अहिंसा की पाठशाला एवं गुरु मेरे पिताश्री की सीखें

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।।

अर्थात- ‘हे भगवान! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम ही मेरे देवता हो।’

ईश्वर की प्रार्थना करते हुए उसे भले ही सब कुछ मान लिया गया पर संसार की सबसे निभ सकेगी? क्योंकि यह संसार ही दुःख से भरा हुआ है। यह दुःख सहन करना कोई आसान बात नहीं है। इस एक वर्ष में मैंने संसार को सहन किया। बीते वर्षों पर भारी यह वर्ष आने वाले जीवन को प्रभावित करने वाला है। वर्ष के प्रारंभ में माँ नहीं रहीं...। अब इस वर्ष के अंत में यह कहना पड़ रहा है पिताजी भी नहीं रहे। दुःख है। संसार कितना दुखदायी है, इसकी अनुभूति अब अव्यक्त क्योंकि वह कल्पना से परे है। उसके लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। बस उस महान पिताजी को विनम्र अश्रुपूरित श्रद्धांजलि😢 और कोटिशः प्रणाम💐

कहते हैं पिता का जाना यानी पूरा का पूरा आकाश सिर से हट जाना है। यह उसके जाने के बाद कि अनुभूति है। वैसे तो जीवन अनेक अनुभूतियों का समुच्चय है लेकिन इस कोटि की अनुभूति अनचाही अनुभूति होती है। उसे देर-सबेर सबको स्वीकार करनी पड़ती है। हम जीवन में अपने समस्त वैभव को एक तरफ कर दें और माँ-पिता का वैभव एक तरफ हो और उनमें से चुनाव करना पड़े तो जो सच्चे होंगे अंतःकरण से, वे माँ-पिता का ही चयन करेंगे। मेरा भी चयन मेरे माँ-पिता का ही सदैव रहता, बाकी संसार मेरे लिये तो मिथ्या ही है।

आज अश्रुपूर्ण हृदय की वेदना अपने महान पिताश्री को केवल अनुभूति से समझ रही है और उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम निवेदित कर रही है क्योंकि उनके जीवन के प्रत्येक क्षण से मिली शिक्षा कोई और नहीं दे सकता। यह तो वही दे सकते थे। कहते हैं- माँ-पिता जीवन के प्रथम शिक्षक होते हैं किन्तु मेरा मानना है कि माँ-पिता तो जीवन के हर क्षण के शिक्षक होते हैं, बस सीखे तो कोई।
 
यहाँ यह कहते हुए अभिभूत हूँ कि मेरी माँ जीवन की शिक्षिका थीं तो पिताजी ही मेरे जीवन के सबसे सच्चे वाले उस स्कूल के हेडमास्टर थे। अनुशासन, ईमानदारी और सत्य का अनुसरण करने की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी। वे सबके हित के आग्रही थे। सबकी भलाई में विश्वास भले ही स्वयं दुःख का वरण करना पड़े। मुझे हमेशा एक बात कहते रहे कि जीवन में बेदाग रहोगे तो चैन की नींद से सो सकोगे। आज जब लोगों में तृष्णा इतनी भरी पड़ी है लोगों में उस जमाने में वह किसी भी कीमती से कीमती वस्तु को नकार देने के आग्रही थे, यह उनकी सीख न केवल किसी पुत्र के जीवन को संवार देगी बल्कि इससे ही एक सच्चा इंसान अपनी श्रेष्ठ छवि के साथ जीवन, जी लेगा, मेरा तो यह मानना है।

पिताजी का हृदय पवित्र था और उस पवित्रता और शुचिता के साथ उन्होंने जीवन को काट लिया। अपनी ज़िंदगी में हर कोई संघर्ष करता है और अपनी संतान के सुख के लिए यत्न करता है मेरे पिताजी ने जीवन भर हमें सुख के साथ वह वैभव भी प्रदान किया जिसकी कल्पना सामान्य परिवार का बालक नहीं कर सकता। यदि मैं राष्ट्रपति भवन की सेवा तक पहुँचा तो उसमें मेरे पिताश्री का त्याग है, उनकी तपस्या है। वे हमें सब कुछ दे गए और मैं सब कुछ लेता रहा। सबसे अहम बात यह भी है कि चाहे कुछ भी छोटा या बड़ा मसला रहा हो, सलाह और उसके फायदे नुकसान के बारे में परामर्श और मार्गदर्शन मैं पिताश्री से लिया करता था। उनके बताए अनुसार कार्य करता था चाहे कार्य छोटा हो या बड़ा। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात पर वह हमें सलाह देते थे, जीवन की राह देते थे। और मैं सफल होता गया। अब जब वे नहीं हैं तो जो बात सबसे ज्यादा खल रही है कि मैं अब उस स्तर की समझ किससे प्राप्त कर सकूंगा? आगे बढ़ सकूंगा कैसे?

आँखें नम हो जाती हैं, अश्रुपूरित। जब ऐसी कमी में डूब जाता हूँ। मैंने केवल अपने महान पिता को नहीं खोया, अपने महान गुरु को भी खोया है। प्रत्येक दिन उन्हें, आज दिन भर क्या हुआ और हम कब कहाँ हैं, क्या करने वाले हैं, क्या करने के लिए क्या करना होगा, सब कुछ बताता था। माँ थीं तो उन्हें भी, पर परामर्श अधिकांश बाबूजी से। यह कोई और नहीं दे सकता। ऐसा भाव था। आपके माँ-पिता सच्चे दोस्त भी होते है। भाई किसी को यह लगे कि श्रवण-भक्ति की बात कर रहा हूँ तो हाँ, सच में अपने भगवान तो माँ-पिता ही होते हैं और उनके लिए एक जीवन तो क्या हज़ार जीवन भी न्योछावर करना किसी भी पुत्र या पुत्री का सौभाग्य है। किसी मसले पर पिताजी मुझसे कुछ उत्तर चाहते थे, वह आग्रह भी था और आदेश भी। किंतु उनके मन में दुविधा भी थी। उन्होंने मुझसे पूछा तो उनके सवाल पर मेरा ज़वाब था- बाबूजी आप जो निर्णय लेंगे वही ठीक है। आपके निर्णय में मेरी सदैव सहमति है और आपको पूछने का प्रश्न ही नहीं उठता। आप को तो बस इतना कहना चाहिए कि मैंने ऐसा करने का निर्णय लिया है। पता है मेरे पिताजी क्या बोले? उन्होंने कहा कि तुम सच में मेरे राम हो। इससे बड़ा कम्प्लीमेंट क्या हो सकता है?

मेरे लिए या किसी के लिए प्रथम राष्ट्र तो उसका पिता होता है। जिस प्रकार एक नागरिक के लिए उसके राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। जन्मभूमि और राष्ट्र का महत्व होता है उसी प्रकार प्रत्येक पुत्र का राष्ट्र तो उसका पिता होता है। उसे उसकी गरिमा की रक्षा भी उसी भाव से करनी चाहिए। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के देश में हमें वह सब कुछ प्रदान किए जिसकी कल्पना मैं कदाचित कल्पना कर सकता हूँ। वे डाकघर में पोस्टमास्टर थे। छोटी सी तनख्वाह में हम सबको पढ़ा लिखा दिया। स्वतः कष्ट उठाए पर पिताजी ने कभी हम भाई-बहनों को किसी कमी का एहसास नहीं होने दिया। सबके मंगलमय जीवन की कामना में ही उन्होंने जीवन बिता दिया। मेरे जीवन के प्रज्वलित दिमाग वे ही रहे। अब आगे भी जो कुछ होगा उसमें उनकी प्रेरणा ही मेरा मार्गदर्शन करेंगी।

इस भौतिकवादी जीवन का रहस्य यही है कि मायामोह में हम स्वार्थी बने रहते हैं। पर मृत्यु ही सत्य है। एक वर्ष में सबकुछ अप्रत्याशित घट गया। जीवन की धार और दिशा ही बदल गई। पिताजी से पिछले महीने व्हाट्सएप कॉल पर बात हो रही थी तो मेरा उनसे निवेदन था कि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो आप स्ट्रैस न लिया करें नहीं तो हम लोग ही परेशान होंगे। आखिर डॉक्टर को पैसा देना पड़ेगा। क्या फायदा होगा? हँसकर टाल दिया, फिर बोले- विधना का जो विधान है, उसे टाल पाओगे क्या? अब प्रत्येक समय वही बात दिमाग में घूमती रहती है कि आखिर वे क्या कह रहे थे? क्या कहना चाह रहे थे? क्या मैसेज था उनका?


अब मेरे पिताजी नहीं हैं लेकिन उनकी दी हुई अहिंसक शिक्षाएँ मेरे जीवन की अमूल्य निधि हैं। उन्होंने सत्य बोलना, बरतना सिखाया तो यह तो अहिंसा का पाठ था। उन्होंने कहा कोई भी व्यक्ति हो यदि वह मदद मांगे तो निःस्वार्थ भाव से उसकी मदद कर दो। ईश्वर सब देखता है। वे सदैव मृदुभाषी होने और किसी को कोई कष्ट न पहुँचाने के आग्रही थे। उन्होंने ही मुझे अहिंसा एवं शांति अध्ययन जैसे विषय को लेकर बहुत ही सच्चे मन से मेरी पी-एच. डी. तक की पढ़ाई पूरी करवाई, यह जानते हुए कि इसमें रोजगार के कोई भी अवसर नहीं हैं। वे असीम धैर्य और संभावनाओं से हमेशा भरे रहे हैं। उनसे मेरी शांति के क्षेत्र में किए जाने वाली पहल पर अभी पिछले महीने जो बात हुई, वह अद्भुत रही। वैश्विक चिंताओं को वह अपनी चिंता बना लेते थे और मुझमें उनके शानदार निराकरण की उम्मीद भी लेकर मेरी रुचि को ऊर्जाश्वीत कर देते थे। उसमें उनका कोई दोष नहीं। हर महान पिता को अपनी संतान में संभावनाएँ तलाशनी ही चाहिए। और हर पुत्र को अपने महान पिता को गौरवान्वित (प्राउड-फील) कराना ही चाहिए। मेरा दुःख इतना सा है कि उनके न रहने पर वह अनुभूति उन्हें कैसे करा सकूंगा?

उस समय को स्मरण कर अंतस करुणा से भर जाता है। सर से छत हट गई हो जैसे। पर सनातन परम्परा में एक सत्य जो पूर्व निर्धारित माना गया है, वह है मृत्यु। श्रीमदभगवदगीता में इस प्रश्न के उत्तर हैं किंतु हृदय उस सत्य को स्वीकार भी नहीं कर पाता और संसार को देखकर झुठला भी नहीं पाता। नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैवं दहति पावकः...  भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश से यह जगत ही मिथ्या लगता है। परंतु समस्त अनुभूति तो इसी जगत से मिलती है फिर यह मिथ्या कैसे हो सकता है? हम सभी अच्छे-बुरे कर्मों को छोड़ जाते हैं मृत्यु के पश्चात। बुरा करते हैं तो लोग नाम लेते ही बुरा भला कहने लगते हैं और अच्छा किया तो लोग श्रद्धावनत हो जाते हैं। मुझे इस बात का गर्व है कि पिताजी के अच्छे कार्यों को लोग याद कर रहे हैं और उनकी कमी को एक अपूर्णनीय क्षति बता रहे हैं। किसी भी पुत्र के लिए यह गौरव की बात है।

अहिंसक वार्ता में हम जितने सत्कार्यों की चर्चा करते रहे वे सब हमारे पिताश्री में विद्यमान मिले। अहिंसा के गुणसूत्र भी मुझे उन्हीं से मिले। हम सब अहिंसक हों। सबसे हमारी मैत्री हो। सबके प्रति करुणा का भाव रखें। सबसे प्रेम करें। मूल्यों के साथ जियें। सत्य के पथ से डिगें नहीं और सबके सुख की कामना करें उसी में सुख की और सच्चे सुख को खोजें, ये मेरे पिताजी के जीवन के महान जीवन सूत्र थे। आज हम उनके शरीर से दूर हो गए हैं। परिवार उस दिव्य आत्मा के साथ सदैव प्रेरणा ले सकेगा उनसे क्योंकि जीवन तो समाप्त हो जाता है किसी का भी पर उसके यश कभी समाप्त नहीं होते।
 
मैं अपने उस महान पिताश्री को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। प्रणाम करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थी हूँ कि पिताश्री को अपने विराट स्वरूप में समादृत करें और मैं जब भी जन्म लूँ तो मेरे पिताश्री के रूप में वही प्राप्त हों, मुझे माँ के रूप में वही माँ मिले ताकि मेरा संपूर्ण अतीत, वर्तमान और भविष्य अहिंसक हो और श्रेष्ठ कार्य का मुझसे निष्पादन हो। 

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः💐

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