शैव सम्प्रदाय के संत: जंगम जोगी

शशि पाधा

शशि पाधा

लोक एवं पारम्परिक कलाएँ-प्रथाएँ किसी भी देश की गौरवमयी संस्कृति की धरोहर हैं। भारत की समृद्ध संस्कृति के इतिहास के पन्नों में झाँक के देखें तो अनगिन उत्सव-मेले, लोक-गीत, तीज-त्योहार, रीति-रिवाज अपने विविध रंगरूपों में दिखाई देंगें। इनमें से कुछ समय की लम्बी दौड़ दौड़ते-दौड़ते थके-टूटे किसी पड़ाव पर आकर बैठ गये हैं और कुछ धीमी-धीमी चाल से चलते-चलते एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के आँगन में कभी-कभी भूले-बिसरे अतिथि की तरह मिलने आ जाते हैं और अपनी खुशियों की पिटारी खोल के बैठ जाते हैं। मेरे मन के आँगन में भी यह आकर, मेरी अंगुली पकड़ कर मेरे अतीत के गलियारों में मुझे ले जाते हैं। ऐसे ही विशेष अतिथि हैं – जंगम योगी।

हर धार्मिक एवं पारम्परिक पर्व के साथ मेरी अपने बचपन की मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। पूरे भारत वर्ष में महाशिवरात्रि का पर्व बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। मेरे जन्म स्थान जम्मू की गलियों और मंदिरों में महाशिवरात्रि की शोभा कुछ भिन्न सी होती है। आइये देखते हैं महाशिवरात्रि के अवसर पर जम्मू नगर की झाँकी-

शिवरात्रि के कुछ दिन पहले ही जम्मू की गलियों, चौराहों में इस विशेष सम्प्रदाय के साधु आना-जाना आरम्भ कर देते थे।  इनकी वेशभूषा भी विशेष होती थी। हम इन्हें जंगम बाबा के नाम से जानते थे। यह सिर पर दशनामी पगड़ी के साथ काली पट्टी पर तांबे-पीतल से बने गुलदान में मोर के पंखों का गुच्छ धारण करते थे। कपड़े पर सामने की ओर सर्प निशान के अतिरिक्त कॉलर वाले कुर्ते पहने और हाथ में खझड़ी, मजीरा, घंटियाँ लिए अन्य साधुओं से अलग ही दिखाई देते थे। अपनी अनूठी अभिनय संवाद शैली में यह शिव-पार्वती के विवाह की कहानी गायनशैली में इस तरह कहते थे कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था। हम बच्चे इनकी संगीतमय कथा को सुनते हुए हर गली-चौराहों में इनके साथ-साथ चलते थे और इस रोचक अभिनय का आनन्द लेते थे। घर में जंगम की यात्रा को स्वयं भगवान शिव की यात्रा के रूप में माना जाता था और जंगम को अच्छी भिक्षा दी जाती थी। जाते-जाते जंगम जोगी हम सब को आशीर्वाद देते थे। 

आइये, इन घुमन्तु जंगम जोगियों से आपकी पहचान कराऊँ -
जंगम जोगी अपनी वेशभूषा एवं भिक्षा माँगने के विशेष ढंग के कारण बाकी साधु -संतों से अलग-थलग दिखाई देते हैं। ये जोगी शैव संप्रदाय से जुड़े होते हैं, जो सिर्फ शिवजी की पूजा-अर्चना करते हैं। प्रत्येक जंगम जोगी को शिवपुराण की कथा याद होती है। इनका भिक्षा लेने का ढंग भी बिलकुल भिन्न होता है। इनके अनुसार इनके आराध्य देव भगवान शिव ने कहा था कि कभी माया को हाथ में नहीं लेना, इसलिए ये भेंट या दान को हाथ से नहीं लेते, बल्कि अपनी घंटी को उलट करके उसी में दक्षिणा लेते हैं। देशभर में धार्मिक मेलों के दिनों में इस सम्प्रदाय के साधु धार्मिक स्थलों में जाकर शिव का गुणगान करते हैं और अखाड़ों में अन्य सम्प्रदायों के साधुओं के साथ मिल कर रहते हैं। जंगम संप्रदाय के देशभर में करीब पाँच हजार गृहस्थ संत हैं। इनमें से अधिकाँश गृहस्थ संत अपने परिवारों के साथ रहते है और आजीविका के लिए खेती-बाड़ी या कोई अन्य कार्य करते हैं। जंगम शब्द ‘जड़’ का विलोम शब्द है, जिसका अर्थ है चलने-फिरने वाला। ये योगी एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते हैं और शिव-विवाह की कथा सुनाते हैं।

जंगम जोगियों के सम्प्रदाय की एक विशेषता यह भी है कि यह कभी अकेले भिक्षा माँगने नहीं आते, अपितु सदैव एक दल में आकर ही शिव-पार्वती की कथा सुनाते हैं। एक और विशेषता यह है कि सिर्फ जंगम साधु का बेटा ही जंगम साधु बन सकता है। हर पीढ़ी में, हर जंगम परिवार से एक सदस्य साधु बनता है, जिससे इनका कुनबा सदियों से बढ़ता चला आ रहा है। जंगम सम्प्रदाय के साधु अधिकतर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में बसे हुए हैं।

इनकी उत्पत्ति कैसे हुई इस विषय में कई कथाएँ हैं। इनमें से सब से प्रचलित कथा यह है -

ऐसा मन जाता है कि इन साधुओं की उत्पत्ति भगवान् शिव की जाँघ से हुई थी। कहा जाता है कि जब शिव-पार्वती का विवाह हो रहा था तो भगवान शिव ने पहले विष्णु और फिर ब्रह्माजी को विवाह कराने हेतु दक्षिणा देनी चाही तो दोनों ने उसे स्वीकार नहीं किया। तब भगवान शिव ने अपनी जांघ काटकर जंगम साधुओं को उत्पन्न किया और फिर इन साधुओं ने ही महादेव से दक्षिणा लेकर शिव-पार्वती विवाह में गीत गाए और बाकी रस्में पूरी कराईं।  यही कारण है कि आज भी शिव पार्वती विवाह जैसे अनुष्ठान को कराने का अधिकार सिर्फ जंगम साधुओं के पास ही है। 
जंगम जोगी भारत की लोक परम्परा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग हैं। अपनी अनुपम गायन शैली की परम्परा को सुरक्षित रखने का और इसे पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तारण करने के लिए यह विशेष रूप से सराहना के पात्र हैं।

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