अनुवाद: पी बी शैली की पाँच कविताएँ

पर्सी बेयिश शैली (Percy Bysshe Shelley) इंग्लैंड के रोमांटिक कवियों में से एक है। सिर्फ उन्तीस बरस की उम्र में नौका दुर्घटना में उनकी मौत हुई। जीवनपर्यंत प्रसिद्धि न मिलने के बावजूद उन्हें मृत्यु के बाद जबरदस्त प्रसिद्धि मिली। रॉबर्ट ब्राउनिंग, थॉमस हार्डी और डब्ल्यू बी यीट्स की कविताओं पर उनका काफी प्रभाव देखा गया। परसी का जन्म 4 अगस्त 1792 और मृत्यु 8 जुलाई 1822 को में हुई। ओज़ीमेंडियस उनकी बहुचर्चित कविता थी लेकिन बाकी कविताएँ भी बेहद सराही गईं । यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी 5 रूमानी कविताएँ। (अनुवादक: किशोर दिवसे)




प्रेम दर्शन (LOVE'S PHILOSOPHY)

किशोर दिवसे
नदियाँ एकाकार है असंख्य झरनों में 
और महासागर में समाती हैं विरही नदियाँ
स्वर्ग से बहती है मधुर मंदानिल सरस 
प्रणय आलिंगन में देखो कैसी है समरस 
 *****

विश्व में कुछ भी नहीं, इस अलौकिक पाश से परे
शाश्वत देवाज्ञा की दास है मानवसंतति - लोग सारे
जब सभी मानव जन हैं एक-दूसरे से गुम्फित
फिर मैं क्यों रहूँ, अलहदा और तिरोहित
 *****

देखो! नीलाभ का चुम्बन लेता है उत्तुंग हिमगिरी
लहरों के अनथक आलिंगन, भोर थी, सांझ है घिरी
सुवासित गंधित पुष्पों की सहज अठखेलियाँ
धरती को सहलाती, पंखुरी सी रश्मियाँ
 *****

साग़र को चूमती चन्द्र किरणें चंचला
प्रेम दर्शन का यही है जीवंत जलजला 
चुम्बन ही मानवसंतति के जीवन का सार 
निस्संदेह प्रणय बिना मैं भी हूँ निस्सार
***


उसके लिए (TO MUSIC WHEN SOFT VOICES DIE)

संगीत के सुर गूंजते हैं मीठी यादों में 
प्रेमालाप की धुन जब हो जाती है गुम
गमक एहसास कराती है गंध का 
मुरझा जाते हैं जब महकते फूल
 ****

प्रेमिल गुलाबों के मुरझाने पर पंखुड़ियां
प्रेमिका के लिए रचती है मखमली सेज
और जब विचार भी कहीं हो जाते हैं गुम
उनींदी होने लगती हैं प्रेम की बोझिल आँखें
***


कवि का स्वप्न (THE POET'S DREAM)

कवि के ओठों पर निद्रामग्न प्रेमदक्ष
स्वप्न में डूबे अगणित यक्ष 
श्वासों में हो रहे थे स्पष्ट प्रतिध्वनित 
उनके नश्वर, मानवी सुखों को अर्पित
 *****

पीछा करती हैं आकृतियाँ विचारों के झंझावात में 
सांझ तक खोया है कवि जिनके चुम्बनों में 
झील पर प्रखर पावन सूर्य का प्रतिबिम्ब 
पीली मधुमक्खियों के छत्तों की मानिंद
 *****

फिर भी विचारों के बीहड़ में हैं गुम्फित
तंतुओं के तार... शब्दों के मणि अगणित
यथार्थ रूप में प्रकट हो जाते हैं सूत्र
साकार हो जाते हैं सारे मानसपुत्र
***

विरही परिंदा (TO THE WIDOW BIRD)

बिछड़ी माशूका के गम में मायूस था 
विरह से व्यथित एक विरही परिंदा
बैठा था काँपती डाल के कोने पर
गुमसुम... यादों के हसीन हिंडोले पर
 *****

सीना चीर रही थी ऊपर हवाएँ सर्द
नीचे बहता झरना भी हो गया था बर्फ
बेरौनक थे बेपत्ता जंगलों के नंगे ठूँठ
जमीन पर भी नहीं गिरा था एक भी फूल
खामोश थी हवाएँ ... एकदम बेजान
गाहे-ब-गाहे चीखती थी पवनचक्की नादान
***


स्वप्नमयी संगिनी (A DREAM OF UNKNOWN 

स्वप्नरत, रास्ते से गुज़रते देखा मैंने
सर्दियाँ हुई मौन... अचानक आ गया वसंत
भटक गया मन, ऐसी गमकती थी गंध
समाए थे जिसमें जलधाराओं के रंग
 *****

बहती जलधाराएँ . पसरे हुए दूब चौरे पर
घनी झाड़ियों ने जिसे रखा था ढककर 
कभी नहीं संजोया था साहस जिसकी
हरित-मयूरपंखी उतावली बाहों ने
झरने के मदमाते-मचलते यौवन को 
मनचले की तरह बाहुपाश में लेने का
 *****

पर... अधीर, चुम्बन लेकर लहराता बढ़ चला
स्वप्न में ही किसी शूर पराक्रमी की तरह
पुष्प खिले थे वहाँ बहुरंगी-नीलपुष्प 
भीगी थी धरा भोर के स्वाति बूंद मोतियों से
धूमिल ऑक्सलिप और नाजुक नील घंटिकाएँ 
जिनके जन्म पर ही उखड़ने लगती हैं 
त्रिणमृदा की उत्तेजित बहकती साँसें
धौंकनी की तरह धक-धक धड़कती हैं 
 *****

और आसमान की और मुँह ताकता पुष्प 
भिगोता है प्रकृति के ममतामयी चेहरे को
स्वर्ग से सहेजे स्वाति सागर से
जब बहती है पुष्प की संगिनी बयार
महकती मंदानिल की गमकती गुनगुनाहट से
प्रफुल्लित होते हैं पुष्प हर्षातिरेक से
 ****

ऊबदार शल्यकी में उगती हैं अनेक 
अरण्यजमा की घनी लहराती लताएँ
हरी केवांच और चंद्ररंगी वसंत रानी
खिलते हैं सूर्यमुखी और श्वेत कटोर
 *****

रिसता नहीं है इनका मधुरस देर तक
जंगली गुलाबों और सिरपेंचे की लता सर्पिल
अपनी गहरी कलियों और पत्तियों के साथ
भटकते हैं दिशाहीन बयार के झोंकों से
सुनहरी धारियों से सजे नीलवर्णी पुष्प
जागती आँखों से भी हैं अधिक चमकीले
 ****

नदी के थरथराते किनारों के निकट 
खिलते हैं हेमवती के बैगनी पताका पुष्प
सजते हैं सफ़ेद चकत्तियों के साथ
क्यारियों में पसरती हैं घनी जलकुम्भियाँ 
जिनकी रश्मियाँ प्रकाशित हैं चंद्रप्रभा से 
वहीँ हैं दलदली सेवार और सरकंडा 
हरीतिमा जिसकी बढ़ाती है नेत्रों की आभा
नदी के थरथराते किनारों के निकट 
 *****

मैं सोचता हूँ ... इन ढेर सारे पुष्पों से 
बनाऊं एक गुलदस्ता सजीला सुंदर
उनकी आभा और अठखेलियाँ लगें ऐसे
निकुंज में गले मिलें, और रूठे कोई जैसे 
हाथों में हो अगणित कालखंड के मानसपुत्र से
प्रफुल्लित होकर मैं पहुँच जाऊँ वहाँ 
प्रेमार्पित कर सकूँ इसे मैं जहाँ 
ओह! पर किसे? तलाश करूँ मैं, कहाँ?
***

अनुवादक: किशोर दिवसे: विश्व पटल पर बहुचर्चित वैश्विक लोककथाएँ, इतिहास,विज्ञान,स्त्री विमर्श से संदर्भित
मराठी-हिन्दी तथा अंग्रेज़ी-हिन्दी अनूदित 11 पुस्तकें (भाषांतर और संकलन)। अंग्रेज़ी व मराठी से काव्यानुवाद। सतत मौलिक रचनात्मक कहानी लेखन। नवभारत समाचारपत्र समूह में 36 वर्ष का संपादकीय अनुभव।
शिक्षा: एम जेएमसी, एम फिल. (पत्रकारिता)
चलभाष: +91 982 747 1743
ईमेल-kishorediwase0@gmail.com
निवास: फ्लैट 206, अनंत वैभव सोसायटी, डी एस के रानवारा रोड, चेलाराम हॉस्पिटल के पास, बावधन, 411021, पुणे (महाराष्ट्र)
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