कहानी: कोठी मिर्ज़ा सिंह

ज्योत्सना सिंह

- ज्योत्सना सिंह



शहर के आख़िरी छोर पर बनी यह कोठी पंडित अलोपिदीन की है। पूरे शहर की यह सबसे बड़ी कोठी है।कोठी का नाम है ‘कोठी मिर्ज़ा सिंह” अब कोठी पंडित जी की, नाम मिर्ज़ा जी का और साथ में सिंह भी, बड़ा ही घाल-मेल है। यह कहिये कि यहाँ पर पूरा हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई वाली कहानी दिख रही थी।

 पुश्तैनी कोठी होते हुए भी इसे पुश्तैनी नहीं कह सकते। मेरी बात यकीनन आपको बड़ी अजीब ही लग रही होगी, किंतु क्या करूँ यही सच है। चलिए पूरा सच उजागर करते हैं।

पंडित अलोपिदीन, दीन-हीन ब्राह्मण परिवार से थे। उनकी ईमानदारी और मज़बूत सेहत को देखते हुए शहर के ‘ठाकुर मिर्ज़ा सिंह साहेब’ ने उन्हें अपनी रियासत का ज़िल्लेदार बना दिया और दस रुपया तनख़्वाह भी निश्चित कर दी।

 पंडित जी के घर भी दोनों जून तवा चढ़ने लगा। महतारी-बाप को भी लगने लगा बड़ी रईसी के दिन आ गए हैं। छोटे भाई-बहन जो दिन भर सीधा इकट्ठा करते थे उनमें भी वो सब कोताही करने लगे।काहे से कि उनके बड़के भैया अब ठाकुर साहब की कोठी में ज़िल्लेदार हैं। भैया का दबदबा ठाकुर साहब की पूरी रियासत पर था और ठाकुर साहब दो-चार शहर के जाने-माने नाम थे। 

रियासत इतनी थी पर उसे सम्भालने वाला कोई वारिस नहीं था, जो भी कमाई आती उसे भोगने वाले मिर्ज़ा साहेब अकेले ही थे। 

गाँव-घर के पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि मिर्ज़ा साहेब अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थे वह भी बड़ी मान-मनौवल से पैदा हुए थे।

एक बार कोई पीर-फ़क़ीर कोठी पर आये थे और इनकी अम्मा के सिर पर अपनी झाड़ू नुमा झाड़न से आशीर्वाद दे गए थे, साथ ही कह गए थे- “गोद ज़रूर भरेगी ठकुराइन, चार कोस नंगे पाँव चलकर पीर मिर्ज़ा की मज़ार तक मियाँ-बीवी जाओ और जब साहेबज़ादे पैदा हों तब उनका नाम मिर्ज़ा के नाम पर ही रखना नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।” 

भरे जेठ के महीने में ठकुराइन और ठाकुर नंगे पाँव चलकर मिर्ज़ा पीर बाबा की मज़ार पर माथा टेकने पहुँचे। अब पूजा तो आती थी लेकिन सदक़ा कैसे करना है इस बात से अनभिज्ञ थे। लेकिन मन में प्रार्थना के भाव बड़े सच्चे और श्रद्धा से भरे हुए थे।

 नंगे पाँव चलने से ठकुराइन के तलवे छालों से भर गए। अभी वो छाले पूरी तरह से सूख भी नहीं पाए थे कि उनके पाँव भारी हो गए। फिर क्या था आस्था ने विश्वास पर इतनी गहरी पैठ जमाई कि जन्म के बाद नामकरण संस्कार में पंडित जी ने कुंडली बनाकर ‘स’ अक्षर से नाम रखने की सलाह दी। लेकिन ठकुराइन अड़ गईं- “हम तो पीर साहब के नाम पर ही नाम धरेंगे।” ठाकुर साहब की स्तिथि यह कि नाम मुसलमानी रखें तो समाज से क्या कहें और न रखें तो ठकुराइन से क्या कहें? अंत में जीत महिला शक्ति की हुई और नाम रखा गया ‘मिर्ज़ा’ ठाकुर साहब ने उसमें संशोधन करते हुए उसे कर दिया ‘ठाकुर मिर्ज़ा साहेब’ इस तरह से ठाकुर साहेब हुये मिर्ज़ा।

ठाकुर मिर्ज़ा साहेब बड़े लाड़-प्यार से पाले गए। लेकिन अमीरी के शौक़ उनमें पनप ही नहीं रहे थे। बचपन में अति स्नेह पाकर ज़िद्दी तो हो गए पर ज़िद्द भी अनोखी कभी किसी तिनके भर के लिए, तो कभी किसी रत्ती भर के लिए जिद्दीया ज़ाया करते। सात्विक भोजन का स्वाद रखते मांस-मछली के नाम से भी उन्हें उबकाई आने लगती।

 इतनी एड़ियाँ रगड़ने के बाद की औलाद के ऐसे हालात देखकर बड़े ठाकुर साहब का दिल बैठा जा रहा था। इतनी बड़ी रियासत अख़िर कौन सम्भलेगा? जब तक आवाज़ में वजन न हो और स्वभाव में रौब न हो तब तक कहाँ संभल पाती हैं रियासत और ठकुराई। 

किंतु ठकुराइन बहुत खुश रहती कहती- “पीर-फ़क़ीर के आशीर्वाद से मिले हैं हमें मिर्ज़ा तो वैसे ही फ़क़ीरी है स्वभाव में।” 

ठाकुर साहब यह सुनते तो उनके तन-बदन में आग लग जाती।कहते तो न किसी से मगर सोचते ज़रूर कि इससे तो कोई न होता तो हम कोई रौबेला ठाकुर गोद ही ले लेते। इसी सोच में उन्होंने एक जुगत भिड़ाई और मिर्ज़ा की मूँछों की रेंके फूटते ही उन्होंने उनकी लगन पत्रिका बनवा ली। अबकि बार लगन पत्रिका बनाने वाले पंडित ने ठाकुर साहब की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पंडित जी ने कहा-“मिर्ज़ा साहब की कुंडली में तो विवाह का योग ही नहीं है।” बड़े ठाकुर ने उन्हें तगड़ी दान दक्षिणा दी और मुँह बंद रखने की कड़क सलाह दी। फिर खुदी बहु की तलाश शुरू कर दी। इधर उनकी तलाश पूरी हुई उधर ठकुराइन की इहलीला समाप्त हो गई। ठकुराइन के जाने का तेरह दिन का शोक जैसे ही पूरा हुआ वैसे ही मिर्ज़ा के सिर मौरी रख दी गई। 

मिर्ज़ा मना करते रहे पर ठाकुर साहब भावनाओं की तुरुप चाल खेल गए- “ठाकुर मिर्ज़ा साहेब, बिन घरनी घर भूतन डेरा। अब हम तो इस उमिर में नई सेज़ सज़ा नहीं सकते इसीलिये साहेब आप ही मोर्चा सम्भालो।”

मिर्ज़ा मन को कुचलकर घोड़ी चढ़ गए और पहली बार तलवार पकड़कर ससुराल के लिए चल पड़े।बड़े ठाकुर साहब यह सोचकर खुश कि उन्होंने बाज़ी मार ली। 

विवाह के तीन माह बीत गए थे। बड़े ठाकुर खुश थे कि चलो देर-सबेर परिवार का नाम लेवा आ ही जाएगा। अपने मन में मंशा बना ली कि वह उसे शुरू से ख़ूँख़ार ठाकुर बनायेंगे।

‘मन चेती होए नहीं, प्रभु चेती तत्काल।’  वाली कथा को चरार्थ करते हुए ठाकुर मिर्ज़ा साहेब एक दिन सब कुछ छोड़-छाड़ कर गौतम बुद्ध की राह पर निकल लिये। बहुत कारिंदे दौड़ाये गये लेकिन मिर्ज़ा न जाने कौन सी राह निकल लिए थे कि वह मिले ही नहीं। बड़े ठाकुर के लिए अब उनकी बहू बंजर भूमि सी हो गई।लेकिन करते भी क्या? खुद को रियासत के काम-काज में यह सोचकर उलझा दिया कि कभी तो मिर्ज़ा लौटकर आयेंगे तो सब सम्भाल लेंगे।

 वक्त बीतने लगा किंतु मिर्ज़ा का अता-पता नहीं लग रहा था।उम्र के दौर के चलते बड़े ठाकुर भी स्थिल रहने लगे। एक दिन खुद को बहुत समझाया और सुंदर विचारों के तहत मन बनाया और अच्छा सा घर-वर देखकर अपनी बहू के हाथ पीले कर दिये।ससुर ने पिता का फ़र्ज़ निभा दिया।

 इधर बहू के हाथ पीले हुए उधर साल भीतर मिर्ज़ा अपने वैराग से वापस आ गये। अब बड़े ठाकुर के ऊपर वज्र पात हुआ। मिर्ज़ा के आने की ख़ुशी और बहु ब्याह देने का ग़म वो दिल से लगा बैठे।मिर्ज़ा ने पिता की हालत देखी तो पूछ बैठे कि उन्हें किस पीड़ा ने जकड़ रखा है।इस बार बड़े ठाकुर ने सिर्फ़ अपनी जायदाद की ही बात कही। मिर्ज़ा ने भी सच्चे पुत्र की तरह वचन दिया कि वह जायदाद का पूरा ख्याल रखेंगे और उन्होंने अपना वचन पूरी शिद्दत से अपने जीवन के अंत तक निभाया भी।

अरे,आप लोग क्या सोच रहे हैं कि मैं पंडित जी की कोठी की गाथा कहते हुए भटक गया हूँ। ऐसा नहीं है। कोठी के नाम की चर्चा आई तो ठाकुर साहेब तो स्वयं ही आ गए। 

चलिए अब पंडित अलोपीदीन की गाथा तक आपको ले चलते हैं।

पंडित का डील-डौल मजबूत पहलवानों जैसा था ईमान खरे सोने सा पक्का। मिर्ज़ा से जायदाद का तिनका भी न सम्भाला जाता था। जिसे देखो उन्हें चूना लगाकर निकल जाता। जब तक वह अपनी ठगी को महसूस करते तब तक बात आई गई हो गई होती। 

इधर एक दिन पंडित अलोपीदीन अपनी ग़रीबी और भूख से आजिज़ आकर टीले से कूदकर अपनी जान देने जा रहे थे कि उन्होंने देखा कोई है जो टीले के नीचे खाई में एक पत्थर के सहारे लटका है और अपनी जान बचाने के लिए ईश्वर से गुहार लगा रहा है। अलोपीदीन  तो वैसे भी जान हथेली पर लिये घूम रहे थे, उन्हें बचाने के लिये अपनी जान की बाज़ी लगा दी। कड़ी मशक़्क़त के बाद जब लटके हुए इंसान को पंडित जी बाहर लेकर आये तब उन्हें देखकर उनके हाथ-पाँव ठंडे पड़ गये यह तो शहर के ठाकुर मिर्ज़ा साहेब थे। पंडित जी डर गये कि कहीं कोई उन्हें ही गुनहगार न समझ बैठे क्योंकि मिर्ज़ा साहेब बाहर आते-आते बेहोश हो गये थे। 

अलोपीदीन उन्हें अपने घर ले आये जब उनकी अम्मा ने कोई पत्ती पीसकर पिलाई तब कहीं जाकर मिर्ज़ा को होश आया। हाथ जोड़कर पूरा परिवार खड़ा हो गया और राम जोहार करने लगा। अलोपीदीन की अम्मा बोली- “मालिक, हमाए लारिका ने आपको खाई में नई गिराया वो तो आपका बचाए के लई आवा है। मुला शहर भर मा खबर उड़ी है कि कौनों ने आपको खाई में धक्का दे दिया है। आपके नौकर आपकी तलाशी में लगे हैं।”  

मिर्ज़ा तो जान रहे थे कि असल माजरा क्या है।

हुआ यह था कि उनकी भूतपूर्व पत्नी के पतिदेव आये और बड़ी चिरौरी करके मिर्ज़ा को अपने गाँव ले जाने को तैयार कर लिया। उनका कहना था कि उनकी पत्नी माफ़ी माँगना चाहती है कि उसने बिना आप से आज्ञा लिये शादी कर ली। मिर्ज़ा को कोई मलाल ही न था लेकिन उनके दिल पर भी एक बोझ था कि उन्होंने अपना गृहस्थ धर्म सही से नहीं निभाया तो वो भी माफ़ी माँगने के लिए उनके साथ चल पड़े। उनके ख़िलाफ़ इतनी बड़ी साज़िश है वह यह जान ही नहीं पाये।  आख़िर काग़ज़ी तौर पर वह अभी भी उनकी पत्नी ही थी। अब राम जाने उन पति-पत्नी में से किसके दिमाग़ की ये उपज थी। 

सब कुछ जानते हुए भी बिना किसी अदावत के मिर्ज़ा अपनी कोठी लौट आये और अपने राज-काज में लग गए।

 हाँ, उन्होंने पंडित अलोपीदीन को अपना ज़िल्लेदार बना लिया और निश्चिंत होकर अपना जीवन यापन करने लगे। पंडित अलोपीदीन इतने ईमानदार थे कि अपनी तनख़्वाह छोड़कर बख़्शीश के तौर पर कुछ भी लेना पसंद नहीं करते थे। मिर्ज़ा साहेब चाहते थे कि उनकी जायदाद का एक टुकड़ा पंडित जी के नाम हो जाये ताकि उनके दिन भी बहुर जायें लेकिन पंडित जी विनम्रतापूर्वक अपनी कमाई लेते और घर का रस्ता लेते।

ठाकुर मिर्ज़ा साहेब ने उन्हें एक खेत की खुदाई का काम सौंपा। उसमें चाँदी के सिक्कों वाला घड़ा निकल आया वह उसे लेकर मिर्ज़ा की सेवा में उपास्थित हुए। मिर्ज़ा ने कहा-“तुम्हें मिला है तुम रखो।” पंडित जी ने सपाट सा जवाब दिया- “सरकार, ज़मीन आपकी तो उसकी हर चीज़ आपकी।” मिर्ज़ा के दिल में पंडित जी का सम्मान और बढ़ गया। महीना भर बाद उन्होंने पंडित जी से कहा- “पंडित जी, आप की झोंपड़ी की खुदाई करवा डालिए वहाँ एक मंदिर बनवाना है।” सरकार का हुक्म पंडित जी के लिए प्रभु वचन। घर आये तो सबने खरी-खोटी सुनाई कि जो सरकार देते हैं वह तो लेते नहीं और पुरखों की बनाई झोंपड़ी भी उनकी नज़र करने को तैयार हैं। अम्मा ने बहुत रोना-पिटना मचाया पर अलोपीदीन ने एक न सुनी और झोंपड़ी की खुदाई शुरू कर दी साथ ही अम्मा को वचन दिया कि कल तक वह नई झोंपड़ी का इंतज़ाम कैसे भी कर लेंगे। झोंपड़ी की खुदाई शुरू हुई थोड़ी ही खुदाई के बाद उसमें से ढाईकिलो सोने का एक साँप निकला। घर वालों के ख़िलाफ़ जाकर अलोपीदीन उसे भी लेकर मिर्ज़ा साहेब के पास पहुँचे। मिर्ज़ा ने सब सुना और मधुर मुस्कान के साथ बोले- “पंडित जी इसे मैं कैसे ले सकता हूँ? यह तो आपकी ज़मीन से निकली हुई चीज़ है। आपके नियमाअनुसार ये आपकी ही अमानत है।”

अलोपीदीन नतमस्तक होकर ठाकुर मिर्ज़ा साहेब का बार-बार अभिनंदन करके घर आये और शहर के आख़िरी छोर पर अपनी सुंदर सी कोठी बनवाई और अपनी अम्मा को दिया वचन पूरा किया लेकिन कोठी का नाम उन्होंने ठाकुर मिर्ज़ा साहेब के नाम पर ही रखा।इस तरह पंडित की कोठी मिर्ज़ा और ठाकुर के नाम के साथ प्रचलित हुई।

मिर्ज़ा कोठी देखकर मुस्कुराये और सोचने लगे कि मुझसे भी बड़ा ज़िद्दी है यह पंडित। जान बचाने की क़ीमत मैं इस तरह भी न अदा कर पाया।” 

वक्त के साथ न ठाकुर मिर्ज़ा साहेब रहे न पंडित अलोपीदीन! बस रह गईं तो शहर में दो कोठियाँ एक वीरान और एक दिये-बाती वाली।

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