अहिंसक होने की साधारण शर्त: हमारे अंतस के भाव

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

खुशियों के लिए कोई ज़रूरी नहीं है कि अपनी सफलता पर ही खुशियाँ मनायी जाए। खुशियाँ तो चौदहों भुवनों में व्याप्त किसी भी अच्छाई से भी प्राप्त की जा सकती है। दुनिया में अनेकों अच्छी जीवात्माएं इन्हीं माध्यमों से खुशियों का संग्रह करती हैं। विगत महीने जारी एक पोस्टर जो मध्य प्रदेश सरकार ने ट्विट किया वह काफी सुंदर लगा। वह एक ऐसा संदेशप्रद कार्यक्रम मेरी दृष्टि में था जिसे कोई भी अपनाने पर राजी हो जाए। पोस्टर में लिखा था-दाना-पानी कार्यक्रम। इस पोस्टर में अपील की गई थी कि गर्मी बहुत ज्यादा है और बहुत से जीव पानी बगैर भटकते हैं। तो सुराही, घड़े या किसी अच्छे पात्र में चिड़ियों के लिए पानी रखें। वह पोस्टर और सन्देश एक ऐसी अपील कर रहे थे जो कोई भी स्वीकार करेगा। गर्मी में यह बहुत बड़ी समस्या है कि चिड़ियों के लिए और पशुओं के लिए पानी का आभाव हो जाता है जिसके लिए पक्षी मीलों दूरी तय करके अपनी प्यास बुझाते हैं। उनके लिए सोचना हि पूण्य का काम है। जो पाप-पूण्य में विश्वास नहीं करते उन्हें करुणा, दया और प्रेम करने में भी विश्वास नहीं होगा, ऐसा मुझे विश्वास नहीं है। वे अवश्य पक्षियों के लिए दाना-पानी योजना में अपना हाथ बटाना चाहेंगे। सबसे अच्छा यह हुआ कि उसे हम अपने संस्थाध्यक्ष को भेजे और उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय परिसर में जगह-जगह पानी रखवाया।अपने घर पर हम रोज पानी रखते हैं लेकिन विश्वविद्यालय भर में जब यह दाना-पानी योजना अपना मूर्त रूप पाई तो ख़ुशी मिली। खुशियों का असर अंतस में होता है। अच्छा लगता है कि बहुत सी सुराही आज विश्वविद्यालय कैम्पस में रख दी गयी हैं और लोग व्यक्तिगत रूप से भी अपने-अपने घरों में छाया में पानी रखने लगे हैं।
स्मरण आती हैं मदर टेरेसा। मदर टेरेसा ने कुष्ठ रोगियों के लिए बड़े पैमाने पर भारत और दुनिया के 100 से अधिक देशों में मिशन के तौर पर सेवा की। सेवा ख़ुशी देती है। नन और मदर टेरेसा द्वारा न जाने कितनी ऐसी परित्यक्त सी विभूतियाँ सीवा के माध्यम से गरिमापूर्ण एहसास पाई हैं। हिंदुस्तान की यह खूबसूरती है कि यहाँ लोगों के भीतर करुणा-दया-प्रेम और अहिंसा समान रूप से विद्यमान है। यहाँ लोग मोहब्बत को ज्यादा महत्व देते हैं। हिंसा और घृणा का प्रचार होता है इसलिए उन्हें लोग ज्यादा स्मरण करते हैं। हिंसा होती ही ऐसी है। हिंसा के कारण अनेकों लोग अपनी नींद खो बैठते हैं। अपना सुख-चैन खो बैठते हैं। अपनी इच्छाओं को ख़त्म कर देते हैं। हिंसा इसलिए ज्यादा समय तक स्मरण रहती है। यदि लोग प्रेम करने लगें, करुणा और दया के साथ जीने लगें और अहिंसक बर्ताव करने लगें तो यह दुनिया और खूबसूरत हो जाएगी।
भूख से मरते लोग यदि अन्न पा जाएँ तो वे नहीं मरेंगे। भारत में इतने लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली, और निरंतर हो रही हैं किसान आत्महत्याएं तो उसकी वजह एक यह भी है कि हम ख़ुशी को बांटना और ख़ुशी को एक-दूजे पर न्यौछावर करना छोड़ दिए हैं। समरस समाज और समावेशी समाज में आत्महत्याओं के लिए स्थान ही नहीं होता। दुनिया के विभिन्न अंचलों में इस प्रकार की चीजें इसलिए देखने-सुनने को मिल रही हैं क्योंकि हमारा सरोकार अब पूंजी केन्द्रित हो गया है। भ्रमपूर्ण हो गया है और यह सब हिंसा के मूल वजहें हैं। जिन देशों नमें खाद्यान की कमी नहीं है उन देशों में भूख और गरीबी की वजह से लोग अपना जीवन खो दें, अपनी मनुष्य होने की गरिमा खो बैठें तो वह तो आज हमारे लिए शर्म की बात है। राज्य इस प्रकार के ढांचे अभी विकसित नहीं कर सके हैं कि हम खुशियों का ग्राफ बढ़ा सकें।
विदर्भ इलाके में एक प्रयोगधर्मी व्यक्तित्व रहते थे-बाबा आम्टे। उन्होंने आदिवासियों के बीच रहकर सेवा की। उनके लिए वही ख़ुशी थी कि वह आदिवासियों के बीच रहकर उनकी सेवा करें। राजेंद्र सिंह ने जल संरक्षण के लिए कार्य किया। शांता सिन्हा ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दिया। सुन्दरलाल बहुगुणा ने प्रकृति के लिए चंडी भट्ट के साथ मिलकर पर्वत बचाओं आन्दोलन चलाया। इसके पीछे की ख़ुशी उनकी आत्माएं जानती हैं। यह सभी सेवा के उपक्रम किसी भी तरीके के उन्माद को आमंत्रण नहीं देते बल्कि जोड़ते हैं करुणा और दया से।
यूनेस्को का महात्मा गाँधी शैक्षणिक संस्थान दिल्ली में कार्यरत है। उसने काइंडनेस पर बहुत साडी इंट्री आमंत्रित की और दुनिया के बहुत से बुद्धिजीवियों ने उसमें प्रतिभाग किया। वे करुणा और दया को विभिन्न तरह से परिभाषित करते हैं लेकिन उनका आंशिक रूप से अनुप्रयोग सरकारें करतीं तो भूभाग का वह हिस्सा जहाँ ऐसा प्रयोग हो रहा होगा वहां कोई नारेबाजी की जगह सौहार्द और प्रेम से सराबोर समाज निर्मित होता हुआ दिखता। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि लोगों के भीतर बहुत बड़े पैमाने पर अविश्वास पढ़ा है और धोखे वाली दुनिया से लोग तंग आ गए हैं। खुशियाँ तो बहुत दूर की बात है, लोग किसी से बात करने में घबडाने लगे हैं। 
यह सब एक सांस्कृतिक बदलाव द्वारा ही सम्भव है। सांस्कृतिक बदलाव में धर्म उसमें सहयोगी बनते हैं लेकिन अब धर्म का स्वरूप बदल गया है। धर्म वही है लेकिन लोगों का माइंडसेट बदल गया है। मेरा इश्वर तुमसे बड़ा है। मेरा ईश्वर तुमसे अच्छा है। मेरा ईश्वर मुझे सहिष्णु बनता है तुम्हारा नहीं। इस प्रकार के धर्म ने अब मूल धर्म की जगह ले ली है। इसलिए चुनौतियाँ अब कुछ ज्यादा हमारे लिए टेढ़ी खीर बन गयी हैं। इसलिए सांस्कृतिक बदलाव की उम्मीद जिनसे हम करते थे, उनसे अब नहीं कर सकते। जब ईश्वर के झगड़े होंगे तो उसके धर्म रक्षक क्या रणनीति अपनाकर समाज-सुधर करेंगे, यह तो कोई भी समझ सकता है।
हिंदुस्तान में सनातन परम्परा की जड़ें सच में बहुत प्राचीन हैं। इसको हिन्दुस्तानी चश्में से देखना आवश्यक है लेकिन जब वह भयग्रस्त होकर अपने को पारदर्शी और सबके सुख का अभीष्ट नहीं बन सकेगा तो उस पर भी दुनिया में सवाल उठेंगे। इसलिए करुणा, दया, प्रेम और अहिंसा के द्वार धम्र्मोपदेश्कों द्वारा कब खुलेगा? यदि यह द्वार खुल जाए तो देश में शांति और सहिष्णुता की नदी में सभी नहा लें और सुख की अनुभूति भी कर लें। लेकिन बार-बार वही कहना कि यदि ऐसा होता तो अच्छा होता। और किन्हीं कारणों से यह सब घटित नहीं हो पा रहा है तो उससे हमारे विकसित मन पर सवाल उठ रहे हैं।
सुख और खुशियाँ यह किसी से जबरदस्ती नहीं लिए जा सकते। यह जबरदस्ती तो दिए भी नहीं जा सकते। लेकिन खुशियों को ज्यादा अवसर देने के लिए हम अपील कर सकते हैं। जिन्हें हम उदहारण के रूप में देख रहे हैं, क्या हम वैसा नहीं कर सकते? यह तो हमारे सभ्य होने के भी अच्छे उदाहरण हो सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हमने अपने आपको खो दिया है। गाँधी जब परचुरे की कुटिया में सेवा के लिए जाते थे, तो उनके मन में क्या चलता था? कोई अपने घर के आस-पास के जीवों के लिए पानी रखकर उन्हें पानी पिला रहा है तो उस समय उसके भीतर के भाव क्या हैं, केवल इतना भी सोच लें और उसके उपरांत वैसा ही एक बार और फिर बा-बार करने की जिद क्र लें तो एक खूबसूरत वातावरण हम निर्मित कर सकेंगे। कभी सेवा के लिए आगे अपना कदम बढ़ाकर देखें, अच्छा लगेगा। सेवा के लिए बढ़ते कदम आपको एक अच्छी अनुभूति देगा और एक अच्छी अनुभूति आपको और आपके आस-पास के माहौल को, सोच को बदलकर न रख दें तो कहिएगा। एक अच्छी पहल तो कहीं से, कभी भी हो सकती है। अच्छे लोग भी हैं, हम भी अच्छा बनकर तो देखें। खुशियाँ हम सबके साथ होंगी।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।