लोकतंत्र की विकास-यात्रा: एक सामाजिक-अभियांत्रिकीय आकलन

चंद्र मोहन भण्डारी
(प्रस्तुत निबंध में विषय को उसके सम्पूर्ण विस्तार मे सहेजने का प्रयास नहीं, अपितु फोकस है कुछ लाक्षणिकताओं पर जो लोकतंत्र की खूबियों एवं कमियों को उजागर करती हैं लेखक के अपने अनुभव के आधार पर। लोकतंत्र को सामाजिक अभियांत्रिकीय यानि सोशल इंजीनियरिंग द्दष्टिकोण से समझने व परखने का भी कुछ प्रयास है।)

विशिष्ट शब्दावली: सामाजिक परमाणुवाद, सामाजिक अभियांत्रिकी, मैग्ना कार्टा चार्टर, अलोकतांत्रिक (यानि अ-लोकिक)

लोकतंत्र आज एक बहुचर्चित पर अपेक्षाकृत कम समझा गया विषय है। आज संसार के अधिकांश देशों में लोकतंत्र है भले ही उसका स्वरूप एवं गुणवत्ता एक दूसरे से बहुत भिन्न हों। शायद चुनाव होना और वोट डालने का अधिकार ही अधिकतर लोगों के लिये इसकी पहचान बन चुका है जबकि वास्तविकता इससे अलग है। लोकतंत्र का ऊँट हर चुनाव के बाद करवट बदलता है और वह किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल है। विविधता से परिपूर्ण इस जटिल विषय के केवल कुछ बिंदुवों पर चर्चा का प्रयास प्रस्तुत लेख में होगा।

लोकतंत्र का ऊँट; किस करवट
पहले के एक लेख [1] में ऊँट की करवटों से बात चल निकली थी और दूर तक चलती चली गई। जिन्होंने वह लेख नहीं पढा उनकी जानकारी के लिये सार-संक्षेप के बाद बात आगे बढ सकेगी। बात एक प्रचलित मुहावरे से आरंभ हुई थी और सृष्टि की जटिलतम रचना यानि मानव मस्तिष्क और मन तक जा पहुँची। मुहावरा जाना पहचाना है “देखते हैं ऊँट किस करवट बैठता है” यानि देखते हैं इसका क्या निष्कर्ष निकलता है? आखिर ऊँट की करवट को ही क्यों इतना महत्व दिया गया इस बात पर भी पिछले लेख में काफी माथापच्ची हो चुकी। सारी बात अनिश्चितता से जा जुड़ती है और जुड़ती है आने वाली घटना के पूर्वानुमान की लगभग पूर्ण अनुपस्थिति से।

दरअसल सारी बात संभावनाओं एवं वास्तविकता के बीच की अनिश्चितता से संचालित होती है [2]। मैं एक सिक्का उछालता हूँ और दो संभावित स्थितियों में कौन सी प्राप्त होगी सही-सही बता सकना असंभव है। ऐसे ही पासे की बात करें जो चौपड़ या लूडो जैसे खेलों में प्रयोग होता है पासा फेंके जाने के बाद छह संभावित स्थितियों में से कोई भी मिल सकती है और यह बता सकना असंभव है कि क्या मिलेगा: इक्का, दुग्गी, तिग्गी, चौका, पंजा या फिर छक्का। हमने छह करवटों वाले ऊँट को देख लिया। पिछले लेख में मानव-मन की तुलना सैकडों करवटों वाले ऊँट से की गयी थी।

लोकतांत्रिक करवट
इस लेख में बात लोकतंत्र की हो रही है। बात की तह तक पहुँचने के प्रयास में हम विज्ञान से जुड़े परमाणु सिद्धांत का जिक्र करेंगे जो सार्थक और उपयोगी है। दो हजार साल से अधिक समय पहले ग्रीस में डेमोक्रेटस और भारत में कणाद ने परमाणु सिद्धांत प्रतिपादित किया था जिसके अनुसार विश्व में हर पदार्थ मूल अविभाज्य घटकों से बना है जिन्हें परमाणु कहा जाता है। इसी धारणा को समाज पर लगाया जाय तो कहा जा सकता है कि समाज जिन इकाइयों से बना है वह व्यक्ति है जिसे सामाजिक जीवन के संदर्भ में मूल इकाई के रूप में लिया जा सकता है। सामाजिक परमाणुवाद नाम से चर्चित इस सिद्धांत के अनुसार बडी संख्या में आपस में जुड़े व्यक्तियों की एक इकाई के रूप में कार्य करने की कोशिश सामाजिक परमाणुवाद कही जा सकती है जिसमें हर व्यक्ति एक अलग परमाणु के रूप में कार्य करता रहे साथ ही परमाणुवों के युग्मन से निर्मित पदार्थ की तरह समाज या राष्ट्र की एक रूपरेखा भी परिभाषित हो सके। इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान [3] दार्शनिक जान लॉक (John Locke) का है जिनका मानना था कि जिस तरह पदार्थ के गुण उसके परमाणु से परिभाषित होते हैं समाज के क्रिया कलाप भी व्यक्तियों से निर्धारित होते हैं। सभी सामाजिक मूल्य, संस्थाएँ आदि मुख्यत: विशिष्ट व्यक्तियों के कार्यों से विकसित होती हैं पर समाज के औसत व्यक्ति की विशेषता को भी प्रतिबिम्बित करती हैं। बाद में जान लाँक और थामस हाब्स (Thomas Hobbes) ने इस सिद्धांत को राजनैतिक संदर्भ में प्रयुक्त किया। उनके अनुसार मानव मूलत: स्वैच्छिक और विचारशील इकाई है जो बड़ी संख्या में मिलकर एक समग्र समाज का निर्माण करते हैं। इस प्रणाली में समाज की भलाई के लिये व्यक्तिगत अधिकारों की एक सीमा निर्धारित करना आवश्यक होता है। व्यक्तिगत अधिकारों को सीमित करने से सहयोग का मार्ग प्रशस्त होता है। लाँक के विचारों ने आने वाले समय में आर्थिक एवं राजनैतिक विचारों को प्रभावित किया। आज की चर्चित एवं स्वीकार्य आधारभूत अवधारणाओं ने (जैसे व्यक्तिवाद, फ्री मार्केट और प्रतिनिधि सरकार) टॉमस जैफरसन और अन्य अमेरिकी विचारकों को प्रभावित किया जिसका सीधा प्रभाव अमेरिकी संविधान की रूपरेखा पर देखा जा सकता है। यह सर्वविदित है कि जैफरसन की भूमिका अमेरिकी संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण थी।

राजनैतिक संदर्भ में सामाजिक परमाणुवाद का सबसे जटिल और अच्छा उदाहरण लोकतंत्र का ही हो सकता है और बात अगर भारत जैसे 125 करोड़ आबादी वाले निकाय से जुड़ी हो तब विश्लेषण और भी दुरूह हो सकता है। जैसा कि नाम से उजागर होता है लोकतंत्र की अवधारणा में हर व्यक्ति की बराबर की भागेदारी है सिद्धांत रूप में हमेशा, पर जमीनी हकीकत में बहुत कम।

भारतीय संदर्भ: 125 करोड़ सिर वाला ऊँट
अब कल्पना करें एक ऐसे ऊँट की जिसके 125 करोड़ सिर हों और हर सिर में करवटों की दर्जनों संभावित स्थितियाँ हों तब क्या होगा इसका अंदाजा लगा सकना लगभग नामुमकिन है। शायद यही वजह है इतने विराट लोकतंत्र का ऊँट यानि 125 करोड सिर वाला ऊँट कुछ ज्यादा ही भ्रमित होता है। हर लोकतंत्र अपनी अलग पहचान रखता है और वह पहचान वक्त के साथ बदल सकती है। वैसे समस्या जटिल होते हुए भी एकदम असाध्य हो यह जरूरी नहीं अगर नियम कुछ लचीले हों और सिद्धांत रूप में असहमत होते भी लोग उसे स्वीकार करें, अपनी सीमाओं में रहते हुए। कई बार लगभग असाध्य लगते भी चीजें कुछ सधती नजर आती हैं। और यह सधने की बात कोई अर्थ तभी ले पाती है जब सांख्यिकीय नियमों के अंतर्गत निकाय को समझने का प्रयास हो। सरल शब्दों में यही कह सकते हैं कि ऐसे मामलों में बात जंगल की करनी होती है न कि कुछ खास पेड़ों की, यह जानते भी कि जंगल पेडों का ही विराट समूह है।

अलग भी – साथ भी
सिद्धांत रूप में लोकतंत्र में हर व्यक्ति के कुछ मौलिक अधिकार हैं और इस संदर्भ में सभी के अधिकार मूल रूप से समान हैं। जरूरत के अनुसार उन अधिकारों पर कुछ अंकुश लगाये जाने का प्रावधान भी होता है और हाल के वर्षों में इसका व्यापक प्रयोग लाँकडाउन के रूप में हम सभीने देखा। लक्ष्य है अधिक से अधिक लोगों को इस प्रक्रिया से लाभ मिल सके। यह बात आपातकाल की थी पर सामान्य दिनों में विकास एक मुद्दा होता है जिसमें लक्ष्य होता है सभी का सर्वांगीण विकास हो। विकास की परिभाषा हर देश की अलग हो सकती है लक्ष्य प्राप्ति के तरीके अलग हो सकते हैं। पर सबसे अहम बात यह है कि नियमों का पालन स्वेच्छा से हो सके, तभी बात बनती है; अगर उसे मनवाने के लिये हर बार प्रशासन की मशीनरी का प्रयोग करना पडे तब लोकतंत्र का अजीबोगरीब प्रतिरूप नजर आता है जिसे नाम भले ही लोकतंत्र का दिया जाये पर वह होता कुछ अलग ही है।

चुनावी लोकतंत्र आज सबसे चर्चित प्रणाली है शासन तंत्र के निर्माण की, जिसमें जनता स्वतंत्र है अपनी पसंद के प्रतिनिधि को चुनने के लिये, पर यह स्वतंत्रता अक्सर एक छलावा होती है। जो चुनाव लड रहे है आपको उनमें से ही चुनाव करना होता है और जरूरी नहीं कि उनमें से कोई भी योग्य हो आपकी नजर में। अक्सर होता यही है आपको बुरे और कम बुरे में चुनाव करना होता है। जिसे सही मायनों में योग्य कहा जा सकता है ऐसा इंसान अधिकतर उन हथकंडों से परहेज करेगा जो चुनाव जीतने की संभावना बढाने के लिये जरूरी हैं। चुनावी हथकंडों के अनगिनत रूप हैं जिनमें से कुछ आम हैं और कुछ खास जिन्हें बस वे ही जानते हैं जो इनका अक्सर प्रयोग करते हैं।

जरा गौर करें; महाभारत का हर पात्र आपको चुनावी कुरुक्षेत्र में मिल जायगा, शेक्सपीयर के नाटकों का भी हर पात्र मौजूद होगा। हर चुनावी दंगल एक महाभारत नहीं तो और क्या है?

सबसे पुराना और सबसे बड़ा
भारत सबसे बड़ा (आबादी में) लोकतंत्र है और अमेरिका सबसे शक्तिशाली। कुछ लोग इसे सबसे पुराना कहते हैं। एक सवाल जरूर उठता है कि दो सौ साल हुए हों जिसे वह सबसे पुराना कैसे हो गया? लोकतांत्रिक पद्धतियाँ किसी न किसी रूप में पहले भी मौजूद थीं पर आज का चुनावी लोकतंत्र जिसमें हर व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया में समान रूप से भाग लेने का अधिकारी है आधुनिक समय में ही संभव हो सका और इसमें अमेरिकी योगदान महत्वपूर्ण है। यूरोप के कई देशों में अलग-अलग रूपों में लोकतांत्रिक प्रणाली विकासमान थी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1215 ईसवी में इंगलैंड में मैग्ना कार्टा चार्टर के तहत राजा के द्वारा सामंतों को दिये अधिकारों के साथ प्रजा के भी कुछ अधिकारों का जिक्र था जिनमें हेबियस कोरपस उल्लेखनीय है। इसके अनुसार किसी बंदी को निश्चित अवधि में अदालत के सामने पेश करने का और कैद के गैरकानूनी होने पर रिहाई का प्रावधान था।

आंशिक रूप में लोकतंत्र की अवधारणा कुछ रूपों में प्राचीन सभ्यताओं में देखी जा सकती है। पश्चिम में ग्रीस में ईसा पूर्व पाँचवीं सदी में इसका आरम्भ माना जाता है। भारत में इसकी मूल भावना पुरातन है जैसा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है जब ग्रीक और रोमन सभ्यताएँ शहरों में विकसित हुई भारत में इसका आधार वनांचलों और ग्रामों में दीख पड़ता है। ग्राम स्वराज की कल्पना यहीं से आरम्भ होती है। अप्रत्यक्ष रूप में ग्राम स्वराज की परिकल्पना लोकतंत्र की मूल भावना से जुड़ती है लेकिन आज की सर्वजनीन वयस्क मताधिकार वाली पद्धति मुख्य रूप से यूरोप व अमेरिका में विकसित मानी जा सकती है यद्यपि वहाँ भी आरम्भ में सब वयस्कों को वोट देने का अधिकार नहीं था जो क्रमिक विकास के बाद इस वर्तमान स्थिति तक पहुँचा।

अच्छाइयों के साथ कमियाँ भी
अमेरिकी अनुभव की खास बात यह थी कि संविधान निर्माताओं ने साफ तौर पर लोकतंत्र की खामियों को स्वीकारा और उनपर अंकुश लगाने का प्रयास किया। यह पहचान लेना मुश्किल न था कि इस प्रणाली की कमियों को लेकर निहित स्वार्थों द्वारा अनुचित लाभ उठाने की संभावना हमेशा बनी रहेगी क्योंकि मानव मन की अंध-गुफाओं में रची-बसी निहित स्वार्थ सिद्धि के प्रयास की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता। वही अंध-गुफाएँ जिनका विस्तृत वर्णन पहले [4] में हो चुका है। इस अभिनव अमेरिकी प्रयोग की चर्चा कुछ विस्तार से करना लाभदायक होगा। इस संरचना में राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक तनावों और दबावों से निजात पाने के नुस्खे मौजूद थे। अमेरिकी स्वतंत्रता की लडाई में विजय प्राप्त होने के बाद एक जटिल समस्या नवोदित राज्यों के सामने थी क्योंकि उस समय (लगभग दो सौ साल पहले) एक दर्जन से अधिक स्वतंत्र राज्य थे। उनको एक सूत्र में पिरोने की बात सामने थी पर किसी सबल केन्द्रीय शासन की अनुपस्थिति में यह लगभग असंभव सा जान पड़ता था। इन राज्यों की अपनी सेनाएँ थी, अपने निहित स्वार्थ और समस्याएँ थी और कोई किसी के आगे झुकने को तैयार नहीं था। उस मुश्किल समय में कई विचारकों ने एक ऐसे राजनैतिक निकाय की परिकल्पना सामने रखी [5] जो उन राज्यों को एक सूत्र में पिरोने का विकल्प देती थी प्रत्येक राज्य की प्रभुसत्ता और विशिष्टता बनाये रखते हुए। राजनैतिक व सामाजिक तनावों से निपटने के लिये आवश्यक व्यवस्था थी जो तनाव मुक्ति में सुरक्षा वाल्व का काम कर सकें। यह एक समाजिक अभियांत्रिकीय अनुप्रयोग था जो काफी हद तक सफल माना जा सकता है।

इसमें दो बातों पर खास ध्यान दिया गया:
(1) असाधारण हालात में सामाजिक-राजनैतिक साम्यावस्था को बनाये रखना, और 
(2) सामान्य व सहज हालात में क्रमिक विकास की संभावना को बनाये रखना। 
यह प्रस्ताव उन विचारकों ने अपनी प्रबुद्ध जनता के सामने रखा। सैकड़ों लेखों एवं पत्रों के जरिये लोगों के बीच एक संवाद महीनों चलता रहा जिसमें सभी विचारों का समावेश करने का यथा संभव प्रयास भी किया गया।

इस अनुभवजन्य एवं तर्कपूर्ण प्रक्रिया के फलस्वरूप अमेरिकी संविधान की रूपरेखा सामने आई। उन विचारकों का यह भी मानना था कि यह व्यवस्था पूर्ण या दोषरहित होने का दावा नहीं कर सकती फिर भी उन परिस्थितियों के लिये कारगर हो सकती थी। यह प्रणाली कितनी उपयोगी रही इसका पता इसी से लग जाता है कि दो सौ वर्षों के अंतराल में अनेक तनावों के बावजूद यह आवश्यक संतुलन बनाए हुए है। सच देखा जाय तो आधुनिक समय में इसे सामाजिक अभियांत्रिकी [6] का एक अभिनव प्रयोग कहा जा सकता है। यह उदाहरण देने का एक खास कारण यह भी है कि संभवत: सामाजिक अभियांत्रिकी का कुशल एवं विवेकपूर्ण प्रयोग हमारे लोकतंत्र को भी सही दिशा में निर्देशित कर सकता है।

लोकतंत्र का स्वरूप और खामियाँ
यह ध्यान देने योग्य है कि अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि लोकतंत्र की पद्धति खामियों से भरी है जिनका प्रयोग समय-समय पर निहित स्वार्थ सिद्धि के लिये किया जा सकता है। लेकिन यह जानते हुए भी उन्हें इस पद्धति को स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा क्योंकि सारी खामियों के बावजूद इससे बेहतर कोई अन्य पद्धति नहीं दिखायी देती। सबसे अच्छी बात है कि इसमें सुधार की गुंजायश रहती हे भले ही उसकी गति धीमी हो।

लोकतंत्र चुनाव के जरिये सरकार चुनता है और चूंकि हर देश-काल की अपनी अलग पहचान होती है हर लोकतंत्र की भी अपनी खास पहचान होती है। भारतीय लोकतंत्र और अमेरिकी लोकतंत्र – सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली – काफी समान होते भी अलग हैं जो स्वाभाविक है। भारतीय लोकतंत्र अभी विकासशील है और उसमें कुछ परिपक्वता आ जाने के बावजूद अभी विकास की काफी संभावनाएँ हैं। जो बात अभी तय होनी है वह यह कि संविधान और बहुमत से बनी सरकार की शक्तियों के बीच अधिकार किस तरह बँटे हैं और यह भी कि वास्तविक कार्यवाही में दोनों कितने परिपक्व हैं। यह परिपक्वता जमीनी स्तर पर समाज की इकाई यानि हर व्यक्ति के सोच पर भी निर्भर करती है। चूंकि हर व्यक्ति के अलग विचार एवं रुझान हो सकते हैं बात बहुमत पर आकर टिक जाती है।

भारतीय संदर्भ: लोकतंत्र की अ-लोकतांत्रिक करवट
लगभग सात दशक पुराना यह लोकतंत्र गतिशील है कभी आत्मविश्वास से भरा, कभी उलझनों में दबा, लड़खड़ाता, लंगड़ाता कभी; लेकिन चलता तो है। यह तंत्र लोक द्वारा चुना जाता है और सिद्धांत रूप में लोक या जन के लिये जिम्मेदार है पर किसी अन्य लोकतंत्र की तरह यह प्रक्रिया जुगाड़ू व्यक्तियों या समूहों के निहित स्वार्थ सिद्धि का साधन बन जाती है और कई बार अ-लोकिक (जो लोक हित में नहीं) निष्कर्षों की ओर अग्रसर होती दीखती है। भारतीय संदर्भ में जातिगत समीकरण, आरक्षण जैसे मुद्दे अक्सर प्रभावी होते दीखते हैं पर वहाँ भी जुगाड़ू ही बाजी मार लेते हैं। इस दुष्चक्र से निकलने का रास्ता मुश्किल जरूर है पर असंभव नहीं, बशर्ते प्रबुद्ध जन एवं राजनीतिज्ञ दलगत भावना से ऊपर उठकर देश व समाज के दीर्घकालिक हित को ध्यान में रखकर आवश्यक नियम बना सकें और उनके क्रियान्वयन में सामाजिक अभियांत्रिकीय प्रणाली का कुशल उपयोग संभव हो सके। अमेरिका में वहाँ की परिस्थिति पर आधारित जिस प्रकार का गहन चिंतन किया गया था क्या हम अपने देश की जमीनी हकीकत देखते हुए नियंत्रण एवं संतुलन पर आधारित एक सार्थक प्रणाली विकसित नहीं कर सकते? पर यह एक बड़ा प्रश्न है जिसके समाधान के लिये द्दढ़ इच्छा शक्ति एवं संकल्प की जरूरत होगी जिसका अभाव साफ नजर आता है। हम संभवत: इस पर भी सहमत नहीं कि देशहित क्या है और वे कौन सी नियमावलियाँ हैं जो इस दिशा में सार्थक हो सकती हैं? इस पहले चरण पर भी क्या सब एक मत हो सकेंगे और यदि नहीं तब बात बहुमत पर आकर टिकेगी जो सभी जनों को ध्यान में रख कर कितना चलेंगे यह भी अनिश्चय के घेरे में रह जायगा। ऐसे में प्रकाश-किरण संविधान से प्राप्त हो सकती है जो प्रकाश-स्तंभ का काम कर सकता है। संविधान की दुहाई सभी देते दीखते हैं पर सभी की उसपर आस्था बराबर की हो जरूरी नहीं। ऐसे में न्यायपालिका की जिम्मेदारी अत्यधिक बढ़ जाती है।

जैसा हम जानते रहे हैं कि लोकतांत्रिक प्रशासन में तीनों घटक - विधायिका, कार्य-पालिका और न्याय-पालिका – एक सीमा तक स्वायत्त होते भी एक-दूसरे से आवश्यक संतुलन बनाये रखते हैं। यह संतुलन सामाजिक परमाणुवाद की मूल इकाई यानि व्यक्ति पर निर्भर करती है और अंतत: लोकतंत्र की गुणवत्ता को परिभाषित करती है। इस बात को हम हाल ही कुछ घटनाओं के आधार पर समझने का प्रयास करना चाहेंगे।

समकालीन उदाहरण
मई 2020 में एक अश्वेत अमेरिकी नागरिक की पुलिस के हाथों हुई हत्या ने देश को हिलाकर रख दिया। स्वाभाविक था कि इसके विरोध में प्रदर्शन होते और हुए भी। कई स्थानों पर प्रदर्शनों ने उग्र रूप धारण कर लिया और कहीं पर आगजनी व तोड़फोड़ भी हुई। बात इतने पर ही नहीं रुकी और उग्र प्रदर्शनों की आग की लपटें वाशिंगटन स्थित व्हाइट-हाउस के पास तक जा पहुँची। खबर यह भी थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति को परिवार सहित सुरक्षा कारणों से बंकर में जाना पड़ा। राष्ट्रपति शायद चाहते थे कि सेना को बुलाया जाय पर सेना के सूत्रों का कहना था कि यह सही नहीं होगा और संभवत: संवैधानिक भी नहीं होता। नेशनल गार्ड को बुलाना अगला चरण था जो किया गया और धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होती गयी। यह घटनाक्रम कई बातों की ओर इशारा करता है जो ध्यान देने योग्य हैं:

(क) उग्र प्रदर्शनों एवं आगजनी के कई मामलों के बावजूद कोई हिंसा की बड़ी वारदात नहीं हुई। हाँ, लूटपाट की खबर जरूर सुनाई दी।
(ख) पुलिस की ओर से या नेशनल गार्ड की ओर से अनावश्यक बल-प्रयोग नहीं देखने को मिला। भीड़ को नियंत्रित करने के लिये गोली चलाने की नौबत नहीं आने दी गई।
(ग) सभी दलों के अधिकतर लोगों ने प्रदर्खन के लोकतांत्रिक अधिकार को तरजीह दी, साथ ही आगजनी व लूटपाट की निंदा की।
(घ) संविधान में नियंत्रण एवं संतुलन (checks and balances) का प्रावधान महत्वपूर्ण था और उसने अपना काम बखूबी किया।

कुछ पुलिसकर्मियों की बर्बरता वाली बात किसी अलोकतांत्रिक देश में होती तो शायद इतने उग्र प्रदर्शन संभव ही न हो पाते और अगर होते तो बेरहमी से कुचल दिये जाते। लेकिन लोकतांत्रिक देशों में भी हर कहीं इतने संयम और धैर्य से प्रशासन शायद काम न लेता। अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में भी पुलिस भीड़ को नियंत्रित करने में गोली चलाने में देर न करती। अमेरिका में भी इसके पहले पुलिस हमेशा इतनी संयमित नहीं रही और इसलिये हमारा यह कहना और भी अर्थ रखता है कि लोकतंत्र किसी कड़ी नियमावली के तहत काम करे जरूरी नहीं क्योंकि वह स्वयं भी विकासशील है और रहेगा। तीनों घटकों के बीच जिस नाजुक संतुलन की बात कही गई है वह भी औसत नागरिक के व्यवहार व जिम्मेदारी पर निर्भर करता है और स्वयं गतिशील है।

जैसा पहले हम कह चुके हैं लोकतंत्र का ऊँट किस करवट बैठेगा कहना असंभव न भी हो बहुत कठिन जरूर रहेगा।

उदाहरण कई और भी हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के बाद ब्रिटेन के प्रधान-मंत्री विंस्टन चर्चिल युद्ध के दौरान अपने निर्णयों एवं संतुलन के लिये चर्चित और प्रशंसित हुए लेकिन अगला ही चुनाव हार गये, सारी लोकप्रियता के बावजूद। कारणों का विश्लेषण करना संभव है पर यह हमारा उद्देश्य नहीं इस लेख में। बात लोकतांत्रिक ऊँट की अनिश्चित और बहुआयामी करवट से है। ऐसे कुशल खिलाड़ी भी है जो इस ऊँट की करवट को थोड़ा-बहुत समझते हैं और अपना जुगाड़ करते रहते हैं। जैसा अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने माना है कि लोकतांत्रिक पद्धति खामियों से भरी है जिनका लाभ निहित स्वार्थों के लिये करना आसान है पर इसके बावजूद फिलहाल इससे बेहतर कोई और प्रणाली इंसान के पास नहीं है। यहीं शायद लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति एवं पहचान है।

करवटों का हुजूम
लोकतंत्र कोई एक तंत्र नहीं है यह तंत्रों का हुजूम है अमेरिका से अफगानिस्तान और ब्रिटेन से लेकर बंगलादेश तक सब किसी न किसी रूप मे लोकतंत्र का जामा पहने हुए दिखायी देते हैं। दरअसल वयस्क मताधिकार के तहत चुनावी प्रक्रिया से बनी सरकार लोकतंत्र की सबसे अहम पहचान है। चुनावी प्रक्रिया में अपेक्षित यही है कि लोग लालच, दबाव या बहकावे में न आकर अपने विवेक के अनुसार अपना प्रतिनिधि चुनें पर यह किस सीमा तक जमीनी हकीकत में उतर पाता है वह हर स्थान के लिये अलग हो सकता है। अगर मान भी लें कि अधिकतर लोग तर्कपूर्ण निर्णय ले सकने की स्थिति में हैं पर जो प्रतिनिधि चुने जाने हैं उनकी योग्यता कितनी है उन पदों के लिये? अधिकतर देशों में चुनाव प्रक्रिया जिस प्रचार तंत्र पर टिकी है वह हरएक के बस का नहीं और इस कारण यह धन, बल और छल का एक प्रदर्शन दिखने लगता है और यह बात अमेरिका में भी उतनी ही सही है जितना अपने देश में। जैसा हम पहले कह चुके हैं यह पद्धति खामियों से भरपूर है और इसका पहला चरण यानि चुनाव ही निहित स्वार्थों के हाथों का खिलौना बन सकता है और बनता भी है। प्रशासन से जुड़ी इकाइयाँ कई बार सत्ता पक्ष के हाथों का खिलौना बनकर रह जानती हैं जिसके लिये आवश्यक नियंत्रण एवं संतुलन के प्रावधान जरूरी हैं। इसके कई उदाहरण अपने देश में भी देखने को मिलते रहे हैं। लेकिन यह भी सही है कि फिलहाल लोकतंत्र का कोई बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं। इसमें अच्छी बात यह है कि विकास की अपार संभावनाएँ हैं और जैसे-जैसे सामाजिक परमाणु यानि इंसान की अपनी वैचारिक क्षमता के स्तर में सुधार होगा एवं सामाजिक अभियांत्रिकी का कुशल प्रयोग होगा वैसे ही लोकतंत्र की गुणवत्ता में भी बदलाव देखने को मिलेगा।

भारतीय संदर्भ में एक बात ध्यान करने योग्य है। जिस तरह अमेरिका में संविधान निर्माण के लिये प्रबुद्ध जनों ने अथक प्रयास किये और एक सामाजिक अभियांत्रिकीय प्रयोग पर आधारित निकाय की नींव रखी उसका हमारे यहाँ नितांत अभाव है। हमारे राजनीतिज्ञ, प्रबुद्ध जन साथ बैठकर विचार करना नहीं जानते और फिलहाल इसके बिना कोई रास्ता नहीं नजर आ सकता। हमारे संविधान में कमी नहीं है पर संविधान स्वयं विकासशील होना होगा जिसके लिये देश की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए सामाजिक अभियांत्रिकी [6] का प्रयोग नितांत आवश्यक होगा।

संदर्भ
[1] चन्द्र मोहन भंडारी, ऊँट और उसकी अनोखी करवट, सेतु-हिंदी, अक्टूबर 2019.
[2] चन्द्रमोहन भंडारी, संभावित और वास्तविक के बीच: एक वैचारिक भ्रमण-पथ पर, सेतु, अगस्त 2020. 
[3] एफ. कापरा, द टर्निंग प्वाइंट, सेक्शन 2, न्यूटोनियन वर्ल्ड मशीन, साइमन एंड शष्टर, 1982.
[4] चन्द्र मोहन भंडारी, अंधगुफाओं का कैदी, सेतु - हिंदी, सितम्बर 2019.
[5] जाँन प्लैट, स्टैप टु मैन, जाँन वाइले, 1966. 
[6] चन्द्र मोहन भंडारी, सामाजिक अभियांत्रिकी, आविष्कार, नई दिल्ली, नवम्बर-दिसम्बर 1982.


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।