मानव के उभयचर अस्तित्व की कथा [1]

चंद्र मोहन भण्डारी
एक विशिष्ट, परन्तु अधूरा अभियान: भारतीय संदर्भ


उभयचरीय दुविधा

मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा चेतन मन के उद्भव एवं विकास की कथा है साथ ही उसकी उभयचरीय दुविधाओं एवं विसंगतियों की भी। इस संदर्भ में पिछले लगभग दस हजार साल विशेष महत्व के हैं जब यात्रा में कई बड़े मोड़ आये और जीवन-शैली में अंतर आना एक अनिवार्यता बन गयी। सोचने में समर्थ मानव-जीव अपने को अन्य जीवों से अलग कर देखने लगा। यह वैचारिक सामर्थ्य उसके सांस्कृतिक विकास का प्रथम अध्याय था। सांस्कृतिक विकास के बाद के चरणों में एक खास तरह की समस्या से भी उसका सामना होने लगा जो पहले के जीवन में विद्यमान नहीं थी – उसकी ‘उभयचरीय’ दुविधा– दो अलग अस्तित्वों को एक साथ लेकर चलने की दास्तान। देखते हैं यह समस्या है क्या? द्वैत जीवन के कई आयामों में परिलक्षित होता है और यह उभयचरीय समस्या भी एक द्वैत का आधार है जिसका प्रबंधन सांस्कृतिक विकास पथ की दिशा एवं गुणवत्ता निर्धारित कर सकता है। विभिन्न समाजों एवं राष्ट्रों के बीच जो अंतर है वह कुछ सीमा तक इसी आधार पर समझा जा सकता है। दो भागों में संपन्न लेखमाला का प्रस्तुत है पहला भाग।

शब्दावली: उभयचर, उभयचरीय द्वैत, स्वायत्त एवं समष्टिपरक अस्तित्व, जिजीविषा एवं जिज्ञासा, उभयचरीय-अस्तित्व-जनित द्वैत, निजेतर संकल्प, उदात्त मूल्यों की सैद्धांतिक स्वीकृति, हिपोक्रिसी या दोगलापन।


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उभयचर उन जीवों को कहा जाता है जो जल और थल दोनों में रह सकते हैं मेंढक इसका अच्छा उदाहरण है। निश्चय ही इस अर्थ में मानव उभयचर नहीं हो सकता। एक खास संदर्भ में उसे उभयचर की संज्ञा दी जाती है क्योंकि उसके अस्तित्व के दो आयाम हैं। पहला आयाम है उसका स्वायत्त-जीव-अस्तित्व जो अन्य जीवों जैसा ही है जिसमें अपनी भोजन व सुरक्षा जैसी जरूरतें प्रमुख होती हैं। दूसरी ओर उसका विचारशील चेतन मन उसे जोड़ता है शेष विश्व से, निकट परिवेश से और सम्पूर्ण सृष्टि से। अपने श्रेष्ठ एवं उदात्त आयामों में यह जुड़ाव निजेतर संकल्पों में भी प्रतिध्वनित होता है। यह अस्तित्व एक तरह से उसका समष्टिपरक अस्तित्व कहा जा सकता है जिसमें वह अपने आपको शेष विश्व से अपने संबंधों के आधार पर देखता है। स्वाभाविक है कि अन्य जीवों की तरह अधिकतर उसका स्वायत्त स्वरूप ही हावी रहता है पर स्वायत्त अस्मिता की जरूरतें पूरी हो जाने पर भी वह चैन से नहीं बैठ पाता। अब शुरू होती है उसकी उभयचरीय विडम्बना जो एक तरह से उसकी दो अस्मिताओं – स्वायत्त और समष्टिपरक – के बीच टकराहट की स्थिति से उत्पन्न होती है। यह उभयचरीयता उसकी दुविधा के मूल में है पर विशेष स्थितियों में उसकी सृजनशीलता का आधार भी। एक तरह से यह चेतना के गुणात्मक विकास[1] की भी कथा है।


जिजीविषा एवं जिज्ञासा

मानव के इन दो रूपों को परिभाषित करती हैं उसकी जिजीविषा एवं जिज्ञासा। जिजीविषा यानि जीने की उत्कट इच्छा जो जीव-जगत में हर कहीं विद्यमान है मानव में भी स्वायत्त-जीव-अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरी ओर उसका विचारशील चेतन-मन प्रेरित करता है जानने समझने के लिये वह सब जो उसे आंदोलित करता है प्रेरित करता है अपनी स्वायत्त अस्मिता से इतर जाने के लिये। इतिहास भरा पड़ा है उन दास्तानों से जो इसकी पुष्टि करती हैं। पौराणिक आख्यानों व लोक कथाओं में बिखरा पड़ा है वह इतिहास जो एक सजीव दस्तावेज है न केवल विशेष देश-काल का अपितु बदलते इंसानी सोच का और उसके रिश्तों का। अपनी इन लाक्षणिकताओं – जिजीविषा और जिज्ञासा – के साथ मानव-जीव आगे बढ़ा है अपने सांस्कृतिक विकास पथ पर; उसकी यह यात्रा उसकी उभयचरीय विशेषता को और भी उजागर कर जाती है।

बहुत दूर निकल आये हम
पीछे मुड़कर देखें भी
नहीं मिलता निशान उस रास्ते का
जिस पर चले थे कभी;
उस पहाड़ी का, झरने का
पीछे छूट आये, नाजुक रिश्तों का।

आगे ही बढ़ने को मजबूर,
जिजीविषा और जिज्ञासा
दोनों साथ लिये चलना
दो नावों पर सवार
चांद की असलियत जानते भी
उसकी खूबसूरती का तलबगार
उड़ानों की लम्बी दास्तान
दास्तानों की अंतहीन श्रंखला
श्रंखला के छोर पर खड़ा मैं।

बीहड़ अनजान रास्ता
घने काले बादलों को चीरती
रह-रह चमक उठती अंगार रेख
आगे बढ़ने की पुरजोर कोशिश
सोचता हूँ आसान रास्ते भी थे
वह अदम्य जिज्ञासा चैन लेने दे, तब।
नहीं कहता, गलत था फैसला
बियाबान, सन्नाटा, काले स्याह पहाड़
जंगलों को गुंजाती हवाओं का गीत
डर है जिजीविषा को
पर जिज्ञासा – चैन लेने दे तब।

जिजीविषा, जिज्ञासा – दोनों का ही साथ
दिल से दिल की बात
हर मोड़ पर गूंज उठता वही गीत
रह-रह चमक उठती बिजली
तड़ित-ऊर्जा में निर्मित होते अणु,
अणुओं की लम्बी श्रंखला,
प्रोटीनी विन्यास का प्रवेश
जीवन-यात्रा की लम्बी दास्तान का
प्रथम चरण –- आरम्भ-बिन्दु।

जैविक विकास - जुझारू दास्तान
सांस्कृतिक विकास - अगला पायदान
संघर्षी दौरों के अनगिनत अभियान
शायद यह नहीं थी उसकी चाहत
लेकिन कोई विकल्प भी नहीं
पर जैसा भी है – है
पीछे लौटना नामुमकिन
चरैवेति – चलते रहना है
दो अलग अस्मिताओं की चुभन
खुद ही निपटना है
उसे तो जुड़ना ही है
अपने आप से, पूरे परिवेश से
अपने चेतन मन के सहारे
आगत संभावनाओं से
और अपने पूरे इतिहास से।
(सेतु, मार्च 2018)


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एक खास परन्तु अधूरा अभियान

हिमालय के दक्षिणवर्ती भूभाग में प्रकृति के इंद्रधनुषी रंगों से लिखी गयी एक विशेष मानवीय यात्रा कथा का जिक्र करेंगे जिसके रंगों की जगमगाती भीड़ में कभी-कभार बेमेल रंग भी दिखायी देते रहे हैं। यह है विकास यात्रा की एक अधूरी पर विशेष दास्तान -- काले और सफेद के बीच विद्यमान हर ‘शेड’ से गुजरती हुई। मानव की निज-केन्द्रित स्वायत्त अस्मिता और उसके निजेतर संकल्पों के अवगुंठन से अनुप्राणित एक खास परन्तु अधूरा अभियान।

महाभारत में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिक सचाई जो भी रही हो वह पूरे विस्तार में मानवीय अच्छाइयों, आकांक्षाओं, कुंठाओं, विकृतियों, कमजोरियों और जिज्ञासाओं का एक रोचक एवं यथार्थपरक दस्तावेज [2] है। कोई दुराव या छिपाव नहीं मानव मन की कालिमा पर पर्दा डालने जैसा; जो जैसा है वैसा सामने है और जो है वह किसी भी जीवन में हो सकने की संभावना‍ को उजागर करता चलता है। मन की यह द्वंदात्मक पहचान उसकी विसंगतियों का उदगम है तो कभी-कभी उसकी सृजनशीलता का स्रोत भी। जहाँ तक महाभारत की लड़ाई की बात है वह कुछ सामान्य परिवर्तनों के साथ हर मन में हर समय विद्यमान है।

उसका हर पात्र अलग-अलग अनुपातों में हर एक के अंदर विद्यमान है। एक-में-अनेक की यह उपस्थिति भी मानव की दुविधा के मूल में है।

और मन की क्या बात करें। अपनी सारी चंचलता के बावजूद वह एक लती किस्म का यायावर है जब-तब अपनी पिनक में रहकर अपने उभयचरीय द्वंदों को झेलता हुवा।


स्वप्निल भावलोक, बीहड़ यथार्थ

यथार्थ के बीहड़ में रास्ता दीखता नहीं आसानी से; उसमें रास्ता खोजना किसी द्दष्टा के लिये ही संभव हो सकता है। जिस देश-काल की बात यहाँ हो रही है उसमें कुछ सार्थक खोजने में प्रयासरत मनीषी अपने अनुभवों और सपनों पर आधारित संकल्पों को कथाओं एवं सूत्रों के माध्यम से संकलित कर रहे थे इसकी परवाह किये बिना कि उनकी व्यक्तिगत पहचान उसमें चित्रित है या नही। वे सपने थे जो होने और हो सकने के बीच की जमीन को मापने [3] में प्रयासरत थे और संघर्षी दौर की समस्याओं के बावजूद कभी-कभार कुछ आगे भी निकल जाते। ऐसे ही बुलंद खयालों को लिपिबद्ध करने के क्रम में मनीषी कह उठे होंगे:
“आत्मवत सर्वभूतेषु”।

यह चेतन मन की ‘निज’ के सीमित दायरे से बाहर निकलने की तड़प थी, निजेतर संकल्पों की प्रथम पहचान थी जो ईशोपनिषद के श्लोक में भी दीखती है। निजेतर या आत्मेतर संकल्पों की यह पहचान चेतना के स्तर में गुणात्मकता की अभिव्यक्ति थी।

यस्तु सर्वाणिभूतान्यात्मन्येवानुपश्यति
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।
(ईशोपनिषद, पद 6)

जो प्रत्येक जीव को स्वयं में और स्वयं को प्रत्येक जीव में देखता है उसे किसी से कोई घृणा नहीं होती।

निजेतर संदर्भों को पोषित करते ऐसे विचार यथार्थ के बीहड़ में भले ही न पनप सके पर मानव की उभयचरीयता का आयाम प्रस्तुत करने में सफल थे जो निज के अस्तित्व से इतर जाने का सैद्धांतिक प्रयास करता है।

एक उदात्त परम्परा के उत्कर्ष के उन क्षणों में चिराग तले का अंधेरा दीख न सका होगा उन मनीषियों को क्योंकि समाज को संचालित करने में उनका योगदान अधिकतर अप्रत्यक्ष ही हुवा करता है, और समर्थवान की ऐसी बातों में रुचि कम ही होती है। सर्व से आत्मवत होने की बात मानव के समष्टिपरक अस्तित्व की उपस्थिति थी मनीषी के चेतन में। ध्यान देने योग्य है ‘सर्व भूतेषु’ पर आग्रह। यह बात महत्व की है क्योंकि बात मानवेतर प्राणियों को भी शामिल करती है और यही क्रम हमें ‘या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्रभिधीयते’ जैसे श्लोकों में भी प्रचुरता से मिल जाता है।

यह और बात है कि यथार्थ के बीहड़ में ‘सर्वभूतेषु’ पर आग्रह के बावजूद ‘सर्वजनेषु’ से आत्मवत होने की बात भी फलीभूत न हो सकी। यह एक पूरे समाज की उभयचरीय दुविधा का अनूठा उदाहरण है उदात्त विचारों की सैद्धांतिक स्वीकृति के साथ जाति-प्रथा-आबद्ध एक अंधे-युग की नींव भी पुख्ता होती रही जो आज लगभग दो हजार वर्षों के अंतराल से गुजरती इक्कीसवीं सदी तक अपना प्रभाव बनाये रखने मे सफल हो सकी। आज भी अंतरिक्ष में अपने अभियान लेकर बढ़ रहा देश सब नागरिकों को मानवीय गरिमा का हक दे पाने में समर्थ नहीं हो सका।

इक्कीसवीं सदी के दो दशकों की समाप्ति पर सामाजिक-राजनैतिक स्तर पर विघटन एवं विकृतियों के जैसे उदाहरण सामने आ रहे हैं उसे देख कर कभी यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या हमारी पहचान उन आदर्श विचारों में प्रतिध्वनित होती है जो हम अक्सर सुनते और पढ़ते आये हैं। किसी संतोषप्रद उत्तर की अनुपस्थिति में हर विचारशील मन को एक अपराध-बोध सा होने लगता है।


मनोवैज्ञानिक अपरिपक्वता

जिडु कृष्णमूर्ति के अनुसार मानव की बौद्धिक उपलब्धियाँ विराट होते हुए भी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से वह अभी परिपक्व नहीं हुवा। संभवत: जीवन से जुडी विसंगतियों में इस प्रकार के बौद्धिक-मनोवैज्ञानिक द्वैत की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। मन की सीमाहीन उड़ान और तन की अस्तित्वजनित स्वायत्त पहचान - दोनों के बीच के फासले का गहराते जाना शायद हमें अटपटा नहीं लगता; मन अपने सपनों की कैद में और तन अपनी जरूरतों की कैद में।


सपनों की जकड़

सर्वेभवन्तु सुखिन: या आत्मवत सर्वभूतेषु में एक सपना निहित है और साथ ही यथार्थ को समझने का एक समष्टिपरक दृष्टिकोण भी। आदर्श की बात जिस आसानी से वैचारिक धरातल पर स्वीकार्य हो जाती है उतनी आसानी से भौतिक दैहिक यथार्थ के धरातल पर नहीं हो सकती। वैसे यह बात स्वाभाविक थी पर जो स्वाभाविक नहीं थी वह यह कि दोनों – संभावना व वास्तविकता- के फासले के बावजूद उनको एक साथ लेकर चलने की मजबूरी। यह तलवार की धार पर चलने जैसी बात थी और ‘आ बैल मुझे मार’ वाले आमंत्रण की पहल। यह सब मन की उस समष्टिपरक जरूरत के आधार पर देखे गये सपनों की गहरी पकड़ के कारण था जो वास्तविकता के धरातल को प्रभावित न करने के बावजूद अपना अस्तित्व बनाये रखता है अंतर्मन की गहराइयों में। ऐसे ही अंतर्मन की गहराइयों में कवि मुक्तिबोध का भावबोध सामने आता है -

मेरी एक चुनौती के सौ अभिप्राय
मालूम मुझे क्या था कि खड़ा मेरे अंदर
फावड़ा टेक कर – विश्व-युगांतर महाकाय।

संभवत: इसी महाकाय की उपस्थिति का असर है जो कभी-कभी हर प्रकार के उदात्त सैद्धांतिक अवलोकन में दृष्टिगोचर होता रहा है और मानव जीवन की विसंगतियों के बावजूद उनसे इतर जाने का मार्ग तलाशता चलता है, साथ ही अपनी समष्टिपरकता में अस्तित्ववादी दुविधाओं का निस्तार खोजता दिखायी देता है। पश्चिम में भी मानव अधिकारों पर सबसे अधिक आग्रह देने वाले देश कुछ समय पहले तक उन अधिकारों का क्रूरता से हनन कर रहे थे।

एक बात और गौर करने योग्य है वह यह कि स्वार्थलिप्सा से संचालित कोई भी शक्तिशाली सम्राट या राजनेता जनता के समक्ष अपना सही लक्ष्य नहीं प्रस्तुत करता जिससे यह साफ हो जाता है कि कथनी और करनी का अंतर समाज में प्रभावशाली लोगों का स्वभाव सदा से रहा है हिपोक्रिसी या दोमुँहापन आज के नेताओं का मौलिक सोच नहीं है। हाँ, इस भूभाग पर उन्होंने इसमें जो महारत हासिल की वह गौर करने लायक जरूर है।


वर्णपट मनोविज्ञान (स्पेक्ट्रम साइकोलॉजी)

इस मानवीय विड़म्बना को उसके पूरे विस्तार में सहेजने का प्रयास किया गया है आधुनिक मनोविज्ञान की कई धाराओं के निचोड़ के रूप में प्रस्तुत स्पेक्ट्रम साइकोलाजी में। केन विलबर [4, 5] द्वारा परिभाषित इस स्पेक्ट्रम में मन के चार प्रमुख प्रकोष्ठ माने गये हैं जिनमें पहला स्तर ‘ईगो स्तर’ कहलाता है जो मानव के स्वायत्त-अस्तित्व और उसकी जरूरतों से सीधा जुड़ जाता है। दूसरा स्तर जैव-सामाजिक (बायोसोशल) कहलाता है जो व्यक्ति के निकट परिवेश – परिवार, मोहल्ला स्कूल या नगर – के आपसी संबंधों से जुड़ जाता है। मन के यह दो स्तर बालपन और किशोरावस्था में मुख्य रूप से हमारे व्यक्तित्व को परिभाषित करते हैं और बाद के जीवन में भी अपनी भूमिका निभाते रहते हैं।

किशोरावस्था की दहलीज पार करने पर उपरोक्त दो स्तरों के साथ एक और स्तर स्वयं को उदभाषित करना आरम्भ करता है जिसमें मानव के अस्तित्व से जुड़े मूलभूत सवालों से मन उलझना आरम्भ करता है। ‘अस्तित्ववादी स्तर’ से चर्चित इस स्तर में जन्म-मरण, सुख-दु:ख, प्रेम-घृणा, अच्छा-बुरा जैसे सवालों एवं विसंगतियों से जूझता मन अक्सर तनावग्रस्त प्रतीत होता है। अपने मूलभूत स्वायत्त अस्तित्व की जरूरतों को पूरा करने में तल्लीन और अस्तित्ववादी स्तर के सवालों से कुछ त्रस्त – संक्षेप में यही कहानी है मानव मन की जो तीनों स्तरों के आपसी तनावों के कारण अधिकांश लोगों में अपनी पूरी विसंगतियों के साथ उजागर होता है।

ऐसा नहीं कि ये सारी बातें एकदम नयी हों। समस्याएँ हमेशा थी और उनके समाधान के प्रयास भी होते रहे। अंतर इतना है कि अब हमारी जानकारी अधिक सक्षम एवं विश्लेषणपरक हो चुकी है। जीवन से जुड़ी उपरोक्त विसंगतियों की बात करें। हर परम्परा में मनीषियों ने अपने तरीकों से उन्हें पहचानने की कोशिश की और इन सभी प्रयासों का एक ही सार्वभौमिक उत्तर पाया कि मन की उलझनों एवं तनावों से निकलने का एक ही मार्ग था - निज के संदर्भों से इतर जाने का। इसी आधार पर केन विलबर ने मानसिक क्रियाओं के वर्णपट में एक और स्तर की जरूरत को महसूस किया और इस तरह चतुर्स्तरीय वर्णपट यानि स्पेक्ट्रम सामने आया: ईगो, जैव-सामाजिक या बायोसोशल, अस्तित्ववादी तथा निजेतर। अगर गौर से देखें तो बात में दम दिखायी देता है कि अस्तित्व जनित समस्याओं एवं विसंगतियों का कोई सरल समाधान नहीं है। आंशिक समाधान कहीं है तो ‘निज’ की सीमा लांघकर समष्टि से जुड़ने में। अहं जनित स्वायत्त अस्मिता की उपस्थिति को नजरअंदाज करने का भाव नहीं है अपितु उसे एक मर्यादा में रखने का है एक तरह से यह बात सदियों से अलग-अलग तरीकों से कही जाती रही है जिसकी प्रतिध्वनि सुनायी देती है कभी लाओ त्सू, कभी गौतम बुद्ध और कभी कबीर की वाणी में। तब से आज फर्क बस इतना आया है कि आज एक दूसरे तरीके से शिखर पर चढ़ने का प्रयास हुवा है हमारी जानकारी बढ़ी है और शिखर का एक और द्दश्य सामने आ जाता है एक ऐसा द्दश्य जो शिखर को पूरी पर्वत श्रंखला के सापेक्ष रख कर हमें पूरी द्दश्यावली से अवगत करा देता है जिसके बिना शिखर उस भव्यता व गरिमा से वंचित हो जाता जो उसकी सही पहचान है और जिसकी अनुपस्थिति में आरोहण अभियान अपना अर्थ खो देता है।

मानव-मन की इसी पृष्ठभूमि में भारतीय भूभाग में सारी सहजता व विस्तार में उद्भाषित होता है एक अभियान – एक स्वप्न और उसे रूपायित करने का एक अभियान – विविधता एवं सर्व-स्वीकारी भाव को आधार बनाता एक अनुभवजनित अभियान। आत्मवत सर्वभूतेषु और सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना हो या सभी जीवों में चेतना की स्वीकारोक्ति (कि नमन है उस देवी को जो सभी जीवों में चेतना रूप विद्यमान है) - यह सब बातें बहुत-कुछ कह जाती है उस काल विशेष के चिन्तन-स्तर के विषय में- उस स्वप्न के विषय में और उसे पूरा करने के अधूरे असफल प्रयासों के विषय में।



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हिपोक्रिसी का दौर: उदार सैद्धांतिक संकल्पना, अनुदार परिवेश

बड़ा ही जटिल है यह मन, कभी दो विरोधी मनस्थितियों को आत्मसात करता हुवा पूरकत्व की मुद्रा में और कभी विरोध या टकराव की मुद्रा में। लेकिन सच तो पूरा सच ही होगा। जिस देश-काल में वैचारिक-दार्शनिक स्तर पर निजेतर संदर्भों की महत्ता स्पष्ट रूप से स्वीकारी जा रही थी तथा सर्व-स्वीकारी भाव को धर्म का आधार बनाया जा रहा था एक सर्वथा असहिष्णु व अनुदार सामाजिक-आर्थिक समीकरण भी आकार ग्रहण कर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा था – एक ऐसा अनुदार परिवेश समाज के एक बड़े वर्ग को चिन्तन-मनन की उस प्रक्रिया से वंचित रखने के लिये प्रयत्नशील था। उस प्रयत्न में वह सफल ही नहीं हुवा अपितु आने वाली कई सदियों के लिये सफलता सुनिश्चित कर ली। आज विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि हम वास्तव में इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। वैचारिक स्तर पर विश्व की उदारतम और सर्वस्वीकारी परम्परा जमीनी स्तर पर अनुदार और असहिष्णु हो गई अपने ही विरोधाभासों से जूझने में इतनी नाकाम हो गयी? हमने कभी इसे समझने का प्रयास भी नहीं किया, समाधान का तो प्रश्न ही नहीं उठ पाया।

एक साथ दो विरोधी स्थितियों का प्रभावी होना मानव मन की एक लाक्षणिकता और उसकी कार्यप्रणाली का एक अंतरंग हिस्सा है। यह युगल प्रवृत्तियों का द्वैत है जिसमें वे कभी विरोधी स्थितियों में दिखायी देते है और कभी पूरकत्व की। हमारे सोच में तार्किकता व सहजबोध दोनों का ही हाथ है समान्यतया इसे हम तर्क-प्रधान व भावना-प्रधान कह सकते हैं, दरअसल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और अलग-अलग परिस्थितियों में कम या अधिक रूप से प्रभावी हो सकते हैं। दोनों के विरोध की स्थिति में आने पर कुछ कठिनाई खड़ी हो सकती है साथ ही पूरकत्व की स्थिति में होने पर विकास एवं सृजन का माहौल तैयार हो सकता है।

लेकिन पूरकत्व वाली बात यह नहीं समझा पायेगी कि सर्वभूतों की महत्ता को सहज स्वीकार करने वाली दृष्टि अपने ही निकट परिवेश के सभी समूहों को न स्वीकार सकी। क्या इसके आधार में मात्र आर्थिक स्वार्थ निहित थे क्या दैहिक-भौतिक सुख की लालसा में उदार दृष्टि आड़े नहीं आ रही थी? यह भी संभव है कि सैद्धांतिक व व्यावहारिक दोनों धरातल अलग थे? संभवत: यही सही हो सकता है और अगर ऐसा है तो इसे हिपोक्रिसी या दोगलेपन की संज्ञा देनी होगी। और कालांतर में यही हिपोक्रिसी हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गयी।

साथ ही यह भी याद रखना होगा इन विरोधाभासों के बावजूद वैविध्य की स्वीकृति भी बनी रही और वह पूरी तरह जनमानस से विलुप्त नहीं हो पायी। साथ ही यह कहना भी आवश्यक होगा कि सब मिलाकर सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में एक संकीर्णता आई है। शायद यह एक मानसिकता है जो वैविध्य को स्वीकार न करने वाले अनुदार भौगोलिक क्षेत्रीय परिवेश का प्रतिक्रियात्मक प्रभाव माना जा सकता है।

देश के चारों ओर वैविध्य की अस्वीकृति वाले अनुदार परिवेश की यह प्रतिक्रिया कुछ सीमा तक असहिष्णुता में वृद्धि की बात समझा सकती है पर अपने ही कमजोर वर्ग के प्रति नकारात्मक सोच किसी बाहरी प्रभाव के कारण नहीं हो सकती। यह हिपोक्रिसी या दोगलापन हमें छलता रहा है और अभी उसका किनारा नजर नहीं आता।

सब मिलाकर भारत को एक उदार सर्वस्वीकारी समाज के रूप में विकसित करने का स्वप्न जो आजादी के समय हमारे नेतृत्व ने देखा था अपने आप में आदर्श था पर उसका अनुचित लाभ उठाने वाले अनुदार समूहों एवं संगठनों पर अंकुश लगाना भी आवश्यक था। आजादी के बाद के दशकों में विघटनकारी शक्तियों पर अंकुश न लगा सकने का निष्कर्ष उस प्रतिक्रिया के रूप में हुवा जिसने किसी सीमा तक सामाजिक-राजनैतिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया। संभवत: यह इस देश व समाज की दीर्घकालिक मानसिकता नहीं होगी और धीरे-धीरे वैविध्य को स्वीकार करने की इस देश की परम्परा अपनी साम्यावस्था को पुन: प्राप्त कर लेगी यदि हम आत्म-मंथन कर अपने आंतरिक अंतर्विरोधों एवं विस़ंगतियों से निजात पा सकें।


संदर्भ:

[1] चेतन मन मस्तिष्क के विकास स्तर पर निर्भर है जिसमें पिछले लगभग 20 लाख वर्षों में यानि चिंपांजी से मानव बनने की प्रक्रिया में विशेष प्रगति हुई। इस काल में न केवल मानसिक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि संभव हो सकी अपितु उसमें गुणात्मक विकास भी आया।

[2] चंद्रमोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु, सितम्बर, 2019.

[3] चन्द्रमोहन भंडारी, हिमालय और हडसन के बीच- एक अंदरूनी भ्रमण-पथ पर, सेतु-हिंदी, नवम्बर 2019.

[4] Ken Wilber, The Spectrum of Consciousness, M B Publishers Pvt Ltd, Delhi (2002), Published by arrangements with Theosophical Publishing House, USA (1977).

[5] Ken Wilber. ‘Up from Eden: Transpersonal view of human evolution’, Quest Books, 1996.


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