अहिंसा एवं युद्ध

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

अहिंसा और युद्ध दोनों एक दूसरे से विपरीत अर्थ रखते हैं। सच यह है कि इनका मेल नहीं हो सकता। लेकिन विडंबना यही है कि युद्ध और अहिंसा दोनों की उपस्थिति बनी हुई है। अनादि काल से युद्ध की उपस्थिति है। संभवतः सृष्टि के साथ संघर्ष और युद्ध का साया प्रकृति के साथ जुड़ा, और वह किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है। उसने कभी आंशिक रूप से कभी विकृति रूप में अपने होने का एहसास कराया है। हिंसा का विकृत और विकराल रूप युद्ध ही है। भारत और दुनिया के इतिहास हमें कभी-कभी युद्धों और संघर्षों का इतिहास लगने लगते हैं, ऐसा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाव में हिंसा है, मन में हिंसा है, कर्म में हिंसा है और उसके लिए नवरत जो किये जा रहे कृत्य हैं, वही हिंसा के छोटे-छोटे स्वरूप- हमें युद्ध के रूप में मिलते हैं। दृष्टि युद्ध, वाक्-युद्ध, मलयुद्ध, पारंपरिक युद्ध, गुरिल्ला युद्ध, सैन्य-युद्ध, छद्मयुद्ध, गृह-युद्ध, राष्ट्र-युद्ध, परमाणु युद्ध और विश्वयुद्ध यह सभी पहले हिंसा और मन से व्युत्पन्न युद्ध हैं। युद्ध को धर्मयुद्ध के रूप में व्याख्यायित किया गया किन्तु यह स्थापना अहिंसक सभ्यता के लोगों के गले नहीं उतरती। वैसे तो मनुष्य के मन में पाप और पश्चाताप के भी समान अवसर हैं। वह जिसे चुनता है उसी में अपने भविष्य को विलीन कर देता है। दोनों के अपने-अपने निहितार्थ हैं। कोई पापी यह नहीं कहता कि उसने कोई जीवन में त्रुटि की। भारत में पश्चाताप के लिए भी अवसर हैं। लेकिन उसके भी अनेक अर्थ और स्वरूप निकाले गए हैं। यथा-रावण और राम के बीच युद्ध को भी अंत में कह दिया गया कि रावण महापण्डित था और उसने ईश्वर से मोक्ष प्राप्ति के लिए वह सबकुछ किया। कृष्ण और कंस के बारे में भी ऐसी कथाएं हैं। प्रह्लाद और हिरण्याकश्यप के बारे में भी ऐसी कथाएं हैं। लेकिन इसे इस प्रकार सरलीकरण करके समझा जाता रहा या हमारे धर्म में हिंसक को भी उद्दातता से सरलीकृत किया जाता रहा, तो यह भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इस उद्दातता पर प्रश्न न उठाकर इसे इस प्रकार से समझने की प्रक्रिया ने संभवतः हिंसा को जड़ से समाप्त न होने दिया। यदि यह बचाव, यह सनातन परम्परा में उद्दातता न होती, तो संभवतः ऐसी चीजें पुनः न दुहराई जातीं। लेकिन सनातन धर्म में सभी औतारों को पाप के नाश के लिए ईश्वर के अवतार को बताया गया। युद्ध और हिंसा की पुनरावृत्ति हुई। समस्त लोकों में इस हिंसा और युद्ध को मोक्ष का मार्ग भी बता दिया गया।
वैसे तो, मन में युद्ध प्रायः अपने नैरन्तर्य में है। मन का युद्ध अपनी सफलता-असफलता को लेकर है। मन में युद्ध शक्ति और संप्रभुता की समृद्धि को लेकर है। मन में युद्ध अपने-पराए, कम और अधिक को लेकर है। ऐसे अनेकों जड़ीभूत प्रश्नों को लेकर मन में चल रहे युद्ध, हमारी व्यग्रता के कारण हैं। इस युद्ध के लिए उपाय हमारे ऋषि, संत और महापुरुषों ने बताया है। हमारे गुरुओं ने बताया है। लेकिन मन की अशांति, सभ्यता और संस्कृति को जब प्रभावित करने लगती है तो वह मन की दुर्बलता हो जाती है। मन की दुर्बलता के कारण हमारी बहुलतावादी और सार्वभौमिक सोच को खतरे होते हैं।
दुर्बल मन में युद्ध ज्यादा होते हैं। चूंकि दुर्बल मन में भय होती है। भय से घृणा जन्म लेती है और प्रतिशोध भी। दुर्बलताएं ही हिंसा की वजहें बन जाती हैं। हमारे भारत की अनेकों ऐसी विभूतियाँ समय-समय पर इसको बताती रही हैं। मनुष्य को उबरने के लिए अवसर देती रही हैं। लेकिन जिस प्रकार उजाले के लिए रौशन करने कोई दीपक आगे बढ़ता है, उसी प्रकार अंधेरा भी उसका पीछा करता हुआ आ ही जाता है। कहते हैं उस युग में आततायी हुए। बहुत से राक्षस हुए। बहुत सी तामसिक प्रवृत्तियों ने जन्म लिया और उससे हिंसाओं और युद्धों से हम अपनी सभ्यता को बचा न सके। किन्तु कौन सा ऐसा युग है, कौन सा ऐसा समय है जब इनका अभाव रहा? प्रायः विघ्नकारी और हिंसक सभ्यता की पीढ़ियाँ अपना विस्तार करते हुए मिलती हैं। और उन सभी ने हिंसा से सार्वभौम अहिंसक सभ्यता को कुचलने का प्रयास किया। यह ऐसा नहीं है कि भारत में अपितु दुनिया में कहीं भी आप इतिहास की पड़ताल करें, तो स्वरूप भले अलग-अलग मिल जाएँ, लेकिन हिंसक प्रवृत्तियाँ और हिंसक लोगों की अच्छी संख्या मिल जाएगी। युद्धों का भी इतिहास ऐसा ही है। अव्वल तो, विभिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं और जीवनचर्या के विनष्ट होने के कारणों में संघर्ष, हिंसाएँ और युद्ध ही थे।
प्रश्न यही है कि युद्ध के बाद क्या? युद्ध के बाद क्या वास्तव में शांति की कामना करना मूर्खतापूर्ण संकल्पना नहीं है? चिर शांति के लिए तो कल्पना करना आत्मघात है। सनातन धर्म में अवश्य चिर शांति की कामना की गई है, और उसका एक दार्शनिक पक्ष है। किन्तु जहाँ के दर्शन तात्कालिकता पर विकसित हुए और उनके सार्वभौमिक स्वरूप की कल्पना भी मिथ्या ही रही तो उनके चिर शांति के बारे में क्या सोच विकसित की जा सकती है? अब जो युद्ध राज्य लड़ रहे हैं। वह युद्ध न ही अशोक का युद्ध है और न ही किसी मुगलकाल के शासक का युद्ध है। राज्यों के मन की दुर्बलता ने उन्हें उनकी संप्रभुता और आधिपत्य के लिए कमजोर किया है। वे युद्ध इसके लिए लड़ रहे हैं कि उनकी संप्रभुता में अभिवृद्धि हो। वे युद्ध इसलिए लड़ रहे हैं जिससे उनकी आर्थिक शक्ति में विस्तार हो। कोविड-19, साइबर युद्ध, क्लाइमेट चेंज, स्पेश रेस, समुद्री संकट, न्यूक्लियर के खतरे  और दूसरी अनेकों जतिलाताएं युद्ध के रूप या युद्ध की दस्तक हैं। इसके पीछे की राजनीति और सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक विस्तारवादी रणनीति से राज्य बहुत ही भयग्रस्त हुए हैं। अब युद्ध की धारा बदल गई है। इन राज्यों को अपने परिक्षेत्र में रह रहे लोगों की हानि, धन की हानि और प्रकृति की हानि पर कोई पश्चाताप भी नहीं है। युद्ध के लिए राज्यों की विवशता क्या है, इससे सही चीजों का आंकलन किया जा सकता है।
सम्राट अशोक पश्चाताप करके बुद्ध के शरण में जा सकता है लेकिन कोविड-19 के खतरों के लिए बुद्ध को मानने वाला चीन कोई पश्चाताप नहीं करता, यह दुनिया के सामने बड़ा संकट है। चीन उपगुप्त को जानता है जिसने अशोक को शांति की राह दिखाई थी। चीन बौद्धों का देश है तो वह अशोक और उपगुप्त से परिचित है। इसीप्रकार, युक्रेन और रूस के युद्ध से पहले जिन देशों में अशांति रही, उन युद्धों को लड़ने वाले राष्ट्राध्यक्षों को कोई ग्लानि नहीं हुई और न होगी। अब सत्ता भी पांच वर्ष या एक समय सीमा तक रहती है, उस दौर के नेतृत्त्व अपने सुखभोग और महत्त्वाकांक्षाओं के बाद किस बात के लिए पश्चाताप करेंगे? उनके लिए सेना के जवान, उनके लिए किसी संस्कृति का सम्मान, उनके लिए बुजुर्गों, महिलाओं, निःशक्त लोगों, बच्चों की जान और उनके जीवन के लिए कोई पश्चाताप नहीं होते, इसलिए हिंसाएँ युद्धों और बड़े संग्रामों में बदल जाती हैं। हिंसा ही बलवती हो जाती है, अहिंसा के भाव तो तब आते जब उनमें करुणा-प्रेम और दया के अंकुर होते। जिन शासकों ने एक से अधिक बार सत्ता में अपनी जगह बनायी, सबसे दुखद यह है कि वे किसी न किसी रूप में तानाशाह होने, जिद्दी होने और अतिशय महत्त्वाकांक्षी होने के कारण, उनमें पश्चाताप नहीं पनपे। इन जिद्दी, तानाशाही और महत्त्वाकांक्षी लोगों के भी अपने-अपने भय हैं। कांट का ‘परपीच्युल पीस- अ फिलोसॉफीकल स्कैच’ पढ़ें। उसने सेनाओं को भंग करने का आग्रह किया है। उसका मानना है कि इसके लिए सेनाओं और नागरिकों से पूछा जाना चाहिए कि वे निर्भय होकर बताएं कि क्या वे किसी युद्ध के लिए तैयार हैं? अधिकांश ना कहना पसंद करेंगे। यह एक कांट के विचार भर नहीं थे, इस पर अमल होना चाहिए था लेकिन युद्ध के सौदागर इसे एक बेकार की बहस कहेंगे।
यह एक विभत्स सभ्यता के दौर की अंतर्कथा है जिसमें हमारी बहुत सी खुशियाँ समाप्त होने वाली हैं। प्रेम और करुणा के लिए इस दौर में स्थान है तो देसज लोगों की वजह से है। वास्तविक संतों और ऋषियों के की वजह से है। उन्हीं के कारण अहिंसा बची है। राज्यों के कल्याणकारी होने के नाटक से अब भला कौन परिचित नहीं है?
मनुष्य सभ्यता में युद्धों का अपना विमर्श है। मेशोपोटामिया, बेबीलोन, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की सभ्यता के अपने उत्स में युद्धों की अनेकों कहानियाँ हैं। ईशा पूर्व और ईश्वी की जितनी भी अब तक की विभिन्न साम्राज्यों और जीवन-जगत की कथाएं हैं, उनकी पूरी गाथाएँ भी बहुत ही रोचक हैं। मुगलकाल और अंग्रेजी सभ्यता (औपनिवेशिक सभ्यता) के समय के युद्धों का अपना इतिहास है। अनेकों देशों के स्वाधीन होने और उन्हें राज्य के रूप में टूटते-जुड़ते और बिखरते हुए देखने वाले लोगों का अपना-अपना अनुभव है। हमारी श्रुतियों, स्मृतियों और दस्तावेजीकरण की कलाबाजियों से पटा पड़ा इतिहास अपनी बात को जिस रूप में हमारे सामने रखे, उस पर प्रश्न उठाने वाले और उसके महिमामंडन करने वाले लोगों का अपना इतिहास है। द्वितीय विश्वयुद्ध के हमने नागासाकी और हिरोशिमा की भयावहता को देखा। अच्छा है कि मृत्यु इस जगत की सत्य है, जिसकी वजह से पीड़ाओं की गाथा कहने-सुनाने वाले नहीं हैं, नहीं तो वह क्रंदन संभवतः कोई भी सह न सकता। और थोड़े से लोगों की दया-करुणा-प्रेम-उद्दातता की कथाएं बौनी पड़ जातीं। किन्तु इस सृष्टि का एक सबसे बड़ा सद्गुण है कि वह अनवरत विलीन करती है एक पीढ़ी, और अनवरत जनती है नई पीढ़ी। टॉलस्टॉय ने ‘द किंगडम ऑफ़ गॉड इस विदिन यू’ में अराजकतावादियों के मनोविज्ञान को उंकेरा और उसने यह बताया कि बुराई के लिए अप्रतिरोध अहिंसा की एक अवधारणा है। लेकिन प्रेम के नियम को ईसाई समाज के लोगों ने भी पुस्तकों में ही छोड़कर आधुनिकता के पीछे दौड़ लगाई। उसने तो यहाँ तक कहा कि युद्ध कदाचित राष्ट्रभक्ति नहीं है। राष्ट्रप्रेम और युद्ध के सामान-आलोचक टॉलस्टॉय थे। आज राज्यों की अपनी संप्रभुता की बढ़ोतरी हेतु नेतृत्वों के पागलपन को रोक पाने में टॉलस्टॉय अक्षम ही लगते हैं। एरिक फ्राम ने इसे इसीलिए मनोवैज्ञानिक ढंग से समझते हुए मानवीय प्रवृत्ति का एक अंग माना था, जो एक कड़वा सत्य है।
युद्ध निःसंदेह एक परिस्थिति है किन्तु यह भय की वजह से है। या संप्रभुता के विस्तार के लिए है या इतिहास को विकृत करने का एक क्रूर सच है, लेकिन युद्ध हिंसक होता है। अपने विरोध में गढ़ी गई किसी हिंसा को कम करने का विकल्प युद्ध नहीं है और पश्चाताप भी इसकी भरपाई नहीं करते। लाओत्से ने युद्ध और शस्त्रीकरण को अनुचित माना। अच्छा यही है कि युद्ध न हों। चिर शांति के लिए हमारी कामना हो और इसके लिए श्रेष्ठ क्या है, इसे तो हमें और हमारी पीढ़ियों को ही तय करना होगा। बर्तोल्द ब्रेख्त की कविता ‘युद्ध जो आ रहा है’ स्मरण आती है- युद्ध जो आ रहा है/पहला युद्ध नहीं है/इससे पहले भी युद्ध हुए थे/पिछला युद्ध जब ख़त्म हुआ/तब कुछ विजेता बने और/कुछ विजित-विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा/विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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