मूल्यांकन: उत्पीड़न के मैग्नेटिक स्कैन- पिछली घास

मधु संधु

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब

चलिये आज चलते हैं दीपक शर्मा के यहाँ, उनके नवप्रकाशित कहानी संग्रह ‘पिछली घास’ की यात्रा पर। दीपक शर्मा हिन्दी की सशक्त महिला कहानीकार हैं। 1979 के धर्मयुग में उनकी प्रथम कहानी  ‘कोलंबस अलविदा’ प्रकाशित हुई, जबकि पंजाबी में कहानी लिखना उन्होने लगभग एक दशक पहले शुरू कर दिया था । उनके इक्कीस कहानी संग्रह हिन्दी साहित्य जगत को मिल चुके हैं। प्रथम कहानी संग्रह ‘हिंसाभास’ 1993 में प्रकाशित हुआ। पेशे से वे अङ्ग्रेज़ी की प्रोफेसर रही हैं। दीपक शर्मा की कहानियाँ उत्पीड़न की, स्त्री उत्पीड़न की एम. आर. आई. है। इस रेडियोजिस्ट कहानीकार ने भिन्न मैग्नेटिक स्कैन लिए हैं। यहाँ उत्पीड़न की विस्तृत छवियों को रेडियो तरंगों की तरह पकड़ने का प्रयास है।

मधु संधु
‘पिछली घास’ 2021 में रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित हुआ। इसमें सोलह कहानियाँ हैं। यहाँ दमन, प्रताड़ना, संत्रास का एक वीभत्स संसार है। परिवार के अंदर की प्राणघाती हिंसा है, जिसे हम सभी जानते पहचानते हैं, लेकिन हमेशा से इसे पुरुष का अधिकार और स्त्री की नियति मान लिया गया है। घरेलू हिंसा, जो कभी अपराध की संज्ञा ले ही नहीं पाई। हिंसा जो दिमागी संतुलन को तार-तार कर दे। हर औरत दुर्भाग्य की मारी है। ऐसे तनाव में दिमाग वश में नहीं रहता और कई बार जुबान भी। हत्या और आत्महत्या उसके साथ नियति की तरह चिपटे हैं। भारतीय सामाजिक ढांचे में संवेदनशील माता पिता भी चुपचाप बैठे हैं। बेटियों के कष्ट को क्या सिर्फ हत्याएँ- आत्म हत्याएँ ही निपटा सकती हैं ? उनकी रुखसती ऐसी वीभत्स क्यों ? कहानियाँ ऐसे असंख्य प्रश्नों से पाठक को जूझने के लिए विवश करती है।

लेखिका हमें सुदूर अतीत में ले जाती हैं- पिछली घास पर । यह स्मृति के अंतर्बोध की कहानियाँ हैं। ‘चमड़े का अहाता’ 1950 वाले दशक का समय लिए है। ‘प्रेत छाया’ में 1928 में साइमन कमिशन के विरोध में निकलने वाले जुलूस का वर्णन है। यहाँ 87 वर्षीय गोकुलनाथ पीछे मुड- मुड कर देख रहा है।  ‘कुंजी’ में 63 वर्षीय बेटा 1956 में मोतियाबिन्द के ऑपरेशन के बाद मरी माँ को याद कर रहा है।  ‘ऊंट की करवट’ में 1952/ 1961 की यादें हैं।

दीपक शर्मा
माँ पर हो रहे अत्याचारों और हत्या का चश्मदीद दर्शक एक बच्चा हर कहानी में है। सच को जानने के बाद पचाने की कठिनतम प्रक्रिया उसे किरच-किरच तोड़ रही है। दीपक शर्मा की कहानियाँ मृत माँ और स्मृतिजीवी बेटे के बीच में ठहरे मूक आत्मीय संवाद की कहानियाँ हैं। ‘चमड़े का अहाता’ का बेटा आज सातवीं में पढ़ता  है। बहुत छोटा था। जब उसने पिता को माँ की हत्या करते देखा था। ‘प्रेत छाया’ के वृद्ध को अपनी अबोध आयु के वह दृश्य अक्सर झिंझोड़ा करते हैं, जब पिता ने उसकी जाई को खुली छत से नीचे फेंक दिया था। सात साल बाद चेचक से पीड़ित बच्चे द्वारा इसका कारण पूछने पर पिता इसे बुखार का प्रलाप बताते उसके मुँह पर पट्टी बँधवा देता है। ‘कब्जे पर’ की आशु की कनपटियों पर हथोड़े की तरह एक भनभनाहट सरसराती रहती है, क्योंकि उसने देखा है कि रोज़ माँ को ज़मीन पर फेंक उसके बाल नोचने वाले पिता ने माँ की कलाई काट इसे आत्महत्या का नाम दे दिया था और फिर अंगूठी के लिए फल काटने वाली छुरी से ककड़ी की फांक की तरह मृत माँ की अंगुली काट दी थी। ‘कुंजी’ का गिरधर गोपाल देखता है कि नाना की मौत के बाद पिता का कर्णभेदी होता स्वर माँ की हत्या और कुंजी पर अधिकार के बाद ही शांत होता है। ‘पिछली घास’ का बेटा बहन का बलात्कार करने वाले पिता के न मुंह लगता है, न उससे अपनी कोई खुशी सांझी करता है। ‘ऊंट की पीठ’  का बेटा आज भी अपने शराबी, जुआरी, लम्पट पिता को भूल नहीं पाता। वह अपने स्कूली जीवन की बुरी स्मृतियों में डूबा है, मानों सब अभी घटित हुआ हो- जब नौकर खिलावन ने गुलाब सी खूबसूरत लड़की से शादी की थी और लम्पट पिता तथा उसका मुंहलगा नौकर जगपाल उस पर हवस भरी नज़र रखे थे। पिता ने जगपाल को कुएं में गिरा कर मार दिया और माँ के यह कहने पर कि वह सब जानती है, उस पर जलता स्टोव फेंक उसकी इहलीला समाप्त कर दी थी। ‘माँ का दमा’ में आठवी का छात्र बेटा जानता है कि दमे से पीड़ित माँ को अध्यापक पिता द्वारा कारखाने में ब्लीचिंग की नौकरी के लिए क्यों भेजा जा रहा है। ‘बाप वाली’ की सातवी कक्षा में पढ़ रही बेटी के पास कड़वी यादें और डरावने सपने हैं कि कैसे पिता मीठेलाल माँ को बूटों और रूल से मारा करता था।  ‘ऊंट की पीठ’ का  15-16 वर्षीय भाई बहन की दुर्दशा और फिर रेल से कट मरने की त्रासदी महसूसता है। संतप्त बहन कहती है- 
  “तुम्हारे जीजा “मानुष मांस खाते हैं, मानुष लहू पीते हैं, वे आदमी नहीं आदमखोर हैं।”

‘वसूली’ का आठ साल का बच्चा बहुत बहुत परेशान है। वह जानता है कि न माँ को बस्तीपुर वाले मौसा के आरे से बचाया जा सकता है और न दादी पिता द्वारा निर्धारित रेल की पटरियों से मिलने वाली मौत से। मृत स्त्री की कोई तस्वीर तक इन घरों में नहीं।

पति पुरुषों ने स्त्री को अपमानजनक  सम्बोधन दे रखे हैं।  ‘दम दमड़ी’ में उसे ‘ठठरी’ कहा जा रहा है। ‘माँ का दमा’ में पति उसे ‘घोंघी’ कह कर बुलाता है। ‘चमड़े का अहाता’ में बेटा सौतेली माँ को ‘चमगीदड़ी’ कहता है, क्योंकि वह पिता से अपनी दो बेटियों को बचाने का कोई उपक्रम नहीं करती और बेटी की रक्षा के लिए अपने प्राण देने वाली अपनी माँ को वह ‘बाघनी’ मानता है।

यहाँ यूनिट परिवार नहीं है। पति पुरुष अपने में एक यूनिट है। अहंकारी, आत्मकेंद्रित और आत्ममुग्ध है। अपने कंधों पर नम्बर वन का लेबल लगाये है। मृत्युदान पर वह संतुष्ट है। ‘दम दमड़ी’ में स्त्री कबाड़ी पति के लिए तेज़ाब और रेगमार से कबाड़ चमकाते- चमकाते बीमार हो जाती है और अंतत: रेलगाड़ी से कटकर मर जाती है। ‘चिराग गुल’ में पति की छूत की बीमारी पत्नी की जान ले लेती है।

स्त्री अगर बेटी है, तो ‘चमड़े का अहाता’ का पिता उसे इस दुनिया में आँखें ही नहीं खोलने देगा। चमड़ा धोने वाली टंकी में ही पत्नी और बेटियों की लाशें फेंक देगा । पत्नी मायके गई है और किशोर बेटी पिता के पास है, तो ‘पिछली घास’ का पाँच बच्चों का टैक्सी ड्राइवर पिता तो उसे अपनी जायदाद ही मानता है। उससे नाजायज संबंध बनाता है, बलात्कार करता है । पत्नी के कुछ कहने पर पत्नी को पीटता है। बेटी के बच्चे को अपनी छठी औलाद बोलता है। इस कुकर्म को वैध बनाने में, औचित्य देने में माँ और बहन उसके साथ हैं, आस-पास हैं।

बहुत मान है इन बेटियों को अपने पिताओं पर, बाप वाली होने पर । लेकिन अनुत्तरदायी, स्वार्थी, क्रूर बाप  ‘कान की ठेंठी’ और ‘बाप वाली’ में उसकी उपयोगिता पर घात लगाए बैठा है, जबकि ‘ढक्कन’ में बेटी हत्यारे पिता में सुरक्षा ढूँढने के विकल्प लिए विवश है। ‘वसूली’ का पिता विवाहित बेटी को ही दस हज़ार में बेच देता है।

परामनोविज्ञान इन कहानियों में कुंडली मारे बैठा है। उनकी ‘प्रेत छाया’  में नायक को 75 की अवस्था में उस वक्त की स्मृतियाँ हांट करती हैं, जब वह बारह वर्ष का था। चेचक हो गई थी। सोचता है- वह हवा की सीटियाँ थी या जाई के रेशमी गरारे और दुपट्टे की सनसनाहट। क्या 1928 में जाई ही छत पर आकार बच्चे के समक्ष अपनी ह्त्या का भेद उगल गई थी ? ‘कब्जे पर’ की आशू को माँ की बड़बड़ाहट हांट करती रहती है-
“नर्क नर्क नर्क--- मैं यहाँ न रहूँगी। यह नर्क है।  नर्क, नर्क, नर्क।”

कर्मचारी या अधिकारी, कांस्टेबल या डी. एस. पी., छोटा या बड़ा व्यापारी, स्कूल टीचर, प्रिन्सिपल या प्रवक्ता, कबाड़ी या ड्राईवर, स्वदेश या विदेश से पढ़ा हुआ, अंधा या दो आँखों वाला- सब शिकारी हैं। एक ही थैले के चट्टे- बट्टे हैं।

दीपक जिस विषय पर भी लिखती हैं, अपने विशेषज्ञ होने का आभास करा ही देती हैं। ‘चमड़े का अहाता’ में मरे जानवरों की खालें खरीदकर उनका चमड़ा बनाकर बेचने का धंधा है।
“ हमारे अहाते के दालान के अंतिम छोर पर पानी की दो बड़ी टंकियाँ थी । एक टंकी में नई आई खालें नमक, नौसादर व गंधक मिले पानी में हफ्तों फूलने के लिए छोड़ दी जाती थी और दूसरी टंकी में खमीर उठी खालों को खुरचने से पहले धोया जाता था।“  
‘प्रेत छाया’ में साइमन कमिशन का उल्लेख है, क्योंकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था, इसलिए इसके विरोध में जुलूस निकाले गए, काली झंडियों के साथ साइमन कमिशन गो बैक के नारे लगाए गए।

‘कब्जे पर’ में मिर्गी की बीमारी के बारे में पापा कहते हैं, मिर्गी के लिए-
“आम तौर पर वह ऑपरेशन ग्यारह साल से छोटे बच्चों पर किया जाता है और हमारी आशु अब अपने चौहदवे साल में है। इस उम्र में इसका ऑपरेशन हुआ तो इसकी यादाश्त चली जाएगी। इसका दिमाग कुछ भी नया सीख न पाएगा।“

‘कुंजी’ में ब्रेल की जानकारी है-

” ब्रेल के कोड में तिरसठ अक्षर और बिन्दु अंकन है। प्रत्येक वर्ण छह बिन्दुओं के एक सेल में सँजोया जाता है, जिसमें दो वर्टिकल, सीधे खानों में एक से लेकर छह रेज्ड डाट्स की पहचान से उसका विन्यास निश्चित किया जाता है।“

‘चिराग गुल’ में-
“पैलविक एबसैस (श्रोणीय फोड़ा) उसके पेट में फूट गया था और खून में जहर भर जाने से उसकी हालत बहुत खराब----“

“एच. एस. वी. टू. ---- हरपीज़ सिम्प्लेक्स वाइरस टू. – इसमें उपचार से ज्यादा परहेज की ज़रूरत रहती है।“

बहुत बार कहानीकार प्रतीकों- बिंबों द्वारा भी अपनी बात स्पष्ट करती है। ‘चमड़े का अहाता’ में कबूतरी और चील का खेल है। आप एक पत्थर से चील पर वार कर सकते हैं, पर हमारे समाज, कानून, व्यवस्था सबने  उस चील को कत्ल और उड़ान की असीमित शक्ति दे रखी है। स्त्री कबूतरी है- बुद्धि और वफादारी की प्रतीक और पुरुष क्रूर चील का बिम्ब।  दीपक शर्मा की भाषा में आये अङ्ग्रेज़ी शब्द, वाक्य, उद्धरण  आधुनिकता के भी द्योतक हैं और उनके अङ्ग्रेज़ी की प्रोफेसर होने का भी संकेत करते हैं। जैसे- “ माई आइज़ मेक पिक्चर्ज वेन दे आर शट। “ कहानियों का कलेवर संक्षिप्त है। कहानियाँ हमें 70-90 वर्ष पुराने काल-खंड में ले जाती हैं, और एक विशिष्ट भाषाई टोन उसे साकार कर रही है।

एक अमानुष, अपमानुष, ईवखोर (आदमखोर नहीं) आदम, शोषक और जल्लाद पति के सिहासन पर पालथी मारे बैठा है। यह हिंसा जगत का बहुपक्षीय, सूक्ष्म  पर्यवेक्षण है। घरेलू हिंसा मात्र कोई इंद्रजाल, कल्पना या स्वप्न नहीं, इसके पीछे घरेलू वीभत्स जीवन का ठोस आधार है। पत्थर की यह अहल्या जानती है कि कोई राम उसका उद्धार करने नहीं आएंगे। यह स्त्री न दुर्गा है, न काली, न चंडी, न भवानी। समर्थ, स्वाभिमानी स्त्री के लिए इस धरती पर कोई जगह है भी नहीं। कस्बापुर, बस्तीपुर की स्त्री चीख चीख कर पूछ रही है- कानून! कहाँ हो तुम। खुला आमंत्रण है- कभी आओ हमारे घर भी।   

 
संदर्भ-

1. दीपक शर्मा, पिछली घास, ऊँट की पीठ रश्मि प्रकाशन, लखनऊ, 2021, पृष्ठ 43
2. वही, कब्जे पर, पृष्ठ 89
3. वही, चमड़े का अहाता, पृष्ठ 17
4. वही, कब्जे पर, पृष्ठ 91
5. वही, कुंजी, पृष्ठ 95
6. वही, चिराग गुल, पृष्ठ 36
7. वही, चिराग गुल, पृष्ठ 38

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