व्यंग्य: केश कला अकादमी

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

जब मैं बोर हो रहा होता हूँ और ऊर्जा पाना चाहता हूँ तो केश कर्तनालय पहुँच जाता हूँ। यहाँ सब अपने चेहरे को इतने आश्चर्य से देखते हैं, गोया भूत देख रहे हों। अब यह भूतगाह सेलून हो गया है और हमारा नाई हेयर स्टाइलिस्ट कहलाने लगा है। वह बाल कम काटता है, अफवाहें ज़्यादा फैलाता है। इस युग में अफवाहें नवजीवन दायिनी हैं। यहाँ दस ग्राम बाल कटें न कटें, परनिंदा सुन-सुन कर किलो भर ख़ून बढ़ जाता है। राजनीति, फिल्मों और क्रिकेट पर लेटेस्ट ख़बरें यहाँ मुफ़्त सुनने मिलती हैं। पूर्व राजा-महाराजा जैसे अपने दीवानखाने में पुराने तीर-तरकश, पोषाकें और शेर की खाल प्रदर्शित करते हुए अपने खानदान का नाम रोशन करते हैं,  हमारे नाई ने भी इसलिए एक कोने में अपने पुराने औजार करीने से सजा कर रखे हैं। इनसे वह अपने प्रसिद्ध ग्राहकों के खानदान की कथा सुनाता है।

केश कर्तनालय की दीवारों पर बहुरंगी छायाचित्र चिपके हैं। एक ओर भरत नाट्यम की मुद्रा में सुप्रसिद्ध आइटम स्टार का गर्म चित्र है तो दूसरी ओर हवा में छलाँग मार रहे एक्शन हीरो का पोस्टर है। इन सबके बीच कई कोलाज चिपके हैं। चित्र अंग प्रदर्शन कर रहे हैं पर दीवार का नंगापन छुपा रहे हैं। पिछले दशक में यहाँ भगवान के फोटो चस्पा थे, उन दिनों नाथू नाई भगवान भरोसे कटिंग करता था। अब अयोध्या में राजनीति पसर गई है, भगवान राजनेताओं के भरोसे हो गए हैं तो हेयर कटिंग सेलून से भी भगवान उतर गए हैं।

मैंने उससे पूछा, "भगवान के फोटो हटा कर तुमने फ़िल्मी कलाकारों के फोटो लगा दिए, क्यों भाई!"

उसने कहा, "यह नई पीढ़ी के रूझान की बात है। केश सज्जा अब कला है। जैसे मूर्ति कला, चित्र कला और बहुत सारी ज़रूरी कलाएँ हैं। मैं समकालीन केश कला से जुड़ा हूँ। इस कोलाज़ में कपूर और ख़ान घरानों की बाल शैली का तुलनात्मक अध्ययन है। उधर हिप्पी, बीटल, जाज़ आदि विदेशी केश कलाओं के नमूने हैं।" 

बुद्धिजीवी आधुनिक ट्रेंड के साथ नहीं चले तो गँवार गिना जाता है। मैं यह जान कर अचंभित रह गया कि मेरा नाई बुद्धिजीवी है, और केश कला का इतना ऊँचा मर्मज्ञ है। उसने कहा, चलो कुछ और बुद्धिजीवियों से मिलो। वाकई यह आश्चर्य की बात थी। यहाँ बुद्धिजीवी कम थे और जो थे वे आम आदमी के बीच उठने-बैठने में तौहीन समझते थे। आम आदमी के बीच बुद्धिजीवी रहने लगे तो उनकी बुद्धि पतित हो जाती है। नाथू ने उन लोगों से परिचय कराया, विप्र जी दो साल में एक बार कटिंग करा पाते थे, इसलिए उनके जो भी बाल थे, लम्बे थे। दूसरे बुद्धिजीवी मधुर जी की दाढ़ी बादशाह बाबर जैसी बाबरी थी। तीसरे बुद्धिजीवी से हाथ मिलाया तो मैं हाथ मिलाता ही रह गया, वे गंजे थे। मैं उत्सुकतावश पूछ ही बैठा, आपका यहाँ क्या काम! उन तीनों बुद्धिजीवियों ने ठहाका लगाया। बुद्धिजीवी बिना बात एक साथ ठहाका लगायें तो समझ लीजिए वे गठबंधन धर्म निभा रहे हैं।

मधुर जी कहने लगे, यहाँ साहित्य-कला अकादमी नहीं है और न ही कॉफी हाउस, तो हम यहीं पर कला चर्चा कर लेते हैं, कला को ज़िंदा रखना हम कलाकारों का धर्म है। विप्र जी कहने लगे – कला पर विमर्श होना चाहिए। कला चिड़िया की तरह रंग-बिरंगी है और उन्मुक्त भी। इसलिए जहाँ-जहाँ चिड़िया है वहाँ-वहाँ कला है। जहाँ कला है वहाँ घोसले हैं। जैसे चिड़िया-चिड़िया में फ़र्क होता है, घोसले-घोसले में अंतर है। इस कारण कुछ घोसले प्रतिष्ठान कहे जा रहे हैं और कुछ प्रतिष्ठानों को घोसला भी नहीं कहा जा रहा। आप समझिये।

तभी एक सहायक ने मुझे पुकारा और कहा, "आइये साहब आपका नंबर है।" मैंने भद्रता से कहा, "विप्र जी और मधुर जी मुझसे पहले आये हैं, इन्हें पहले निपटा दो। लोग अपने क्रम से सम्मान पा लें तो कला बंदर-बाँट से ऊपर उठ जाये।" एक और ठहाका गूंज गया कर्तनालय में। विप्र जी ने कहा, "बंधु आप ही निपट लें, तब तक हम कला पर चर्चा करते हैं और आपका मुफ़्त में ज्ञानवर्धन भी।" 

उनके इस ढोंगी भोलेपन पर मैं हँस दिया, अब कला कभी मुफ़्त में ज्ञानवर्धन नहीं करती। मैं बाल कटाने गया था, इसलिए कला के झाँसे में नहीं आया। मैंने नोट किया, सभी भारतीय केश कर्तनालयों में यूरोपियन हेयर कट के पोस्टर लगे रहते हैं। मैंने अपने नाई को एक कट बताते हुए कहा 'मेरे बाल इस स्टाइल में काट दो।' वह मेरा मुँह ताकने लगा, बोला -सर, आपके देसी चेहरे पर देसी कटिंग ही जँचेगी। यह पोस्टर तो नई स्टाइल देखने भर के लिए है। आधुनिक बाल कला पर सार्थक चर्चा हो इसलिए यह पोस्टर ज़रूरी है, हमारे रोजमर्रा के जीवन से इसका क्या वास्ता।

उन्हें नाचना नहीं आता था, पर टेढ़े आँगन का पोस्टर ज़रूरी था। कला को सार्थक बनाने के लिए कलाकार ऐसे ही रिझाते हैं। मैं ठहरा साधारण आदमी, मेरा कला से क्या लेना-देना; मुझे ग़ुस्सा आने लगा। मैंने कहा, एक घंटे से बाल शैली, बाल कला, बाल विन्यास की रट लगा रखी है। इसे हेयर कटिंग सेलून ही रहने दो, यहाँ तो कला मत ठूँसो। मधुर जी ऊँगली नचाते हुए बोले, इसे बाल कला वीथिका कहिए श्रीमान। बस ग्रांट मिलने वाली है, फिर तो इसे हम केश कला अकादमी बना देंगे।

पीछे से कोई बोला – सरकार मेहरबान तो गधा पहलवान।
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