व्यंग्य: झूठ का बोलबाला

उषा शर्मा


 समय परिवर्तनशील है और समय के बदलने के साथ ही बहुत कुछ बदल जाता है। यह बात मैं वैसे ही हवा में नहीं कह रही हूँ बल्कि पूरे होशोहवास के साथ कह रही हूँ। आप मानें या न मानें आज शब्दों और मुहावरों के भी रूप बदल गए हैं।

उषा शर्मा
 यूँ तो बचपन से ही सुनते आए हैं कि ‘सच की विजय होती है ,और ‘एक सच को छिपाने के लिए हजारों झूठ बोलने पड़ते हैं ’ आदि-आदि लेकिन आज के परिवेश में कुछ इस तरह देखने में आ रहा है कि अब ‘एक झूठ बोलो और जीत हासिल करो’ ही देखने में आने लगा है। अगर आपने झूठे को भी सच बोलने का प्रयास किया तो आपको भी राजा हरिश्चंद्र से अधिक यातना झेलने को तैयार रहना पड़ेगा। इतना ही नहीं राजा हरिश्चंद्र को तो आखिर में सत्य बोलने का सुखद फल भी प्राप्त हो गया था किन्तु आपको सुखद की जगह कौन सा दुष्परिणाम झेलना पड़ेगा, कोई नहीं जानता। और तब आप उस क्षण को बार-बार कोसेंगे जब आपने सच बोलने की गलती की थी। आपको महसूस हो जायेगा कि निश्चित ही आज के परिवेश में सच कहीं पर मुँह छुपाए रो रहा होगा और वही झूठ एक बॉस की तरह सीना ताने रौब दिखाता हुआ शान से ठहाका लगा रहा होगा।

 ये सारी वकालत मैंने आपके सामने यूँही आपका समय बर्बाद करने के लिए नहीं कहीं हैं बल्कि ऐसी कई घटनाएँ मुझे याद आ रही है जब मैं सच के कारण बार-बार मुसीबत में फंसी हूँ। आपको यकीन न आ रहा हो तो लीजिए आपको अपनी आप बीती एक घटना सुना ही देती हूँ-

 हुआ यह कि अपनी शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए हमने एक अन्य विषय में स्नातकोत्तर करने की ठानी। अब आप कहेंगे भई इस उम्र में भी कोई अन्य-अन्य विषयों में स्नातकोत्तर करता है। बच्चों की शादियाँ हो गई। नौकरी चल ही रही है। जरूरत क्या थी ओखली में सर देने की? आराम से मौज करिये बस। लेकिन मैं पूछना चाहती हूँ कि शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए उम्र कहाँ आड़े आती है। अपने ही देशमें ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने 17-17 भाषाओं का ज्ञान हासिल किया था तो क्या उन्होंने वे 17 भाषाएँ 20 वर्ष की उम्र में ही प्राप्त कर ली थीं?

 तो सही बात यह है कि हर वक्त कुछ नया करने की चाह ने यह गलती हमसे भी करवा दी। उस पर तुर्रा यह कि जो परीक्षा हर वर्ष मई में हो जाती थी वह इस वर्ष अगस्त में जाकर हुई। क्या कहें इस कोरोना ने अच्छे अच्छों के अरमानों पर पानी फेर दिया है।

 खैर अब हम ओखली में सर दे ही चुके थे तो फिर मूसल से क्या डरते सो परीक्षा कार्यक्रम का इंतजार करने लगे। और लंबे इंतजार के बाद परीक्षा कार्यक्रम हमारे हाथ में था। परीक्षा शुक्रवार से सोमवार तक थी जिसमें शनिवार रविवार का विद्यालय अवकाश था।  क्या करें, क्या न करें। मन में आया परीक्षा छोड़ दें। फिर दिल ने कहा कि सुमन, लोग यही सोचेंगे कि पास होने की उम्मीद नहीं होगी इसलिए परीक्षा नहीं दी। चलीं थीं कई-कई विषयों में पोस्ट ग्रेजुएशन करने। इसी असमंजस में हम लिपिक कार्यालय में पहुँचे ताकि पता कर सकें कि हमारी छुट्टियाँ कितनी बकाया हैं? हैं भी या नहीं।

अवकाश रजिस्टर देखते हुए लिपिक महाशय ने सलाह दी कि मैडम आपकी आपातकालीन अवकाश तो मात्र दो बचे हैं और अभी साल में पूरे चार महीने भी बचे हैं कब किस काम के लिए आकस्मिक अवकाष लेना पड़ जाय तो आप एक काम करिये न कि आप चिकित्सा अवकाश ले लीजिए। वह तो आपके पंद्रह बचे हैं और मार्च में खत्म भी हो जाएंगे इसलिए उनका कोई लाभ भी आपको नहीं मिलेगा। सुनकर मन को तसल्ली हुई और भगवान को धन्यवाद दिया कि चलो वेतन नहीं कटेगा। साथ ही मन ही मन लिपिक महोदय को धन्यवाद दिया कि अच्छाई अभी मरी नहीं है आज भी कुछ अच्छे लोग सही राह दिखाने वाले दिख जाते हैं।

 खैर अब हमने अपना पूरा ध्यान परीक्षा पर दिया और परीक्षा पूर्ण होने पर हम जब विद्यालय पहुँचे तो पता चला कि अभी तो एक और परीक्षा बकाया है जिसके बारे में तो हमने सोचा ही नहीं था।

 चिकित्सा प्रमाण पत्र तो हमने भाई के डॉक्टर होने के कारण आसानी से बनवा लिया क्योंकि यह सच था हमारे हाथों की हड्डी खराब होने के कारण उन्हीं का इलाज चल रहा था। हमने चिकित्सा अवकाश प्रमाण पत्र, प्रधानाचार्य जी के कार्यालय में हस्ताक्षर हेतु प्रेषित किया और शांत मन से आगे के काम में लग गए परंतु शायद असली परीक्षा तो अब शुरू हुई थी। अवकाश प्रमाण पत्र भेजने के थोड़ी देर बाद ही चपरासी हमारे सामने आकर खड़ा हो गया, "चलिए मैडम, प्रधानाचार्य जी बुला रहीं हैं आपको।"

 सुनते ही दिमाग की घंटियाँ बजना शुरू हो गई। ‘अब क्या हो गया, क्या कहेंगी?’ यह सोचते हुए हम कार्यालय में प्रधानाचार्य जी के सामने जाकर खड़े हो गये, "जी मैम!"

 "क्या हुआ था आपका?" हमें सामने देख प्रधानाचार्य जी ने सीधा प्रश्न किया।

 "जी वो..."

 हमारे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना प्रधानाचार्य जी ने तिरछी नजर से हमें देखा, "देखो सच तो यह है कि तुमने अवकाश अपनी परीक्षाओं के लिए लिया था तो तुम्हें आपातकालीन अवकाश लेना चाहिए था। तुम खुद तो गलत कर ही रही हो और एक वरिष्ठ अधिकारी से भी गलत करा रही हो। क्या सिखाओगी तुम बच्चों को, जब खुद ही सही काम नहीं करती।"

 "मैम... मेरे पंद्रह चिकित्सा अवकाश बकाया हैं और आपातकालीन अवकाश इतने थे नहीं इसलिए ..."
 "तो क्या तुम गलत रुप से अवकाश लोगी? और इसी तरह गलत काम करती रहोगी । जानती हो इसका क्या असर होगा?’- कहते हुए उन्होंने मेरे अवकाश-पत्र वाले पेपर मेरी ओर फेंक दिए।

मैं हारे हुए जुआरी की तरह उन कागज के टुकड़ों को समेट कर सोचने लगी। मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था कि काश! मैंने विद्यालय में परीक्षा के विषय में न बताया होता और अन्य अध्यापिकायों और कर्मचारियों की भांति ही चिकित्सा अवकाश लेकर पेपर दे आती जैसे और लोग चिकित्सा अवकाश लेकर रिश्तेदारियों में शादियाँ या भ्रमण कार्यक्रम आदि सम्पन्न कर आते हैं।

 प्रधानाचार्य के सामने से हटने पर मन में एक ही ख्याल आया कि आगे से सच नहीं बल्कि झूठ बोलकर अपना काम निकलवाने में ही भलाई है। जैसे उन्हीं दिनों दूसरी अध्यापिका ने बिना बताए अवकाश लिया था। जब कि कारण दोनों का एक ही था। पर सच बोलने के कारण हम प्रधानाचार्य जी की झाड़ सुन रहे थे और झूठ बोलने के कारण वह प्रसन्नमुद्रा में इठला रही थी। सच रो रहा था यानि समाज के किसी कोने में पड़ा सिसक रहा था और झूठ सीना ताने खुश होकर घूम रहा था। ऐसे में मेरा मन बार-बार यही कह रहा था, "सच का मुँह काला झूठ का बोलबाला।"
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ई- 45 महाविद्या कॉलोनी, मथुरा 281003

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