कहानी: काले रंग का

नमिता राय

नमिता राय

गोमतीनगर, लखनऊ



अभी कल ही की तो बात है जब मैं बहूरानी के साथ डोली में बैठकर आया था। मैं बहूरानी के ससुराल और मायके से मिले जेवर, बनारसी चद्दर, ज़री की साड़ियों तथा यादगार उपहारों से सुसज्जित रहता था। मुझमें लगे दर्पण में वह शृंगार करती, अपने को निहारती। भरे-पूरे घर की चहेती बहू जो थी। वह प्रतिदिन मुझे खोलती और संवारती, कभी चिठ्ठियाँ कपड़ों के नीचे रखती, कभी पति के जीते हुए पदक व सर्टीफिकेट ठीक करती, कभी अपने विवाह की तस्वीरें निहारती। फिर एक संतोष भरी सहज मुस्कान के साथ मुझे बन्द कर देती।

संयुक्त परिवार था, पुराने ज़माने का। ममेरे, चचेरे देवर, ननद, सास ससुर सभी तो थे। वक्त कैसे बीतता था पता ही नहीं चलता था। बहूरानी सबकी सेवा कर के खुश थीं। पर नियति के खेल को कौन जानता था। बड़े बुजुर्ग संसार से क्या गए, तेरे-मेरे की भावना घर कर गई। जितने मुँह उतनी सरकारें हो गई। सबके हाथ आयी हरी घास और बहूरानी के हिस्से में आया मैं - काले रंग का, वही छोटा बक्सा जिसपर पीतल का ताला लटका रहता था। बेटियों को लेकर बहूरानी गाँव आ गई, साथ में आया मैं, वही बक्सा जिसमें उनकी ससुराल की यादें रह गयी थीं। वक्त ने चांदनी चढ़ा दी थी बहूरानी के बालों पर। आज भी बेटियों की निगाहों से बचकर वह बक्सा खोलती और पुराने अंतर्देशीय व पोस्टकार्ड जिनकी स्याही पीली पड़ चुकी थी, उनको चश्मा लगाकर पढ़ती, उनमें पुराने रिश्तों को टटोलती। बक्से के तले से चिपकी हुयी पीली-पीली तस्वीरें निकालकर उनमें अपना बीता हुआ जीवन ढूंढ़ती, पुरानी गोटे और किरण की अपनी वरमाला को पुनः सहेजती। बक्से में इकन्नी दुअन्नी के रखे सिक्के अलग करती, मंदिर में देने के लिए। रुमाल में बंधी अंगूठियों को उलट पलट कर देखतीं, और सजल नयनों से एक ठंडी आह के साथ बक्सा बंद कर देती। 

बहुत बार मन में आता कि जब रिश्ते ही नहीं रहे ती यादों का क्या करे सहेज कर। पर वे यादें बहूरानी का एक हिस्सा बन चुकी थीं - उनका जीवन, उनका संस्कार, उनका विश्वास, भरोसा और आदर्श। कोई अपना हिस्सा काट कर अलग कैसे कर सकता है। यादें ही उनकी पहचान और उनका भविष्य बन गयी थीं। बहूरानी के लिए विश्वास, प्रेम, संस्कार, आदर्श और आपसी ममता ही रिश्तों की बुनियाद थी, बाकी सब धूल।

एक दिन मैंने बहूरानी में एक अजब परिवर्तन देखा! पता नही वह परिवर्तन अच्छे के लिए था या बुरे के लिए? मुझे नहीं पता। ऐसा लग रहा था उन्होने किसी क्रूर सत्य का सामना कर लिया हो। समाज भी तो परिवार का विस्तृत रूप है। वह कल भी वस्त्रहीन था ओर आज भी वस्त्रहीन है। बेटियों के रिश्तों के लिये आने वाले सौ सवाल और दान-दहेज की जद्दोजहद ने उनको कुछ समय के लिये खिन्न कर दिया था। हाँ, जिस परिवार के लिये उन्होंने इतना कुछ किया, यदि वह साथ देता तो आज जीवन कुछ और ही होता। लेकिन आदर्श, संस्कार, प्रेम भाव और विश्वास का वजन उठाना सबके बस की बात नहीं होती है। सुदामा समान एक सच्चे मित्र थे, जिन्होंने बहूरानी के परिवार का सदैव साथ दिया। ऐसे एकाध लोगों का साथ ही बहुत होता है ढाढस बंधाने के लिये। सजल नयनों से बहूरानी ने कुछ पीली पड़ी तस्वीरें निकालीं और उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। यही नहीं बहूरानी ने अत्यन्त खट्टे मन से बक्से में पड़ी कुछ पीली पड़ चुकी चिट्ठियाँ भी फाड़ डालीं। इतना करके जैसे वह अतीत से मुक्त हो गई हो। उसके मुख पर एक अजब संतोष था। वह पहले से मजबूत हो गयी थी। हँसी खुशी वह अपने पति और बच्चों के साथ रहने लगी। 

वक्त बीता, कुछ मुश्किलें आसान हुई। नाते-रिश्ते, समाज फिर से नज़दीकियाँ बनाने लगे। पर बहूरानी दिल से कड़ी हो गई थी। अब उन्हें इस मोह के जाल में नहीं पड़ना था। हँसते हुए बोली, "रहिमन धागा प्रेम का मत दीहो चटकाये। टूटे से फिर न जुडे़, जुड़े तो गाँठ पड़ जाये।" प्यार के रिश्ते जब परिवार में टूट जाते हैं तो फिर लाख बनाने पर भी वे सहज और निश्छल नहीं रह पाते हैं, बनावटी हो जाते हैं। एक औपचारिकता सी आ जाती है जो हृदय को अन्दर तक भेद जाती है। डर लगता है फिर से विश्वास करने में कि कहीं धोखा न खा जाएँ। इसीलिये कहा जाता है कि रिश्ते नाज़ुक कोमल व अनमोल होते हैं। जो सालों में प्रगाढ़ होते हैं और छोटी सी ग़लती से टूट जाते हैं, घन, दौलत, यौवन, दम्भ, अहंकार का रंग एक दिन फीका पड़ जाता है पर यदि रिश्ते पक्के और मजबूत हों तो सब कुछ हराभरा दिखता है। व्यक्ति अपने रिश्तों में सुकून और विश्वास ढूढता है। भाग्यवश बहूरानी की बेटियों के विवाह  प्रतिष्ठित परिवारों में हो गये। जीवन और दुनिया देखने के बाद भी उनका व्यवहार नही बदला वह सदैव मृदु व संवेदनशील रहीं। बच्चों में भी उन्होंने कभी कटुता नहीं आने दी। 

आज बहूरानी नहीं रहीं फिर भी उनकी संतति ने मुझे सम्मान के साथ रखा है। मैं उनके और बहूरानी के बीच की कड़ी जो हूँ। मैं आज भी इन बेटियों का अतीत और भविष्य हूँ। मुझमें वही फीकी पड़ी स्याही के कुछ बचे, अधगले पत्र, रुमाल में बंधी अंगूठियों, एकन्नी, दुअन्नी के सिक्के, एक-एक, दो-दो रुपयों की गड्डियाँ और गोटे-किरण की वरमाला रखी है। मैं इस परिवार की अनमोल धरोहर हूँ, बेटियों का संस्कार हूँ। गहनों से सुशोभित नही हूँ, किन्तु आदर्श, संस्कार, प्रेम, व विश्वास से अलंकृत हूँ। मैं इस परिवार की साकारात्मक सोच, परम्परागत व नूतन विचारधारा का द्योतक हूँ। मैं प्रेम, विश्वास व चरित्र की मिसाल हूँ। मैं वही काले रंग का बक्सा हूँ जिस पर पीतल का ताला लटका हुआ है। 

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