बाबा साहेब की मुक्ति

टीना कर्मवीर

ईमेल: teenaroy35@gmail.com

तारों वाली रात में
पापा किस्सा कहते 
'बाबा साहेब महामानव थे'
'हम लोग बाबा साहब की बदौलत हैं'
और मैं ठानती रहती
एक दिन मिलूंगी जरूर
पापा के बाबा साहेब से
एक दिन उनका पता
खोजूंगी जरूर


एक नाम सुनते बढ़ा बचपन
किशोरा में आया रोमांच
और साहस की मुट्ठियां भिंचीं
आगाज ए जवानी में
उसी ‌नाम के भरोसे

लड़ते रहे इसी ताबीज के बल
कालेजों, विश्वविद्यालयों में
जाति के चबूतरों और उनके पंडों से

लेकिन बचपन की पहेली
जो बड़ी हो रही थी
मेरे ही साथ
मांगने लगी मुझसे अपना हक
और मुझे करना पड़ा
महाभिनिष्क्रमण
सुविधाओं के महल से
'दलितों' के बाबा साहेब की खोज में

मैं अंबेडकर को ढूंढने लगी
उन किताबों में
जो उनकी हैं या उनके बारे में
उन जगहों में जो अब स्मृति स्थल हैं
उन सरकारी कार्यक्रमों में
जहाँ उनके लोग सिर्फ पानी ढोते हैं
उन नेताओं के यहाँ
जो मालदार हुए
जपकर 'बाबा साहेब' का माला
उन अफसरों के यहाँ भी
जो अपने ही लोगों की
रिपोर्ट दर्ज नहीं करा पाते
उन बुद्धि जीवियों के यहाँ भी
जिन्होंने अंबेडकर का नाम लेकर
जीने की बुद्धि कमा ली है
पर शिनाख्त थी
कि यहाँ हो तो मिले


थक हार कर
हमने रिपोर्ट दर्ज करा दी
उनके नाम के पोस्टर लगवाए
गुमशुदगी की मुनादी करा दी


वर्षों की खोज का नतीजा निकला
लेकिन हाय!
क्या निकला
मेरा कलेजा
धक्क से कर के बैठ गया
प्राण मुंह को आ गए
और मैं पछाड़ खा रोने लगी
जब मैंने जाना कि
'बाबा साहेब बंदी हैं'

सब मिटे जा रहे थे
बचपन से जोड़े सपने
और जवानी के देखे ख्वाब
जिंदगी घूमती रही
जिस एक नाम की धुरी पर
काम आया जो हर गाढ़े पर
अपनी सबसे बड़ी 'एप्रोच' था वो नाम
उसके इस हाल की सूचना...


इस देश में सब कुछ बदला
पर कभी सरकार न बदली
चाहे तब की रही हो, चाहे अब की
बम से अधिक डरती आई
'अंबेडकर' और उनके लोगों
अंत में मैंने यही सोचा
जो है अब अपने भरोसे करना पड़ेगा


 उनकी किताबों में
कहे उनके कथन
उन पर बीती विपदाएँ
उनके अपार संघर्ष
और सबसे बढ़कर
अपने लोगों के लिए
अतुलनीय प्रतिबद्धता
को याद करके
मैंने शुरू कर दी है
एक दूसरी यात्रा
उनकी मुक्ति की
बुन लिया है एक नया ख्वाब
जो मुकम्मल होगा
तो बाबा साहेब के लोगों के लिए
बाबा साहेब की मुक्ति पर


यह नहीं है बात अकेले मेरे बस की
पर अब तक मिले हैं मुझे हजारों लोग
जिनके काम आते रहे हैं बाबा साहेब
मेरे ही जैसे बचपन से
मेरी सारी अपील मेरे अपनों से है

साथियों,
मैं बाबा साहेब को
मूर्तियों से मुक्त कराना चाहती हूँ
जिनमें रहना
वे जीते जी कभी स्वीकार न करते

मुक्त करा देना चाहती हूँ
उन तमाम अलंकारों से
जिनमें जड़े जाना
उनकी देह को
कील ठोंक कर
दीवार पर चस्पा करना है
जिसमें आत्मा नहीं है

मैं बाबा साहेब को
विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियों से निकाल कर
उनके लोगों को
दे देना चाहती हूँ
मैं उन्हें ले जाना चाहती हूँ
उड़ीसा के कंधमाल और कालाहाँडी
उत्तर प्रदेश के हाथरस और सोनभद्र
राजस्थान के दौसा और अलवर
मैं उन्हें फिर से पहुँचा देना चाहती हूँ
मध्य प्रदेश के महू,
महाराष्ट्र के सतारा, नासिक, नागपुर और बंबई

और हर उस जगह
जहाँ वे जाना चाहते
जहाँ उनकी सबसे अधिक जरूरत है


जब उनके अंतिम हथियार
संविधान को खत्म करने की साज़िशें हो रही हैं

आजादी के अमृत महोत्सव में
हमारी आज़ादी के पिता
प्यारे बाबा साहेब को
मैं आज़ाद कराना चाहती हूँ

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