राधिकारमण प्रसाद सिंह और उनकी कहानी ‘कानों में कँगना’

डॉ. सितारे हिन्द

सितारे हिन्द

सहायक प्रोफ़ेसर (अतिथि), हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर, तमिलनाडुचलभाष: +91 897 823 8235; ईमेल: sitareeflu@gmail.com
राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। इनके लेखन में ‘शैली’ की प्रधानता दिखाई देती है। इसी कारण से इन्हें ‘शैली सम्राट’ के रूप में भी जाना जाता है। काल की दृष्टि से ये द्विवेदी युग के कथाकार हैं। अतः इनकी रचनाओं में द्विवेदी युगीन आदर्श की झलक मिलती है। राधिकारमण प्रसाद सिंह का जन्म 10 सितंबर, सन् 1890 ई. को सूर्यपुरा, शहाबाद (बिहार) में हुआ था। ये शहाबाद के प्रसिद्ध जमींदार राजा राजराजेश्वरी सिंह ‘प्यारे’ के पुत्र थे। इनकी शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई। “सन् 1907 ई. में आरा जिला स्कूल से इंट्रेंस, 1909-1910 ई. में सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता से एफ.ए., 1912 ई. में प्रयाग विश्वविद्यालय से बी.ए. और 1919 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए.(इतिहास) की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं।”1 इन्होंने हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनी चलाई है। 
इनके कहानी-संग्रह ‘गल्प कुसुमांजलि’ (1922 ई.) और ‘सावनी समाँ(1938 ई.) हैं। कहानियों में ‘कानों में कँगना’ (1913 ई.), ‘गांधी टोपी’ (1938 ई.), ‘नारी क्या एक पहेली?’ (1951 ई.), ‘हवेली और झोपड़ी’ (1951 ई.), ‘देव और दानव’ (1951 ई.), ‘वे और हम’(1956 ई.), ‘तब और अब’ (1958 ई.), ‘धर्म और मर्म’ (1959 ई.), ‘अबला क्या ऐसी सबला?’ (1962 ई.), बिखरे मोती-भाग-1 (1965 ई.), ‘बिजली’, ‘दरिद्रनारायण’, ‘मरीचिका’, ‘पैसे की घुँघनी’, ‘पद का मद’, ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’, ‘जबान का मसाला’, ‘कर्तव्य की बलिवेदी’, ‘ऐसा महँगा सौदा’, ‘माँ’, ‘भगवान जाग उठा’, ‘बाप की रोटी’ आदि प्रसिद्ध हैं। उपन्यासों में ‘राम-रहीम’ (सन् 1936 ई.), ‘पुरुष और नारी’ (1939 ई.), ‘सूरदास’ (1942 ई.), ‘संस्कार’ (1944 ई.), ‘पूरब और पश्चिम’ (1951 ई.), ‘चुंबक और चाँटा’ (1957 ई.) हैं। लघु उपन्यासों में ‘नव जीवन’ (1912 ई.), ‘तरंग’ (1920 ई.), ‘माया मिली न राम’ (1936 ई.), मॉडर्न कौन, सुंदर कौन (1964 ई.), अपनी-अपनी नजर, अपनी-अपनी डगर (1966 ई.) शामिल हैं। नाटकों में ‘नये रिफारमर’ या ‘नवीन सुधारक’ (1911 ई.), ‘धर्म की धुरी’(1952 ई.) ‘अपना पराया’ (1953 ई.) हैं। ‘नजर बदली बदल गए नजारे’ (1961 ई.) नाम से इनका एक संस्मरण भी है। गद्य काव्यों में ‘नव जीवन’ तथा प्रेम लहरी (1912 ई.) शामिल हैं।
सन् 1920 की पहली जनवरी को अंग्रेज सरकार ने राधिकारमण प्रसाद सिंह को ‘राजा’ की उपाधि से विभूषित किया। आगे चलकर उनको सी.आई.ई. की उपाधि भी मिली। “1920 में वे बेतिया में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पंद्रहवें अधिवेशन के अध्यक्ष मनोनीत हो गए थे। उक्त सम्मेलन के पंद्रहवें अधिवेशन के वे स्वागताध्यक्ष भी थे। वे ‘आरा नागरी प्रचारिणी सभा’ के सभापति भी हुए।”2 इसके अलावा “1922 से 1928 तक ‘शाहाबाद डिस्ट्ररीक्टी बोर्ड’ के प्रथम भारतीय चेयरमेन रहे तथा 1933 से 1940 तक ‘हरिजन सेवक संघ’ के अध्यक्ष तथा 1956 से 1964 तक ये साहित्य अकादमी, दिल्ली के सदस्य भी रहे। 1962 में राष्ट्रपति द्वारा हिन्दी सेवा के लिए पद्मभूषण पुरस्कार, 1965 ई. में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा वयोवृद्ध साहित्यिक सम्मान तथा 1970 ई. में प्रयाग हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से नवाजे गए।”3 अमूल्य साहित्य सेवा करते हुए राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह ने 24 मार्च 1971 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 
राधिकारमण प्रसाद सिंह ने मुख्य रूप से वातावरण प्रधान कहानियाँ लिखी है। इनकी कहानियों में आदर्श को महत्व दिया गया है। वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने बीबीसी के एक लेख में इनकी कहानी ‘दरिद्रनारायण’ पर चर्चा करते हुए लिखा है कि “ ‘दरिद्र नारायण’ नाम से एक बहुत सुंदर कहानी राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह ने लिखी है – उसका गद्य अनूठा है, इसलिए कि उसमें उर्दू की छौंक बहुत प्यारी है।”4 राधिकारमण जी को अनेक भाषाओं का ज्ञान था। इन्होंने इस ज्ञान का उपयोग अपनी रचनाओं में सफलतापूर्वक किया है। इनका गद्य कहीं-कहीं तत्सम बहुल तो कहीं व्यावहारिक, कहीं उर्दू-फारसी शब्दों से युक्त तो कहीं काव्यात्मक तथा अलंकारिकता से पूर्ण है। नीचे कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं- 
“मिश्र जी की मूँछें कड़ी रहतीं, तो अभाव की तड़ी बेभाव नहीं पड़ती। मलाई की मलाहियत पर पाली हुई जबान, छाछ के छूछेपन पर तिलमिला उठी।”5 
“बड़ा घरवाला जब गरीब होता है, तब उसके जीवन की दसों दिशाएँ, सूनी हो जाती हैं। भिखमंगे को भीख माँगने में कोई लाज नहीं, मजदूर को कुदाल उठाने में कोई लिहाज नहीं, मगर शरीफ गरीब न हाथ पसार सकता है, न हाथ चला पाता है। उसे तो भूख ही नहीं खाती शर्म भी खाती है! वह सिर्फ भूख से ही नहीं मरता, लाज से भी मरता है। उसके शिकम में ही भट्ठी नहीं जलती, उसकी छाती में भी भट्ठी जलती है। उसका शरीर ही तिल-तिल कर नहीं घुलता, जान भी अंदर-ही-अंदर घुलती है। उसके साथ पेट का ही कहर नहीं, लहू की भी लहर है, दिमाग का भी जहर है। गरीबी की चिता पर शराफत का घी तन और मन दोनों को फूँक डालता है। कुली बेकार से कुलीन बेकार कहीं विकराल है।”6 
“आखिर सावन आ ही गया। वही काली बदरिया; वही धानी चुनरिया। वर्षा-वधु की वही नीली कंचुकी; वही रंगीली ओढ़नी। बिजलियों की रंगरलियाँ; पुरवैया अठखेलियाँ। पेड़ों के कंधे पर बेलें लपटानें लगीं। बेलों पर कलियाँ मुसकाने लगीं। मेघ की छाती में लौ लगी। प्राणों के पहलू में मुरादों की वेदना जगी। बूंदों की झरी आई। हरियाली की घटा छाई।”7 
ऊपर के उदाहरणों में देखा जा सकता है कि राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की भाषा शैली में पाठकों को बाँधने का पूर्ण सामर्थ्य है। ये उस दौर के लेखक थे जब हिन्दी कहानी-कला निर्मित हो रही थी। देखा जाए तो इनकी कहानियों में सुगठित शिल्प के साथ-साथ सम्पूर्ण कथानक भी बेहद संतुलित नजर आता है। इनकी भाषा के संबंध में हिन्दी साहित्य कोश (भाग-1) में कहा गया है “आपकी सफलता का रहस्य आपकी मनोरम भाषा-शैली है। आप हिन्दी के आधुनिक गद्यकारों में एक विशेष प्रकार की भावुकताप्रधान, काव्यात्मक, लच्छेदार तथा मुहावरेदार भाषा शैली के कारण प्रसिद्ध हैं। तत्सम सामासिक शब्द-योजना तथा तुकपूर्ण पदावली के कारण आपके लेखन में बँगला गद्य–शैली की झलक पाई जाती है।”8 
‘कानों में कँगना’ राधिकारमण प्रसाद सिंह की एक प्रसिद्ध कहानी है। यह कहानी ‘इंदु’ पत्रिका में सन् 1913 ई. में प्रकाशित हुई थी। यह एक प्रकार की आदर्शवादी कहानी है। इस कहानी में कुल छह पात्र (नरेंद्र या कथावाचक स्वयं, किरण, योगीश्वर, मोहन, किन्नरी तथा जूही) हैं। लेकिन मुख्य पात्र के रूप में नरेंद्र ही है जो कि अपनी कहानी कहता है। शेष पात्र गौण होते हुए भी कथा की संरचना में सहायक हैं। संक्षेप में कहानी इस प्रकार है- 
नरेंद्र या लेखक अपने पिता की आज्ञा से अपने पिता के ही लड़कपन के दोस्त योगीश्वर की कुटी में धर्मग्रंथ के अध्ययन हेतु जाता है। विद्या अध्ययन पूर्ण होंने के उपरांत नरेंद्र गुरु दक्षिणा के रूप में एक जोड़ा पीताम्बर, पाँच स्वर्ण मुद्राएँ तथा योगीश्वर की पुत्री किरण के लिए दो कनक कंगन ले जाता है। आचार्य योगीश्वर सबकुछ वापस कर देते हैं केवल कंगन किरण उठा ले जाती है। कंगन पहनने के बाद अनायास ही नरेंद्र अपने गुरु योगीश्वर की पुत्री किरण के सौन्दर्य पर मोहित हो जाता है। इसे अनुभवी योगीश्वर जान लेते हैं। वो अपनी पुत्री को नरेंद्र के हाथों सौंपते हुए कहते हैं – 
 “नरेंद्र! अब मैं चला, किरण तुम्हारे हवाले है।”9
नरेंद्र अपनी पत्नी की सुंदरता पर मोहित है, लेकिन एक दिन अपने दोस्त मोहन के यहाँ नाचने वाली किन्नरी से उसकी आँखें मिलती हैं और वह मोहित हो जाता है। किन्नरी की सुंदरता के विषय में नरेंद्र कहता है – 
“किन्नरी सचमुच किन्नरी ही थी नाचने वाली नहीं नचानेवाली थी।”10 
किन्नरी पर मोहित नरेंद्र अपनी पत्नी के तमाम जेवर किन्नरी पर न्योछावर कर देता है। तमाम संपत्ति खोने के बाद वह किरण से कुछ भी देने को कहता है ताकि वह किन्नरी को समर्पित कर सके। नरेंद्र वासना के नशे में है। यहाँ कुछ पंक्तियाँ बहुत ही मार्मिक हैं-
“किरण, किरण । तुम्हारे पास कोई गहना भी रहा है? 
“हाँ,” – क्षीण कण्ठ की काकली थी। 
कहाँ हैं, अभी देखने दो।” 
उसने धीरे से घूँघट सरका कर कहा- वही कानों का कँगना।”11 
इसके पश्चात किरण की मृत्यु हो जाती है और नरेंद्र का नशा टूट जाता है। लेकिन उसकी आँखों की पट्टी तब खुलती है जब उसका सबकुछ लुट जाता है। 
देखने पर यह शिक्षाप्रद कहानी मालूम होती है जो कि द्विवेदीयुगीन कहानी की एक प्रमुख विशेषता भी है। इसके अलावा पाठकों के मन में तीव्र संवेदना जगाने में बेजोर है। 
कहानी में कई जगह भारत की दुर्गति का जिक्र किया गया है। हालाँकि इसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन द्विवेदी युग साहित्यिक के साथ-साथ सामाजिक सुधार का भी युग था। अतः लेखक ने इसके लिए भी अवकाश निकाल लिया है। कथाकार वर्तमान स्थिति पर निराश होते हुए लिखता है – 
“समय ने सबकुछ पलट दिया। अब ऐसे वन नहीं, जहाँ कृष्ण गोलोक से उतरकर दो घड़ी वंशी की टेर दें। ऐसे कुटीर नहीं जिनके दर्शन से रामचन्द्र का भी अंतर प्रसन्न हो, या ऐसे मुनीश नहीं जो धर्मधुरंधर धर्मराज को भी धर्म में शिक्षा दें। यदि एक-दो भूले-भटके हों भी, तब अभी तक उनपर दुनिया का परदा नहीं उठा - जगन्माया की माया नहीं लगी।”12 
कहानी में पुरुष की वासना का चित्रण नरेंद्र के माध्यम से किया गया है। जो एक स्त्री (किरण) पर मोहित होने के बाद किन्नरी पर मोहित होता है। अतः उसे किरण से प्रेम न था, बल्कि वासना थी, लेकिन किरण की मृत्यु के पश्चात उसे उस प्रेम का एहसास होता है जो उसमें अब तक न था। कथाकार ने यहाँ पर स्त्री के प्रति वासना तथा दाम्पत्य प्रेम के बीच की रेखा को स्पष्ट करते हुए संदेश देना चाहा है कि दाम्पत्य प्रेम घर को बचाने वाला होता है, जबकि पर स्त्री के प्रति वासना घर को उजाड़ देता है। वासना तथा प्रेम के तानेबाने पर बुनी इस कहानी की शुरुआत बेहद अलंकारिक और शृंगारिक अंदाज में हुई है, लेकिन अंत उतनी ही दुखद तथा मार्मिक है। 
दूसरे कोण से यह कहानी स्त्री-गुलामी को भी दिखती है। यहाँ किरण एक प्रकार से गुलाम स्त्री की प्रतीक है जिसकी अंतिम परिणति मृत्यु में होती है। कहानी में कई जगह मिथकीय तथा ऐतिहासिक चरित्रों तथा घटनाओं का भी सहारा लिया गया है। ये चरित्र कृष्ण, नूरजहाँ, दुष्यत तथा शकुंतला के रूप में आए हैं। ये चरित्र कथानक के विकास तथा कहानी की संवेदना को उदीप्त करने में महती भूमिका का निर्वाह करते हैं। यह राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह जी की विशिष्ट लेखन-कला का द्योतक है। 
कहानी की भाषा-शैली अलंकारिक, काव्यात्मक तथा क्लिष्ट है। वातावरण विधान में कई जगह अनावश्यक विस्तार होने के बावजूद यह कहानी मानवीय संवेदना को झकझोरने में पूर्णतः समर्थ है।  

संदर्भ सूची 
1. Tojsiab. “राजा राधिकारमण सिंह- इतिहास अर्थ और सामग्री.” विश्व लेख पढ़ें, https://www.hmoob.in/hi/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9
2. “राधिकारमण प्रसाद सिंह.”, ककसाड़, 8 Jan. 2020, www.kaksaadmagazine.page/2020/01/raadhikaaraman-prasaad-sinh-X6QJap.html.
3. “10 सितम्बर जयंती पर विशेष: हिंदी साहित्य के विभूतियों में शामिल हैं राजा राधिका रमण.” दैनिक भास्कर, 10 Sept. 2021, www.bhaskar.com/amp/local/bihar/patna/shekhapura/news/raja-radhika-raman-is-included-in-the-figures-of-hindi-literature-128908477.html.
4. BBC News हिंदी, and प्रियदर्शन. “नज़रिया: ताजमहल के साथ क्या-क्या छोड़ेंगे संगीत सोम?” BBC News हिंदी, बीबीसी हिंदी, 16 Oct. 2017, www.bbc.com/hindi/india-41639471.
5. राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की श्रेष्ठ कहानियाँ, कमलानंद झा (संपादक), नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष-2017, पृष्ठ संख्या- 2 
6. राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की श्रेष्ठ कहानियाँ, कमलानंद झा (संपादक), नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष-2017, पृष्ठ संख्या -166 
7. राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की श्रेष्ठ कहानियाँ, कमलानंद झा (संपादक), नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष-2017, पृष्ठ संख्या -59 
8. हिन्दी साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास (द्वितीय खंड), डॉ. कुसुम राय, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, वर्ष- 2012 (प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या- 193 (उद्धृत)
9. गद्य तरंग- सुनील कुमार (संपादक), ओरियंट ब्लैक स्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद, वर्ष- 2012 (प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या-13 
10. गद्य तरंग- सुनील कुमार (संपादक), ओरियंट ब्लैक स्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद, वर्ष- 2012 (प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या-14 
11. गद्य तरंग- सुनील कुमार (संपादक), ओरियंट ब्लैक स्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद, वर्ष- 2012 (प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या-15
12. गद्य तरंग- सुनील कुमार (संपादक), ओरियंट ब्लैक स्वॉन प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद, वर्ष- 2012 (प्रथम संस्करण), पृष्ठ संख्या-12

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