मेरे बाल नाटक बच्चों के आगे विभिन्न रंग-रूपों की एक समूची दुनिया उद्घाटित कर देते हैं! (प्रकाश मनु)

जाने-माने साहित्यकार डॉ. प्रकाश मनु से शोध-छात्रा पिंकी बिड़ला का साक्षात्कार
प्रकाश मनु
प्रकाश मनु हिंदी बाल साहित्य में सिरमौर हैं। सबसे अलग और खास। एक तरह से बाल साहित्य का पर्याय बन चुके प्रकाश मनु जी ने बाल साहित्य की हर विधा में बहुत काम किया है। साथ ही उसमें बहुत कुछ नया और महत्त्वपूर्ण जोड़ा है। बच्चों के लिए लिखी गई उनकी कविता, कहानी और उपन्यासों की तो बहुत चर्चा हुई है। उन पर शोधकार्य भी बहुत हुए हैं। पर पता नहीं क्यों, मुझे शुरू से ही उनके बाल नाटक कहीं अधिक आकर्षित करते रहे। बच्चों के लिए इतने रोचक और रसपूर्ण बाल नाटक कम ही लिखे गए हैं। फिर वे सीधे बच्चों के दिल में उतरते हैं। इसीलिए जब पंजाब विश्वविद्यालय से शोध के लिए मुझे विषय निर्धारित करना था, तो मैंने मनु जी के बाल नाटकों को ही चुना। इसके बाद तो मैंने मनु जी के लिखे बहुत नाटक पढ़े और बिल्कुल बच्चों की तरह ही उनका आनंद लिया। उनसे बहुत कुछ सीखा भी। लगभग चार वर्षों से मैं पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से हिंदी में पी.एच-डी. कर रही हूँ। मेरे शोध का विषय है, ‘प्रकाश मनु के नाटकों का बाल-मनोवैज्ञानिक अध्ययन’।
पिंकी बिड़ला
प्रकाश मनु जी के बाल नाटक बच्चों को भीतर से प्रेरित कर कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देते हैं। वे बच्चों को कभी हार नहीं मानने देते, बल्कि हर पल बालकों की जिज्ञासा और सृजनात्मकता को बढ़ावा देते हैं। खुद मनु जी का संपूर्ण जीवन संघर्षमय रहा है, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। जीवन में सदैव कुछ कर गुजरने का जज्बा रखा। यही बात उनके लेखन में भी नजर आती है। इसके अलावा उनके नाटक बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से बहुत ही उच्च कोटि के हैं। उनमें बाल मन की कल्पना, जिज्ञासा, संवेदना व सृजनात्मकता है, तो साथ ही ये नाटक बच्चों को खेल-खेल में सीख भी देते हैं।
प्रकाश मनु जी को बाल साहित्यकार के रूप में कहीं अधिक गहराई से जानने और उनके बाल नाटकों को पढ़ने के बाद मेरे भीतर यह जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि इन सुंदर नाटकों को लिखने के पीछे आखिर कौन सी प्रेरणा रही होगी। बहुत से प्रश्न मेरे मन में उठ रहे थे। मैंने उन्हें प्रकाश मनु जी के आगे रखा और उन्होंने बहुत ही सुंदर ढंग से उनके जवाब दिए। फिर तो उनसे निरंतर संवाद का सिलसिला बनता चला गया।
मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि बहुत सीधे-सरल और रोचक ढंग से मेरे सवालों का जवाब देते हुए, मनु जी ने बहुत ऐसी बातें भी कहीं, जिनसे नई पीढ़ी को दिशा मिलेगी। इसी तरह बाल नाटकों से जुड़ी समस्याओं और जिज्ञासाओं का उन्होंने बहुत रोचक ढंग से समाधान किया। इससे बाल नाटकों के संबंध में बहुत सी नई बातों पर प्रकाश पड़ता है। बच्चों को कैसे नाटक अच्छे लगते हैं और बाल नाटकों में कैसे सर्जनात्मकता लाई जा सकती है, इस बारे में भी मनु जी के विचार बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। लीक से हटकर भी।
बाल साहित्य के बड़े लेखक, चिंतक और इतिहासकार प्रकाश मनु जी से लिया गया यह विविधरंगी इंटरव्यू मैं यहाँ अविकल रूप में प्रस्तुत कर रही हूँ।    (पिंकी बिड़ला)
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पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपको कब यह महसूस हुआ कि आपको लेखक ही होना है, या आप लेखक होने के लिए ही जनमे हैं?

प्रकाश मनु – पिंकी जी, यह ठीक-ठीक बता पाना तो मुश्किल है कि कब मेरे मन में यह आया कि मुझे लेखक होना है या मैं लेखक होने के लिए ही जनमा हूँ। पर यह जरूर याद आता है कि बचपन से ही मैं साहित्य का दीवाना था। पाठ्य पुस्तकों की कहानी-कविताएँ बड़ी रुचि से पढ़ता था। हालाँकि कविताओँ में कुछ अधिक रुचि थी। छठी कक्षा से हिंदी में सहायक पुस्तक ‘भाषा भास्कर’ हमें पढ़नी होती थी। पर यह तो मेरे लिए किसी वरदान से कम न था। इसलिए कि ‘भाषा भास्कर’, जिसे हमारे कॉलेज के ही हिंदी के विद्वान शांतिस्वरूप दीक्षित जी ने लिखा था, बड़ी अद्भुत पुस्तक थी। मेरे मन में साहित्य के संस्कार जगाने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। दीक्षित जी ने अपनी इस बेहद रोचक और सरस पुस्तक में कवियों की बहुत अच्छी-अच्छी कविताएँ उद्धृत की थीं। मैं सुबह-सुबह उठकर वे कविताएँ याद करता था और बड़े जोश से भरकर पढ़ता था। इसके पीछे यह बात नहीं थी कि इससे नंबर अच्छे आएँगे, बल्कि ये कविताएँ रोज सुबह-सुबह मैं इसलिए पढ़ता था कि उन्हें पढ़े बगैर मैं रह ही नहीं सकता था। पढ़ते समय उन कविताओं का आवेश मेरे भीतर समा नहीं पाता था, तो भीतर ही भीतर प्रकंप हो उठता था। खासकर किसी करुण प्रसंग को पढ़ता तो आँखों से आँसू आ जाते, गला रुँध जाता। लगता, करुणा की एक विश्व महाधारा है, और मैं उसमें बहा जा रहा हूँ।

हालाँकि यह तो मैं उस समय नहीं जानता था कि आगे चलकर मैं लेखक बनूँगा, पर साहित्य का बूँद भर रस मैंने चख लिया था, और उसने मुझे बावला बना दिया था। मैं विह्वल होकर बार-बार अपनी पसंद की कविताएँ पढ़ता, और जाने-अनजाने गुनगुनाता रहता था। इनमें बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की कविता की ये पंक्तियाँ भी थीं, जो मुझे सचमुच भीतर से खौला देती थीं, “लपक चाटते जूठे पत्ते, जिस दिन देखा मैंने नर को,/ उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ आग, आज इस दुनिया भर को...!” इसी तरह दिनकर की ये पंक्तियाँ मन में जोश भर देती थीं, “श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,/ माँ की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं,/ पापी महलों का अहंकार, तब देता मुझको आमंत्रण...!”

पिंकी जी, तब यह तो पता था कि मैं औरों से कुछ अलग सा हूँ, पर आगे चलकर मैं लेखक ही बनूँगा, यह तो सोच भी नहीं सकता था। पर हाँ, अपने भविष्य की एक धुँधली सी तसवीर कभी-कभी मन में जरूर उभरती थी। उससे इतना तो जरूर लगता कि मैं कोई दुनियादार किस्म का आदमी न हूँ, और न हो सकता हूँ। मैं कुछ अलग सा ही करूंगा अपने जीवन में।...यों मैं साइंस का अच्छा विद्यार्थी था, तो एम.एस-सी. तक साइंस ही चलती रही। पर आगरा कॉलेज, आगरा से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. करने के दौरान ही समझ में आ गया था कि मेरा जन्म तो किसी और ही चीज के लिए हुआ है। यानी मुझे तो साहित्य के लिए इस दुनिया में भेजा गया है। ...फिर मैंने घर पर जिद की कि मैं तो नए सिरे से अपना जीवन शुरू करूंगा। इसके लिए घर में अनशन किया। माँ मुझे समझती थीं और बहुत प्यार करती थीं। तो उनका आशीर्वाद मिला। फिर मैंने हिंदी में एम.ए. किया, और पी-एच.डी. के लिए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय गया।...तब तक मन में यह चीज जाग गई थी कि अब लेखक ही होना है। जैसे मुझे अंदर से इल्हाम हो गया था कि ऊपर वाले ने मुझे लेखक होने के लिए ही धरती पर भेजा है। तो अब चाहे जो भी मुश्किलें आएँ, लेखक ही बनना है।...आप कह सकती हैं, शायद वही समय था जब अपने लेखक होने की कल्पना मन में बिजली की कौंधी, और वह क्षण हमेशा के लिए मेरी स्मृतियों में दर्ज हो गया।


पिंकी बिड़ला – क्या तब आप जानते थे कि आगे चलकर आपका इतना नाम होगा और बाल साहित्य के सिरमौर लेखकों में आपकी गिनती होगी?

प्रकाश मनु - नहीं पिंकी जी, बिल्कुल नहीं। मैं तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकता था। तब बस यही सोचता था कि जैसे तमाम लोग लिखते हैं तो मैं भी कुछ न कुछ लिखूँगा ही। कोई पढ़ेगा तो ठीक, नहीं पढ़ेगा तो कोई बात नहीं। पर मेरा काम तो लिखना है, सो मैं लिखता रहूँगा। हाँ, यह बात जरूर मन में आती थी कि मैं जो भी लिखूँगा, अपने आप को भीतर तक मथकर लिखूँगा। उसमें अपने को पूरा उड़ेल दूँगा। तो चाहे चार लाइनें ही लिखूँ, पर उसमें मेरे भीतर चलने वाला पूरा भावनात्मक द्वंद्व या कि भीतर का पूरा का पूरा महाभारत उतर आएगा। इसलिए वे चार लाइनें भी अलग से जरूर पहचान में आएँगी कि ये प्रकाश मनु की पंक्तियाँ हैं। बड़े-बड़े नामों के बीच एक छोटा सा अनजाना नाम मेरा भी होगा।...

पर इसे मैं ईश्वर की अनुकंपा ही कहता हूँ कि धीरे-धीरे बहुत से पाठकों और यहाँ तक कि बड़े लेखकों का ध्यान भी मेरी लिखी रचनाओं पर गया। मैं ज्यादा संपर्कों वाला आदमी नहीं हूँ। चुपचाप अपने काम में डूबे रहना ही मुझे पसंद है। पर फिर भी ऐसे लोग मिलते गए जिन्होंने मुझे मन से सराहा। मेरी हिम्मत और मनोबल बढ़ाया। इससे एक आत्मविश्वास तो भीतर आया ही। मैं अपने काम में लीन होता तो कहीं अंदर से आवाज आती, “प्रकाश मनु, तुम लिखो, लिखते रहो...तुम औरों से अलग हो। तुम्हारी एक अलग पहचान बनेगी।” मुझे जीवन में बहुत अच्छे मित्र मिले, जिन्होंने मेरे भीतर की बेचैनी को पहचाना। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर हौसला देने की कोशिश की। फिर तो एक-एक कर बहुत सारे लोग मिलते गए, जो मुझसे और मेरी लिखी रचनाओं से प्यार करते थे।...मैं उनका बेहद आभारी हूँ और अपने पाठकों का भी, जिन्होंने मेरी हिम्मत बढ़ाई और कभी मेरे हौसले को डिगने नहीं दिया।


पिंकी बिड़ला – आपने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि आपका वास्तविक नाम तो चंद्रप्रकाश था, पर बाद में आप प्रकाश मनु हो गए।...आपको क्यों ऐसा लगा कि नाम बदलना चाहिए?

प्रकाश मनु – पिंकी जी, मेरे नाम का भी मजेदार किस्सा है। घर में सब मुझे कुक्कू कहकर बुलाते थे, पर यह तो घर में पुकारने का नाम था। तो फिर मेरा वास्तविक नाम क्या हो? मेरी माँ शिवभक्त थीं, तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरा नाम रखा शिवचंद्र प्रकाश। यानी मैं शिव के मस्तक पर विराजने वाले चंदमा का प्रकाश था।...नाम तो सुंदर था, और इसमें मेरी ममतामयी माँ का प्यार भी छिपा था। पर मेरी प्राथमिक पाठशाला, जिसका नाम पालीवाल विद्यालय था—के हैडमास्टर तिवारी जी को यह पसंद न आया। मुझे याद पड़ता है कि मेरे बड़े भाई साहब कृष्ण भापा जी स्कूल में मेरा एडमिशन कराने गए थे। हैडमास्टर जी के पूछने पर जब उन्होंने मेरा पूरा नाम बताया तो हैडमास्टर जी चकराए। बोले, “इतना लंबा नाम...?” तो उन्होंने मेरे नाम में से शिव हटा दिया। बोले, “चंदप्रकाश अच्छा नाम है। इसका नाम चंदप्रकाश रख देता हूँ।”

कृष्ण भाईसाहब को इसमें क्या ऐतराज होता? सवाल तो स्कूल में मेरे दाखिले का था, सो हो गया। परिवार का कुल नाम विग था, तो मैं स्वाभाविक रूप से चंद्रप्रकाश विग हो गया।...लेकिन तरुणाई में जब मैं जमकर कविताएँ लिखने लगा, तो मुझे कविता लिखने के लिए यह नाम नहीं जँचा। मैंने सोचा कि चंद्रप्रकाश विग तो जरा दुनियादारी वाला नाम है। लेखक का तो कोई अलग सा व्यक्तित्व होना चाहिए, और वह उसके नाम में भी झलकना चाहिए। सो विग हटाकर मैं चंदप्रकाश रुद हो गया। उन दिनों मैं खूब जोश, गुस्से और आवेश भरी कविताएँ लिखता था, तो रुद उपनाम मेरे नाम के साथ खासा जँचता भी था। 

फिर शिकोहाबाद से हिंदी में एम.ए. करके मैं रिसर्च करने कुरुक्षेत्र गया, तो वहाँ एक बड़ी विस्तृत दुनिया थी, जो मुझे भा गई। मैं वहाँ रात-दिन पढ़ने-लिखने और अध्ययन में ही दूबा रहता। तो मुझे लगा कि मेरा एक नया जन्म हुआ है। कुछ-कुछ पुनर्नवा होने जैसा अहसास। उन दिनों मैं काफी एकांतप्रिय, चुप-चुप सा और अध्ययनशील था, तो अपना नाम चंद्रप्रकाश रुद भी अधिक सही नहीं लगा। मुझे लगा, यह नाम तो असंगत या नाकाफी है। तो मन में आया कि नाम बदलना चाहिए। उन दिनों जयशंकर प्रसाद जी की ‘कामायनी’ मुझ पर छाई हुई थी। श्रद्धा और मनु की कथा मुझे बहुत आकर्षित करती थी, जिसमें मनुष्य की विकास-कथा बड़े खूबसूरत ढंग से कही गई है। ‘कामायनी’ बड़ा अद्भुत महाकाव्य है, जिसमें यह पूरी विकास-कथा मनु, श्रद्धा और इड़ा सरीखे पात्रों के जरिए, बड़े प्रतीकात्मक रूप में उभरती है। मनु में बेशक कमजोरियाँ हैं, पर अपनी कमजोरियों के बावजूद वे मुझे आकर्षित करते थे। फिर वे सृष्टि के आदिकालीन पुरुष थे ही, कहना चाहिए मनुष्य जाति के जन्मदाता। तो उनसे मनुष्य की पूरी विकास-कथा को समझा जा सकता था। यों मनु मुझ पर इस कदर छा गए कि मैंने रुद्र के बजाय मनु होना चाहा।...

पर मैंने अपनी डायरी के पन्ने पर लिखकर देखा चंदप्रकाश मनु, तो मुझे बड़ा अटपटा लगा। मुझे कहीं अंदर से लगा कि अगर मैं अपने नाम में से चंद्र हटा दूँ, तो प्रकाश मनु नाम ठीक लगेगा, और यह छोटा सा नाम मेरी सही पहचान होगा। तो मैं प्रकाश मनु हो गया। पर पिंकी जी, याद पड़ता है कि प्रकाश मनु होने से पहले मैंने दर्जनों बार लिख-लिखकर देखा था कि प्रकाश मनु लगता कैसा है? जब भीतर से संतुष्टि मिल गई, तो मैंने प्रकाश मनु होने का निश्चय किया और हो गया।...मैं इसी नाम से पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ भेजने लगा, और धीरे-धीरे चंद्रप्रकाश जो मेरा वास्तविक नाम था, ओट होता चला गया। साहित्यिक दुनिया में मेरी पहचान प्रकाश मनु नाम से बनी, और वह आज तक चली आती है। 


पिंकी बिड़ला - आपने अपनी पुस्तक ‘मेरे कुछ आत्म-संस्मरण’ में लिखा है कि आप गैर-दुनियादार शख्स थे। इसका क्या आशय है? 

प्रकाश मनु – यह बात आप इस तरह समझ सकती हैं पिंकी जी, कि मैंने जिंदगी में कभी बुद्धि से बहुत सोच-विचारकर फैसले नहीं लिए। बल्कि जो भी फैसले लिए, वे भावनाओँ के तूफान में बहते हुए लिए गए। यानी एकाएक कोई चीज तेजी से मन में आई तो मैंने निर्णय कर लिया कि ऐसा करूँगा या कि नहीं करूँगा।...असल में दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। जो खासे दुनियादार लोग हैं, वे तो हर तरह का फायदा या नुकसान देखकर फैसले करते हैं। यानी कोई भी फैसला लेने से पहले वे दाएँ-बाएँ दस बार देखते हैं। पर जो भावुक किस्म के लोग होते हैं, वे अपना फायदा-नुकसान नहीं देखते, बल्कि दिल जो कह रहा है और जो बात ठीक लग रही है, वैसा करने के लिए मचल उठते हैं। फिर इसमें उऩ्हें फायदा हो या नुकसान, कोई बड़े से बड़ा तीसमार खाँ खुश हो या नाराज, इसकी वे परवाह नहीं करते। अगर आप भावुक और गैर-दुनियादार किस्म के आदमी हैं तो आप बहुत कुछ खो भी देते हैं, बहुत चोटें खाते हैं, पर आपको अंदर से लगता है कि करना तो वही चाहिए, जिसे हमारा मन सही कह रहा है, चाहे सारी दुनिया हमारे खिलाफ क्यों न खड़ी हो जाए।...या चाहे सबसे ऊँची कुरसी पर बैठा सत्ताधारी आदमी हमसे नाराज क्यों न हो जाए, पर हमें हर हाल में सच का ही साथ देना चाहिए।

तो अपनी इस भावुकता के कारण जिंदगी में बहुत तरह के विरोध, और तकलीफें भी मुझे झेलनी पड़ीं। मैंने लोगों को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि जो ठीक समझा, और जो सच लगा, वही कहा। पर पिंकी जी, ऐसे लोग, गैर-दुनियादार किस्म के लोग ही होते हैं और जीवन भर कष्ट पाते हैं। मैं साइंस छोड़कर साहित्य की ओर आया, यह भी इसी तरह का कठिनाइयों भरा फैसला था। पर मैंने सोचा कि चाहे जो हो जाए, बनना तो मुझे लेखक ही है।...और एक बात और। कभी मैंने यह देखकर लोगों से संबंध नहीं बनाए कि इससे मुझे कुछ फायदा होगा, बल्कि जिससे फायदा हो सकता था, उससे मैंने चार कदम की दूरी बनाकर रहना पसंद किया, जिससे कि मेरे स्वाभिमान को चोट न पहुँचे। और जिन्हें मैंने अच्छा या भला समझा, उन्हीं से मित्रता की।

अपनी खुद्दारी के कारण मुझे पग-पग पर विरोध और परेशानियाँ भी झेलनी पड़ीं। पर मैंने मुश्किलों से हार नहीं मानी, और अपनी राह पर आगे बढ़ता रहा। बिना फायदा या नुकसान सोचे, जो ठीक लगता, वह करता। ऐसे क्षणों में अगर कोई नाराजगी दिखाता तो हर बार मेरा जवाब यही होता कि देखिए, मेरा दिल ऐसा कह रहा है, या कि मेरे अंदर से यह आवाज आ रही है, तो अब चाहे जो भी विरोध करे, मुझे इसकी कोई परवाह नहीं! ...तो पिंकी जी, ऐसा व्यक्ति दुनियादार तो नहीं हो सकता न! इसी अर्थ में मैंने अपने आपको गैर-दुनियादार आदमी कहा है।


पिंकी बिड़ला – आपने कहा है कि आपके मन में बचपन में ही लेखक बनने का विचार कौंधा था। उन दिनों आप पढ़ते भी बहुत थे। उस समय किस लेखक ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?

प्रकाश मनु – ऐसा है पिंकी जी, शुरू में साहित्य में मेरी रुचि कविताओं से हुई, जो पाठ्य पुस्तकों में थीं, या फिर जो हमारी हिंदी की सहायक पुस्तक ‘भाषा भास्कर’ में पढ़ने को मिलती थीं। तो शुरू में कविताओं और कवियों की छाप ही गहरी पड़ती थी। उन दिनों मैथिलीशरण गुप्त, निराला, दिनकर और बालकृष्ण शर्मा नवीन अच्छे लगते थे। निराला की ‘भिक्षुक’ कविता हमारे पाठ्यक्रम में थी। उसे पढ़ते हुए मन में एक करुणा सी व्याप जाती थी। ऐसे ही नवीन जी की कितनी की पंक्तियाँ मन में पैठ गई थीं। मैथिलीशरण गुप्त के साकेत की कैकेई का पश्चात्ताप मन में एक गहरी करुणा जगाता था, हरिऔध जी की ‘एक बूँद’ कविता जीवन में कुछ कर गुजरने को ललकारती थी।...तो इन सब कवियों की छाप मन में थी। फिर कुछ समय बाद गद्य की ओर मेरा रुझान हुआ तो प्रेमचंद, रवींद्रनाथ टैगार, शरत, बंकिम को पढ़ा, और सभी बहुत अच्छे लगते थे। उन समय बंगला लेखकों के हिंदी अनुवाद इतने अच्छे और समर्थ लेखकों ने किए थे कि कभी लगा ही नहीं कि हम अनुवाद पढ़ रहे हैं। जैसे प्रेमचंद हिंदी के लेखक थे, ऐसे ही टैगोर, शरत, बंकिम हमें हिंदी के ही लगते थे, और मन पर उनकी गहरी छाप पड़ती थी। उनका कोई उपन्यास पढ़ने बैठता तो जब तक पूरा न कर लूँ, हाथ से छूटता ही न था। 

प्रेमचंद के ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘वरदान’, ‘कर्मभूमि’ आदि उपन्यास उन्ही दिनों पढ़े और बहुत प्रभावित हुआ। प्रेमचंद की कहानियाँ ‘बड़े भाईसाहब’, ‘ईदगाह’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘पूस की रात’—ये सब तभी पढ़ीं। इनकी करुणा और भावधारा ऐसी थी कि मैं इनके साथ बहता चला गया। कभी-कभी आँखें नम हो जातीं और गला रुँधने सा लगता था।...बल्कि कई बार तो आँखों से लगातार आँसुओं की झड़ी लग जाती। लेकिन पूरा उपन्यास पढ़कर खत्म करने की ऐसी बेसब्री होती कि वह हाथों से छूटता ही न था। यों उस दौर में रवींद्र, शरत, बंकिम सब बहुत अच्छे लगते और प्रभावित करते थे। पर निस्संदेह प्रेमचंद इनसे अलग थे और उनकी जो गहरी छाप मन पर पड़ी, वह आज भी ज्यों की त्यों है। उस दौर में जिन लेखकों ने मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाला, उनमें प्रेमचंद मुझे सबसे विशिष्ट और सचमुच बड़े साहित्यकार लगते थे। और आश्चर्य, प्रेमचंद आज भी मुझे सबसे बड़े लगते हैं। उनके यहाँ कोई बनावट नहीं है। सादगी ही उनका सौंदर्य है। यही आज भी मुझे लगता है कि सादगी से बड़ी कोई सुंदरता नहीं होती। 

मेरे गुरु रामदरश मिश्र जी ने एक बार फिर से इस ओर मेरा ध्यान दिलाया। शुरू में मैं प्रयत्न करके ऐसे वाक्य लिखता था कि लोग चकित हों, प्रभावित हों। उनमें एक तरह की बनाई हुई कला या कलाकारी थी। कलाबाजी भी आप कह सकती हैं।...पर जल्दी ही यह आदत छूट गई। इसके लिए आज भी मैं प्रेमचंद और उनके बाद के लेखकों में रामदरश जी का सबसे अधिक आभारी हूँ।


पिंकी बिड़ला - बाल साहित्य के अंतर्गत बाल नाटक लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

प्रकाश मनु – पिंकी जी, नाटकों में मेरी रुचि तो थी, पर कभी स्वयं भी नाटक लिखूँगा, यह तो मैंने सोचा न था। हाँ, जिन दिनों मैं आर्य कॉलेज पानीपत में पढ़ाता था तो वहाँ मैंने कुछ विद्यार्थियों के आग्रह पर एक नाटक का निर्देशन किया था, जिसकी बहुत तारीफ हुई थी। उन्हीं दिनों मेरी पत्नी सुनीता जी भी पानीपत एक स्कूल में, जिसका नाम करुणा मांटेसरी था, अध्यापन कार्य करने लगी थीं। उस स्कूल के वार्षिक समारोह के लिए उन्होंने एक नाटक का निर्देशन किया था, जिसमें उनके साथ-साथ मैंने भी काफी रुचि ली थी। वह स्कूल असल में हमारे ही कॉलेज के एक प्राध्यापक शर्मा जी चलाते थे, जिनसे हमारा पारिवारिक संबंध था, और वे मेरा बहुत आदर करते थे।...तो स्कूल के बच्चों के लिए मैंने और सुनीता जी ने मिलकर एक नाटक कराया था, जिसका नाम था, ‘झूठ का अलार्म’। यह जाने-माने साहित्यकार वेद राही जी का लिखा हुआ बड़ा ही मजेदार नाटक था। कहना न होगा कि वह काफी सफल रहा और बच्चों ने इसे काफी पसंद किया था।

बाद में जब मैं ‘नंदन’ पत्रिका के संपादकीय विभाग में आया तो बहुत बाल कहानियाँ और कविताएँ लिखी गईं। पर नाटक मैंने कोई नहीं लिखा था। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में, सन् 1994-95 के आसपास याद पड़ता है, मैंने पहली बार छह नाटक लिखे और इसका श्रेय अलका पाठक जी को जाता है, जो उन दिनों आकाशवाणी के विदेश सेवा प्रभाग में थीं। उन्होंने ही मुझसे बच्चों के लिए नाटक लिखने का आग्रह किया था। खास बात यह है कि ये नाटक काफी अलग तरह के थे, और प्रचलित नाटकों से बहुत भिन्न थे। इनमें मेरे कुछ प्रिय पात्र थे, जो मेरे मन में बसे हुए थे, और थोड़ी-बहुत भिन्नता के साथ प्रायः हर नाटक में मिल जाते थे। उनमें लंबी सफेद दाढ़ी वाले लोक यायावर सत्यार्थी जी, जो मेरे साहित्यिक गुरु थे, जरूर आते थे। कहीं वे बड़े मस्त कलंदर किस्म के कहानी बाबा के रूप में तो कहीं खासे ऊँचे कद के भव्य व्यक्तित्व वाले बाबा देवगंधार के रूप में आते थे, और पूरे नाटक को मानो अपने कंधों पर उठा लेते थे। नाटक में उनके आकस्मिक प्रवेश के साथ ही पूरा नाटक मानो जीवंत हो उठता था और उसमें एक उदात्त भावधारा बह निकलती थी।...इसी तरह नाटक का प्रारंभ जिन पात्रों से होता था, वे प्यार और जिंदादिली से भरे प्रशांत भैया और शोभा दीदी भी मेरे मन में बहुत गहरे बसे हुए थे। उनके नाम अलग-अलग नाटकों में थोड़े अदलते-बदलते रहे, पर व्यक्तित्व उनका एक समान ही था।

अकसर नाटक का प्रारंभ प्रशांत भैया और शोभा दीदी की बड़ी ही विनोदपूर्ण बातों से होता था और फिर बात-बात में एक-एक कर बहुत सारे पात्र जुड़ते चले जाते थे। हर नाटक में कोई बड़ा संदेश भी था, पर उन नाटकों को किस्सागोई और खूबसूरत कविताओं के सहारे इतनी खूबसूरती से आगे बढ़ाया गया था, और उनमें ऐसी लय और रवानगी थी कि इन सभी नाटकों को बच्चों ने बहुत पसंद किया। जो बच्चे आकाशवाणी भवन में इन नाटकों में अभिनय करने के लिए आते थे, और जिन्हें किसी विशेष पात्र का अभिनय करना होता था, वे भी खासी रुचि ले रहे थे। पर उन्हें संवाद बोलने का अभ्यास कौन कराए? तो अलका जी ने अनुरोध किया कि “मनु जी, यह जिम्मा आप ही सँभाल लीजिए।” 

तब मैंने न सिर्फ बच्चों को संवाद बोल-बोलकर, सही संवाद अदायगी का अभ्यास कराया, बल्कि एक तरह से उन नाटकों का निर्देशन भी किया। यह मेरे जीवन का बड़ा ही आनंददायक अनुभव था, जबकि नाटक को मैंने सच्ची-मुच्ची सृजनात्मकता के स्तरों पर जिया था। मैंने पूरी तरह डूबकर वे नाटक लिखे और उतनी ही रुचि और आनंद के साथ उनका निर्देशन भी किया था। बाद में वे नाटक थोड़े संपादन के बाद पुस्तकाकार आए, जिसका नाम था, ‘मुनमुन का छुट्टी क्लब’। और जाहिर है, इस पुस्तक को बहुत सराहा गया। इसके दर्जनों संस्करण निकल गए हैं, और आज भी यह बच्चों को उतनी ही प्रिय है।

इसके बाद फिर से बाल नाटक लिखने का सिलसिला शुरू हुआ कोई पंद्रह बरस बाद। हुआ यह कि डायमंड पाकेट बुक्स के भाई नरेंद जी ने उन दिनों बाल साहित्य की मेरी बहुत पुस्तकें छापीं, जिन्हें बच्चों ने बहुत पसंद किया। एक दिन उन्होंने बातों-बातों में कहा, “मनु जी, बहुत से लोग बच्चों के लिए लिखे गए अच्छे नाटकों की माँग करते हैं। अगर आप बच्चों के नाटकों की तीन-चार पुस्तकें संपादित कर दें, तो हमें बहुत अच्छा लगेगा।” मैंने कहा, “नरेंद्र जी, बाल नाटकों की तीन-चार पुस्तकें आपको मिल जाएँगी और उनमें लाजवाब नाटक होंगे, जिन्हें बच्चे खूब पसंद करेंगे और उनमें मंचीयता भी होगी, जिससे स्कूल के फंक्शनों आदि में, और गली-मोहल्लों में भी, उन्हें मंचित किया जा सके। पर नाटकों की ये संपादित पुस्तकें न होंगी। मैं खुद नाटक लिखूँगा...और ये ऐसे नाटक होंगे कि पढ़कर लोग हैरान हो जाएँगे, कि अच्छा, हिंदी में इतने सुंदर और सृजनात्मक नाटक भी लिखे गए हैं।” 

सुनकर नरेंद्र जी को बहुत खुशी हुई। बोले, “मनु जी, यह तो सोने में सुहागा वाली बात है। हमें इसमें क्या परेशानी? आप जो बाल नाटक लिखना चाहते हैं, जरूर लिखिए हमारे लिए। हम उन्हें बड़ी खुशी से छापेंगे।” और फिर एक-एक करके वहाँ से बाल नाटकों की चार पुस्तकें छपीं—‘बच्चों के अनोखे हास्य नाटक’, ‘बच्चों के श्रेष्ठ सामाजिक नाटक’, ‘बच्चों को सीख देने वाले नाटक’, तथा ‘बच्चों के रंग-रँगीले नाटक’। कहना न होगा कि नाटकों की इन पुस्तकों का जमकर स्वागत हुआ। ये पुस्तकें बहुत बिकीं भी। पर इसका श्रेय मैं डायमंड बुक्स के उत्साही मालिक भाई नरेंद जी को देना चाहूँगा।

और इतना ही नहीं, नाटक लिखने के लिए मन में उत्साह जागा तो अब जैसे एक रचनात्मक आँधी सी आ गई। मन होता था, नाटक लिखूँ, बस, नाटक ही लिखूँ। और तब विविध किस्म के नाटक लिखने का ऐसा सिलसिला चला, कि आप समझिए, जीवन के ये दो-तीन बरस मानो मैंने पूरी तरह नाटकमय होकर ही जिए।...फिर तो नाटकों की बहुत किताबें छपीं। यों मेरी करीब दो दर्जन किताबें हैं नाटकों की। मेरे अलावा और लेखकों ने भी नाटक लिखे हैं और बहुत अच्छे लिखे हैं। मस्तराम कपूर, रेखा जैन, केशवचंद्र वर्मा, श्रीकृष्ण...ये सब बाल नाटकों के दिग्गज रचनाकार हैं। पर जहाँ तक मेरा खयाल है, किसी ने भी बीच-पच्चीस से ज्यादा नाटक नहीं लिखे। जबकि मैंने कोई अस्सी नाटक लिखे हैं, और हो सकता है कि इनकी संख्या इससे भी कहीं अधिक हो। क्योंकि अपने लिखे कुछ नाटक अब मेरे पास ही नहीं हैं। शायद वे कभी मिल जाएँ। तो मैं फिर दोहराऊँ, कि यह खुद मेरे जीवन की एक अद्भुत रोमांचकारी घटना है, क्योंकि नाटक पढ़ने और देखने में आनंद तो आता था, पर कभी मैं खुद भी नाटक लिखूँगा, और एक-दो नहीं, करीब अस्सी नाटक लिखूँगा, यह तो कभी सोचा न था। इसके लिए मैं फिर से अलका पाठक जी और भाई नरेंद जी के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। 

इनमें अलका जी अब नहीं हैं, पर उन्होंने नाटक जिखने के लिए जिस विनोदपूर्ण ढंग से प्रोत्साहित किया, वह मैं भूल नहीं सकता। उनके अनुरोध पर जब मैंने कुछ हिचकिचाते हिए कहा कि “अलका जी, मैंने तो कभी नाटक लिखे नहीं।” तो उनका उत्तर था कि “अरे मनु जी, आप लिखिए तो। नाटक तो खुद-ब-खुद लिखे जाएँगे, और ऐसे बनेंगे कि वे अमर हो जाएगे, और उनके साथ-साथ मैं भी अमर हो जाऊँगी कि मैंने आपसे नाटक लिखवा लिए। यों आपके कथा साहित्य में जबरदस्त नाटकीयता है। पता नहीं, आपने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया...?” उनकी जिंदादिली और स्नेह बार-बार याद आता है, और मैं मन ही मन उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट किए बिना नहीं रह पाता। 

पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपको क्या लगता है। आपके बाल नाटक अन्य लेखकों के नाटकों से किस प्रकार भिन्न है? 

प्रकाश मनु – ऐसा है पिंकी जी, मेरे बाल नाटकों में कथावस्तु और किस्सोगोई पर बहुत जोर है। उन्हें पढ़ते हुए आपको नाटक और किस्से दोनों का आनंद आएगा। इससे मेरे नाटकों का आकर्षण कहीं अधिक बढ़ जाता है। इसलिए पूरे देश भर में बच्चे इनके मुरीद हैं। ऐसे बहुत बच्चे हैं जो इन्हें ललककर पढ़ते हैं और मंचित करने के लिए उन्होंने उत्साह भी दिखाया। कई स्कूलों, संस्थाओं और नाट्य निर्देशकों के संदेश भी मुझे मिलते रहते हैं, जिनके मन में इन्हें मंचित करने की उत्सुकता पैदा हुई। कथावस्तु अन्य लेखकों के नाटकों में भी होती तो जरूर है, पर शायद यह तत्त्व वहाँ इतनी प्रमुखता के साथ नजर नहीं आता। 

फिर मेरे बाल नाटकों को अगर आपने ध्यान से पढ़ा है, तो एक बात पर आपने जरूर गौर किया होगा। अपने हर नाटक में कहीं न कहीं मैं खुद भी मौजूद हूँ, और बड़ी ही अदृश्य डोर से उस नाटक का संचालन भी कर रहा हूँ। पर यह यह इतना अनायास हुआ है कि नाटक को संचालित करने वाले वे बारीक धागे किसी को नजर नहीं आते। अकसर मैं नाटक के किसी न किसी पात्र में छिपकर उस नाटक में उपस्थित हो जाता हूँ, और वह पात्र बड़ी खूबसूरती से उस नाटक को धीरे-धीरे उस संदेश के ओर ले जाता है, जो मैं नाटक के जरिए देना चाहता हूँ। पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा, यह किसी स्थूल ढंग से नहीं होता। बड़ा अनायास होता है, इसलिए नाटकों की स्वाभाविक लय-गति और पात्रों की स्वतंत्र शख्सियत बरकरार रहती है। पाठकों को प्रतीत यही होता है कि नाटक स्भाविक गति से एक अच्छे संदेश की ओर बढ़ रहा है, जो हर बच्चे को अच्छाई की राह पर ले जाता है, ताकि यह दुनिया जैसी भी है, उससे कहीं अधिक सुंदर हो जाए। अन्य लेखकों के नाटकों में यह चीज आपको कम मिलेगी, या फिर इतने स्थूल रूप में मिलेगी कि पूरा नाटक बनावटी लगने लगता है, और पाठक उसमें रुचि लेते ही नहीं हैं। हाँ, रेखा जैन, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, श्रीकृष्ण, केशवचंद्र वर्मा और कमलेश्वर सरीखे अच्छे और सिद्ध नाटककारों के यहाँ यह विशेषता है, और काफी निखरे हुए रूप में है।


पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपके बाल नाटक कल्पना पर आधारित है या वास्तविकता पर? 

प्रकाश मनु – पिंकी जी, मेरे नाटक वास्तविकता पर आधारित भी हैं और कल्पना पर भी। कभी-कभी यह होता है कि मैं जो नाटक लिख रहा हूँ, उसमें थोड़े-बहुत बदलाव के साथ वास्तविक जीवन से सीधे-सीधे लिए गए पात्र आ जाएँ, और जो कथावस्तु है, वह काल्पनिक हो, या मैंने कल्पना से उसे गढ़ा हो। या फिर यह भी हो सकता है कि कोई घटना वास्तव में घटित हुई हो, पर मेरे नाटक में आते-आते वह कोई और ही शक्ल ले ले। इसलिए कहीं-कहीं कल्पना और वास्तविकता दोनों ही चीजें आ जाती हैं। इसी तरह यह भी हो जाता है कि जिस घटना को मैं नाटक में दिखाना चाहता हूँ, वह जिस पात्र के साथ हुई थी, उसी का चेहरा-मोहरा एकदम बदल जाए। किसी पात्र को नाटक में प्रस्तुत करते हुए ऐसा मेरे साथ बहुत बार हुआ कि उस पात्र में दो-तीन चेहरे और भी शामिल हो गए। यानी दो-तीन लोगों को मिलाकर एक नया पात्र बना लिया गया, जिसमें नाक-नक्श किसी के आए तो आदतें किसी और की आ गईं...और बोलने का अंदाज तथा कायिक भाषा या भंगिमाएँ भी बदल गईं। 

कई बार नाटकीयता बढ़ाने के लिए ऐसा करना जरूरी हो जाता है तो कई बार मजे-मजे में किसी खेल की तरह होता है। जैसे बच्चे खेल-खेल में स्वांग भऱते हैं, ऐसे ही अपने नाटकों में स्वांग रचना मुझे प्रिय है, और इसे भी मैं बच्चों के किसी खेल या बाललीला की तरह जीता हूँ। इससे एक नाटककार के रूप में मुझे जो आनंद आता है, वह किसी न किसी रूप में उस नाटक को भी रोचक और रसपूर्ण तो बनाता ही है। इससे नाटक की गति बिल्कुल सीधी या एकरेखीय नहीं होती, बल्कि उसमें थोड़ा लोच, या कहें थोड़ी अलग भंगिमा उत्पन्न हो जाती है। 
इस तरह पिंकी जी, अपने बाल नाटकों में मैं किस्म-किस्म के खेल और कौतुक करता हूँ और इसमें मुझे मजा आता है। बेशक इससे नाटकों में एक अलग सा आकर्षण आ जाता है। और इसी लिए मेरे हर नाटक में एक अलग बात, एक अलग अंदाज आपको मिलेगा। इससे ये नाटक बाल पाठकों को रुचते भी हैं और इनका आकर्षण कभी कम नहीं होता।


पिंकी बिड़ला - आपके बाल नाटकों के पात्र काल्पनिक है या फिर असल जिंदगी के धरातल से लिए गए हैं?

प्रकाश मनु – इसका जवाब तो पिंकी जी, मैंने अभी-अभी दे दिया। मेरे पात्र कुछ-कुछ काल्पनिक भी हैं और जिंदगी के धरातल से भी उठाए गए हैं, दोनों चीजें एक साथ हैं। इसलिए कि मेरे नाटकों में कोई पात्र आपको ऐसा नहीं मिलेगा जो वास्तविक दुनिया से न उठाया गया हो। पर कल्पना के जरिए उनकी सूरत कुछ न कुछ बदल जाती है, बोलने और चलने का अंदाज बदल जाता है और कभी-कभी तो कुछ आदतें भी नई जुड़ जाती हैं। और ऐसा तो बहुत बार होता है पिंकी जी, कि मैंने असल जिंदगी के दो-तीन पात्रों पर गौर किया, जिनमें एक जैसी आदतें हैं, तो मैंने उन तीनों को मिलाकर एक नया पात्र बना लिया, जिसमें चेहरा किसी का आ गया, आदतें किसी की और बोलने का अंदाज किसी और का। तो यह काम तो बगैर कल्पना के हो नहीं सकता। असल जिंदगी में जो काम बड़े से बड़ा डाक्टर, सर्जन या साइंटिस्ट नहीं कर सकता, वह काम कल्पना के औजारों से मैं खेल-खेल में कर लेता हूँ। ऐसे पलों में अपनी नाट्य सृष्टि पर थोड़ा गर्व भी होता है और हँसी भी आती है। तभी तो कहा जाता है कि विधाता की जो विराट सृष्टि है, उसका मुकाबला तो कोई कर ही नहीं सकता। पर पिंकी जी, विधाता के बाद अगर इस पृथ्वी पर कोई स्रष्टा है, तो वह कवि, लेखक या साहित्यकार ही है।... 

हर बड़े साहित्यकार में यह गुण आपको मिलेगा। प्रेमचंद, टैगोर, शरत ये सब महान स्रष्टा थे। ऐसे ही जैनेंद्र, अमृतलाल नागर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, नागार्जुन—ये सब बड़े स्रष्टा हैं। मैंने तो थोड़ा-बहुत इनसे सीखा है, और जो सीखा है, उससे अपने लिखे या रचे हुए में थोड़ा-बहुत कौतुक करना मेरा शौक है। इसलिए पिंकी जी, मेरे नाटकों के पात्रों में वास्तविकता और कल्पना दोनों का सहमेल है। ऐसा शायद ही कोई पात्र हो, जो केवल काल्पनिक हो और ऐसा भी शायद ही कोई पात्र हो, जो वास्तविकता से सीधा-सीधा उठा लिया गया हो और कल्पना के सहारे मैंने उसे एक नए रूप में न ढाला हो। फिर चाहे मैंने खेल-खेल में उसके चेहरे पर कोई अलग ढंग की मूँछ-दाढ़ी ही क्यों न लगा दी हो, या फिर उसके बोलने-चालने के अंदाज में ही कोई कमाल पैदा कर दिया हो। पर ऐसा मैं करता हूँ। यह मेरा शौक भी है, खेल भी। और इससे मेरे बाल नाटकों में कोई न कोई ऐसी भंगिमा जरूर आ जाती है, जो उसे तमाम सपाट किस्म के नाटकों से अलग कर देती है।


पिंकी बिड़ला – आपका लिखा हुआ ऐसा कौन-सा बाल नाटक है, जिसके साथ आपका कोई गहरा भावनात्मक संबंध है? 

प्रकाश मनु – पिंकी जी, मेरे सभी बाल नाटक ऐसे हैं जो मेरे भीतर की गहरी उथल-पुथल से निकलकर आए हैं। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मैंने सिर्फ लिखने के लिए लिखा हो या कि एक नया नाटक लिखना है तो बस कलम उठाई और लिखना शुरू कर दिया। हर नाटक लिखने से पहले मेरे भीतर एक गहरी कशमकश चलती है और उस दौर में मैं कुछ व्यग्र, कुछ असहज सा रहता हूँ। अगर कहूँ कि यह भी मातृत्व जैसी ही कोई विकलता है, तो कुछ गलत न होगा। फिर जब पूरी आभ्यंतरिक हलचल और अंतर्मंथन के बाद नाटक लिखा जाता है और धीरे-धीरे पूरा नाटक सामने आता है, तो मेरे चेहरे पर भी शायद कुछ-कुछ वैसा ही सुकून आता होगा, जो उस नवप्रसूता माँ के चेहरे पर होता है, जो बहुत लंबी प्रसव पीड़ा के बाद अपने नवजात शिशु को देखती है तो अपने सारे दर्द और पीड़ा भूल जाती है। 

यही हालत मेरे साथ भी है, पिंकी जी। इसलिए कि मेरे बाल नाटक भी तो मेरी संतानें ही हैं, जिनके साथ मेरा बहुत गहरा भावनात्मक रिश्ता है। मैंने तो हर नाटक को बड़ी ममता से पोसा है। इसलिए कह पाना मुश्किल है कि किस नाटक से मेरा कुछ अधिक भावनात्मक संबंध है। फिर भी अगर कुछ नाटकों के नाम लेने हों तो ‘मुनमुन का छुट्टी क्लब’, ‘हमारा नंदू जिंदाबाद’, ‘झटपट सिंह, फटफट सिंह’, ‘गोलू-मोलू गप्पू खाँ’, ‘युद्ध अब कभी नहीं’, ‘नानी की कहानी’, ‘निठल्लूपुर का राजा’, ‘पप्पू बन गया दादा जी’, ‘गुड्डे की नाक’, ‘खेल-खेल में नाटक’, ‘यारो मैं करमकल्ला नहीं हूँ’, ‘सपनों का पेड़’, ‘नन्हा गुलाब पढ़ता नई किताब’ और ‘बच्चा-बच्चा माँग रहा है पंपापुर’ जैसे कुछ नाटकों का नाम लिया जा सकता है।


पिंकी बिड़ला – मनु जी, बाल नाटक लिखने के पीछे आपका उद्देश्य क्या है?

प्रकाश मनु – बाल नाटक लिखने के पीछे भी मेरा वही उद्देश्य है पिंकी जी, जो बच्चों के लिए कविता, कहानी, उपन्यास समेत बाल साहित्य की सभी विधाओं में किस्म-किस्म की रचनाएँ सिरजने के पीछे कभी स्पष्ट नजर आता है, तो कभी अदृश्य रूप में भी रहता है। मैं असल में बच्चों के लिए जो कुछ भी लिखता हूँ, उसका पहला उद्देश्य तो यही होता है कि वह बच्चों को आनंदित करे। उसे पढ़ते हुए उन्हें खुशी हो। बल्कि खुशी हलका शब्द है, उसे पढ़ते हुए उनका पूरा व्यक्तित्व पुलक जाए, और वह आनंद विभोरता उनकी आँखों, उनके मुसकराते होंठों, उनके मन और शरीर के पोर-पोर से फूट पड़े।...हालाँकि यह आनंद कोरा मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह अपनी सीमाओं से बाहर आरकर अनंत आकाश में उड़ने जैसा कोई अनुभव है। जैसे उसे पढ़ते हुए बच्चे का आत्मविस्तार हो गया हो, उसमें हर किसी का सुख-दुख समा गया हो। वह थोड़ा और अच्छा, थोड़ा और सच्चा, सहानुभूतिशील और संवेदनशील बन गया हो। जब भीतर से ऐसा आनंद उमड़ता है तो हम असल में एक अच्छे संवेदनशील इनसान होने के आनंद को महसूस कर रहे होते हैं।

जाहिर है, ऐसी रचनाएँ उपदेश भले ही न देती हों, पर खेल-खेल में बहुत कुछ सिखा देती हैं और उन्हें पढ़कर बच्चे अच्छे होने के आनंद को जान लेते हैं। ऐसा बच्चा बुराई से बचेगा, औरों को भी बचाएगा। उसकी आत्मा मानो प्रकाशित हो उठेगी। उसके हदय में हर किसी का दुख-दर्द समा जाएगा। तो जाहिर है, मेरे बाल नाटक भी बच्चों को आनंदित करते हैं। इन्हें पढ़ते हुए वे कल्पना के सहारे उड़ने का आनंद जान लेंगे। साथ ही, इस दुनिया के बहुत सारे रूप, या कहिए कि इस दुनिया के भीतर की बहुत सारी दुनियाएँ उनके आगे खुल पड़ेंगी। इससे उनके व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास होगा। ऐसा बच्चा केवल अपने स्वार्थ की बात नहीं सोचेगा, बल्कि सभी के सुख-दुख की चिंता करेगा। और अपनी बुराइयों से बचकर, दूसरों के लिए कुछ करने की भावनात्मक आर्द्रता उसके दिल में पैदा होगी। यह अलग बात है कि यह सब मेरे बाल नाटक में किसी उपदेश की शक्ल में नहीं आता। बल्कि खुद-ब-खुद उनके भीतर यह प्यार, यह करुणा या हमदर्दी उपजती है।

फिर बाल नाटक ऐसी विधा है, जिसमें कविता, कहानी, जीवनी सभी का रस किसी न किसी रूप में समाया होता है। यह अपने आप में पूरी एक जीवंत सृष्टि है। बच्चा इनमें से किसी न किसी पात्र से खुद को जोड़ लेता है और उसके हर सुख-दुख को स्वयं भोगता है। वह बड़ी गहराई से उसे महसूस करता है, और अंत में जब वह अपने नायक को तमाम कष्ट झेलने के बाद जीतते हुए देखता है, तो वह आनंद से भर उठता है। उसके जरिए सचाई की जीत का सपना और आदर्श उसके भीतर पनपता है। इससे जीवन में हर कहीं सच्चाई के साथ खड़े होने का हौसला उसके अंदर आता है, और यह एक बड़ी बात है। ऐसा बच्चा बड़ा होकर एक अच्छा और समझदार इनसान बनेगा, जो कभी किसी को सताएगा नहीं, और भरसक हर किसी के दुख-दर्द को दूर करने की कोशिश करेगा।...तो पिंकी जी, सच पूछिए तो अपने नाटकों के जरिए मैं इस दुनिया को कहीं और अच्छा और एक सुंदर दुनिया में बदलना चाहता हूँ। हाँ, मेरे हर नाटक में यह बात अपने, बिल्कुल अपने ढंग से सामने आती है। 


पिंकी बिड़ला - आपके बाल नाटकों में बाल मनोविज्ञान के दर्शन किन-किन रूपों में होते है? 

प्रकाश मनु – मेरे ज्यादातर बाल नाटकों के केंद्र में बच्चे ही हैं, इसलिए पिंकी जी, न सिर्फ उसमें बाल चरित्रों की विविधता है, बल्कि यही विविधता बाल मनोविज्ञान को लेकर भी है। अगर कुछ उदाहरण देने हों तो चलिए, मेरे बाल नाटक ‘पप्पू बन गया दादा जी’ की बात करते हैं। इसमें एक छोटा सा बच्चा पप्पू दादा जी की ऐनक पहन, हाथ मे छड़ी और अखबार लेकर सच्ची-मुच्ची दादा जी बन गया है। अब उसका पूरा व्यवहार देखिए कि उसमें बाल मनोविज्ञान कितने अनोखे रूप में सामने आता है। जब उसकी मम्मी कुछ असमंजस में पड़कर हैरान सी उसके सामने आती है तो वह जानता है कि इस समय वह पप्पू नहीं, दादा जी है। इसलिए उसकी मम्मी भी मम्मी नहीं रह जाती, बहू बन जाती है, और वह उन्हें डाँटते हुए कहता है, “क्या बहू, तुम बिल्कुल खयाल नहीं रखती हो...!” यानी पप्पू के रूप में वह मम्मी से ऐसी बात नहीं कह सकता था, पर दादा जी बनकर उसे वह सब कहने की छूट मिल जाती है, जो दादा जी होते तो कह सकते थे। ऐसी ही और भी बहुत सारी अद्भुत चीजें आपको यहाँ मिलेंगी, जिनमें एक छोटे बच्चे का मन और मनोविज्ञान प्रकट होता है। 

इसी तरह ‘यारो, मैं करमकल्ला नहीं हूँ’ में एक बच्चे डब्बू को उसके सारे दोस्त करमकल्ला कहकर चिढ़ाते हैं, और जब वह चिढ़ता है तो बच्चे और भी मौज में आकर करमकल्ला कह-कहकर मजा लेते हैं। यह बच्चों का मनोविज्ञान है कि अगर कोई किसी बात से चिढ़ता है तो मजा लेने के लिए वही बात बार-बार कहते हैं।...अब जाहिर है, कि डब्बू, जिसे करमकल्ला कहकर चिढ़ाया जा रहा है, इस कदर परेशान हो उठता है कि रोने-रोने को हो जाता है। तो उसका एक प्यारा दोस्त कुप्पू उसे सलाह देता है कि डब्बू, तुम चिढ़ो ही नहीं, बल्कि समझो कि करमकल्ला कहकर किसी और को चिढ़ाया जा रहा है। उनके साथ तुम खुद भी करमकल्ला कहकर मजा लो, तो तुम्हारी सारी मुश्किल खत्म हो जाएगी। डब्बू को बात समझ में आ जाती है। अब किसी के करमकल्ला कहने पर वह चिढ़ता नहीं है, उलटा ठठाकर हँसता है। और एक बार तो ऐसी हालत में वह करमकल्ला पर इतना मजेदार गाना बनाकर सुनाता है कि हर कोई खिलखिलाकर हँस पड़ता है। यहाँ तक कि वह अपने बनाए गाने पर खुद ही ताल दे-देकर नाचने भी लगता है। फिर तो उसे करमकल्ला कहकर चिढ़ाने वाले बच्चे इतने शरमाए कि उऩ्होंने फिर कभी उसे नहीं चिढ़ाया। 

ऐसे ही मेरा एक नाटक है, ‘गोलू मोलू गप्पू खाँ’। इसमें दोस्तों के बीच हमेशा बढ़-चढ़कर डींगें हाँकने वाला बच्चे गोलू का किस्सा है, जो खुद-ब-खुद एक मजेदार हास्य नाटक का रूप ले लेता है। ‘गुल्लू को गाना आता है’ नाटक भी ऐसा ही है। इसमें एक बच्चे गुल्लू को गाना नहीं आता। उसकी क्लास के सारे बच्चे इस बात पर उसका खूब मजाक उड़ाते हैं। कुछ रोज बाद गुल्लू ने अपने जन्मदिन पर दोस्तों को बुलाया। पर दोस्त इसी शर्त पर आने को तैयार हुए कि गुल्लू इस मौके पर उन्हें गाना सुनाएगा। अब तो बेचारा गुल्लू बहुत दुखी, परेशान और घबराया हुआ है। वह सोचता है कि मेरे दोस्त आएँगे तो उनके सामने मेरी खिल्ली न उड़े। हारकर उसने उसने खुद ही अपने जन्मदिन पर गाने के लिए एक गीत बनाया और उसे गाने का अभ्यास करने लगा। पर वह अच्छा गा नहीं पा रहा था, और इस बात से बहुत परेशान था। तभी वहाँ संगीत परी आई और उसने कहा, “अरे गुल्लू, जरा तुम ऐसे गाओ न!” गुल्लू संगीत परी का सुरीला गाना सुनता है, फिर थोड़ा सँभलकर खुद भी गाता है। परी उसकी हिम्मत बढ़ाती है और उसे फिर-फिर गाने के लिए कहती है। आखिर अभ्यास करते-करते गुल्लू अच्छा गाने लगता है। 
असल में परी शायद कहीं थी ही नहीं। हम जब किसी चीज का कड़ा अभ्यास करते हैं तो अपने भीतर से ही हमें बल मिलता है, सहारा मिलता है। इस बाल नाटक में भी गुल्लू को अंदर से जो बल, जो सहारा मिला, वही शायद इस नाटक की संगीत परी है। फिर जन्मदिन के मौके पर गुल्लू के सारे दोस्त आए। उन्होंने गुल्लू की खिल्ली उड़ाने के लिए मजे-मजे में कहा कि “अरे भाई गुल्लू, अब जरा तुम गाना तो सुनाओ।” इस पर गुल्लू ने जो सुरीला गाना सुनाया, उससे सबके मुँह खुले के खुले रह गए।...

तो पिंकी जी, यह भी एक तरह का मनोविज्ञान है कि जब हम बहुत दुखी और परेशान होते हैं तो कहीं अंदर से हमारी सोई हुई शक्तियाँ जाग जाती हैं। और फिर जो हम ठान लेते हैं, वह होकर ही रहता है।...मेरे बाल नाटकों में ऐसे बहुत उदाहरण दिए जा सकते हैं। बच्चों का डींगें हाँकने का स्वभाव, कभी किसी बात पर मन में गहरी आत्महीनता का आ जाना, बड़ों को देखकर वैसा ही करने की कोशिश...और कभी-कभी बिना बात मजा लेने के लिए दूसरे को चिढ़ाना, यह भी उनके लिए खेल ही है। ऐसे ही मेरे एक बाल नाटक ‘खेल-खेल में नाटक’ में दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो आपस में भाई-बहन हैं। वे अपना-अपना खिलौना लेकर खेल खेल रहे हैं। इस खेल-खेल में कैसे उनमें एक छोटा सा झगड़ा भी शुरू हो जाता है, और फिर लड़ते-झगड़ते कैसे वे एकाएक खिल-खिल करते हुए हँस पड़ते हैं। यह आप पढ़ लें तो छोटे बच्चों का मनोविज्ञान आपको समझ में आ जाएगा। 


पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपने बड़े सुंदर पद्य नाटक भी लिखे हैं। इन्हें पढ़ते हुए कविता का भी आनंद आता है, और नाटक का भी। आपके अन्य नाटकों से बिल्कुल अलग हैं। इन पद्य नाटकों को लिखने के पीछे कौन सी प्रेरणा या विचार आपके मन में था?

प्रकाश मनु – हाँ पिंकी जी, दूसरे नाटकों की तरह मैंने पद्य नाटक भी लिखे हैं और पूरे मन और तल्लीनता से लिखे हैं। इन्हें लिखने के पीछे मन में एक ही बात थी कि कुछ नाटक ऐसे जरूर होने चाहिए, जो एक किस्म के संगीतात्मक नाटक हों, जिसके संवादों को गाया भी जा सके। यानी इनमें कविता और नाटक दोनों का ही आनंद हो, और उनकी प्रस्तुति पूरी तरह संगीतात्मक हो। जाहिर है, इन नाटकों का मिजज दूसरे बाल नाटकों से अलग होता है, और ऐसा मेरे यहाँ भी आपको देखने को मिलेगा। इसके अलावा मेरे पद्य नाटकों की एक विशेषता की ओर आपका ध्यान जरूर गया होगा कि इनकी शुरुआत नट और नटी के बड़े ही जिज्ञासा और कौतुक भरे संवादों से होती है। इससे इन पद्य नाटकों की शुरुआत बड़ी रोचक हो गई है। नट-नटी की बातों से धीरे-धीरे नाटक की कथावस्तु खुलने लगती है, और फिर एकाएक बातों-बातों में ही नाटक शुरू हो जाता है। इससे दर्शक उत्कंठित हो उठते हैं। पात्रों के संवाद और स्वगत कथन भी ऐसे हैं कि नाटक जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, दर्शकों की उत्सुकता भी बढ़ती जाती है। अंत तक आते-आते पाठक एक साथ नाटक और कविता के रस से आनंदविभोर हो उठते हैं।
नाटकों के अंत में फिर से नट-नटी की उपस्थिति नाटक के सभी बिखरे तारों को जोड़ देती है, और नाटक का अंत पाठकों को पूरी तरह अपने साथ बहा ले जाता है। एक क्षण के लिए भी उनका ध्यान इधर-उधर नहीं जाता। ‘नानी की कहानी’, ‘थोड़ी चुस्ती, थोड़ी फुर्ती’, ‘फिसफिस भाई, सेहत बनाओ’, ‘नन्हा गुलाब पढ़ता नई किताब’ और ‘बच्चा-बच्चा माँग रहा है पंपापुर’ मेरे ऐसे पद्य नाटक हैं जिन्हें लिखने में मुझे बहुत आनंद आया। बल्कि कहना चाहिए, इनमें हर पद्य नाटक का मिजाज कुछ अलग सा है, पर बड़ी स्वाभाविक नाटकीयता, कौतुक और तेज गति उनमें है। बीच-बीच में अन्य पात्रों का काव्यमय नाटकीय हस्तक्षेप भी इन पद्य नाटकों में जान डाल देता है। इसलिए उनका आकर्षण पाठकों को अंत तक बाँधे रखता है। यही कारण है कि अपने पद्य नाटकों से मुझे बड़ा सृजनात्मक आनंद और संतोष मिला है। मेरा मन है कि कुछ सुंदर, लयात्मक और भावपूर्ण पद्य नाटक और लिखे जाएँ। तब हो सकता है मेरे पद्य नाटकों की कोई अलग पुस्तक भी सामने आए।


पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपने पंचतंत्र की कहानियों का भी बड़ा सुंदर नाट्य रूपांतरण किया है। पंचतंत्र की कहानियों का इस तरह कलात्मक ढंग से नाट्य रूपांतरण किया जाए, यह विचार आपके मन में कैसे आया?

प्रकाश मनु – ऐसा है पिंकी जी, भारत के जिस महान कथा साहित्य ने सारी दुनिया को प्रभावित किया, उसमें पंचतंत्र की कहानियाँ भी हैं, जो हर बच्चे-बड़े के मन में बसी हैं। तो सबसे पहले तो पंचतंत्र की कहानियों को रुचिकर ढंग में आज के बाल पाठकों के आगे प्रस्तुत करने का विचार मेरे मन में आया। मैंने बड़े उत्साह से यह कार्य किया। बच्चों के लिए लिखी गई पंचतंत्र की ये कथाएँ एक सुंदर पुस्तक के रूप में सामने आईं। पुस्तक का नाम था, ‘बच्चों का पंचतंत्र’। इससे पंचतंत्र की कथाओं को एक बार फिर से ध्यान से पढ़ने का अवसर मुझे मिला, और उसमें जो नाटकीय तत्त्व है, उसने मुझे काफी आकर्षित किया। यही कारण है कि मेरी पुस्तक ‘बच्चों का पंचतंत्र’ छपी तो मैंने तय किया कि इसका नाट्य रूपांतरण भी किया जाए। डायमंड बुक्स के भाई नरेंद्र जी बड़े उत्साही प्रकाशक हैं। मैंने उनसे कहा तो वे खुशी-खुशी तैयार हो गए। इसके बाद मैंने नाटक लिखने शुरू किए तो इतना आनंद आया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हाँ, इन नाटकों को आज के बच्चों से जोड़ना भी जरूरी था। दूसरी ओर जिस परिवेश की वे कथाएँ थीं, उसमें भी कोई अनावश्क छेड़छाड़ न हो, यह जरूरी था। तो फिर क्या किया जाए?

आखिर मैंने एक रास्ता निकाला। एक बड़ी नेक और भली-भली सी, खुशदिल हवा दीदी की रचना की, जो बच्चों से बेहद प्यार करती है। पंचतंत्र के हर नाट्य रूपांतरण में वह मौजूद हैं। बल्कि पंचतंत्र के हर नाटक की शुरुआत उसी से होती है। पंचतंत्र की कथाओं का नाट्य रूपांतरण करते हुए, हरेक नाटक के प्रारंभ में एक दृश्य मैंने यह डाला कि जंगल से हवा दीदी चली आ रही है। वह कोई ऐसा अद्भुत नाटक देखकर आई है, जिसे बताने के लिए बहुत अधिक उत्सुक है। एक जगह कुछ बच्चे खेल रहे हैं। हवा दीदी को देखकर बच्चों को लगता है कि शायद वह कुछ कहना चाहती है। तो बच्चे पूछते हैं, “क्या हुआ, हवा दीदी, तुम कहाँ से आ रही हो?” इस पर हवा दीदी बड़े रोचक ढंग से जंगल में हो रहे एक बड़े भव्य बाल नाटक की चर्चा करती है, जिसे हाथी दादा करवा रहे थे। सुनकर स्वाभाविक रूप से बच्चे भी उस नाटक के बारे में जानने को उत्सुक हो उठते हैं। वे पूछते हैं कि “उस नाटक में क्या दिखाया गया था हवा दीदी?” इस पर हवा दीदी का जवाब मिलता है, “लो, तुम खुद ही देख लो।” और फिर हवा दीदी जो नाटक जंगल में देखकर आई है, वह एकाएक बच्चों के आगे चल पड़ता है।...

नाटक के अंत में फिर से हवा दीदी और बच्चों का संवाद है। हवा दीदी बच्चों से पूछती है कि तुम्हें कैसा लगा नाटक? इस पर सब बच्चे उमगकर अपने-अपने ढंग से जवाब देते हैं। वे नाटक की खूबियों की चर्चा करते हैं, और उससे उन्होंने क्या सीखा, यह भी बताते हैं। और आखिर में हवा दीदी का खुशी और आनंद से भरा सुंदर संवाद है, जिसके साथ ही वह बच्चों से विदा लेती है। बच्चों की बुद्धिमत्ता और समझदारी की खूब प्रशंसा करते हुए, वह कल फिर आने के वादे के साथ प्रस्थान करती है। इससे ये नाटक आज के बच्चों और परिवेश से सीधे-सीधे जुड़ जाते हैं, और उनमें एक अलग सा आकर्षण भी आ गया है। पंचतंत्र की कथाओं पर आधारित मेरे बाल नाटकों की यह पुस्तक ‘पंचतंत्र के अनोखे नाटक’ शीर्षक से बड़े सुंदर कलेवर में छपी है।


पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपने अपनी बहुत सी कहानियों को भी नाटक के रूप में बदला है। इसकी जरूरत आपको क्यों पड़ी? 

प्रकाश मनु – ऐसा है पिंकी जी, जब मुझे नाटक लिखने के लिए कहा गया तो सबसे पहले मेरी दृष्टि अपनी लिखी बाल कहानियों पर गई, जिनमें कई कहानियों में बड़ा जबरदस्त नाट्य तत्त्व था। मुझे लगा कि अगर इन कहानियों का नाट्य रूपांतरण हो, तो यह बहुतों को आकर्षित करेगा। बल्कि कहानियों की तुलना में इन पर लिखे गए नाटक कहीं अधिक प्रभावशाली साबित होंगे। फिर जब मैंने इन कहानियों का नाट्य रूपांतरण किया तो सचमुच बहुत मजा आया। इसलिए कि नाटक अलग चीज है, कहानी अलग। दोनों की संरचना ही नहीं, रचनात्मक जरूरतें भी अलग-अलग थीं। इसलिए अपनी इन कहानियों को मैंने नाटक का रूप दिया तो उनमें बिल्कुल अलग ढंग के कौतुक भरे संवाद तो जुड़ने ही थे। साथ ही बहुत से पात्रों का रूप बदला, बल्कि कुछ का तो कायाकल्प ही हो गया। बहुत से नए पात्र भी जुड़े। बहुत सी नई-नई नाटकीय घटनाएँ और वृत्तांत भी जुड़े। बल्कि कहीं-कहीं तो पात्र इस कदर बदल गए और नाटक की कथावस्तु कहानी से इतनी भिन्न हो गई कि न सिर्फ पात्रों के नाम, बल्कि नाटक का शीर्षक भी कुछ और हो गया। यह सब इसलिए करना पड़ा कि मेरे मन में यह बात साफ थी कि नाटक में जो कुछ भी आए, वह नाटक की शर्तों पर ही आना चाहिए। यानी जब मैं नाटक लिखूँ तो कहानी पीछे चली जाए, और उसका नया नाट्य रूप ही उभरकर सामने आए।

इस लिहाज से मैंने अपनी कुछ कहानियों का नाट्य रूपांतरण किया, तो बड़ा ही प्रीतिकर अनुभव हुआ। तब कुछ अन्य कहानियों पर भी नजर गई और उनकी नाटकीय संभावनाओं पर भी मैंने गौर किया। फिर कुछ और कहानियों का भी नाट्य रूपांतरण हुआ। हालाँकि इसमें मैंने पूरी छूट ली कि वे पात्र और स्थितियाँ नाटक का रूप लें, तो नाटक की संरचना और जरूरत के मुताबिक ही ढल जाएँ। लिहाजा इसमें कल्पना का इतना सहारा लिया गया कि ज्यादातर नाटक कहानियों से बहुत दूर चले गए। उनका यह नया रूप मुझे मोहक लगता है, बल्कि कई बार तो मूल कहानियों से भी ये नाटक कहीं अधिक सफल और जानदार लगते हैं। उदाहरण के लिए अपने एक हास्यपूर्ण नाटक ‘निठल्लूपुर का राजा’ की बात करूँ. तो वह ऐसा ही है। यह मेरा अत्यंत प्रिय बाल नाटक है, और मूल कहानी की तुलना में कहीं अधिक जोरदार है। फिर पूरे नाटक में हास्यपूर्ण स्थितियाँ तो कमाल की हैं। कहानी इसकी तुलना में कहीं पीछे रह जाती है। ऐसे ही ‘खेल-खेल में नाटक’, ‘यारो मैं करमकल्ला नहीं हूँ’, ‘झटपट सिंह फटपट सिंह’, ‘टुनटुनिया राज्य का सबसे अक्लमंद आदमी’, ‘हँसी पूप्सी हा-हा-हा’ तथा ‘युद्ध अब कभी नहीं’ समेत और भी कई नाटक हैं। 

इसी तरह कुछ बाल कविताओं पर आधारित पद्य नाटक भी लिखे गए। पर वे भी रूपांतरण की प्रकिया में मूल काव्य से इतनी दूर चले गए कि एक स्वतंत्र सृष्टि आप उन्हें कह सकते हैं। ‘नानी की कहानी’, ‘थोड़ी चुस्ती, थोड़ी फुर्ती’, ‘फिसफिस भाई, सेहत बनाओ’, ‘नन्हा गुलाब पढ़ता नई किताब’ और ‘बच्चा-बच्चा माँग रहा है पंपापुर’ मेरे ऐसे ही पद्य नाटक हैं। पर मुझे खुशी है पिंकी जी, कि इस बहाने अपनी कहानियों और कविताओँ के नाट्य तत्त्व पर मेरा ध्यान गया, जिसे पहले भी देखा और परखा तो था, पर अपनी कहानी और कविताओं को रूपांतरित कर, स्वतंत्र नाटक भी लिखे जा सकते हैं, यह खुद मेरे लिए एक अचरज भरा अनुभव था, जिसे याद करके आज भी मैं आनंद से भर उठता हूँ।


पिंकी बिड़ला – आपने इतने सुंदर बाल नाटक लिखे। कभी आपके मन में किसी नाटक के निर्देशन का खयाल नहीं आया...? 

प्रकाश मनु – ऐसा है पिंकी जी कि कोई बाल नाटक लिखते हुए मैं नाटककार भी होता हूँ और नाट्य निर्देशक भी। क्योंकि यह चीज भी बराबर मेरे मन में चल रही होती है कि अगर इसे मंचित किया जाए तो किस ढंग से, कैसा प्रभाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए निर्देशक होने का मेरा सपना भी साथ ही पूरा हो जाता है। वैसे मैंने आपको बताया ही है कि सन् 1980-81 में जब मैं आर्य कॉलेज, पानीपत में प्राध्यापक था, तब मेरी पत्नी डा सुनीता एक स्कूल में पढ़ाती थीं। उस स्कूल के वार्षिक समारोह के दौरान उन्होंने एक बाल नाटक का मंचन किया था। वेद राही जी के लिखे इस बाल नाटक का नाम है, ‘झूठ का अलार्म’। मैंने भी इसमें उनकी काफी मदद की थी। एक तरह से हम दोनों का यह सह-निर्देशन ही था। मैंने इस नाट्य प्रस्तुति में बच्चों को संवाद बोलने का अभ्यास कराया तथा मंच-सज्जा आदि में भी बड़ी सकियता से सहयोग किया था। इसी तरह मैं आर्य कॉलेज, पानीपत में था, तो कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के यूथ फैस्टीवल के लिए हरिशंकर परसाई जी का नाटक ‘भोलाराम का जीव’ मैंने करवाया था। उसे खूब सराहा गया। बाद में हमारे कॉलेज में भी वह खेला गया, और उसे खूब प्रशंसा मिली।

ऐसे ही मैं डी.ए.वी. कॉलेज, मलोट में पढ़ाता था तो वहाँ भी मैंने अपने मित्र प्राध्यापक प्रेम मेहता जी के साथ मिलकर, धर्मवीर भारती जी के एक नाटक की तैयारी करवाई थी। इसी तरह अभी कुछ अरसा पहले हिंदी अकादमी द्वारा आयोजित एक भव्य नाट्य समारोह में मेरी कहानी ‘भटकती जिंदगी का नाटक’ का नाट्य रूपांतरण हुआ तो उसकी रिहर्सल देखने मैं भी पहुँचा। उसमें कुछ कलाकारों ने नाट्य स्थितियों के मुताबिक, संवादों के बीच-बीच में मेरी लिखी कुछ कविताओं के अंश भी पढ़े, पर उनके काव्य-पाठ में इतना कच्चापन था कि मुझे बहुत दुख हुआ। तब नाटक की निर्देशक मीता जी के कहने पर मैंने उन कलाकारों को कविता पढ़ने का सही ढंग सिखाया, जिसमें सही उतार-चढाव के साथ-साथ, बीच में आने वाले अंतराल भी कितने जरूरी है, यह चीज समझाई। नाटक में अभिनय कर रहे कलाकारों ने इस बात को समझा, महसूस किया, और बार-बार सही ढंग से कविता पढ़ने का अभ्यास भी किया। इसमें मैंने उनकी काफी मदद की, और लगभग पूरे दिन उनके साथ बैठकर मेहनत की। बाद में यह नाटक मंचित हुआ, तो खचाखच भरे उस सभागार में बैठे दर्शकों ने इसे बहुत पसंद किया। 
नाटक की समाप्ति पर, मंच पर आकर इसकी निर्देशक माता मिश्र और सभी कलाकारों ने नाट्य प्रस्तुति में मेरे इस योगदान की बहुत भावुक होकर चर्चा की, और कृतज्ञता प्रकट की। साथ ही मंच पर मेरा यथेष्ट सम्मान भी किया।...यह भी मेरे जीवन का एक यादगार अनुभव था, और इसे आप निर्देशन से जुड़ा अनुभव भी कह सकती हैं। और अब तो पिंकी जी, इतनी अवस्था हो गई है कि मैं स्वयं किसी नाटक का निर्देशन करूँ, यह मेरे लिए संभव नहीं है। हाँ, अगर कोई चाहे तो उसके लिए सलाह मैं दे सकता हूँ, और मुझे इसमें खुशी ही होगी।


पिंकी बिड़ला - आपके रचना-संसार में जैसी सरलता विद्यमान है, वैसी अन्य कहीं देखने को नहीं मिलती। क्या आपने कभी सोचा कि यह कहाँ से आई? या कि इस दृष्टि से आपके लेखन पर किसका प्रभाव पड़ा? 

प्रकाश मनु – पिंकी जी, यह बात आपने बिल्कुल ठीक कही कि मेरे रचना-संसार में एक तरह की सरलता है, एक किस्म का भोलापन भी है। यह बात औरों ने भी नोट की, और कहा भी है। खुद मैं भी जब अपने बाल साहित्य और दूसरे साहित्यकारों के लिखे साहित्य की तुलना करता हूँ तो यह बात मेरे ध्यान में आती है। खासकर जिन्हें खल पात्र कहते हैं, बहुत दुष्ट और खराब किस्म के पात्र, वे आपको मेरे लिखे साहित्य में बहुत कम मिलेंगे। उँगलियों पर गिनने लायक, और उनको भी मैं बहुत ज्यादा बुरा नहीं दर्शा पाता। जल्दी ही कुछ ऐसा होता है कि वे अपनी गलती मानकर अच्छाई की ओर आ जाते हैं। आप कह सकती हैं कि खल पात्रों का सृजन कैसे किया जाता है, मैं जानता ही नहीं। हाँ, अच्छे पात्रों का सृजन कैसे किया जाता है, यह मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ, और आपको मेरे यहाँ कई अलग-अलग तरह की विशेषताओं वाले अच्छे और भले लोग मिलेंगे, जिनकी एक अलग सुवास आप महसूस करेंगी। 

यों भी अगर वास्तविक जीवन में देखें तो किसी भी क्षेत्र में आपको जितने भी बड़े लोग मिलेंगे, वे बच्चों से भी अधिक सीधे-सरल होंगे। उनसे मिलकर आपको हैरानी होगी कि अरे, ये सारे लोग तो दुनियादारी से दूर, बिल्कुल अपने काम में डूबे हुए हैं। असल में जितने आप बड़े होते जाते हैं, उतने ही खुद-ब-खुद सीधे-सरल होते जाते हैं। आपका काम ही आपकी तपस्या बन जाता है। यह मुझे नियति या प्रकृति का ही कोई कमाल लगता है।...पर पिंकी जी, अगर मेरे बाल नाटकों में कुछ ऐसी विशेषता आई है, तो इस पर किसी और का नहीं, मेरे खयाल से, खुद मेरे बचपन का असर है। असल में बचपन में मैं इतना सीधा-सरल था कि किसी को दुख देना तो दूर, यह सोच भी नहीं सकता था कि मेरे कारण किसी को कोई कष्ट पहुँचे। मेरे कारण किसी को जाने-अनजाने कोई कष्ट पहुँचा, यह सोचकर ही मैं रोने लगता था। आँखें आँसुओं से भर जाती थीं। अपने सुख के लिए किसी को जरा सा भी कष्ट दूँ, यह मुझे गवारा न था।...

मैं बचपन से ही एक बात लगातार सोचा करता था कि हे भगवान, इस दुनिया में पहले ही इतने कष्ट हैं, तो लोग एक-दूसरे को परेशान करके बिना वजह ये कष्ट और क्यों बढ़ा देते हैं, और इससे इन्हें मिलता क्या है? तो अपने तईं मैं सोचता था कि यह दुनिया जैसी भी है, काश, उससे कहीं अधिक अच्छी और सुंदर हो जाए!...और पिंकी जी, आज भी मेरा सबसे बड़ा सपना यही है कि कैसे यह दुनिया थोड़ी और अच्छी, थोड़ी और सुंदर हो जाए। और इस बात का जवाब तो मुझे आज तक नहीं मिला पिंकी जी, कि लोग बिना बात दूसरों को सताते क्यों हैं, कष्ट क्यों पहुँचाते हैं और इससे उन्हें मिलता क्या है? मैंने बहुत सोचा, पर आज भी मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया। 


पिंकी बिड़ला – मनु जी, आपने कोई बीस वर्ष लगाकर बाल साहित्य का इतिहास लिखा। इसकी प्रेरणा आपको कहाँ से मिली...?

प्रकाश मनु – पिंकी जी, मैंने सन् 1990 के आसपास बाल साहित्य आलोचना का काम शुरू कर दिया था। उन दिनों ‘नंदन’ के संपादक जयप्रकाश भारती जी से मेरी बात होती थी तो वे एक बात बार-बार कहते थे कि “चंदप्रकाश जी, जिस साहित्य में बड़े संदर्भ ग्रंथ न हों, उसे कभी सम्मान नहीं मिल पाता। इस लिहाज से हिंदी बाल साहित्य में बहुत काम करने की जरूरत है, पर ज्यादातर लेखक कविता, कहानी लिखकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। इसलिए कि यह आसान है...और कोई बड़ा जिम्मा उठाने से सब बचते हैं।” 

तभी उन्होंने सेवक जी की सराहना करते हुए उनका इतिहास-ग्रंथ ‘हिंदी बालगीत: समीक्षा और इतिहास’ मुझे थमाया, और कहा कि ‘चंद्रप्रकाश जी, हिंदी बाल कविता में बहुत बड़ा काम सेवक जी ने किया है, पर अभी बहुत काम करने की दरकार है।” मैंने देखा, हिंदी कविता की आलोचना और इतिहास पर सेवक जी ने सचमुच बड़ा काम किया है। मैं उनका मुरीद हो गया, पर कहीं न कहीं मैं उनके काम से असंतुष्ट भी था। इसलिए कि कोई लेखक बहुत महत्वपूर्ण हो या एकदम साधारण, उनका तरीका यह था कि वे उसके बारे में दस-बीस परिचयात्मक पंक्तियाँ लिखते और फिर उसकी एक कविता भी उद्धृत कर देते थे। मुझे लगा, यह तो इतिहास लेखन का बड़ा यांत्रिक तरीका है, तो यह ठीक नहीं है। हर कालखंड की कविता में कुछ बड़े और प्रतिनिधि कवि होते हैं। हमें उन्हें केंद्र में रखकर बात करनी चाहिए। फिर उस दौर के अन्य कवियों के बारे में थोड़ा-थोड़ा बता देना चाहिए। और जो एकदम गौण कवि हैं, उनका तो केवल जिक ही काफी है।

तो एक चुनौती मेरे मन में उत्पन्न हुई कि मैं अपने ढंग से हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखूँगा। कहीं अधिक व्यवस्थित इतिहास, जिसमें हर कालखंड के महत्त्वपूर्ण कवि और उनकी सर्वाधिक प्रमुख रचनाओं की बड़ी प्रमुखता से चर्चा हो। साथ ही हिंदी बाल कविता की पूरी विकास-यात्रा भी सामने आए। मैंने इस पर बहुत काम किया और सन् 2003 में मेरा लिखा ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ प्रकाशित हुआ, जो कि हिंदी बाल कविता का पहला व्यवस्थित इतिहास है, जिसके पीछे सच ही एक इतिहास-दृष्टि या इतिहास-चेतना है। 

हिंदी बाल कविता का इतिहास सामने आया तो उसकी बहुत प्रशंसा हुई। पूरे देश भर के साहित्यकारों के सराहना भरे पत्र मेरे पास आए। तभी मेरे कुछ अनन्य मित्रों और बाल साहित्यकारों ने आगह किया कि मैं समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखूँ। मुझे भी कहीं अंदर से लग रहा था कि यह एक चुनौती अब मेरे सामने है। मैंने अपने आप से पूछा, “क्या तुम यह कर सकते हो, प्रकाश मनु?” भीतर से आवाज आई कि “हाँ, मैं कर सकता हूँ!” और फिर मैंने दिन नहीं देखा, रात नहीं देखी, बस इस भगीरथ प्रयत्न में जुट गया। कोई बीस-बाईस बरस तक निरंतर यह तपस्या चलती रही। रास्ते में कितनी मुश्किलें, कितनी कठिनाइयाँ आईं, कितने दारुण कष्ट मुझे सहने पड़े, बताना मुश्किल है। काम बड़ा था, जैसे मैंने अपने कंधों पर एक समूचा पहाड़ उठा लिया हो।...

इस इतिहास-ग्रंथ के लिए मुझे बाल साहित्य की सैकड़ों पुस्तकों की दरकार थी। तो मुझे दो-ढाई लाख रुपए मूल्य की पुस्तकें खरीदनी पड़ीं, क्योंकि जो इतिहास लिखना था, वह कोरी कल्पना से तो नहीं लिखा जा सकता था। बाल साहित्य की पुस्तकों के आधार पर ही लिखना था। प्रकाशकों से मैं जिस सहयोग की अपेक्षा कर रहा था, वह मुझे मिला नहीं।...तो होता यह कि जहाँ भी पुस्तक प्रदर्शनी लगी होती, मैं वहाँ से पुस्तकें खरीदकर लाता। मेरी आधी तनखा इसी में चली जाती थी। पर मेरी पत्नी सुनीता बहुत अच्छी हैं। बच्चे भी जानते हैं कि हमारे पापा जिद्दी हैं। जो सपना है, उसे पूरा किए बिना उन्हें चैन नहीं मिलेगा। तो एक तरह से जो घर और बच्चों की जरूरतें थीं, उनमें से पैसे काटकर मैं किताबें खरीद रहा था। फिर जो सज्जन मेरे लिखे हुए को कंपोज करते थे, वे बाद में उसका प्रिंट निकालते थे। उसे मैं खूब काट-छाँटकर सुधारता। और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता। बरसोंबरस तक।
इस तरह अनगिनत प्रिंट लिए गए। अनगिनत बार संपादन हुआ, सामग्री को फिर-फिर काटा-तराशा, बदला गया और सँवारा गया। यह एक अहर्निश तप था। पर आखिर मेरा वह तप पूरा हुआ।...हालाँकि पिंकी जी, सच बताऊँ तो मुझे अब भी यकीन नहीं है कि यह काम मैंने किया है। मेरा मानना है कि मेरे मित्रों, साथी लेखकों, परिवारीजनों, सबका साथ मिला, तभी यह बड़ा भारी और ऐतिहासिक महत्त्व का काम हो सका। और सबसे बढ़कर तो शायद ईश्वर ही चाहता था कि मैं यह काम करूँ, तो उसी ने मुझे प्रेरणा दी, बल दिया और अंततः यह महत् कार्य मुझसे करा लिया। वरना मैं तो एक साधारण सा व्यक्ति हूँ। इतना पहाड़ जैसा बोझा भला कैसे सँभाल सकता था? इस ऐतिहासिक कार्य का श्रेय मैं सभी लेखकों को देता हूँ, जिनकी सद्भावनाएँ मेरे साथ थीं। साथ ही उऩ्हें मुझ पर पूरा भरोसा भी था। इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तकें तो दीं ही, पूरा सहयोग भी किया। बाल साहित्य के प्रारंभिक दौर के बहुत से दुर्लभ ग्रंथों की जानकारी मेरे कई साहित्यिक मित्रों ने मुझे दी। इस सबके बिना मैं कुछ नहीं कर सकता था।

और इतिहास पूरा हुआ तो मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि मैं सैकड़ों बाल साहित्यकारों के इस सपने को पूरा कर सका कि हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखा जाना चाहिए। सब चाहते थे कि यह इतिहास लिखा जाए। पर सवाल था कि लिखे कौन? हालाँकि किसी न किसी को तो लिखना ही था, नहीं तो अनगिनत बाल साहित्यकारों का यह सपना कैसे पूरा होता? इस बड़े और ऐतिहासिक महत्त्व के काम में मैं निमित्त बना, इसके लिए मैं फिर से सभी साहित्यिक मित्रों और शुभचिंतकों के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। 


पिंकी बिड़ला – मनु जी, एक अच्छे लेखक की आप के मन में क्या छवि है? 

प्रकाश मनु – पिंकी जी, मेरे मन में अच्छे लेखक की जो छवि है, वह तो बड़ी भव्य है। मुझे इस दुनिया में लेखक से बड़ा कोई और नहीं लगता, क्योंकि ईश्वर की तरह वह भी स्रष्टा है। भले ही उसकी सृष्टि कल्पना पर आधारित हो, पर वह कल्पना भी बिना वास्तविकता के तो नहीं ही है। और कहीं न कहीं जीवन यथार्थ की छाया उसमें आती है।...फिर लेखक इतना संवेदनशील प्राणी है और उसकी आत्मा इतनी सरल और निर्मल होती है, कि मुझे लगता है सारी दुनिया का सुख-दुख उसके भीतर समा गया है। किसी छोटे से छोटे, दुर्बल और गरीब इनसान का दर्द भी वह महसूस करता है, अपने शब्दों में प्रकट करता हैं और उसके लिए बहुतों से लड़ता भी है। इसलिए प्रेमचद हों, निराला हों, मुक्तिबोध हों, अमृतलाल नागर हों, या फिर बंकिम, टैगोर और शरत हों, ये मुझे सिर्फ लेखक ही नहीं लगते। बल्कि सच पूछिए तो ये मेरे भगवान हैं, जिनके चरणों में बैठकर मुझे सुख मिलता है। इसीलिए हो सकता है कि दुनिया के किसी बड़े से बड़े और ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष के आगे मेरा सिर न झुके, पर लेखक—कोई सच्चा लेखक अगर मेरे सामने हो तो मन होता है कि मैं आदर से उसे प्रणाम करूँ और देर तक उसके चरणों में बैठा रहूँ। उन क्षणों में लगता है, जैसे मेरे दिल को ठंडक पड़ रही है। 

मुझे जिन बड़े और दिग्गज साहित्यकारों का सान्निध्य मिला, वे ऐसे ही आदर्श किस्म के व्यक्ति थे। इनमें मेरे गुरु देवेंद्र सत्यार्थी बहुत बड़ी शख्सियत थे। इसी तरह रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, विष्णु खरे, रामदरश मिश्र जैसे बड़े लेखकों का सामीप्य, प्यार और आत्मीयता मुझे मिली। यों मैं खुद को एक छोटा सा लेखक ही मानता हूँ, पर बड़े से बड़े उस्तादों के चरणों में बैठकर कुछ सीखने का अवसर मुझे मिला है। इसका कुछ असर शायद मेरे व्यक्तित्व पर भी पड़ा है। इसीलिए बहुत नाम हो जाए, बहुत पुरस्कार मिलें और यह सब मुझे मिल जाए, वह सब मिल जाए, ऐसी आकांक्षा कभी नहीं रही। चुपचाप अपना काम करने में जो सुख मुझे मिलता है, वह किसी और चीज से नहीं मिलता। 


पिंकी बिड़ला - एक लेखक के रूप में आपका सबसे बड़ा सपना...? 

प्रकाश मनु – पिंकी जी, एक लेखक के रूप में मेरा सबसे बड़ा सपना यह है कि यह दुनिया जैसी है, उससे थोड़ी अच्छी, थोड़ी सुंदर और संवेदनशील हो जाए। पचास बरसों का मेरा शब्द-तप इसी के लिए था। और खुली आँखों से इसी सपने को देखता हुआ, एक दिन मैं इस दुनिया से चला जाऊँगा। हालाँकि मैं कितना कर पाया या नहीं कर पाया, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। हाँ, पर बहुत से लोग जिन्होंने मुझे पढ़ा है, इनमें बच्चे भी हैं, जब आनंद से भरकर या भावुक होकर मेरी किसी रचना की चर्चा करते हैं, जिसने उन्हें अंदर तक छुआ और विभोर कर दिया, तो मुझे अच्छा लगता है। लगता है, दुनिया बदलने का जो मेरा सपना था, उसकी कुछ शुरुआत तो हुई। दुनिया कितनी बदल सकी या नहीं, यह दीगर बात है।...


पिंकी बिड़ला – आपने प्रचुर मात्रा में लिखा है, आप क्या और लिखना चाहते हैं...? 

प्रकाश मनु – पिंकी जी, मुझे तो लिखना प्रिय है। कितना लिखा, कितना नहीं, यह बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है कि मेरे अंदर लिखने की कितनी प्यास, कितनी तड़प अभी बाकी है। मैं अपने अंदर झाँकता हूँ तो लगता है अभी तो मैंने शुरुआत ही की है, अभी तो यह लिखना है, वह लिखना है, वह-वह लिखना है।...मैं जानता हूँ कि मैं अब बूढ़ा हो चुका हूँ। मेरी शक्तियाँ अब चुकने लगी हैं, पर लिखने की तड़प अभी कम नहीं हुई। मुझे हरदम लगता है कि मैं लिखूँ, लिखूँ, रात-दिन बस लिखता ही रहूँ, और लिखते-पढ़ते हुए ही मेरे प्राण निकलें। मैं अपने जीवन की आखिरी साँस तक लिखता-पढ़ता रहूँ, इससे बड़ा मेरा कोई सपना नहीं है।...

और आपको बताऊँ, बाल साहित्य लिखते हुए मुझे कोई पचास बरस होने को आए। पर अब भी बच्चों के लिए कुछ लिखना होता है तो मेरा मन अंदर से बहुत डरा-डरा सा होता है। मेरा पूरा वजूद काँप रहा होता है कि जो लिखूँगा, वह कुछ बन भी पाएगा या नहीं। और जब रचना पूरी होती है तो चेहरे पर इतनी तसल्ली आ जाती है कि मैं आपको बता नहीं सकता। आज भी जो कुछ लिखता हूँ, उसे निरंकारदेव सेवक जी, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे बाल साहित्य के बड़े दिग्गजों, जिन्हें मैं बाल साहित्य के भगवान कहता हूँ—के चरणों में रख देता हूँ। और जब कहीं अंदर से मेरा मन कहता है कि उन्होंने स्वीकार कर लिया है, तो लगता है, हाँ मेरा श्रम सार्थक हुआ।...
इस मामले में मैं आज भी किसी नवोदित लेखक की तरह ही हूँ और मानता हूँ कि हर रचना लेखक के लिए एक अलग चुनौती लेकर आती है। उसे लिखकर अगर आपको ही पूरी तसल्ली नहीं हुई, तो फिर चाहे उसकी जितनी तारीफ हो, वह बेकार है। इसलिए कोई लेखक नया हो या पुराना, उसे हर क्षण खुद को तपाए और जगाए रखना होता है। इसके लिए आसपास के जीवन को खुली दृष्टि से देखना तो जरूरी है ही, पर इसके साथ ही आपके समकालीन तीन या चार पीढ़ियों के लेखक जो लिख रहे हैं, उसे भी पूरी सतर्कता से पढ़ना-परखना जरूरी है। इससे आपको अपनी सामर्थ्य और कमजोरियाँ दोनों का पता चलता है और आपका तप निरंतर चलता रहता है। इसी तरह दिग्गज साहित्यकारों के रचना-संसार से बार-बार गुजरते रहना भी आपको अंदर-बाहर से माँजता है। इसलिए कि अगर आप उन्हें नहीं पढ़ते तो आपकी लेखनी में तो कच्चापन होगा ही, एक लेखक के रूप में आपकी तपस्या भी अधूरी ही रहेगी।

तो आप कह सकती हैं पिंकी जी, कि मेरा यह साहित्य तप अब भी अविरत जारी है और मैं चाहता हूँ कि जब तक मेरी साँसें बाकी हैं, यह तप अनवरत जारी रहे और मैं लिखता रहूँ। बस, लिखता और पढ़ता ही रहूँ। इसके अलावा मैं कुछ और सोचता नहीं हूँ, और शायद चाहता भी नहीं हूँ।
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परिचय: प्रकाश मनु
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक। मूल नाम: चंद्रप्रकाश विग।
जन्म: 12 मई, 1950 को शिकोहाबाद, उत्तर प्रदेश में।
शिक्षा: आगरा कॉलेज, आगरा से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. (1973)। फिर साहित्यिक रुझान के कारण जीवन का ताना-बाना ही बदल गया। 1975 में हिंदी साहित्य में एम.ए.। 1980 में यू.जी.सी. के फेलोशिप के तहत कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ‘छायावाद एवं परवर्ती काव्य में सौंदर्यानुभूति’ विषय पर शोध संपन्न। कुछ वर्ष प्राध्यापक रहे। लगभग ढाई दशकों तक बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे। अब स्वतंत्र लेखन। प्रसिद्ध साहित्यकारों के संस्मरण, आत्मकथा तथा बाल साहित्य से जुड़ी कुछ बड़ी योजनाओं पर काम कर रहे हैं।
उपन्यास: यह जो दिल्ली है, कथा सर्कस, पापा के जाने के बाद।
कहानियाँ: अंकल को विश नहीं करोगे, सुकरात मेरे शहर में, अरुंधती उदास है, जिंदगीनामा एक जीनियस का, तुम कहाँ हो नवीन भाई, मिसेज मजूमदार, मिनी बस, दिलावर खड़ा है, मेरी श्रेष्ठ कहानियाँ, मेरी इकतीस कहानियाँ, 21 श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रकाश मनु की लोकप्रिय कहानियाँ, मेरी कथायात्रा: प्रकाश मनु, तुम याद आओगे लीलाराम, भटकती जिंदगी का नाटक।
कविता: एक और प्रार्थना, छूटता हुआ घर, कविता और कविता के बीच।
जीवनी: जो खुद कसौटी बन गए
आत्मकथा: मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ, मैं मनु।
हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों के लंबे, अनौपचारिक इंटरव्यूज की किताब ‘मुलाकात’ बहुचर्चित रही। ‘यादों का कारवाँ’ में हिंदी के शीर्ष साहित्कारों के संस्मरण। देवेंद्र सत्यार्थी, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र तथा विष्णु खरे के व्यक्तित्व और साहित्यिक अवदान पर गंभीर मूल्यांकनपरक पुस्तकें। साहित्य अकादेमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ। सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी ‘देवेंद्र सत्यार्थी: एक सफरनामा’ प्रकाशन विभाग से प्रकाशित। इसके अलावा ‘बीसवीं शताब्दी के अंत में उपन्यास: एक पाठक के नोट्स’ आलोचना में लीक से हटकर एक भिन्न ढंग की पुस्तक। 
बाल साहित्य की सौ से अधिक पुस्तकें, जिनमें प्रमुख हैं— प्रकाश मनु की चुनिंदा बाल कहानियाँ, मेरे मन की बाल कहानियाँ, मेरी संपूर्ण बाल कहानियाँ (तीन खंड), मैं जीत गया पापा, मेले में ठिनठिनलाल, धमाल-पंपाल के जूते, भुलक्कड़ पापा, लो चला पेड़ आकाश में, चिन-चिन चूँ, मातुंगा जंगल की अचरज भरी कहानियाँ, मेरी प्रिय बाल कहानियाँ, इक्यावन बाल कहानियाँ, नंदू भैया की पतंगें, कहो कहानी पापा, बच्चों की 51 हास्य कथाएँ, चुनमुन की अजब-अनोखी कहानियाँ, गंगा दादी जिंदाबाद, किस्सा एक मोटी परी का, चश्मे वाले मास्टर जी, धरती की सब्जपरी, जंगल की कहानियाँ, अजब-अनोखी शिशुकथाएँ (तीन खंड), दीवाली के नन्हे मेहमान, नानी का घऱ और किस्से पंपापुर के, बच्चों का पंचतंत्र, ईसप की 101 कहानियाँ, तेनालीराम की चतुराई के अनोखे किस्से, (कहानियाँ), प्रकाश मनु के संपूर्ण बाल उपन्यास (दो खंड), गोलू भागा घर से, एक था ठुनठुनिया, चीनू का चिड़ियाघर, नन्ही गोगो के कारनामे, खुक्कन दादा का बचपन, पुंपू और पुनपुन, नटखट कुप्पू के अजब-अनोखे कारनामे, खजाने वाली चिड़िया, अजब मेला सब्जीपुर का, चार बाल उपन्यास, किस्सा चमचम परी और गुड़ियाघर का (उपन्यास), मेरी संपूर्ण बाल कविताएँ, प्रकाश मनु की 100 श्रेष्ठ बाल कविताएँ, बच्चों की एक सौ एक कविताएँ, हाथी का जूता, इक्यावन बाल कविताएँ, हिंदी के नए बालगीत, बच्चों की अनोखी हास्य कविताएँ, मेरी प्रिय बाल कविताएँ, मेरे प्रिय शिशुगीत, 101 शिशुगीत (कविताएँ), मुनमुन का छुट्टी-क्लब, इक्कीसवीं सदी के बाल नाटक, मेरे संपूर्ण बाल नाटक (दो खंड), बच्चों के अनोखे हास्य नाटक, बच्चों के रंग-रँगीले नाटक, बच्चों को सीख देते अनोखे नाटक, बच्चों के श्रेष्ठ सामाजिक नाटक, बच्चों के श्रेष्ठ हास्य एकांकी (बाल नाटक), विज्ञान फंतासी कथाएँ, अजब-अनोखी विज्ञान कथाएँ, सुनो कहानियाँ ज्ञान-विज्ञान की, अद्भुत कहानियाँ ज्ञान-विज्ञान की (बाल विज्ञान साहित्य)।
हिंदी में बाल साहित्य का पहला बृहत् इतिहास ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ लिखा। इसके अलावा ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’, ‘हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व’, ‘हिंदी बाल साहित्य के निर्माता’ और ‘हिंदी बाल साहित्य: नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ पुस्तकें भी। संस्मरण, साक्षात्कार, आलोचना और साहित्येतिहास से संबंधित विचारोत्तेजक लेखन। कई महत्त्वपूर्ण संपादित पुस्तकें और संचयन भी। कई पुस्तकों का पंजाबी, सिंधी, मराठी, गुजराती, कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
पुरस्कार: बाल उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्य अकादमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘बाल साहित्य भारती पुरस्कार’ और हिंदी अकादमी के ‘साहित्यकार सम्मान’ से सम्मानित। कविता-संग्रह ‘छूटता हुआ घर’ पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार।
पता: 545, सेक्टर-29, फरीदाबाद-121008 (हरियाणा), चलभाष: 09810602327
मेल आईडी – prakashmanu333@gmail.com
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परिचय: पिंकी बिड़ला

शोधछात्रा, हिंदी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, चलभाष: 7508466127

पिंकी बिड़ला का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर के एक छोटे से गाँव गुनियाजुड्डी में हुआ था। उनके पिता किसान परिवार से हैं। नौकरी की तलाश और बेहतर भविष्य के लिए उन्हें गाँव से शहर (चंडीगढ़) की ओर पलायन करना पड़ा। पिंकी जी का बचपन और संपूर्ण शिक्षा चंडीगढ़ में ही हुई। वर्तमान समय में वे हिंदी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से हिंदी विषय में शोधकार्य कर रही हैं। उनके शोध का विषय है, ‘प्रकाश मनु के नाटकों का बाल-मनोवैज्ञानिक अध्ययन’। उनके शोध-पत्र कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं, जिनमें ‘चिंतन’, ‘परिशोध’ (गुरु नानक देव विशेषांक), ‘सृजन मूल्यांकन’, ‘सोच-विचार’ इत्यादि प्रमुख हैं। 
पिंकी बिड़ला की पहली रुचि है, हिंदी साहित्य पढ़ना। धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’, प्रेमचंद का ‘गोदान’, भीष्म साहनी का ‘तमस’, अज्ञेय का ‘शेखर : एक जीवनी’, प्रकाश मनु का बाल उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ तथा मैक्सिम गोर्की का ‘माँ’ उपन्यास उन्हें बहुत प्रिय है। इसके साथ ही प्रेमचंद, जैनेंद्र, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश की कहानियाँ और समकालीन कवियों की कविताएँ पढ़ना उन्हें अच्छा लगता है। पिंकी जी का मानना है कि साहित्य हमें जीने का एक अलग नजरिया देता है। यही कारण है कि हर कहानी उन्हें अपनी कहानी प्रतीत होती है। उन्हें लगता है, हिंदी साहित्य को जितना पढ़ा जाए, उतना ही कम है। 
पिंकी को पढ़ने के साथ-साथ कविताएँ व गजलें लिखने का भी शौक हैं। एम. ए. के दौरान पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की ओर से निकलने वाली पत्रिका ‘यूनिवर्सिटी कैंपस’ में उनकी दो कविताएँ प्रकाशित हुई थीं। हाल ही में पटियाला से निकलने वाली पत्रिका ‘गुलिस्ता’ में उनकी ‘आत्मजा’ कविता प्रकाशित हुई है। उनके जीवन का एक ही उद्देश्य है कि शोधकार्य पूर्ण होने के बाद वे खूब सारा साहित्य पढ़ें और एक अच्छी शिक्षिका बनकर आने वाली पीढ़ी को अपनी गौरवमयी साहित्यिक परंपरा से अवगत करवाएँ। वे एक मध्यवर्गीय परिवार से हैं। उन्हें पढ़ना और पढ़ाना दोनों अच्छे लगते हैं। इसीलिए वे पूरी तल्लीनता से अपने शोधकार्य को संपन्न करने में जुटी हैं। 
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5 comments :

  1. बहुत सुन्दर। महत्वपूर्ण बातचीत।

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  2. वाह ! बहुत ही सधे हुए सवाल और उनका सटीक जवाब ।👏👏👏👍👍👍

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  3. बहुत सुंदर साक्षात्कार

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  4. बहुत बहुत ज्ञानवर्धक एवं महत्वपूर्ण साक्षात्कार।

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