किशोर काबरा के काव्य "परिताप के पाँच क्षण" में मिथक तत्व

चौहान अनुराधा

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद 56
चलभाष: +91 960 197 8235; ईमेल: annulovesmom@gmail.com

 डॉ. काबरा ने अपनी प्रखर विद्वता से अतीत की कथा को ज्यों का त्यों प्रस्तुत न करके उसे वर्तमान की चिंतनधारा से जोड़कर एक नया परिवेश में प्रस्तुत करते है। समकालीन जीवन संदर्भों में उन्होंने अपने काव्यों में पौराणिक प्रसंगों को स्थान दिया है। जो दृश्यगत जीवंतता के कारण आधुनिक भाव संवेदन को उद्घाटित करनेवाले हैं। काव्य जगत में महाभारत की उपेक्षित पात्र अंबा को आजतक कभी सम्मान नहीं मिला । जिस प्रकार राधा, उर्मिला, यशोधरा, विष्णुप्रिया, रत्नावली, आदि नारी पात्रों का सम्मान हुआ है। उसे कवि ने साहित्य जगत में स्थान दिया है। इस खंडकाव्य में अंबा की मौन पीड़ा, व्यथा को वाचा मिली है। अंबा के कई बिंब इस काव्य में उभरकर सामने आए हैं।"वह भोली बालिका, चपल किशोरी, मुग्धा नवयुवती, आशंकित अभिसारिका, समर्पित प्रेयसी, विह्वल विरहीणी एवं प्रज्वलित विद्रोहिणी, प्रखर तपस्विनी एवं मुख्य मनस्विनी के रूप में पूरे खंडकाव्य पर फैली हुई है। 'परिताप के पाँच क्षण' यह आरोपित ब्रम्हचर्य एवं अतृप्त नारीत्व के संघर्ष की गाथा है। इसमें कवि ने भीष्म और अंबा के मिथक द्वारा नर-नारी के नैसर्गिक साहचर्य भाव की यथार्थता को प्रस्तुत किया है। कवि ने सभी पात्रों के प्रति घृणा न प्रकट करके उनके प्रति सहानुभूति दिखाई है। जिसमें मानवीय संवेदना के अन्य पहलू अनुताप, पश्चाताप, आंतरिक मनोव्यथा आदि उजागर है। इन पात्रों के द्वारा कवि ने आधुनिक युग के बनते और बिगड़ते जीवन को अपने शब्दों में व्यक्त किया हैं।

 'परिताप के पाँच क्षण' खंडकाव्य पाँच क्षण यानी पाँच सर्ग में विभाजित काव्य है। संपूर्ण कथा भीष्म के उत्तर जीवन से संबंधित है। परिताप के प्रथम क्षण में भीष्म की पीड़ा का वर्णन है। बाण शैया पर लेटे हुए भीष्म के मन में उठते असंख्य प्रश्न, उनकी विवशता और पीड़ा, अंबा का स्मरण, अंबा के प्रश्न भीष्म का पश्चाताप, कृष्ण-अर्जुन का शोक आदि प्रसंगों का वर्णन किया गया है। दूसरे क्षण में मत्स्यगंधा और भीष्म का संवाद है। उसमें भीष्म मत्स्यगंधा के परिताप को देखकर भावविह्वल हो उठते हैं। भीष्म प्रतिज्ञा कर लेते हैं कि वे कुरु वंश के लिए अप्सरा-सी तीन राजकुमारियोंओं को लाएंगे। तीसरे क्षण में भीष्म और अंबा का संवाद है। जिसमें अंबा को त्रिकोणात्मक प्रणय, उसे अपना बालपन, शैशव और यौवन स्मरण, शाल्व के पास जाना, शाल्व द्वारा अपमानित अंबा का वापस लौटकर भीष्म के पास आना, उसे अपने साथ विवाह करने की प्रार्थना करना, भीष्म का मौन, अंबा के मन में प्रतिशोध की भावना, भीष्म के मृत्यु के कारण बनने की प्रतिज्ञा करना आदि का वर्णन है। चौथे क्षण में अंबा शिव की तपस्या करती है। शिव अंबा को वरदान देते हैं। अंबा का शिखंडी के रूप में जन्म होता है,आदि प्रसंगों का वर्णन है। पाँचवें और अंतिम चरण में अर्जुन का वर्णन है जो भीष्म के प्रिय है। अर्जुन भीष्म की सेवा करते हैं। इस सर्ग में अतृप्त वासना से ग्रसित व्यक्ति का परिचय भीष्म अपना उदाहरण देकर समझाते हैं। अपनी प्रतिज्ञा एवं अन्य कार्यों पर भीष्म परिताप व्यक्त करते हैं। 

पात्रों के स्वभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

भीष्म

"भीष्म पितामह महाभारत के प्रमुख चरित्र है। उनका चरित्र सभी दृष्टियों से बड़ा ही उदात्त और आदर्श है। महाभारत में भीष्म अखंड ब्रह्मचारी, आदर्श पितृभक्त, सत्य प्रतिज्ञ , अस्त्र-शास्त्र वेता तथा ज्ञानी, कुल रक्षक तथा राज्य संचालक, पराक्रमी तथा अद्भुत वीर, शांति एवं न्याय के समर्थक और कृष्ण भक्त रूप में चित्रित है।" 1
लेकिन 'परिताप के पाँच क्षण' में कवि ने उनके ब्रह्मचर्य पर प्रश्न खड़ा किया है। उनके मन में रही इच्छाओं की पूर्ति ना होने पर भीष्म के कुंठित स्वरूप को उजागर किया है। बाण शैया पर लेटे हुए भीष्म अपने बीते जीवन को याद कर परिताप कर रहे हैं। उनके साथ जो हुआ उसे याद करके दुखी हो रहे हैं। उनकी प्रतिज्ञा के कारण उनकी जो मानसिक अवस्था हुईं है उसका वर्णन कवि ने किया है। जीवन भर उन्होंने जो कर्म किए हैं उसका घात-प्रत्याघात मनुष्य के मृत्यु के समय पड़ता है। जो आज हर मनुष्य अनुभव करता है। आज का मनुष्य में भीष्म की तरह अपनी इच्छाओं को पूर्ण ना कर पाने पर यही दुख, पीड़ा, परिताप सहन करता है। अपने वृद्ध पिता की वासना के लिए भीष्म अपने कुंवारे सपनों की होली जलाते हैं। वे कहते हैं-

"कौन कहता /
वासना ही सो गई मेरी प्रणय के पार्श्व में! आज भी एकांत में/
मेरे ह्रदय की घुमड़ती उत्ताल लहरे
चांद की परछाइयों को लूटते हैं।" 224


कवि ने भीष्म के पात्र द्वारा आधुनिक युग में मनुष्य की मानसिक पीड़ा, दंभ, दुख, व्यथा परिताप का सफल चित्रण किया है।

अम्बा

महाभारत की उपेक्षिता पात्र में अंबा का नाम लिया जाता है। जिसे कवि ने अपने काव्य में स्थान देकर साहित्य समाज में सम्मान दिया है। अंबा के पात्र के माध्यम से कवि ने वर्तमान समय की नारी की व्यथा को व्यक्त किया है। युग बदल गए, समय बदल गए, कथा बदल गई लेकिन नारी के प्रति जो दृष्टिकोण पहले था वही दृष्टिकोण आज भी है। आज भी नारी को भोग के साधन के रूप में और संतानोत्पत्ति के साधन के रूप में देखा जाता है। उसकी इच्छाओं का, सपनों का, कोई महत्व नहीं इसी समस्या को कवि ने अंबा के द्वारा प्रस्तुत किया है। प्रणय के त्रिकोण में फंसी अंबा का जीवन भी नष्ट हो जाता है। न वह पत्नी बन पाती है, ना मां, नाहीं प्रेयसी। भीष्म के कारण अंबा का जीवन बर्बाद हो जाता है। जब वह बड़े अरमान लेकर उसके प्रेमी शाल्व के पास जाती है तो वह भी उसे भीष्म का 'उच्छिष्ट' कहकर अंबा का अपमान करता है।

"तुमने कहा था/
 छीन कर ले जाए कोई व्यक्ति
 भोग्या भामिनी को/
 लौटकर आ जाए वह स्वमेव,
 पर उस कामिनी को/ कौन भोगेगा/
 पुरुष संसार में तुम ही कहो?" 225

आज के युग में भी लड़कियों का अपहरण होता है। उनके साथ बलात्कार होते हैं। जब समाज में यह बात फैल जाती है। तो कोई उसको उसका हाथ नहीं थामता। वर्तमान समय के नारी इस विकट समस्या का सामना कर रही है। एक ओर नारी अपने अधिकारों के लिए जागृत होती है तो दूसरी और उसके लिए भय फैला है। 

मत्स्यगंधा

मत्स्यगंधा महाभारत का गौण पात्र है जो तृतीय चरण में हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। मत्स्यगंधा सम्राट शांतनु की पत्नी और भीष्म की मां है। अपनी वासना बुझाने के लिए वृद्ध पति का सहारा लेती हैं। मत्स्यगंधा के कारण ही भीष्म के सुहाने सपने कंटीले प्रणों में बदल गए। रानी की तरह उनके मातृत्व पर भी पुत्र के प्रति अंधा प्रेम छा जाता है।

"स्वार्थ, तू ही सत्य संसार का /
 तू नियामक विश्व के व्यवहार का ।
 खेल के पहले बड़े अंदाज से/
 तो मुखौटा पहन लेता प्यार का"231

मत्स्यगंधा अपने स्वार्थ के कारण अंबा, अंबिका और अंबालिका का जीवन बर्बाद करती हैं। मनुष्य जब स्वार्थ में अंधा होता है, तो उसे भले-बुरे की परख नहीं होती‌। वर्तमान युग स्वार्थ से भरा हुआ है। आज भी मत्स्यगंधा जैसे स्त्रीयाँ है जो स्वार्थ के कारण अपने बेटे का जीवन बर्बाद करती हैं। मत्स्यगंधा का स्वार्थ देखकर भीष्म सोचते हैं कि -

"माता मत्स्यगंधा /
दग्ध मरुस्थल की व्यथा को
अश्रु सें सुजला बनाना चाहती है,
विफल कुल की शुष्क वन्ध्या बेल को
सुफला बनाना चाहती है,
वंश के घिरत-घुमडते कज्जली परिवेश को 
उजला बनाना चाहती है/
स्नेह के परिधान में वह स्वार्थ के उपवस्त्र मुझ पर टांगती है।"232

वर्तमान युग में भी मत्स्यगंधा जैसे कई पात्र हैं। जो स्वार्थ को ही अपना जीवन मानकर दूसरों की खुशियों को नष्ट कर देने में नहीं हिचकिचाते।

विचित्रवीर्य

विचित्रवीर्य मत्स्यगंधा और शांतनु का पुत्र है। द्वितीय क्षण में वे और आगे उसका उल्लेख आता है। वह क्षतवीर्य, क्षीणकाय था। फिर भी अंबा, अंबिका और अंबालिका का जीवन नष्ट करने में विचित्रवीर्य की भूमिका है। विचित्रवीर्य खुद जानता था कि वह स्त्री को भोग नहीं सकता, फिर भी अपनी नपुंसकता छिपाने के लिए अपहरण करके लाई गई काशीराज की कन्याओं के साथ विवाह करता है। और उनका जीवन बर्बाद करता है। अंबा जब शाल्व से अपमानित होकर विचित्रवीर्य के पास जाकर उसे अपनाने के लिए कहती है तब विचित्रवीर्य अपनी नपुंसकता को छिपाते हुए कहता है-

"दूर हट जा वासना की क्रीत दासी!
तू रही तो जहर खाकर मैं मारूंगा/
या, लगा लूंगा कभी स्वयंमेव फांसी
मुझे सरीखे अल्प होगी संयमी को
नारियाँ दो ही बहुत है/
तीसरी को क्या करूंगा?"233
 
आज के दिन दुनिया में कई मनुष्य है जो अपनी इज्जत रखने के लिए ओरों की जिंदगियाँ बर्बाद करते हैं। स्त्री को भोग न पाने की पीड़ा को भीतर दबा देते हैं। स्त्री को तृप्त नहीं कर सकते और ना ही मातृत्व प्रदान करते हैं। उन पर शंका कर जिंदगी जीना दुष्कर बना देते हैं।

अंबिका अंबालिका
 
अंबिका और अंबालिका काशी नरेश की पुत्रियाँ हैं। भीष्म ने इन कन्याओं का अपहरण कर विचित्रवीर्य को भेंट किया था। इन दोनों का पात्रों का सांकेतिक उल्लेख मात्र है। भीष्म के द्वारा अपहरण करके लाई गई तीन कन्याओं में से दोनों ने चुपचाप विचित्रवीर्य को स्वीकार कर लिया और अपने सपने को नष्ट कर दिया। उनके हृदय में जो सुंदर सपने थे। वे सारे बर्बाद हो गए। उन्हें कहाँ मालूम था कि जिसके साथ उनका विवाह के बंधन में बांधा है वह निवीर्य है। और मालूम होता तब भी वे मजबूर थी क्योंकि कौन उनका हाथ थामता। कवि ने इन दो पात्रों के माध्यम से आज स्त्रियों की इन व्यथा को वाचा दी है।

शाल्व

शाल्व अंबा का प्रेमी है। इस काव्य में उसका भी सिर्फ नामोल्लेख है। शाल्व अंबा से पहले ही परिचय में परिणय की बात करता है। पहली बार जब अंबा उसे देखती है तो उसे लगता है जैसे माधव स्वयं अवतार लेकर आ गए हैं। अंबा उसे उत्तर देती है।

"प्रणय है श्याम,प्रणय है श्वेत/
प्रणय है बीज, प्रणय है खेत,
प्रणय की प्रथम भूमि विश्वास/
प्रणय का अंतिम क्षण अद्वैत।
बिना परिचय के कहाँ प्रतीति?/
बिना पहचान कहाँ की प्रीति?
नहीं तुम मुझे जानते हाय/
अजब परदेशी तेरी रीती।
राज्य का संपूर्ण वैभव/ 
सिद्धियाँ सारी/
समर्पित है तुम्हारे पांव में" 233

 और ऐसे शाल्व में अपनी मीठी-मीठी बातों में अंबा को फंसाकर, प्रेम का नाटक रचता हुआ चला जाता है। अंबा उसे सच्चा प्रेम समझकर उसे प्रेम के बिरह में जलने लगती है। वर्तमान युग भी शाल्व जैसे युवकों से भरा पड़ा है। भोलीभांली युवतियों के साथ मिठी- मिठी बातें करके उन्हें फुसलाकर प्रेम का नाटक रचते हैं और छोड़ देते हैं जीवन रूपी मरुस्थल में भटकने के लिए। आज प्रेम के नाम पर पाखंड चल रहा है जिसका शिकार कई स्त्रियाँ होती है। इसका परिणाम यह भी आता है कि भोलीभांली लड़कियों को देहव्यापार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। 

 शिखंडी

अंबा की अतृप्त वासनाओं वेरभावना उसको शिखंडी के रूप में अवतरित करती है। "प्रतिशोध की मूर्ति अंबा न स्त्री सुलभ कोमलता सुरक्षित रख सकी और न पुरुषोचित कठोरता अर्जित कर सकी।" 240 शिखंडी ही अंबा का रूप है जो भीष्म से बदला लेने के लिए दूसरे जन्म में शिखंडी का रूप धारण करता है। अंबा का दुख उसे शिखंडी बनने पर मजबूर करता है। अपना दु:ख व्यक्त करते हुए वह कहती है-

"पुरुष-मन में एक‌ औरत उस समय बेजार थी,
पुरुष तन में एक औरत इस समय बेजार है।
एक ही बस फर्क है/ तब ज्वलित ज्वालामुखी थी
अब बुझा अंगार है/ मर चुकी अंबा कभी की
मर चुका हूं मैं / जगत में रह गए बस नाम
मैं महज आया यहाँ पर देखने/
कुंठित ह्रदय का आखिरी विश्राम
मैं सहज आया यहाँ पर देखने-
प्रतिशोध की प्रतिबद्धता का आखिरी परिणाम।"241

व्यक्ति वैर में इतना अंधा हो जाता है कि उसे अपने जीवन को भी उस वैर में नष्ट कर देता है इस वैर की आग में वह तो जलता है और अपने दुश्मन को भी जलाता है। इस बात को कवि ने शिखंडी के पात्र द्वारा भली-भांति समझाया है। अंबा वेराग्नि में जलकर मर गई उसके फल स्वरुप उसकी अधूरी इच्छाओं ने शिखंडी के रूप में जन्म लिया। सभी जगह से अपमानित अंबा भीष्म को अपनी बर्बादी का कारण मानकर उसे बदला लेती है। नारी कभी अपमान नहीं सह सकती। वह पहाड़ जैसे दु:खों का सामना कर सकती है पर अगर उसका अपमान हुआ तो वह उसका बदला लेने के लिए चंडी का रूप धारण करने में भी पीछे, नहीं हटती। यह बात हमें अंबा के पात्र द्वारा कवि ने सुंदर ढंग से समझाया है।

द्रौपदी

कवि ने प्रस्तुत काव्य में 'पाँचवें क्षण' में भीष्म जब अर्जुन के समक्ष पारिताप करते हैं; तब द्रौपदी के पात्र का केवल नाम उल्लेख किया हैं। अर्जुन के समक्ष भीष्म अपने विगलित मन की व्यथा को व्यक्त करते हैं।

"पार्थ/ मैं ने पाप हाथों से नहीं
हरवक्त आँखों से किया है/
मैं भरे दरबार में 
आँखें गड़ाकर नग्न होती द्रौपदी को, देखने में मग्न था/ बस, सोचता था-
वस्त्र उतरें/ वस्त्र उतरें/ वस्त्र उतरें;
एक ही चिंता मुझे थी/ वस्त्र इतने हट गए पर नग्न होती क्यों नहीं यह द्रौपदी?/ 
वश चला होता स्वयं ही पहुँचता चीर हरने/
यदि नहीं घनश्याम आते द्रोपदी की पीर हरने" 243


कवि ने द्रौपदी के पात्र द्वारा वर्तमान युग में नारी समस्या का चित्रण किया है। उस युग में द्रौपदी की लाज भरे दरबार में लूटी गई थी। बड़े-बड़े महान लोगों के सामने उसे अपमानित किया गया था। आज भी कई द्रौपदियों की लाज लूटी जाती है भरे बाजार में। भीष्म जैसे लोग जो समाज में महान कहलाते हैं ऐसे लोग भी इसका मजा लेते हैं। कितनी ही माँ बेटियों को रुप के बाजार में नंगा किया जाता है। आज भी परिस्थितियाँ वही है जो पहले थी। उस समय तो भगवान स्वयं द्रौपदी की रक्षा के लिए आए थे लेकिन इस युग में तो भगवान भी नहीं सुनते।

गंगा और शांतनु

गंगा और शांतनु का उल्लेख 'दूसरे क्षण' में आता है। गंगा भीष्म की माता है जो बचपन में ही भीष्म को उसके पिता शांतनु को सौंपकर चली जाती है। भीष्म को बचपन में न माता का प्रेम मिलता है ना पिता का। भीष्म का बचपन माता-पिता के प्रेम से वंचित रहता है और उसके मन में कुंठा घर कर लेती है। भीष्म के पिता शांतनु कभी भी अपनी वासनाओं को तृप्त नहीं कर पाए। इसलिए भीष्म को उनके लिए अपने सपनों का बलिदान देना पड़ता है। कवि इन दो पात्रों के माध्यम से माता-पिता के प्रेम से वंचित बालक की मनोव्यथा को प्रकट किया है। माता-पिता बचपन से ही अपने बच्चों को छोड़ कर चले जाते हैं या अलग हो जाते हैं। वे बच्चे को जन्म तो दे देते हैं लेकिन उनकी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं उन्हें प्यार नहीं दे सकते। ऐसी परिस्थिति में बच्चे के मन पर विपरीत असर पड़ता है। ऐसे गलत शस्त्रों तक पहुँच जाता है जहाँ उनकी जिंदगी नरक बन जाती है। यही समस्या आज के युग में फैली है। बच्चे अनाथ आश्रमों में पल रहे या किसी आया की गोद में। जिसके कारण उनका व्यक्तित्व खिल नहीं सकता।

इस प्रकार 'परिताप के पाँच क्षण' में कवि ने भीष्म के साथ सभी चरित्रों की दबी हुई वासना का विशेष चित्रण किया है। यहाँ कवि की दृष्टि आधुनिकता में अधिक रमी है। भीष्म के चरित्र चित्रण में अतिशयोक्ति दृष्टिगत होती है। अंबा के चरित्र का उद्घाटन करने में फ्रायडवादी विचारधारा को अधिक व्यक्त किया गया है। काबरा जी ने भीष्म पितामह के चरित्र को मनोवैज्ञानिक रूप से बतलाते हुए उनकी प्रतिज्ञा पर जबरदस्त प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। कवि ने मिथक और प्रतीक के माध्यम से इस कथा को बड़े ही चिंतन और वेदना के क्षणों में डूबकर अत्यंत प्रभावशाली ढंग से समसामयिक परिवेश को मनोवैज्ञानिक धरातल पर प्रस्तुत किया है। उपेक्षिता अंबा जो आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती है, उसे साहित्य में स्थान देकर नारी की व्यथा को प्रकट किया है। 


संदर्भ:

1. 'परिताप के पाँच क्षण', किशोर काबरा, पृष्ठ 41
2. स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता में महाभारत के पात्र, जे.आर. बोरसे, पृष्ठ 266
3. 'परिताप के पाँच क्षण', किशोर काबरा, पृष्ठ 38
4. वही, पृष्ठ 29
5. वही, पृष्ठ 41
6. वही, पृष्ठ 58
7. वही, पृष्ठ 6
8. वही, पृष्ठ 93

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