‘ओला’ पानी कैसे बन जाता है: मेहरून्निसा परवेज

खेमकरण सोमन

खेमकरण ‘सोमन’

हिंदी विभाग, राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़, जिला-नैनीताल, उत्तराखण्ड -244713 
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हिंदी कथा-साहित्य जगत के हरे-भरे विस्तृत धरातल पर ऐसे कई कथाकार हैं जिनकी कहानियाँ सुखद-दुःखद रंगों-आब अर्थात विविध जीवनानुभवों से भरी हुई हैं। ये कहानियाँ एक ओर जहाँ समाज-संस्कृति में घुसी विसंगतियाँ उजागर करती हैं, वहीं दूसरी ओर प्रकृति को देखने की सूक्ष्म दृष्टि भी प्रदान करती हैं। समाज-संस्कृति और प्रकृति के माध्यम से जीवन-दर्शन की गहरी समझ और विचार उत्पन्न कर देना सरल कार्य नहीं है। यह समर्थ और समृद्ध कथाकारों की लेखनी द्वारा ही सम्भव है। ऐसी लेखनी में मेहरून्निसा परवेज का नामोल्लेख सर्वथा उचित होगा, जो बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध की चर्चित कथाकार हैं।

मेहरून्निसा परवेज
बीसवीं सदी के उतरार्द्ध में कई लेखिकाएँ हिंदी कहानी के क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति के साथ उभरीं। कहना उचित होगा कि इन लेखिकाओं की उपस्थिति, एक प्रकार से स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरांत हुई सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का परिणाम है। इससे एक बड़ा लाभ यह हुआ कि स्त्री लेखकों की दृष्टि से भी समय, समाज और दुनिया को देखने-परखने और गढ़ने का कार्य प्रारम्भ हुआ। ‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका के संपादक और युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक अपनी आलोचनात्मक पुस्तक ‘हिंदी कहानी के सौ साल तथा भूमंडलोत्तर कहानी’ में कहते हैं, "सातवें-आठवें दशक में चंद्रकान्ता, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, मंजुला भगत, सुधा अरोड़ा, राजी सेठ, ममता कालिया, मालती जोशी, मेहरून्निसा परवेज आदि एक साथ कई महिलाएँ कहानी लेखन के क्षेत्र में आकर सदियों से मार खाते आ रहे स्त्री के दबे-कुचले मन, आत्मसम्मान की भूख, भीतरी एहसास, आत्माभिव्यक्ति की इच्छा और बाहर-भीतर की लड़ाइयों को सशक्त तरीके से अपनी कहानियों में पेश किया। "1

सन 2005 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ सम्मान सहित साहित्य भूषण सम्मान, महाराजा वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार और डॉ0 राही मासूम रजा आदि पुरस्कारों से सम्मानित मेहरून्निसा परवेज ने हिंदी कथा साहित्य को अपनी सशक्त लेखनी द्वारा कई उपन्यास, कहानी-संग्रह और स्मरणीय कहानियाँ प्रदान की हैं। उनकी कथायात्रा की जमीन पर मुस्लिम स्त्रियों का जीवन-चरित्र, प्रेम के चादर में छुपी हुई दुर्भावनाएँ, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और कई प्रकार की असंगतियाँ सहित भारतीय मध्यवर्गीय परिवार का आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष एवं परिवेश भी प्रमुखतः से उभरता है। उनकी कहानियों के आस्वादन के उपरांत प्रतीत होता है कि ये कहानियाँ विचार और संवेदना के साथ पाठक पर ऐसा प्रभाव डालती हैं कि पाठकीय हृदय भी विचलित हो जाता है। उसकी स्थिति कुछ क्षणों के लिए ‘क्या कहे और क्या न कहे’ जैसी हो जाती है। इस सन्दर्भ में ‘ओला’ शीर्षक उनकी एक खूबसूरत कहानी का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। यह कहानी भी प्रतीक और बिम्ब के सहारे अपने उद्देश्य तक पहुँचकर मन-हृदय के शान्त कोने में पहुँचकर, अन्ततः लम्बे समय तक चलते वाला विक्षोभ उत्पन्न कर देती है। समर2 और लाल गुलाब3 आदि कहानियों की भाँति यह कहानी भी लेखिका के व्यक्तिगत जीवन से बहुत गहरा सम्बन्ध रखती है।

‘ओला’ मुख्य रूप से दो दृश्यों अथवा दो चरणों की कहानी है। इसके पहले चरण में बालमन का श्रम, लगन, कौतूहल और दुःख है, और दूसरे चरण में युवावस्था का विषम दारूण परिस्थितियों का चित्रण, जो पहले चरण से जुड़कर निष्कर्षरूप में एक जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है। कहानी प्रारम्भ होती है दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची से जो घर में सबकी लाडली और जिज्ञासु प्रवृत्ति की है। कहानी के केन्द्र में अतीत का समाज है, अतः तब वर्तमान के सादृश्य प्राइवेट, कॉन्वेट अथवा प्ले स्कूल नहीं, अपितु ज्ञान प्राप्ति का बड़ा केन्द्र सरकारी स्कूल ही हुआ करते थे। वह छोटी बच्ची भी इसी स्कूल में पढ़ती थी।

एक दिन जब उसके पास स्कूल का कोई काम नहीं था और अम्माँ तथा उसका छोटा भाई भी पड़ोस में किसी के यहाँ गए हुए थे। तभी जोरदार बारिश होने लगी और आसमान से पानी के साथ बर्फ के गोल-गोल टुकड़े भी गिरने लगे। यह प्राकृतिक-मनोहारी दृश्य देखकर बच्ची आश्चर्य चकित हुई। चपरासी और घर में काम करने वाली बाई द्वारा उसे ज्ञात हुआ कि बर्फ के इन गोल-गोल खण्डों को ओला कहा जाता है।

आसमान से पानी के साथ बर्फ गिरते उसने इससे पूर्व कभी देखा नहीं था। उसे अपनी अम्माँ का ध्यान आया जो उसकी दृष्टि में बहुत समझदार थी। उसे नई-नई जानकारियाँ एवं ज्ञान की बातें बताया करती थी। चूँकि अम्माँ ने कभी बारिश, पानी और कभी-कभार बर्फ या ओले गिरने की बातें बताई नहीं थी अथवा उनकी बातों में इन प्राकृतिक चीजों का कभी उल्लेख न होने से बच्ची ने यह समझा कि उन्हें भी यह सब मालूम नहीं। अतः ये ओले अम्माँ को दिखाना है, यह सोचकर वह, चपरासी और बाई के लाख मना करने पर भी नहीं मानती। बारिश में रोमांचित होकर वह ओले चुन-चुनकर पहले अपने फ्रॉक में फिर खाली बर्तनों भरने लगी। एक घंटे बाद जब बारिश थमी, पानी और ओले गिरने भी बंद हो गए, तब अम्माँ भी घर पर आ गईं।

यहाँ तक की कथावस्तु सामान्य है, लेकिन बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण भी, क्योंकि सर्वमान्य स्वीकृति है कि बच्चे, अपने किए गए कार्य की प्रशंसा बड़ों द्वारा चाहते हैं। यही सब इस बच्ची के साथ भी है। पड़ोस से अम्माँ के आने पर वह उत्साहित उन्हें ओले दिखाने के लिए घर के अन्दर ले जाती है। उसके इस कार्य से अम्माँ प्रसन्न होकर प्रश्नाकुल मुद्रा में कहती है, "अरे, तुमने ओले बीनकर रखे हैं?" परन्तु घर के अन्दर घुसते ही वहाँ का सम्पूर्ण दृश्य तो पूर्णतः परिवर्तित हो चुका था।

बच्ची बर्तन खोलकर दिखाने लगी जिसमें ओले रखे हुए थे, परन्तु वह जिस भी बर्तन को खोलकर दिखाती, बर्तन में ओले की जगह पानी होता। मासूम बालमन हृदय होने के कारण वह पानी के ठोस, द्रव और गैस वाले स्वरूप या उसकी वातावरणीय स्थितियों से अपरिचित थी। अतः बर्तनों में पानी की जगह ओले देखकर वह हतप्रभ सी चीख पड़ी, "मेरे ओले कहाँ गए? किसने चुरा लिए। यहाँ तो पानी भरा है?"

अम्माँ को मुस्कुराते देख, बच्ची ने उन्हें पूरा विश्वास दिलाया कि उसने ओले चुनकर इन्हीं बर्तनों में रखे थे। इस पर अम्माँ ने समझाया भी कि ओले कहीं नहीं गए है बल्कि पानी बनकर यहीं है! वह तब भी समझ नही पाई और निरन्तर रोती रही। अम्माँ ने बस इतना ही कहा, "सयानी हो जाएगी न, तो सब समझ में आ जाएगा।"

ओले पानी कैसे हो गए? इसी प्रकार के कई प्रश्न उदाहरणार्थ- पहाड़ कैसे बनें? मिट्टी कैसे बनी? बारिश क्यों होती है? दिन-रात कैसे होते हैं? या पशु-पक्षी मनुष्य की तरह क्यों नहीं बोलते? स्कूल अच्छा क्यों नहीं लगता? आदि सैकड़ों प्रश्न भारतीय घरों में बिखड़े पड़े हैं। जिनके उत्तर माता-पिता और अभिभावक अपने स्तर से दे सकते हैं। परन्तु प्रायः यह देखा गया है कि वे बालसुलभ मन से बातचीत करना अथवा उनकी जिज्ञासा को शान्त करने की पहल नहीं करते। भविष्य में उन्हें स्वयं ही सब कुछ समझ में आ जाएगा, ऐसा मानकर नितांत अकेले छोड़ देते हैं। विचार करें तो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में ऐसे प्रश्नों को ऐसे ही छोड़ देना कदापि उचित नहीं। इससे सबसे बड़ी हानि यह होती है कि अपने प्रश्नों का उत्तर न मिलने अथवा निरन्तर टालने पर बच्चे एक समय के बाद प्रश्न करना ही छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होकर, एक नागरिक के रूप में भी अपने समय, समाज और सरकार से प्रश्न पूछ नहीं पाते। इक्कीसवीं सदी तो यही प्रमाणित करती है। बहरहाल... कहानी का बालमन जुड़ाव होने के कारण यह अतिरिक्त विश्लेषण आ जुड़ा अन्यथा ‘ओला’ कहानी अपने दूसरे चरण में कुछ और ही बिम्ब प्रस्तुत करती है।

समय बीतने के साथ वही बच्ची अब युवा लड़की होकर अपने समय, समाज और संस्कृति को अच्छी तरह समझने लगी। उसका विवाह भी सम्पन्न हो गया, लेकिन अम्माँ की कही हुई बातों का अर्थ वह आज तक भी समझ न पाई। समझ भी तब आई जब उसका सत्रह वर्षीय किशोर पुत्र असमय इस दुनिया से चला गया। सामने युवा पुत्र की लाश पड़ी हुई थी और वह जार-जार रो रही थी। तब उसे अतीत का स्मरण हो आता और वह सब कुछ समझ जाती है, "उफ्फ! ओला पानी कैसे बन जाता है?" पुत्र बिछोह में आहत वह युवा लड़की इतना डर जाती है कि अब उसे ओले देखकर भी डर लगने लगता है।

पूरी कहानी मात्र चार-पाँच मिनट में पढ़ी जा सकती है। इस दृष्टि से यह कहानी छोटी अवश्य है परन्तु विचार-संवेदना में बहुत बड़ी और अपने उद्देश्य में पूर्णतः परिपूर्ण। कहानी बताती है कि मानवीय-जीवन कई बार ऐसा धोखा दे देता है कि व्यक्ति ठगा सा महसूस करता है। जैसा कि कहानी की नायिका ‘मैं’ जो वास्तव में स्वयं लेखिका है! पहली बार अपने बाल्यावस्था में और दूसरी बार युवावस्था अर्थात जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव में अपने पुत्र को खोकर ठगी सी महसूस कर रही थी। लेखिका, न बचपन में समझ सकी कि ‘मेरे ओले पानी कैसे बन गए?’ और न अपनी युवावस्था में समझ सकी कि, "मेरे ओले पानी कैसे बन गए?"

जिस ओले को लेखिका ने बड़े जतन से एकत्रित किया, वे कुछ समय पास रहकर पानी हो गए। लेखिका इस घटना को अपने जीवन की सबसे बड़ी बिडम्बना स्वीकार करती हैं, जो बचपन में भी उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी और अपनी युवावस्था में भी। यहाँ यह कहना उचित प्रतीत होता है कि मानव जीवन में ओले की भाँति, इसी प्रकार कई विसंगतियाँ हैं, जो उसे जीवनपर्यन्त घेरे रहती हैं। कहानी में उत्पन्न इस सौन्दर्यबोध का कारण स्वयं लेखिका के जीवन में आए उतार-चढ़ाव हैं। इसी ने उनके पुत्र समर को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया, जिनसे वे बेइन्तहा प्यार करती थीं। इस संदर्भ में अपने कहानी संग्रह ‘समर’ में ‘मेरी बात’ के अन्तर्गत वे कहती हैं, "समर तो मेरी पहचान था, मेरा तेज था, मेरे माथे का तिलक था, चंदन था। मेरी सारी शक्ति मिट्टी का ढेर बन गई है।"4

माँ के लिए अपने पुत्र की महत्ता और प्यार जगजाहिर है परन्तु इस कहानी को मात्र लेखिका मेहरून्निसा परवेज के जीवन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता ! वास्तव में यह कहानी उन माँओं की दुःखद व्यथा भी है जिनसे उनका पुत्र अल्पायु में बिछुड़ गया। यह कहानी उन बच्चों की मनःस्थिति का जीवंत चित्रण भी है, जिनके पास अपने श्रम के फलस्वरूप प्रसन्नता और बड़ों से प्रशंसा पाने के लिए थोड़़े से ओले एकत्रित होते हैं। फिर वही ओले अचानक जब पानी बनकर पूरा परिदृश्य परिवर्तित कर देते हैं तब इस कारण वे, बीमार भी हो जाते हैं। यह कहानी मानवीय संवेदना, सपने, प्रकृति, प्रतीक और दर्शन के आलोक में एक विचारणीय प्रस्तुति है। निष्कर्ष रूप में यही कि आत्मकथा शैली में लिखी गई ‘ओला’ एक मर्मस्पर्शी कहानी है जिसकी अनुगूँज लम्बे समय तक सुनी जा सकती है।

संदर्भ सूची:
01. दिनेश कर्नाटक, ‘हिंदी कहानी के सौ साल तथा भूमंडलोत्तर कहानी’, समय साक्ष्य, देहरादून, संस्करण: 2020, पृष्ठ 90
02. समर, मेहरून्निसा परवेज, ग्रन्थ अकादमी, नई दिल्ली, संस्करण: 2002
03. लाल गुलाब, मेहरून्निसा परवेज, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2006
04. समर, मेहरून्निसा परवेज, ग्रन्थ अकादमी, नई दिल्ली, संस्करण: 2002, पृष्ठ 08


2 comments :

  1. आलेख हेतु हार्दिक धन्यवाद 'सेतु`।

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  2. सोमन, बहुत सुन्दर लिखा आपने। मेहरून्निसा परवेज जी का प्रशंसक हूँ।

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