लघुकथा: आम्ही सक्सेसफुल आहोत

जया आनन्द
जया आनन्द


नीरजा प्रिंसिपल के केबिन से निकली तो बहुत तनाव में थी। प्रिंसिपल की अपेक्षाओं पर खरा उतरना कितना मुश्किल है। जी-जान से कितनी कोशिश करती है वह, चाहे विद्यार्थियों को पढ़ाना हो या कॉलेज का कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम, फिर भी आलोचना सुननी ही पड़ जाती। 

घर-गृहस्थी के झंझावातों से निकलकर अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में नीरजा ने नासिक में यह नौकरी की थी। उसके लिए यह नौकरी उसकी डिग्री की तुलना में कहीं छोटी थी। पर कुछ नहीं से तो कुछ बेहतर, यही सोचकर वह अपने मन को समझा लेती थी। कभी-कभी उसे लगता कि वह न तो घर-गृहस्थी में पूरी तरह सफल है और न करियर में। उसके साथ दोस्त डॉक्टर बन गए, इंजीनियर बन गए और वह एक छोटे-से कॉलेज में पढ़ा रही है। और इस छोटे से कॉलेज में भी सुकून नहीं। यह सब सोचते हुए उसके कदम स्टाफ रूम की ओर मुड़ गए। पास की कक्षा से दीपा ठाणेकर का स्वर गूँजा। दीपा आईटी की टीचर है,पढ़ाई में बहुत अच्छी,विद्यार्थी बड़े ध्यान से सुनते हैं उसे।

"आप आईटी विषय लेकर क्या करना चाहते हो?" दीपा अपने विद्यार्थियों से पूछ रही थी।
किसी ने उत्तर दिया, "आईटी प्रोफेशनल,’’
"बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करना चाहती हूँ," 
"फॉरेन जाकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता हूँ,"... सब के अलग-अलग उत्तर आ रहे थे।
"आप जो भी बनो, उस काम को बहुत अच्छे से करने का …चांगला काम करनार पाहिजेत। तभी आप सक्सेसफुल होंगे। मैं चाहती तो बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी कर लाखों कमाती, पर मेरी सिचुएशन ऐसी नहीं थी। फिर भी मैं ये नौकरी करके खुश हूँ। मी मह्णते आम्ही सक्सेसफुल आहोत।" 

नीरजा के कानों में दीपा ठाणेकर का स्वर स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था, पर नीरजा उसे अनसुना करते हुए स्टाफ रूम में आकर निढाल हो कर बैठ गई। पानी की बोतल से एक घूंट पानी पिया और मोबाइल देखने लगी। तभी मैसेंजर पर एक संदेश आया।

"हैलो मैम मैं राजीव आपका पुराना विद्यार्थी ..."
"राजीव! " नीरजा ने उसकी फोटो को गौर से देखा, "अच्छा-अच्छा राजीव कश्यप। कैसे हो?"
हाल-चाल लेने के बाद नीरजा ने राजीव से पूछा, "हिन्दी पढ़ते हो या नहीं?"
"हाँ मैम! पढ़ता हूँ कभी-कभी और आपको याद भी करता हूँ। सच पूछिये तो मैम! आपने जो पढ़ाया वह कभी भूला ही नहीं। और मैं ही नहीं इस कॉलेज से पास होने वाला हर विद्यार्थी आपको याद करता है।" 
 
नीरजा की आँखों से दो बूँदें मोबाइल पर ही टपक गईं। कानों में दीपा ठाणेकर की आवाज गुंजित होने लगी, 
'आप जो भी बनो उस काम को अच्छे से करने का…मैं यह नौकरी करके खुश हूँ। आम्ही सक्सेसफुल आहोत ...।'

नीरजा की आँखें राजीव के संदेश पर टिकी थीं। उसका मन तरंगित हो रहा था, “आम्ही सक्सेसफुल आहोत। हाँ, मैं सफ़ल हूँ।'

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।