लोकतंत्र की तंत्र-माया

चंद्र मोहन भण्डारी
जन-जन का अपना ही, जन-मन का सपना भी
मिल गया जादुई मंत्र - सबका प्यारा लोकतंत्र;
बुनावट कुछ खास इसकी
कहीं आड़ी, कहीं तिरछी
इंगला-पिंगला सी जटिल भरनी
उसको लजाती बारीकियों में
खूब रच दी और रंग दी, वक्त ने
अद्भुत लोकतांत्रिक चदरिया।

चदरिया ओढ़ ली हमने – सभी ने
खूबियाँ जानी व पहचानी
बुनावट तंत्र की कुछ खास
जानी कई ने, कुछ ने नहीं जानी
अनछुई रख दी किसी ने
ओढ़ने वालों का अजब है हाल;
आकर्षक डिजाइनों में लुभाती
उलझती और उलझाती,
भटकाती, भ्रमित करती
लोकतांत्रिक तंत्र की माया।

तंत्र-जाल में उलझा जन-मन
जिंदगी बेहाल कैसे दाँव-पेंचों में?
मानवी संबंध की वह सादगी
मनसा-वाचा-कर्मणा की बानगी
उलझते ही रहे इस तंत्र में;
तंत्र वह सब ले गया औ दे गया
जुगाड़ूपन, चातुर्य, अभिनव तिकड़मी अंदाज
चापलूसी, दोगलापन और लफ्फाजी
चुनावी दंगलों का शोर चारों ओर,
नारे और फिकरे, पैंतरेबाजी,
चाटुकारिता के अप्रतिम गान
चुनावी दंगलों के साथ चलता
जुगाड़ू फितरतों का अनवरत अभियान।
बातें और भी हैं
इंसानी दिमागी तंत्र में उलझी
लोकतांत्रिक तंत्र की माया
तंत्र को जब समझने निकला
उलझता ही गया, गुम हो गया
तंत्र के गहरे अंधेरे जाल में।
लोकतांत्रिक तंत्र-माया
जन-गण-मन सभी उलझा गई
मोहिनी रूप शब्दों के लिये
दिशाभ्रम देकर कभी भरमा गई
जुगाड़ू फितरतों का बोलबाला
शब्द-जालों में हमें उलझा गया
जन-मन भ्रमित कर तंत्र-माया में
जुगाड़ू हर एक हिस्सा पा गया।
बाहुबलियों का दिखा वर्चस्व
खेलते बलिष्ठ भुजाओं के खेल
नचाते जन को - मदारी जैसे जमूरे को नचाता
जन-जन को रिझाता-लुभाता
लूट भी लेता, कोई जान न पाता
इशारों पर नाचता उनके
जमूरा होता उन्हीं में से एक;
बखूबी चल रहा है चलता रहेगा
तंत्र का अ-लोकतांत्रिक खेल
जन-कल्याण की समांतर पटरियों पर
दौड़ जाती लोकतांत्रिक मेल।

बातें और भी हैं
अंदरूनी विकृतियों से जूझता इंसान
चुनावी दंगलों के घमासान
इंसा के हजारों प्रारूप
महाभारत के सभी वे पात्र, उसके इतर भी
कहीं तालिबानी डर, हिटलरी हुंकार भरते स्वर
चुनावी दंगलों में नित नये आकार लेते
मुखौटे अनगिनत भ्रमित कर जाते
मुखौटों पर लगे कितने मुखौटे
जन-जन मानवी पहचान खोता
तंत्र का जंजाल उसको भ्रमित करता
उसी जंजाल में से गुजरकर
सामने आता विकृतियों का वेग।

बातें और भी हैं
पर एक है संतोष अप्रतिम -
माना दस्तावेज है यह मंजर
इंसाँ की जुगाड़ू फितरतों का
निहित स्वार्थों, लालसाओं का
पर हमें यह याद रखना
अब तक के सभी शासन-तंत्र
प्रशासन के सभी परिचित मंत्र
बहुत देखे और परखे;
माना कि यह प्रारूप कमियों से भरा
पर इसका नहीं अब तक कोई विकल्प
नहीं बेहतर कोई प्रारूप शासन का
इसका शोर है आवश्यक सुरक्षा वाल्व
इसमें संभावनाओं का खुला है द्वार
कदम आगे बढ़ेंगे लिये दृढ़ विश्वास
उदार मानवी मूल्यों से जुड़ेंगे जो
विकसित हो सकेगा चेतना का दायरा
निज के लिये, उसके इतर भी
आत्मेतर संकल्प एवं आस्था के साथ।

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