कविताएँ: अशोक कुमार

उदासी

जब भी उदास होता हूँ
तो एक यात्रा पर निकल पड़ता हूँ
खुद से खुद की यात्रा पर।

खुद से सवाल करता हूँ
सलाह मशविरा देता हूँ
हौसला अफजाई करता हूँ
और खुद से ही खुद का हालचाल पूछ लेता।

कितनी सुखद यात्रा है यह?

मैं सोचता हूँ कि खुद में लौटने के लिए
कभी-कभी उदास हो जाना भी-
कितना जरूरी होता है।
***


तुम्हारा आना

बर्फ़ होती संवेदनाओं के युग में
तुम्हारा मेरे पास होना
किसी मरुभूमि में छांव के एक टुकड़े की तरह था।

छाँव का वह शीतल टुकड़ा
कि जिसकी सतह के नीचे
धरती के आर्द्र होने की उम्मीद बाकी थी।

या फिर उस संगीत की तरह
कि जिसके माधुर्य में सिक्त हृदय
कुछ क्षणों लिए सभ्यताओं के शोर को भुला दे।

या फिर उस सुगंध की तरह
जो कि ताज़ा खिले फूलों से
ओस की निर्मल बूंद के ढलकने के साथ आती है।

फिसलते हुए उस वक्त को
अपने हाथों में थामने के तमाम प्रयत्न व्यर्थ थे
इसलिए तुमने वक्त नहीं हाथ थामा।

तुम्हारा आना ठीक वैसा था
जैसा कि बारिश के बाद
प्रत्याशित होता है धरा का हरा हो जाना।
***


आत्महत्या

शहर के व्यस्तम चौराहे पर बैठा वह कवि
आत्महत्या से पहले
अपनी आखिरी कविता लिखना चाहता है।

उसने आखिरी कविता के लिए
कोई एकांत नहीं चुना
जंगल, पहाड़ या नदी का किनारा भी नहीं चुना।

बीच बाजार में बैठा हुआ वह
उन शब्दों को चुन रहा है
जो निष्कासित भी हैं और प्रतिबंधित भी।

वह उन शब्दों से लिख रहा है कविता
जो इस संक्रमण काल में-
या तो घट चुके हैं या फिर घुट चुके हैं।

और मैं सोच रहा हूँ-
कि कितनी बुरी बात होगी यह
कि पहली दफ़ा कोई तानाशाह नहीं
कोई कवि आत्महत्या कर लेगा।
***


अनुपस्थिति

मैं इस रेगिस्तान में तुम्हारी उपस्थिति को
दूर तक फैली इस नीरवता में
महसूस करने की कोशिश में हूँ।

मैं खेजड़ी के अकेले दरख़्त की तरह
किसी टीले की तलहटी पर खड़ा हूँ।

तुम कोई हवा बनकर आओ
और झकझोर दो मुझे
किसी बादल के टुकड़े की तरह आओ
और बरस पड़ो मुझपर।

कितना खूबसूरत है यह रेगिस्तान
रेत पर मेरे पैर फिसलते हैं
तुम आओ और थाम लो मुझे।

मैं राणा प्रताप की मूर्ति के ठीक नीचे बैठकर
उस पुरानी बावड़ी में पत्थर फेंकता हूँ
तुम ठहरे हुए पानी में किसी लहर सी आओ
और छू लो मुझे।
***


रेगिस्तान

अभी-अभी देखकर आया हूँ
सहेजे हुए युद्ध के पुराने सामान
धारदार हथियार
और सभ्यता की पीठ पर खड़ा
सदी का सबसे मजबूत किला
कि जिसकी जड़ें
केर की जड़ों से थोड़ा कम गहरी होगी।

मैं देख रहा हूँ खेजड़ी का वो पेड़
जो टीथिस के तल से नमी लेकर
इस धूसर धरती पर
हरियाली की उम्मीद लिए खड़ा है।

किले के ऊपरी झरोखे से
मैने धोरों के बीचोंबीच देखे हैं आक के फूल
जो रोहिड़ा के फूलों से
मुस्कुराकर कह रहे हैं
कि देखो कितना खूबसूरत है रेगिस्तान।
***

कवि परिचय
मूलत: जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश।
शिक्षा: MA, B.ED
जन्मतिथि: 05 जून 1981
वर्तमान पता: मकान नम्बर-17, पाकेट-5, रोहिणी सेक्टर-21 दिल्ली-110086
सम्प्रति: दिल्ली के सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक के पद कार्यरत
प्रकाशित संग्रह: “मेरे पास तुम हो” बोधि प्रकाशन से, हिमतरू प्रकाशन हि०प्र० के साँझा संकलन “हाशिये वाली जगह” में कविताएँ प्रकाशित।
इसके अतिरिक्त: युवासृजन, प्रेरणाअंशु, नवचेतना, छत्तीसगढ़ मित्र, कथाबिम्ब, हंस, वागर्थ, कृति बहुमत, ककसाड़, विपाशा, में कवितायेँ प्रकाशित, आजकल में कविताएँ स्वीकृत।
हस्ताक्षर, साहित्यिकी, साहित्यकुंज, समकालीन जनमत, अविसद और पोशम्पा और जर्नल इंद्रधनुष और सहित्यिकी डॉट कॉम वेब पोर्टल पर कविताएँ प्रकाशित।

संपर्क: 9015538006
akgautama2@gmail।com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।