णमाला के वर्ण सामान्य दिखाई देते हुए भी अद्भुत और सारगर्भित है। इनकी विशिष्ट बनावटों का भी कारण है। क्योंकि योग-ध्यान की चरम साधना से साधित पराशक्ति कुण्डलिनी का दर्शन सामान्य दर्शन नहीं है इसलिए इन वर्णों को अपने शरीर में अनुभव करना भी साधारण मनुष्यों के बस की बात नहीं है। वर्षों की साधना भी सम्भवतः कमतर ही रह जाए। ऋषियों ने अपने अद्वितीय अनुभवों से इन्हें शरीर में देखा, अनुभव किया और अस्तित्व दिया। इसीलिए ये वर्ण अपने-अपने देवता द्वारा बीज-वर्ण रूप में साधित होकर ही फलीभूत हो पाते हैं। इस जटिल समस्या से उबरने के लिए ही एकाक्षर ॐ की साधना पर बल दिया जाता है क्योंकि सभी वर्ण उसी के अविभाज्य अङ्ग है। हरेक वर्ण का अपना देवता है, ऋषि है जिनके यौगिक दर्शनों के फलस्वरूप उस वर्ण का अस्तित्व है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हर वर्ण का एक विशिष्ट रङ्ग भी है सम्भवतः इसीलिए रङ्ग तथा वर्ण पर्यायवाची शब्द हैं। हर वर्ण मानव-शरीर के किसी न किसी अङ्ग से सम्बन्धित भी दिखाया गया है। वास्तव में, हर वर्ण अपने आप में इतना कुछ छिपाये या लपेटे है कि वर्णों का वर्णन कितना भी किया जाए वही अपूर्ण है। अतः ‘वर्ण’ शब्द ‘वर्णन’ शब्द का ही प्रारूप मान लिया जाए तो बेहतर होगा और सम्भवतः यही इसका वास्तविक अर्थ होना भी चाहिए।


इसी सारगर्भिता के कारण इस अङ्ग्रेज़ी-वर्चस्व समाज में हिन्दी-संस्कृत सम्भाषण सब के बस की बात नहीं रह गई। चित्त की सात्विक्ता, मन की पवित्रता और वर्णों की सार्थकता की जानकारी इस भाषा-सम्भाषण के लिए परमावश्यक है। इसीलिए यह देवभाषा है।

 

सन्दर्भ-सूची:

[1]     आचार्य, डा॰ सुद्युम्न (2015), दर्शन शास्त्र की परम्परा में भौतिक विज्ञान, परिमल पब्लिकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड. 

[2]     पुरी, रामचन्द्र (2012), श्रीमदाद्यशंकराचार्य विरचितिं श्रीप्रपञ्चसारतन्त्रम्-प्रथमो भागः, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली।

[3]     मालवीय, सुधाकर (सम्पादक एवं व्याख्याकार)(2017) रुद्रयामलम् (उत्तरतन्त्रम्)-प्रथमो भागः, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली।  

[4]     सिंह, जयदेव (2016), प्रत्यभिज्ञाहृद्यम्, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली।

[5]     अक्षमालिकोपनिषद्: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/akshamalika.- pdf

[6]     शिवस्वरोदय: https://www.freehindipdfbooks.com/download-now/shivsvarodaya-pt-shri-dhar-shiv-lal-shiva-parvati-sanvaad-hindi-sanskrit-pdf/

[7]     Bäumer, Bettina (Editor) (2017), Parā-trīśikā-Vivaran͎a–The Secrets of Tantric Mysticism, Motilal Banarasidass Publishers Pvt. Ltd., Delhi.

[8]     Singh, Jaidev (2012), Śiva Sūtra, Motilal Banarsidass Publishers Pvt. Ltd., Delhi.

[9]     Sharma, Vagisha (2019), Therapeutic Aspects of Indian Music, Sangeet Galaxy, Vol.8(2), 37-52, https://sangeetgalaxy.co.in/paper/therapeutic-aspects-of-indian-classical-music

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।