व्यंग्य: लो, शब्द असंसदीय हो गए

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

समय शब्दों के साथ खिलवाड़ करता आया है। लोक से आए शब्द ठेठ और देशज कहे गए तो संस्कृत शब्दों को संस्कृतिनिष्ठ और अभिजात्य माना गया। कुछ शब्द आधुनिक करार दिए गए तो कुछ अपभ्रंश। शब्दों के साथ जाति-पाँति का खेल दरबारियों ने ही खेला। पिछले दशक में शब्द असहिष्णु होने लगे तो अब असंसदीय शब्दों की अद्यतन सूची आ गई। मैं एक झटके में लेखक से असंसदीय हो गया। अपने असंसदीय होने का दुख नहीं है, पर मुझे हिंदी के मूर्धन्यों की चिंता होने लगी। कबीर की ललकार ‘बहरा हुआ खुदाय’ याद आई तो टैगोर, प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, अज्ञेय के लिखे में अहंकार, उचक्का, गुंडा, तानाशाह, नाटक आदि शब्द सैकड़ों की संख्या में तैरने लगे। दिग्गजों की पूरी जमात असंसदीय हो गयी। परसाई और शरद जोशी तो असंसदियों के सरदार बन गए। उनका हर लेख असंसदीय शब्दों से ठसाठस भरा मिला। नरेंद्र कोहली और ज्ञान चतुर्वेदी के लेखन में असंसदीय शब्दों की आबादी के सामने पद्मश्री शब्द फीके पड़ गए। जिस भी लेखक को जाँचा वह असंसदीय निकला। भले राष्ट्रवादी था, पर असंसदीय सिद्ध हुआ। इसके चलते पूरा लेखक समुदाय असंसदीय और काली सूची में जड़े जाने योग्य हो गया। 

कबीर ने कहा है निंदक नियरे राखिए। जो ‘नियर’ को अंग्रेजी शब्द मानते हैं, वे इसका अर्थ ‘पास में’ लगा लें। इस हिसाब से निंदकों को पास में रखना चाहिए, चाहे वे असंसदीय होने लगें। कोई सांसदों को संसद में बैठने ही नहीं दे तो वे भला संसदीय कैसे हो सकता हैं! सूरदास कह गए ‘मूरख-मूरख राजे कीन्हें, पंडित फिरत भिखारी’ तो तुलसी का गँवार और ‘कोई नृप होय, हमहिं का हानि’ याद आ गया। दादागिरी, दंगा, गुंडागर्दी, गुलछर्रा, चांडाल-चौकड़ी, तड़ीपार, मूर्ख, पिट्ठू आदि लोक के बहुप्रचलित शब्द, प्रश्न बन गए। क्या गाँव, क्या शहर, गली-मोहल्ले में व्याप्त ये शब्द असंसदीय हो गए। ओह, माननीयों को चुनने वाले सारे मतदाताओं से बना लोकजीवन ही असंसदीय हो गया। दलाल और दलाली पर राजनेताओं का एकाधिकार नहीं है। हर काम के लिए पेशेवर दलाल हैं। दलाल स्ट्रीट का संसद पर प्रभाव अलिखित ही रहे तो अच्छा है। पर दलाल को असंसदीय शब्द का तमाचा मारने की राजनीति सही नहीं है। उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे, चोर-चोर मौसेरे भाई, तलवे चाटना, घड़ियाली आँसू, ढिंढोरा पीटना, मगरमच्छ के आँसू, खरीद-फरोख्त, आदि अभिव्यक्तियाँ हमारे समय की सच्चाई हैं। इस सच्चाई को असंसदीय कहकर राजनीति खुद को पाक-साफ घोषित नहीं कर सकती।

माना कि गधा, कायर, गद्दार, गिरगिट उन जनप्रतिनिधियों के प्रतीक चिह्न हैं जो मुखर नहीं हैं। दिन में चादर ओढ़कर नींद निकालने वाले दरबारी कुछ शब्दों को बहिष्कृत कर क्या पाएँगे! शब्दों में अपने प्रतीकात्मक अर्थ बदलने की प्रक्रिया निरंतर होती है। विपक्षी कहेंगे कि ‘वे फूल से वार करेंगे’ तो क्या फूल असंसदीय हो जाएगा! वे साइन लैंग्वेज में अपनी बात रखेंगे तो क्या इशारेबाजी असंसदीय हो जाएगी! बात-बात पर भ्रष्ट, कालाबाजारी, कमीना, छोकरा, सांड, माफिया, तुर्रमखाँ, अंट-शंट, लॉलीपॉप जैसे शब्द लिखने वाले व्यंग्यकार कभी विधानसभा या संसद में नहीं जा पाएँगे। वे संसद की कार्यवाही से निकाल दिए जाएँगे और कहीं ऐसे डाल दिए जाएँगे कि ढूँढे नहीं मिलेंगे। संसद की बहसों का जीवंत प्रसारण देखते हुए अशालीन हो-हल्ला करने, बात-बात पर कार्यवाही रोकने, आँख मार कर संकेत देने, बाँहें चढ़ाने और आँखें तरेरने की घटनाएँ होती हैं। ये इशारे असंसदीय नहीं माने गए तो शब्द कैसे असंसदीय हो गए! ऐसा भी नहीं है कि प्रतिबंधित शब्द हमेशा ही सदन की कार्यवाही में मार दिए जाएँगे। ऐसे शब्दों को जिंदा रखने का विवेकाधिकार संसद के सभापति को है तो फिर ऐसे प्रतिबंधों की क्या जरूरत?

सांसदों की शब्दावली में से डेढ़ हजार से अधिक शब्द निकाल लें तो उनके पास बचेगा क्या! जो शब्द उन्हें याद हैं, आप उनसे छीन रहे हैं, उनकी सामित शब्दावली कम कर रहे हैं। ऐसे शब्दों को कार्यवाही से निकाल कर संसद की वास्तविक बहस को कमतर करने की कोशिश कितनी वैध्य मानी जा सकती है? सांसद की भाषा पर ताला लगाकर प्रशासन कैसा विवेक सिद्ध करना चाहता है! जनतंत्र पर यह खतरा है कि यदि संसद शब्दों को छाँटने वाली संपादक बनने लगी तो संसद का काम कौन करेगा? स्वतंत्र देश के सांसद का शब्द पराधीन हो जाए तो फिर प्रजातंत्र के क्या मायने! बड़ा खतरा यह भी है कि आज ये शब्द संसद में प्रतिबंधित हो गए, कल न्यायालय में प्रतिबंधित होंगे, परसों मीडिया के लिए प्रतिबंधित होंगे। धीरे-धीरे वे मानक शब्दकोशों से बाहर हो जाएँगे। याद रखिये, साहित्य पर राजनीति भले सदियों से भारी रही हो किंतु वह कई शब्दों को अपने अनुकूल नहीं गढ़ सकी। लेखकों, आप संसद को असंसदीय शब्द तलाशने दें और आप बाहर से असंसदीय शब्दों से संसद को चेताते रहें। जब शब्द की शक्ति राजनीतिक सत्ता को ललकारती है तो कलम, तलवार से अधिक तीक्ष्ण सिद्ध होती है।

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