संस्मरण: मेरे पापा आनंदप्रकाश जैन - कुछ यादें, कुछ बातें

आनंदप्रकाश जैन

मंजुरानी जैन


मेरे पापा आनंदप्रकाश जैन एक प्रसिद्ध बाल-साहित्यकार और जाने-माने ऐतिहासिक उपन्यासकार थे। ‘पराग’ के संपादन के अलावा भी हर विधा में ढेर सारा साहित्य और ‘चंदर’ उपनाम से लिखे गए करीब 80 जासूसी उपन्यासों के रचयिता भी! पर इसके साथ ही वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जो घर से कभी कहीं अकेले जाने को तैयार नहीं होते थे। अफसोस, वे कैसे एकाएक हमसे इतनी दूर चले गए?...अपनी आँखों से सब-कुछ देख लेने के बाद भी विश्वास कर पाना मुश्किल हो जाता है। बचपन से लेकर उनके जाने तक मैं उनके साए में ही रही। उनके जाने पर घर में एक खालीपन का अहसास होने लगा था। वही एक धुरी थे, जिनके चारों ओर घर में जीवन व्याप्त था। उनका स्नेह, बच्चों की भावनाओं को समझने की उनकी क्षमता, एक ढाल की तरह हमारे पीछे खड़े रहना, उनका गुस्सा और मान-मनौवल, उनके लिखने का ढंग, उनकी आदतें—सब कुछ बहुत पास से देखा और जाना है हमने।

पापा ने लिखने की शुरुआत बहुत पहले से ही कर दी थी। स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान जब वे दसवीं कक्षा के छात्र थे तो उन्हें दो वर्ष का कठोर कारावास हुआ था। उस समय वे खूब कहानियाँ लिखते थे। उस लेखन में शरतचंद्र चट्टोपाघ्याय का प्रभाव था। उस समय का उनका पूरा साहित्य पुलिस ने उनकी शाहपुर की पुश्तैनी हवेली और उनके बड़े भाई, जो सहारनपुर में बतौर टीचर काम कर रहे थे, के घर में छापा मारकर जब्त कर लिया था। उस समय का लिखा एक उपन्यास ‘अपराजिता’ अभी हमारे पास रखा हुआ है। सचमुच उनकी लेखन प्रतिभा जन्मजात थी।

श्रीमती चंद्रकांता जैन
एक जमाना था जब इंजीनियरिंग पढ़ने का भी उन्हें बड़ा शौक था, लेकिन जमींदार पिता की शर्तें और एक कलाकार और बिन माँ के बच्चे की जिद और विद्रोह ने उनके इस सपने को कभी पूरा नहीं होने दिया। लिखना तो बहुत छुटपन से ही शुरू हो गया था। उनकी लिखी कहानियों में सबसे पहले जो प्रकाशित हुई थी, वह थी ‘आमों का बाग’। यह कहानी 1949 में एक मासिक पत्रिका ‘आँधी’ में प्रकाशित हुई थी। उस समय जो मास्टर जी बचपन में उन्हें स्कूल में पढ़ाया करते थे, उन्हीं की चौदह वर्षीया बेटी चंद्रकांता को वह पसंद करते थे। इस बात का अहसास नाना जी और नानी जी दोनों को ही था। पापा स्वतंत्रता संग्राम के में भाग लेने के कारण दो वर्ष का कारावास भोगने के बाद, उस समय मैट्रिक पास करके स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। उम्र थी उस समय केवल उन्नीस साल।

दबी जुबान से पापा ने अपनी इच्छा अपनी दादी को बताई। दादा जी कहीं नाना जी से टकरा गए तो दादा जी ने उनसे कहा, “मास्टर जी, क्या उस निकम्मे लड़के से अपनी बेटी के ब्याह के बारे में सोच रहे हैं? यह समझ लीजिए कि आप उसे गड्ढे में धकेलने का काम करेंगे।”

मंजुरानी जैन

नाना जी ने यह बात घर में बताई तो नानी जी ने कहा, “नहीं, मुझे तो लड़के की आँखों में कुछ अलग ही दिखाई देता है कि वह जिंदगी में जरूर कुछ करेगा, लड़के में कोई बुराई नहीं।”

विवाह की बात चली। कम उम्र में अपनी पसंद से परिवार की स्वीकृति से विवाह और उसकी जिम्मेदारी निभाने के लिए संघर्ष उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गया था।

आजीविका के लिए स्वतंत्र रूप से लेखन करना उन का अपना चुनाव था। व्यवसाय करना उन्हें आता नहीं था। वे एक स्वतंत्र प्रकृति के व्यक्ति थे, नौकरी में अनेक बंधन थे। इसलिए जहाँ भी नौकरी की तो बहुत लंबे समय तक वह नहीं चल पाई। शुरुआत के दिन बड़े कड़की में बीते। हर स्थिति में मम्मी ने उनका साथ दिया। किसी भी परिस्थिति में दो-तीन साड़ियाँ होने पर भी मम्मी यही सोचतीं कि उनके पास सबसे अच्छा है। यही भावना छोटे-छोटे हम बच्चों में भी थी।

मेरठ में ही उन्होंने अपने नए जीवन की शुरुआत की थी। बड़े भाई यानी हमारे ताऊ जी ने भी अपना व्यवसाय वहीं से शुरू किया था। विवाह के कुछ समय बाद ही पापा को प्लूरिसी हो गई थी, बहुत गंभीर अवस्था थी। तब ताऊ जी ने अपनी सूझ-बूझ से उन्हें सोने की भस्म खिलाकर उस जानलेवा बीमारी से उबारा था।

सपरिवार आनंदप्रकाश जैन
हम बहनों के कुछ बड़ा हो जाने के बाद मम्मी ने हमारे ही स्कूल से विद्याविनोदिनी की पढ़ाई शुरू की और सेकंड क्लास लेकर पास भी हो गईं। उसके बाद उन्होंने बी.ए. करने के लिए मेरठ के स्माइल कॉलेज में दाखिला भी लिया था। मुझे याद है कि मम्मी की अनुपस्थिति में पापा कभी-कभी हमारी चोटियाँ भी गूँथते थे। हालाँकि कॉलेज के कठोर नियमों और छोटे बच्चों की देख-रेख में कमी आने की सोच के कारण मम्मी को छह महीने बाद ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। परेशानी तो जरूर होती होगी, पर पापा ने उन्हें पढ़ने के लिये कभी मना नहीं किया।

एक बार की बात है कि हम मेरठ शहर के भाटवाड़े में रहते थे। वहाँ नीचे के हिस्से में एक किरायेदार आए, जो इतने चिड़चिड़े स्वभाव के थे कि जरा सा शोर सुनते तो चिल्लाने लगते थे। एक बार तो हद हो गई, वे गालियों पर उतर आए। पापा ने टेप रिकॉर्डर को नीचे लटकाकर उनकी सारी गालियाँ टेप कर लीं। बाद में जब उनका बोलना बंद हुआ तो उसी तरीके से जोर-जोर से टेपरिकॉर्डर चलाकर उन्हें वापस सब सुना दिया। उन पर क्या बीती होगी, पता नहीं। पर उसके बाद उनकी चीख-चिल्लाहट या गालियाँ, जब तक हम वहाँ रहे, कभी सुनाई नहीं दीं। 
पापा बताते थे कि 1950 से 1960 के जीवन में उन्होंने बहुत लिखा। अपनी पहली कहानी जब उन्होंने ‘माया’ में भेजी थी तो उस समय के ‘माया’ के संपादक ने पत्र लिखकर उनसे पूछा था कि क्या सच में वह कहानी उन्होंने ही लिखी थी और इस अविश्वास के कारण उनका नाम उस कहानी पर नहीं छापा गया था।

सन् 1947 से 1949 के बीच में पापा ने अपनी एक पत्रिका निकाली थी, जिसका नाम था, ‘कल्पना’। लेकिन पैसे के अभाव में वह एक साल चलकर बंद हो गई थी। फिर कशीदाकारी की किताबें निकालीं, जो ज्यादा बिकी नहीं और घर में ही पड़ी रहीं। वह नुकसान का सौदा साबित हुआ। कुछ कागज से जुड़ा व्यवसाय भी करने की कोशिश की, पर वह नहीं चला। चला तो केवल लेखन।

जिंदगी यों ही चल रही थी और कहानियों और उपन्यासों की झड़ी लग रही थी। उस दशक में उन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली। उसी दौर में उन के जासूसी उपन्यास ‘अदृश्य मानव’ और ‘चाँद की मल्का’ नामक वैज्ञानिक उपन्यास दस-दस भागों में प्रकाशित हुए जो किशोरों में बहुत लोकप्रिय हुए थे। धीरे-धीरे हर प्रकार का साहित्य वे लिखते चले गए। बच्चों के लिए, किशोरों के लिए, सामाजिक, ऐतिहासिक कथा-कहानियाँ, नाटक औक शिक्षाप्रद किताबों की शृंखला। उनके उनमें से कुछ अब भी खस्ता हालत में हमारे पास मौजूद भी हैं। बहुत से नाटकों का प्रसारण आकाशवाणी पर जब-तब होता रहता था। 
*

सन् 1959 तक, जब तक पापा मेरठ में रहे, उनके बहुत से प्रशंसक बन गए। वे उनसे दूर-दूर से मिलने आते थे। कई प्रशेसक उनके अच्छे मित्र बन गए थे। फिर तो ‘माया’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘ज्ञानोदय’, ‘सरिता’ आदि में उनका नाम लेखक के रूप में खूब जाना जाने लगा। उनकी एक कहानी सन् 1951 में ‘धर्मयुग’ की कहानी प्रतियोगिता में प्रकाशित हुई थी जिसका नाम था, ‘भैंस’। इस कहानी पर उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला था। मम्मी बताती हैं कि उससे मिली राशि से उन्होंने एक साइकिल खरीदी थी और उसे लेकर बड़े शौक से वे एक गोष्ठी में हिस्सा लेने चले गए थे। वहाँ से जब लौटने के लिए निकले तो जाना कि उनकी नई-नकोर साइकिल तो कोई चोर उठा ले गया था। उस समय वे बड़े दुखी मन से घर लौटे थे।

उन्हीं दिनों एक दौर चला था, वह यह कि उन्हें विभिन्न प्रतियोगिताओं में जब-तब पुरस्कार मिलते रहते थे। पापा बताते थे कि लोग यह कहने लगे थे कि हमारे घर का खर्च पुरस्कारों के बल पर ही चल रहा है। एक बार अपने बचपन की बात मुझे याद है। मेरठ के भाटवाड़े वाले घर में हम आँगन में खेल रहे थे तो पापा हाथ में एक पर्चा लहराते, सीढ़ियाँ चढ़ते जोरों से चिल्लाते हुए आँगन में दाखिल हुए थे, “आ गया, आ गया...घोड़े पर चढ़कर आ गया!”

मम्मी भी वहीं थी, हम कुछ नहीं समझ पाए। बाद में उनके बताने पर पता चला कि तार के जरिए ‘हिंदुस्तान लीवर’ की तरफ से तीन हजार रुपए के प्रथम पुरस्कार की उन्हें सूचना मिली थी। मजे की बात यह कि उससे एक-दो दिन पहले ही मम्मी कह रही थीं कि वह चार लाइन की कविता जो पापा ने लिखकर भेजी थी, उस पर पुरस्कार मिल जाए तो कुछ आर्थिक संकट दूर हो जाएँ। इस पर पापा ने जवाब दिया था, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं...वह तो जैसे घोड़े पर चढ़कर ही चला आ रहा है। बस!”

यह किस्सा सन् 1957-58 का है जब सनलाइट साबुन पर एक चित्र के आधार पर, कुछ शब्दों में विज्ञापन लिखना था। पापा ने जो पंक्तियाँ लिखकर मम्मी के नाम से भेजी थी, वे इस प्रकार थीं, “सनलाइट और नार सुगढ़, साजन गए हवा पर चढ़, क्या चंदा-सा गोरा मुखड़ा, क्या सूरज-सा उजला कपड़ा!”

जब वह पुरस्कार मिला तो लौटते समय दिल्ली से वे एक टेप-रिकॉर्डर और एक बहुत छोटा-सा प्रोजेक्टर खरीद लाए थे। इस प्रोजेक्टर में लॉरेल हार्डी और चार्ली चैप्लिन आदि की रील चढ़ाकर हमें दिखाते थे और खुद भी उसका भरपूर मजा लेते थे। उसमें आवाज तो नहीं थी, पर भागते-दौड़ते चित्र हमें बड़े मनोरंजक लगते थे। बाद में तो वह हमारा एक खिलौना ही बन गया था।

जब पापा ने वह टेप-रिकॉर्डर लिया था, उसके कुछ समय बाद मेरठ में एक बड़े कवि-सम्मेलन का आयोजन हुआ था। उसमें भाग लेने बड़े-बड़े कवि आए थे और हरिवंशराय बच्चन जी ने उसमें अपनी ‘मधुशाला’ सुनाई थी। पापा ने उसे रिकॉर्ड भी किया था। अब न वह टेप-रिकॉर्डर है और न ही ‘मधुशाला’ का वह स्पूल। बाद में जरूरत पड़ने पर वह टेपरिकॉर्डर तो बिक गया था और शायद वह स्पूल चोरी चला गया था। बचपन में हमें उसके बारे में कुछ पता नहीं था। पर बड़े होने पर अब जब सोचती हूँ तो लगता है, “काश, वह अमूल्य निधि हमारे पास होती।...बच्चन जी की आवाज में उनकी मशहूर कृति!”

मेरठ में हमारे घर में आए दिन लेखकों और कवियों की गोष्ठियाँ हुआ करती थीं। सब गोल-घेरे में बैठकर अपनी-अपनी रचनाएँ सुनाते। बीच-बीच में चाय और सिगरेट के दौर चलते। वहीं पर फिर रचनाओं का आकलन होता था। वह सब हम देखते थे। हम तीनों बहनें इन सब गतिविधियों की आदी हो गई थीं। इन सब के बीच हमारे कार्य-कलाप यानी खेल-कूद आदि आराम से चलते रहते थे। मुझे धुँधली-सी याद है कि वहाँ एक कोने में कोयले की एक अॅंगीठी रखी रहती थी, जिस पर चाय गरम होती रहती। पापा को ठंडी चाय कतई पसंद न थी। पापा के लिए इन गोष्ठियों की एक महत्ता थी। वह यह कि अगर उनकी किसी रचना की नकारात्मक आलोचना होती या उनकी कहानी दूसरे साहित्यिक मित्रों द्वारा ज्यादा पसंद नही की जाती थी, तो वे अपनी उस रचना को फाड़कर फेंक देते थे।

पापा ने अपने एक लेख ‘मैं और मेरा कौशल’ में अपने आपसे एक प्रश्न पूछा था, “क्या मैं कलाकार हूँ?” इसके उत्तर में वे लिखते हैं, “कई बार मैंने अपने से यह प्रश्न पूछा है, हर बार अहं कह देता है, हाँ, और वहम कह देता है, नहीं! जब तक मेरे पास चिट्ठियाँ आती हैं, जिसमें लोग ऐसी चीज की प्रशंसा करते हैं, जिसे मेरी कला कहा जाता है, तबीयत खुश हो जाती है, लेकिन भीतर के कोने से कोई कह देता है, इस वहम में क्या रखा है?”

हमें याद नहीं कि पापा ने कभी लेखन के दौरान हमारी धमा-चौकड़ी पर पाबंदी लगाई हो। जब वे लिखने बैठते थे तो उनके विचारों के साथ-साथ उनकी उँगलियाँ अनायास ही टाइपराइटर पर चलती चली जाती थीं। कहानी तो वे एक बैठक में ही लिख डालते थे। हमारी नानी कहती थीं, “आनंदप्रकाश जब लिखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे मेह (बरसात) बरस रहा हो।” हमारी बचपन की जितनी यादें हैं, उनमें से ज्यादातर पापा को टाइपराइटर पर लिखते देखने और उनकी हलचल भरी गोष्ठियों की ही ज्यादा हैं।

सन् 1959 में पापा से मिलने टाइम्स ग्रुप के एक बड़े सम्मानित सज्जन मेरठ आए थे। पापा के साहित्य के अलावा उनकी कहानियों और उपन्यासों की पांडुलिपियों के रख-रखाव, लिखने के त्वरित ढंग और परिवेश से प्रभवित होकर वे वापस लौटे थे। उसके करीब एक साल बाद उन्हें तार देकर मुंबई बुलाया गया था और उनके इंटरव्यू के बाद, सिर्फ हाईस्कूल पास होने पर भी, ‘पराग’ मासिक के संपादक के रूप में उन्हें नियुक्त कर लिया गया था।
उन्हें घर से इतना लगाव था कि पहली बार में ही वे पूरे परिवार के साथ, घर का कुछ सामान बेचकर और कुछ सामान इधर-उधर निकालकर, एक अनजान शहर मुंबई की ओर चल पड़े थे। पहले तीन-चार दिन एक मित्र के घर और फिर वी.टी. पर ही एक लॉज में अपने परिवार के साथ रहे थे। बाद में धीरे-धीरे घर का भी इंतजाम हो गया था। आगे जाकर भी, चाहे कुछ भी हो, लेकिन अपने परिवार से दूरी उन्हें कतई मंजूर नहीं थी। अगर हममें से कोई कभी शहर से बाहर जाने वाला हो, तो उसे ट्रेन में स्वयं बैठाकर आते थे, और जब हम वापस लौटते थे, तो हमेशा रिसीव करने के लिए स्टेशन पर खड़े मिलते थे। अपने कैरियर की शुरुआत में मैं और मेरी बड़ी बहन जब भी किसी इंटरव्यू के लिए कहीं जाती थी, तो ज्यादातर जगहों में वे हमारे साथ होते थे।
*

पापा एक बहुत ही भावुक किस्म के व्यक्ति थे। मेहनती और गरीब लोगों की मदद के लिए हमेशा वे आगे रहते और अपनी सीमा से परे जाकर भी उनकी मदद करने को तैयार रहते थे। एक बार की बात है कि वो नाना जी के यहाँ मुजफ्फरनगर जा रहे थे। दिसंबर का महीना था और कड़ाके की सर्दी! बस-स्टैंड से उतरकर जिस रिक्शा में वे बैठे, उसका चालक फटी कमीज में रिक्शा चलाते-चलाते भी ठंड से ठिठुर रहा था। उन्हें बडा खराब लगा। उन्होंने अपना नया स्वेटर, जो मम्मी ने बुनकर उन्हें पहली बार पहनने के लिए दिया था, उतारकर उसे दे दिया था। 
जीवन में कई बार निराशा के क्षण भी आते हैं, उनकी जिंदगी भी ऐसे पलों से अछूती नहीं थी। जब कभी जीवन के किसी मोड़ पर अपने को कमजोर महसूस करते तो कन्हैयालाल मुंशी का उपन्यास ‘पृथ्वीवल्लभ’ पढ़ लेते थे। वह भी एक बार नहीं, उसके कुछ हिस्से तो बार-बार...और अपने काम में फिर उसी उत्साह से जुट जाते थे। उन्होंने जितना लिखा, उसके अनुरूप उन्हें ख्याति नहीं मिली। इसका एक कारण शायद यह भी रहा कि वो स्वभाव से सीधे-सरल इनसान थे और उनमें व्यवहार-कुशलता की भी बहुत कमी थी। उनके सामने उनके विरुद्ध राजनीति चलती रहती तो भी उन्हें पता नहीं चलता था। कोई बताता तो कहते कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। अपने इस स्वभाव के कारण उन्होंने बहुत धोखे भी खाए, समय-समय पर आर्थिक, मानसिक और शारीरिक झटके भी झेले। उन्होंने बीच-बीच में कई बार अपने लिखने की धाराएँ बदलीं, ऐतिहासिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और जासूसी सभी प्रकार के साहित्य की रचना की।

इससे एक प्रकार के उपन्यासों के प्रकाशन में अंतराल काफी हो जाता था। काफी वर्षों तक जासूसी उपन्यास ‘चंदर’ उपनाम से लिखे, तो उनका अपना नाम पीछे चला गया। वैसे अपने लेख ‘मैं और मेरा कौशल’ में उन्होंने लिखा था—
“अखबार, किताबें, मासिक और साप्ताहिक सामयिक साहित्य—सभी धीरे-धीरे छोटे-छोटे प्रकाशकों को दिवालिया बनाकर अब प्रमुख उद्योगपतियों के हाथों में केंद्रित हो रहे हैं। आपका नाम जब तक इन सब में प्रकाशित नहीं होता रहता, तब तक कोई भला आदमी आपको साहित्यकार मानने के लिए तैयार नहीं होता, और इन लोगों के आर्थिक हितों के विरुद्ध तथा उनके आधार पर बनी हुई मान्यताओं के विपरीत यदि आज का लेखक कुछ लिखना चाहता है, तो उसे चमककर कुछ नाम पैदा करने कर जाने का ख़्याल छोड़ देना चाहिए...या फिर अपना प्रकाशन स्वयं करे...और अपने साहित्य को सीधे पाठकों के हाथ में पहुँचाए। जैसा मैथिलीशरण गुप्त, यशपाल, जैनेंद्र, वृंदावनलाल वर्मा, उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ आदि ने किया।”

उन्होंने 1973 में ‘चंदर पॉकेट बुक्स’ के नाम से मम्मी (श्रीमती चंद्रकांता जैन) के सहयोग से अपने प्रकाशन की शुरुवात की थी। यहीं से चंदर उपनाम से जासूसी उपन्यासों का प्रकाशन होना शुरू हुआ था और ये उपन्यास लोगों ने बहुत पसंद भी किए। ‘राम और श्याम सीरीज’ के अंतर्गत उनके लिखे बच्चों और किशोरों में इन उपन्यासों ने खासी धूम मचाई थी। किराए की जगह और इमरजेंसी लग जाने की वजह से इसे बंद करके हम मुंबई अपने घर वापस लौट आए थे। यहाँ आकर लेखन तो जारी रहा और उपन्यास भी दूसरे प्रकाशकों द्वारा छापे गए।

बच्चों के लिए उन्होंने खुद चंदर के नाम से कॉमिक्स भी लिखे और उनके लिए 4-5 आर्टिस्ट बुलाकर उनसे उनका चित्रांकन भी खुद ही करवाया, उनका मेहनताना अपने पास से ही दिया। रात दो-तीन बजे तक यह काम चलता रहता था। मम्मी उन्हें काफी समझाती थीं, पर वे अपनी झख के पक्के थे, नहीं माने। काम चलता रहा। पापा की अस्वस्थता के कारण उनमें से कुछ तो बिना लिखे ही रह गए थे, कुछ ही प्रकाशित हो पाए थे। मुंबई की बरसात के कारण बचे हुए चित्रांकित कॉमिक्स में फफूँद लग गई, थी, इसलिए उनके देहांत के अठारह साल बाद अभी हाल ही में हमें उन्हें निकालना पड़ा था। इस प्रकार चित्रकारों की मेहनत और पापा का समय, निर्देशन और पैसा सब बेकार ही गया।

हर क्षेत्र में उनका लेखन बहुत पसंद किया गया। साहित्य के क्षेत्र में सबसे ज्यादा ख्याति उन्हें ऐतिहासिक उपन्यासों के जरिये हासिल हुई। उनके उपन्यास ‘कठपुतली के धागे’, ‘पलकों की ढाल’, ‘आटे के सिपाही’, ‘कुणाल की आँखें’, ‘तांबे के पैसे’ बहुत ज्यादा सराहे गए। उनकी लिखी बहुत सारी ऐतिहासिक कहानियाँ उस समय के प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में खूब छपती रही थीं, और बहुत-सी कहानियाँ तो कहानी-संग्रहों में आए बिना ही रह गईं हैं। 1971 में उनके द्वारा रचित एक आंचलिक उपन्यास ‘आठवीं भाँवर’ जो मम्मी के गाँव के एक परिवार और उस में घटी एक घटना पर आधारित है, अत्यंत लोकप्रिय हुआ। उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास भी लिखा, नाम था ‘अंतर्मुखी’ और न जाने कितनी कहानियाँ और ‘नागपाश’ जैसे लघु उपन्यास भी बाद में लिखे, जो ‘सारिका’ और ‘मनोहर कहानियाँ’ में भी प्रकाशित होते रहे। ‘रेत के कण’ उनका आखिरी उपन्यास, जिसे वे लिख रहे थे, अधूरा ही रह गया।

बच्चों की कहनियाँ और बाल उपन्यास तों वो ऐसे ही लिख लेते थे, बहुत कम समय में। हमें पता ही नहीं चलता था कि कहानी कब लिखी गई। अब जब उनकी फाइलें और कतरनें देखीं तो पता चला कि कितना कुछ है जो अभी पुस्तक के रूप में प्रकाशित होना बाकी है। दोनों बहनें अपने घर में व्यस्त रहीं और मैं अपनी नौकरी और घर के अन्य कामों में। पता नहीं था किससे संपर्क करें? इसलिए उनका बहुत सा बाल साहित्य पुस्तक के रूप में एक साथ के साथ प्रकाशित होने से वंचित रह गया।

बड़े मजे की बात है कि बच्चों के साथ वे एकदम बच्चे ही बन जाते थे। मेरी बहन के बच्चे घर में आते तो उनका सबसे बड़ा आकर्षण नाना जी के साथ तरह-तरह के खेल खेलना होता था, चाहे वह साँप-सीढ़ी हो या लूडो, बिजनेस हो या कैरम। बच्चे जमकर चीटिंग करते तो खेलने में उन्हें ज्यादा मजा आता। फिर पापा बच्चों की तरह उनसे झगड़ा भी करते। कभी-कभी उनकी मम्मी उन्हें चीटिंग करते देखती तो जमकर वहीं बैठ जाती और कहती थी, “पापा, ये दोनों तुम्हारे साथ कितनी चीटिंग कर रहे हैं। जरा ध्यान दो।” तब दोनों बच्चों का मजा किरकिरा हो जाता और वे खेल की समाप्ति कर देते थे। यही सिलसिला चलता रहता था।

काम की चीजों में बच्चों को कैसे शामिल किया जाता है, यह कला उनमें स्वाभाविक रूप से थी। मुंबई आने के बाद अकसर गरमी की छुट्टियो में हमारे ताऊ जी, जो व्यावसायिक रूप से एक कॉमर्शियल आर्टिस्ट थे, मुंबई रहने आते थे। गुड्डे-गुड़िया के कपड़े मेरी बड़ी बहन अलका सीती थी, और प्लॉयवुड की शीट को टुकड़े करके एक मशीन की सहायता से आवश्यकतानुसार आकार देकर उनके घर, पलंग, जंगल और अन्य सब सेट्स सब मिल-जुलकर खुद ही तैयार करते थे। फोटोग्राफी ताऊ जी करते और कहानी पापा लिखते थे। ‘ताऊ तिलकू की कहानी’ और ‘सोनबाला और सात बौने’ उन्हीं की सूझबूझ का कमाल है। उसमें दिख रही जादूगरनी और सात बौने हम बहनों ने उनके निर्देशन में प्लास्टर ऑफ पेरिस से, तथा घास, झाड़ियाँ, पौधे आदि बुरादे को हरे रंग से रंगकर बनाए थे। और कपड़े तो घर में बनाए ही गए थे।

समय मिलने पर पापा कैरम खेलते थे। छुट्टियाँ कैसे बीत जाती थीं, कभी पता नहीं चलता था। हर साल दीवालीं की छुट्टियों में अकसर बाहर घूमने भी जाते रहते थे। उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार के कारण हमें कभी व्यर्थ ही इघर-उधर भटकने का मौका ही नहीं मिला। आर्ट क्लास वगैरह सब घर में ही हो जाती थी। शायद हम दुनिया के सबसे संतुष्ट बच्चे थे।

सन् 1974-75 की बात है, हम दिल्ली में थे। एक बार पड़ोस की चार बरस की बच्ची अपने घर के बाथरूम में बंद हो गई। उसने अंदर से लॉक लगा तो लिया, पर खोल नहीं पाई। उसकी माँ और अन्य लोगों ने उसे निकालने की बहुत कोशिश की, पर कामयाब नहीं हुए। बच्ची और भी जोरों-जोरों से रोने लगी, तो सबने सलाह दी, “जैन अंकल को बुलाओ, वही कुछ करेंगे।” उसकी मम्मी पापा को बुलाकर ले गईं। पापा ने पहले तो बच्ची को बड़े प्यार से बहलाकर उसका रुदन रोका। फिर समझाया कि अंदर से वह लॉक कैसे खोले, और यह भी कि अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो अंदर ही बंद रहेगी। बस, फिर क्या था। पाँच मिनट प्रयत्न जारी रखने पर बच्ची ने खुद ही अंदर से दरवाजा खोल दिया।

पापा हरफनमौला थे। उनकी यह आदत थी कि घर में जब कोई इलेक्ट्रॉनिक की चीज खराब हो जाती तो खुद ही उसे खोल-खालकर ठीक करने की कोशिश में लग जाते थे। इस कारण घर बुरी तरह से फैल जाता था और इस बात पर घर में झंझट भी हो जाता था। कभी चीजें दुरुस्त हो जातीं तो कभी एकदम बेकार। और तो और, जब मुंबई आने के कुछ साल बाद उन्होंने कार खरीदी तो उसमें कुछ खराबी आने पर वह भी खुद ठीक करने की कोशिश करते थे और छोटी-मोटी उसकी बीमारी तो दूर कर ही लेते थे। ऐसा कर के उनके दिमाग को जैसे ऊर्जा मिल जाती थी और लिखने में जोर-शोर से लग जाते थे।

सन् 1994 में पापा बुरी तरह बीमार पड़े। हृदय के साथ-साथ शरीर के सभी सिस्टम फेल हो गए थे। उस समय वे मृत्यु के मुँह से निकले थे, लेकिन डा़क्टरों के हिदायत देने पर भी छिप-छिपकर कैमरे की फ्लैश वगैरह ठीक कर लिया करते थे। जब कभी हम माँ-बेटी कहीं बाहर किसी काम से चले जाते थे तो लौटने पर देखते कि वे एक बड़े ऊॅंचे स्टूल पर चढ़कर छत से लगे शो-केस की किताबें साफ करके तरतीबवार लगा रहे हैं, या फिर कोई किताब उतार रहे हैं। इसी तरह कभी टी.वी. या रेडियो ठीक करने में मगन दिखाई पड़ते। ऐसा करते समय अपनी तबीयत का उन्हें जरा भी खयाल नहीं रहता था।

सिनेमा देखने के उनके शौक के कारण बड़ा होने पर हमें अपनी कुछ सहेलियों की तरह अपने माता-पिता से छिपकर कभी पिक्चर नहीं देखनी पड़ी। पिक्चर देखने पाँच लोगों का हमारा परिवार साथ ही जाता था।

एक बार मुझे एक पिक्चर देखनी थी, पास के थिएटर में उसका आखिरी दिन था। पापा को ज्यादा साढ़ियाँ चढ़ना मना था। मैंने दो टिकिट रिजर्व करवा लिए थे, क्योंकि एक सहेली साथ जाने वाली थी। पर उस समय उसे कुछ काम पड़ गया और वह नहीं आ पाई तो मैंने कहा, “अब जाने देती हूँ, ऐसा कोई जरूरी भी नहीं है देखना।” इस पर पापा बोले, “तेरा पापा अभी है तेरे साथ चलने को। चल, मैं चलता हूँ।” टिकट बालकनी के थे, इसलिए मैं झिझक रही थी कि उन्हें सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ेंगी। पर वे बोले, “तेरा इतना मन है। रुक-रुककर चढ़ लेंगे, जल्दी चलते हैं।” और हम दोनों जाकर वह पिक्चर देख आए थे। उनके जाने से चार-पाँच महीने के पहले की ही बात है यह।

सचमुच एक पिता के रूप में जो स्नेह उनसे हम तीनों बहनों को मिला, वह अथाह था, विशेष रूप से मेरे लिए। बचपन से लेकर वर्षों तक बरकरार मेरी दब्बूपन की आदत को सुधारने का पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है। वे हमेशा सामने बैठाकर मुझे समझाते थे और मुझसे पूछते थे, “तेरा यह तगड़ा पिता तेरे पीछे हरदम खड़ा है।...किस बात की फिक्र है तुझे, बता?” और मैं निरुत्तर रह जाती थी, और खुद से वही प्रश्न पूछने पर मजबूर हो जाती थी।

मेरे अंदर जो भी आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पनपी है, सब पापा की ही देन है। उन्होंने हमें हमेशा ज्यादा से ज्यादा पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि शिक्षा आदमी की सबसे बड़ी प्रॉपर्टी होती है, उसे कोई नहीं छीन सकता। जिंदगी में वही साथ देती है और पैसा वगैरह सब-कुछ बेमानी है, वह आपसे कोई भी छीन सकता है, शिक्षा हमेशा साथ देती है। पढ़ाई को कभी उन्होंने हमारे लिए बोझ नहीं बनने दिया। जब भी रिजल्ट आता और अच्छा होता था तो शाबाशी मिलती थी। खराब आता था और हमारे दुखी होने पर सहानुभूति के साथ प्यार से यही सलाह मिलती थी, “कोई बात नहीं, अगली बार मेहनत करके अच्छे नंबर ले आना। सब तुम्हारे हाथ में है।”
*

घर से बाहर निकलना उन्हें ज्यादा पसंद न था। घर बहुत प्रिय था। हम सबकी बातें ध्यान से सुनते थे। बाहर हमारे साथ जो भी घटता, आकर पापा को बताने की आतुरता रहती थी। कोई बात कहीं अनकही रह गई होती तो हमारा मन अंदर ही अंदर घुटता रहता था।

पापा को जब किसी बात पर गुस्सा आता था तो घर में खाना खाना छोड़ देते थे। असल बात यह थी कि घर के खाने से बेहतर उन्हें और कहीं का भोजन पसंद नहीं था। मम्मी को यह बात बखूबी मालूम थी। ऐसे मौके पर हमारे यहाँ हर चीज उनकी पसंद की बनती थी। उन्हें समझाने की हिम्मत तो हमारी नहीं होती थी, क्योंकि वे गुस्से में होते थे और स्वभाव से भी काफी जिद्दी थे। हमें पता था कि वे मानेंगे नहीं। एक-दो दिन तो वे जाकर होटल में खा लेते थे। इत्तिफाक से मुंबई में तो घर के सामने ही होटल था। उड़द की दाल के साथ सूखे आलू की भुनी हुई सब्जी, शाम के समय चाय के साथ आलू-गोभी या आलू-मटर के साथ गरम-गरम पराँठे या बेसन के चीले उन्हें बड़े पसंद थे। टेबल पर प्लेट तो सबके सामने ही रखी जाती थी। दो-एक दिन के बाद वे थाली चुपचाप अपने सामने खिसका लेते और खाना शुरू कर देते थे। बाद में धीरे-धीरे घर का वातावरण सहज हो जाता और बात करने का सिलसिला शुरू हो जाता था तो वो हॅंसकर कहते थे, “तुम लोग बड़े शैतान हो। मेरी कमजोरियों को खूब पहचानते हो।”

मनोरंजन और काम दोनों ही पापा की जिंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। काम करते थे तो पूरी तरह उसमें डूबकर करते थे और जब तक उनका काम पूरा नहीं हो जाता था, छोड़ते नहीं थे, चाहे देर रात तक करना पडे। सुबह जल्दी उठकर काम करना उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था। बस, सुबह उठकर चाय की जरूरत सबसे पहले होती थी। कई बार काफी समय पढ़ते और अपने शौक के काम करने में भी गुजरता था। कहानी लिखने बैठते तो एक बैठक में ही लिखकर पूरी कर देते थे।

उनका पूरा समय विशेष रूप से लिखने-पढ़ने से लेकर हाम्योपैथी की घरेलू चिकिसा और टी.वी. देखने में बीतता था। पहले जब टी.वी. नहीं था, तब रेडियो, टेपरिकॉर्डर आदि में उनकी जान बसती। दिल्ली के कई पड़ोसी इस बात की बड़ी सराहना करते थे कि पापा को मैकेनिक या इलेक्ट्रिशियन का इंतजार नहीं करना पड़ता, सब स्वयं ठीक कर लेते हैं। पापा कहते थे कि खाली समय में यह सब करने से उन्हें ऊर्जा मिलती थी। बोर होना उन्होंने कभी नहीं जाना। यह शब्द उनकी डिक्शनरी में था ही नहीं। पापा की होम्योपैथी चिकित्सा से काफी लोगों को फायदा भी हुआ था। खुद अपने ऊपर भी उन्होंने कई दवाइयों को आजमाया। सन् 1991 में उनकी हालत बहुत खराब हो गई थी। जोड़ों के दर्द के साथ लगातार तेज बुखार। लंबे समय तक यही हालत रही। तब एक होम्योपैथी की दवा लेने से वे उबरते चले गए थे। इतने बीमार थे कि ठीक होने पर भी उबरने में एक माह का समय लग गया था। डॉक्टर भी हैरान थे।

अस्सी के दशक से ही अकसर जोड़ों के दर्द के साथ समय-समय पर बुखार चढ़ते रहने के कारण उनके हृदय के दो वाल्व खराब हो गए थे। पर उस स्थिति में भी अंत तक छत से लगे शो-केस को स्टूल पर चढ़कर खुद किताबों के बीच फिनायल की गोलियाँ डालकर, उन्हें क्लीनर से खुद ही साफ करने से बाज नहीं आते थे। कोई टोक दे तो गुस्सा हो जाते थे। ऐसी हालत थी और दीवाली का त्योहार आ गया। वह बाजार से कुछ चकरी और अनार ले आए थे। बोले, “ये पटाखे नुकसान नहीं पहुँचाते। चल नीचे, एक-दो चकरी और अनार छुड़ा आएँ, पता तो चले दीवाली है।”

मम्मी ने काफी मना किया, पर नहीं माने। मैं भी साथ गई, चकरी तो ठीक-ठाक चल गईं, फिर अनार की बारी आई। उसे फुलझड़ी से जलाया तो वह नहीं छूटा। इस पर पास जाकर देखा, तो वह फट पड़ा। पापा के चश्मे में गड्ढे पड़ गए। हाथ बुरी तरह झुलस गया। फिर भी मुझसे पूछने लगे, “तुझे तो कहीं नहीं लगा?”

मैं उनका हाथ पकड़कर घर की तरफ भागी। जब तक डॉक्टर आएँ, बर्फ वगैरह से सेंका, बरनौल लगाया। बड़ी जलन थी हाथ में। ईश्वर की कृपा से चश्मे के कारण आँखें सही-सलामत बच गईं। मुझे तो यत्र-तत्र चार-पाँच छींटे ही लगे थे, जिसका वे बड़ा शुक्र मना रहे थे। उसके बाद आज तक हम कभी किसी अवसर पर भी किसी प्रकार के पटाखे नहीं लाए। वह दीवाली पापा के हाथ पर जले के निशान छोड़ गई थी। कई लोगों ने आपस में बातें भी कीं कि क्या यह पटाखे छुड़ाने की उम्र थी? पर पापा ऐसे ही थे।

अपने बड़ों से हमने सुना था कि स्वतंत्रता संग्राम में दो वर्ष के कारावास की सजा भुगतने से पहले पापा का धर्म के प्रति काफी झुकाव था। वे जैन ग्रंथों का बहुत अध्ययन करते थे। नित्य मंदिर जाते थे। पर जेल से आने के बाद उन्होंने मंदिर जाना छोड़ दिया था। अध्ययन करना तो उनके स्वभाव में था, इसलिए जैन ग्रंथों में छिपी कहानियाँ उन्हें आकर्षित करती थीं। परिणामस्वरूप 1970 में युगादि तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली महाराज को लेकर लिखा गया उनका पौरीणिक उपन्यास ‘तन से लिपटी बेल’ प्रकाशित हुआ। इसमें दो एतिहासिक कथाओं भी शामिल हैं, ‘देवताओं की चिता’ और ‘जयपुर का दीवान’, जिनके कथा-नायक ऐसे विलक्षण धीर पुरुष हैं जिन्होंने जीवन को जीवन की तरह जिया और जब मृत्यु वरण करने का समय आया तो उन्होंने जीवन को तिनके की तरह त्याग दिया। एक फिल्म निर्माता ने उनसे जैन ग्रंथों के आधार पर कहानियाँ लिखकर संवादों के साथ 13 एपिसोड तैयार करने के लिए कहा था। उन्होंने बड़े सुंदर एपिसोड लिख भी लिए थे, पर बाद में पता चला कि उस निर्माता के पास पर्याप्त धन न होने की वजह से वे कभी टेलीविजन पर नहीं आ पाए।

कहानी के पूरे कथानक का सार वो पहले एक पृष्ठ़ पर लिख लेते थे। फिर अपने मूड और समय के अनुसार खुद ही टाइपराइटर पर बैठकर लिखते थे। औरों के साथ मिलकर एक चीज को कैसे लिखा जा सकता था, यह उनकी कल्पना से परे था। एक बार एक बड़े फिल्म प्रोड्यूसर ओैर निर्माता ने उनसे सम्राट अशोक पर अपने अधूरे एपीसोड्स को आगे बढ़ाने के लिए संपर्क किया था। पर जब उन्होंने अपने पुराने तीन-चार एपीसोड्स जो वे बना चुके थे, पापा को दिखाए तो उन्हें वे इतिहास और कल्पना की दृष्टि से बिल्कुल ठीक नहीं लगे। उन्हें किसी भी तरह आगे बढ़ाने की गुंजाइश उन्हें नजर नहीं आ रही थी। लिहाजा उन्होंने अपना मत उनके सामने रख दिया था और कहा कि उसे नए सिरे से ही लिखा जा सकता है। वे निर्माता यह बात मान गए, पर बोले, “मेरे पास दो-तीन लेखक और हैं। मैं चाहता हूँ कि आप सब मिलकर लिखें।” पापा ने इस बात से इंकार कर दिया।

तय हुआ कि पापा एक ऐपिसोड लिखकर उन्हें दें। पापा ने ऐसा ही किया। वह उन्हें बहुत पसंद आया, पर नए सिरे से लिखकर फिर से इतने एपिसोड डब्बे में डालकर वे लाखों रुपए बर्बाद नहीं करना चाहते थे। इसलिए बात खटाई में पड़ गई। हालाँकि पापा ने जो पहला एपिसोड उन्हें लिखकर दिया था, उसका मेहनताना भी उन्होंने भेज दिया था। वे निर्माता-निर्देशक अब नहीं रहे और न ही पापा। सम्राट अशोक का उनका वह सीरियल अधूरा ही रह गया, कभी दूरदर्शन पर नहीं आ पाया, क्योंकि उसमें वे इतना उलझ गए थे कि वे उनसे आगे बढ़ ही नहीं पाए।  
पापा का बड़ी इच्छा थी कि उनका अपना प्रेस हो, पर वह न तो संभव था और न ही कभी फलीभूत हो पाया। दिल्ली जाकर उन्होंने ‘चंदर पॉकेट बुक्स’ की शुरुआत भी की और मम्मी के कुछ सहयोग से लिखे अपने जासूसी उपन्यास ‘चंदर’ उपनाम से प्रकाशित किए, पर जगह की कमी के कारण अपना प्रेस कभी नहीं खोल पाए। प्रेस का काम उनके व्यक्तित्व के अनुकूल भी नहीं था और घरेलू जगहों पर ऐसा करने की इजाजत आम तौर पर कहीं नहीं थी। इस शौक की पूर्ति उन्होंने अपने आखिरी समय में एक इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर खरीदकर की थी। उन्होंने अपनी कुछ टेली स्क्रिप्ट्स भी उस पर तैयार की थीं। वे भी अब तक ऐसे ही रखी हैं।

इसी बीच ‘मनोहर कहानियाँ’ में भी उनकी काफी कहानियाँ प्रकाशित हुई थीं, जो बेहद पसंद की गई थी। अब भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित पापा की कहानियों का एक बड़ा खजाना हमारे पास है। ये कहानियाँ पुस्तक रूप में छपें तो उन्हें आज के साहित्य प्रेमियों के बीच विशेष पहचान दिलाने में सक्षम सिद्ध होंगी।
*

जाने का समय बताकर नहीं आता, पर पापा को शायद अंदर ही अंदर आभास था कि उनका समय करीब था। दिसंबर 1994 के दिल के दौरे के बाद जो डेढ़ वर्ष का समय उन्हें मिला था, उसमें उन्होंने सब चीजें लिखकर रख दी थीं। हमें उनके जाने के बाद ही पता चला कि उन्हें पता था कि वे बस एक-आध हफ्ते के ही मेहमान हैं। दिन था सात जुलाई, 1996। उस दिन मेनका गांधी का एक इंटरव्यू छपा था। देवगौड़ा प्रधान मंत्री थे, साक्षात्कार उन्हीं पर केंद्रित था। उसी को लेकर वह बड़ी चर्चा का विषय बन गया था। टी.वी. के हरेक चैनल पर उसे लेकर बहस हो रही थी। रात हो चली थी। पापा बोले, “अभी मैं ‘मिड-डे’ (एक अखबार जो दोपहर तक की खबरें छापता है) लेकर आता हूँ, विस्तार से पढ़कर पता चलेगा।”

बाजार गए तो एक-दो काम और निकल आए। वह सब पूरा करके करीब आठ बजे घर लौटे। आकर पहले वह इंटरव्यू पढ़ा। टेबल पर खाना लग गया था। खाते-खाते आपस में भी चर्चा होती रही, और फिर हम सब टी.वी. के सामने बैठे तो दिल्ली से मेरी बहन रश्मि का फोन आ गया। उससे भी कुछ बातें की। पापा ने उससे पूछा था, “कब आ रही है मुंबई?” उसने अगले महीने आने की बात कही तो इतना ही कहा, “बहुत देर नहीं हो जाएगी?” और सचमुच में देर हो ही गई।

उसके बाद हमारी कुछ चर्चा उस इंटरव्यू को लेकर जारी रही। बारह बज चुके थे, यानी अगला दिन शुरू हो चुका था, आठ जुलाई! पापा ने टोस्ट के साथ एक कप चाय पीने की इच्छा जाहिर की। मम्मी उठीं और बना लाईं। पापा टोस्ट के साथ चाय पीकर लेट गए। हम भी सोने चले गए। करीब एक बजे मुझे बहुत देर तक बाथरूम में से पानी चलने की आवाज आती रही। हमारे मन में एक शंका-सी उठी। हम भी जाग रहे थे कि पापा आकर बोले, “बिटिया, जरा मेरा ब्लड-प्रेशर चेक कर ले।”

मन पहले से ही शंकित-सा था कि कुछ न कुछ गड़बड़ है, ब्लड-प्रेशर मापा तो 210 था। उसे वहीं छोड़कर मैंने जल्दी से पहले अस्पताल में वैन भेजने के लिए फोन किया और फिर अपने फैमिली डॉक्टर को सब हालत बताई, तो वे कुछ ही देर में आ गए। पापा की हालत गंभीर हो चली थी, वे एकदम निढाल से हो गए थे। डॉक्टर समझ गए थे कि बात हाथ से निकल चुकी है। एंबुलेंस भी आ गई, और हम उन्हें अस्पताल लेकर गए, डॉक्टर साहब भी हमारे साथ थे। वहाँ पहुँचने पर हार्ट स्पेशलिस्ट ने हार्ट को काफी रिवाइव करने की कोशिश की, पर वे हार मान गए। हम वहीं खड़े रह गए। इतने थोड़े से पलों में सब-कुछ बदल गया था। जिन्होंने पापा को बाजार जाते देखा था, वे आश्चर्यचकित थे। खुद हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि पापा हमारी जिंदगी से निकलकर एकाएक जैसे एक तारे में तब्दील हो गए थे। हम हैरान और स्तब्ध थे।

उनके जाने के बाद घर में एक शून्य-सा व्याप्त हो गया था। शाम को काम पर से घर लौटने पर मैं उनसे बातें करने के लिए तरसती रहती। वे यों अचानक चले गए कि ठीक से मिल भी नहीं पाए हम घर-परिवार के लोग। आज उनकी पुरानी फाइलें और मित्रों, परिजनों को लिखे पत्रों की प्रतिलिपि पढ़ती हूँ तो वे जैसे सामने आकर खड़े हो जाते हैं।

अपनी लिखी पांडुलिपियों को वे बड़ी शिद्दत से सहेजकर रखते थे। जो कुछ लिखते, उसे खुद संपादित करते और कार्डपेपर से जिल्दबंद करके, सुंदर अक्षरों में अपने हाथ से उस पर उपन्यास का शीर्षक लिखते थे। उनका हर काम सुनियोजित होता था...बल्कि इस बात का उन्हें शौक था कि अपनी चीजों को ढंग से रखें। उन्हें यह कतई पसंद न था कि उनकी यथास्थान रखी कोई भी चीज उठाकर हम कहीं और रख दें। अपनी जिंदगी की शुरुआत उन्होंने बेहद हिलती-डुलती आर्थिक स्थिति और सिर्फ दसवीं तक की पढ़ाई से की थी। उसके मुकाबले अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर उन्होंने जिंदगी को जिस जज़्बे के साथ जिया, उसे आप सबके साथ-साथ मैं भी सलाम करती हूँ। 
***

मंजुरानी जैन
10, नरूला बिल्डिंग, पहला माला, 21वीं रोड, चेंबूर, मुंबई-400071,
चलभाष: +91 986 968 6430 

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।