कवि गोरख प्रसाद मस्ताना के गीतों में राष्ट्रीय चेतना

डॉ. ममता

महासचिव, 'सम्यक संवाद', दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

राष्ट्रीय चेतना राष्ट्र में रहने वालों की राष्ट्र के प्रति, सम्मान, समर्पण और त्याग के भाव का वह नाम है, जो उसे राष्ट्र की गरिमा और मर्यादा की रक्षा के लिए सर्वदा प्रेरित करती रहती है।

राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद, आदि शब्द उसी चेतना से अर्जित शब्द हैं जिन्हें हम अपने कर्म शब्द और भावाभिव्यक्ति के द्वारा प्रस्तुत करते हैं। मेरा भारत महान, हमारा भारत देश, भारत माता की जय, वन्दे मातरम आदि पदबंध उसी राष्ट्रीय चेतना से उपजे शब्द हैं जो हमारे ह्रदय और मस्तिष्क को झंकृत किये रहते हैं, जिनपर हम गर्व करते हैं। 
 व्यक्ति जब कर्म से योद्धा, बुद्धि से चिन्तक, स्वभाव से संत, और आचरण से शालीन हो जाता है, तो वह प्रकारांतर से चिंतनशील और फिर राष्ट्रवादी हो जाता है। उसे राष्ट्र से ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता तथा देश ही उसके लिए धर्म और कर्म हो जाता है।

उपरोक्त राष्ट्रीय भावों को हिंदी के प्रसिद्ध मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान और गोपालसिंह नेपाली जैसे रचनाकारों ने अपने सर्जन का विषय बनाया और भारतीय साहित्यिक भंडार में वृद्धि की है। साथ ही जन मन की सोई आत्मा को जगा कर उन्हें राष्ट्र के प्रति अपने कृतव्यों का अनुपालन करने का सन्देश भी दिया है।

इसी क्रम में हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार डॉ गोरखप्रसाद मस्ताना की रचनाओं में भी राष्ट्रीय चेतना के विभिन्न भावों को महसूस किया जा सकता है। डॉ मस्ताना रचित सभी गीति काव्यों में राष्ट्र के प्रति चेतना के स्वर मुखरित होते प्रतीत होते हैं। कवि अपने पूर्वज कवियों की महान राष्ट्रवादी परम्परा को उनके प्रति समर्पण के भाव के साथ रचनाओं में प्रस्तुत करते हैं। वह एक व्यापक दृष्टि के साथ राष्ट्र की महानता का वर्णन करने के साथ- साथ राष्ट्र में रहने वालों का राष्ट्र के प्रति त्याग समर्पण और उसके गुणगान के भावों को अपने शब्दों में व्यक्त करने लगते हैं। कला, कलम और कर्तव्य जब राष्ट्र प्रेम की चाशनी में सने होते हैं तो  राष्ट्रीय चेतना के स्वर का मुखरित होना अवश्यंभावी है तथा इसी सन्दर्भ में डॉ मस्ताना मातृभूमि को समर्पित एक गीत लिख जाते हैं:
            हे वसुंधरा ! तू माँ मेरी 
            जग तेरी महिमा कहे कहे 
            हैं बूंद बूंद शोणित अर्पित
            ले ले तू पर आजाद रहे (1)         (रेत में फुहार  काव्य संग्रह, ‘हे धरती’ कविता)

भारत देश प्रारंभ से ही सर्वधर्म संद्भाव का देश रहा है। प्रत्येक जाति, धर्म या सम्प्रदाए के लोगों ने इसे समान रूप से सम्मान दिया है। सबके बीच का भाईचारा ही हमारे राष्ट्र की विशिष्टता रही है। यहाँ भारती की गोद में सबका सामान संवर्धन होता आया है, यह देश अपनी सहिष्णुता के लिए सर्वकालिक महान रहा है। इसी को दर्शाते हुए कवि गोरख प्रसाद मस्ताना लिखते हैं:

            यही मंदिर मस्जिद का मेल 
            सभी धर्मों का हम सम्मान 
            कहीं पर रामायण के बोल
            कहीं पर पंचों वक्त अजान (2)  (रेत में फुहार  काव्य संग्रह, ‘गाँव’ कविता)

राष्ट्रीय चेतना में जन-मन जहाँ अपनी राष्ट्रीय धरोहरों को अपना गर्व समझता है, वहीं उसने अपने वीरों को सर्वदा अपनी स्मृतियों में जगह दी है, जिन्होंने इस देश की मर्यादा और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। आज हमारा राष्ट्र ध्वज तिरंगा जब नीलाम्बर में लहराता है तो हमारी छाती गर्व से चौड़ी होती है और नसों में नए जोश का संचार होने लगता है। राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय भावना का दर्शन हमारे तन-मन में नवीन ऊर्जा भर देता है। कविवर मस्ताना इन सभी दृश्यों को अपनी एक काव्य रचना में प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं-

            “लिख दे गंगा का पवन जल, जमुना जी का पानी लिख 
            लहर- लहर पर इसके अपनी साहस भरी कहानी लिख 
            ध्वजा तिरंगा रहे विहँसता, हँसता नील गगन में 
            नई शक्ति, नव प्राण अहर्निश, लह्लाये जन मन में 
            मान शान हित वीर शिव जी की तलवार भवानी लिख” (3)  (‘गीत मरते नहीं’ काव्य संग्रह, ‘हिन्दुस्तानी’ कविता)

राष्ट्रीय चेतना को अनवरत जाग्रत रखने में हमारे शहीदों का बलिदान सर्वोपरि है। वे देश के लिए अपना बलिदान देकर आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र्हेतु आत्मोत्सर्ग का पाठ पढ़ा जाते हैं। कवि ‘बलिदान’ शब्द को पवित्रता का वह वस्त्र पहना जाते हैं जिससे हर कोई इन वीरों के सम्मान में अपना शीश झुका देता है। कवि की  तमन्ना है कि हमारी अंजनी का हर फूल भारत माता के चरणों और शहीदों की चिताओं के लिए होना चाहिए। मस्ताना जी के यह विचार उनके गीतों में स्पष्ट देखने को मिलते हैं। वे लिखते हैं-
            “चल करें फूलों की खेती सुगन्धित मन प्राण हो 
            जो सुमन सुरभित हो, भारती को समर्पित 
            जो भी जयकारा लगे हो, शहीदों हित उच्चरित 
            नयन में हो तिरंगा रुदन में हिंदुस्तान हो” (4)  (अक्षर अक्षर बोलेगा, काव्य संग्रह, ‘खेती फूलों की’ कविता)

भारतभूमि किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है इसके हर प्रदेश में जीवन का मधुर स्वर बसता है।  इसकी माटी, यहाँ की हवाएं, नदियाँ सब हमारे राष्ट्र की वंदना में रत लगते हैं।  कवि मस्ताना की दृष्टि जब यहाँ पहुंचती है तो एक गीत का जन्म होता है-

           “वसुधा है अपनी धर्म धाम 
            है इसी धारा का हिन्द नाम 
            है सब भले ही भिन्न भिन्न   
            पर मुक्ति भाव सबके अभिन्न “(5)   (‘तथागत’ काव्य संग्रह, ‘चिंतन सर्ग’ कविता)

वह राष्ट्र चेतना ही है जिसके बलबूते पर देश की सीमा की रक्षा हेतु हमारे वीर सैनिक जीरों डिग्री से नीचे के तापमान में भी अपने प्राणों की बाजी लगाये रहते हैं। कभी कड़ी धूप, भारी वर्षा, असहयनीय ठंड तो कभी दुश्मनों की गोलियों की बौछार सबके बीच में अपने प्राणों का मोह त्याग अडिग रहते हैं। देश रक्षा में तैनात इन वीरों की लाशें जब तिरंगे में लिपट कर उनके घर आती हैं तो आकाश उनको श्रद्धांजलि देता हुआ वीरों की जयजयकार से गूंज उठता है। कवि डॉ मस्ताना ऐसे वीर जवानों के बलिदानों को उनका जन्मोत्सव कहते हैं। कवि लिखते हैं –

            “तिरंगे में लिपट कर शरीर 
            भारती का वीर
            मुख पर असीम शांति 
            गर्व की चमक मुख पर 
            मात्र भू का अंक लौटा 
            अपने जन्मदिवस के दिन 
            करके अपना आत्मोत्सर्ग” (6) (‘बिंदु से सिंधु तक’ काव्य संग्रह, ‘जन्मदिन’ कविता)

स्वयं को मिटा कर राष्ट्र बचाने का भाव ही देश प्रेम है जिसे सच्चा राष्ट्रवाद भी कहा जा सकता है। कविवर माखनलाल चतुर्वेदी ने “पुष्प की अभिलाषा” कविता में एक पुष्प के माध्यम से त्याग, समर्पण और सैनिकों के प्रति कृतज्ञता के भाव को जिस मनोभाव के साथ प्रस्तुत किया है। कुछ ऐसा ही डॉ मस्ताना की रचनाओं में भी देखने को मिलता है वे लिखते हैं –

            “अस्तित्व रहे भारत भू का अपना अस्तित्व मिटा देना 
            इस पावन धरती के चरणों में अपना सर्वस्व लुटा देना 
            इस जनम की बातें बचा करना 
            सौ जनम सफल हो जायेंगे” (7)   (‘गीत मरते नहीं’ काव्य संग्रह, ‘समर्पण’ कविता)

राष्ट्र के प्रति सर्वस्व त्याग देना उस पुनर्जन्म के फेर से कहीं अधिक लाभकारी है जो सहस्त्र वर्षों के यश के समान है और यही हमारी राष्ट्रीय चेतना को एक नया स्वरुप देता है। राष्ट्रीयता राष्ट्र के भीतर विभिन्न विषयों की अलग -अलग चेतना होती है। यह मनुष्य की स्वाभिविक वृतियों में से एक है इस चेतना के जाग्रत होते ही व्यक्ति राष्ट्र के कल्याण और विकास के प्रति सचेत होने लगता है। राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर के कविताओं में जिस तरह राष्ट्र चेतना के भाव उद्घृत किया हैं कुछ ऐसा ही भाव डॉ मस्ताना के गीति काव्य में भी उपस्थित नज़र आता हैं –

           “जगत का गौरव हिंदुस्तान देश है पावन तीर्थ महान 
            शंखनाद, जयघोष मध्य मुस्काता है दिनमान
            अतुल शक्ति का देश हमारा एक भाव एक भेष हमारा 
            हर बाला है लक्ष्मीबाई, मन में बिजली ले अंगड़ाई 
            बालक बालक राणा प्रताप, शिवाजी वीर महान” (8) (‘गीत मरते नहीं’ काव्य संग्रह, ‘मेरा देश’ कविता)

राष्ट्र की सीमा में रहने वाला व्यक्ति वहाँ का नागरिक होता है। उसके कुछ अधिकार हैं तो कुछ कर्तव्य भी। कोई भी रचनाकार जो स्वयं राष्ट्र के प्रति चेतनशील है उसकी आँखों में देश के विभिन्न चित्र विभिन्न रंगों में उभरते हैं। वह देश को अपनी सांसों और ह्रदय से अलग नहीं रख सकता। राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए जीने-मरने का भाव ही किसी राष्ट्र प्रेमी की पहली शर्त होनी चाहिए। ऐसा होते ही वह राष्ट्र का आह्वान करने लगता है।

डॉ मस्ताना ने अपनी एक रचना में राष्ट्र का मानवीकरण कर दिया है। मानवीकरण काव्य का वह प्रांजल अलंकार है जिसमे अमूर्त को मूर्त, निर्जीव को सजीव करने की क्षमता परिलक्षित होती है। कविता की कमनीयता तो बढ़ जाती है। काव्यात्मक शक्ति को एक नया आयाम मिलता है।
“चले देश को एक निमंत्रण पत्र लिखें
वो आयेगा, सब आयेंगे, चर्चा ये सर्वत्र लिखें
देश मेरे हृदय में बस जा
मैं तुझमें रम जाऊँ
समय पड़े तो शीश झुकाकर
तेरे चरण चठाऊँ” (9) (‘गीत मरते नहीं’ काव्य संग्रह, ‘निमंत्रण’ कविता)

आधुनिक काल के साहित्यकारों ने राष्ट्र भावना से प्रेरित होकर राष्ट्र प्रेम की अनेक रचनाओं का प्रणयन किया है। प्रसाद के गीतों में,सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं में,श्याम नारायण पाण्डेय या गोपाल सिंह नेपाली की रचनाओं में देश भक्ति के भाव सहज ही दिखाई पड़ते हैं। इसी में ‘वीरों का कैसा हो बसंत‘ या ‘चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा ‘ शीर्षक कविताओं का अध्ययन हमे राष्ट्रीयता के भावो से परिपूर्ण कर देता है। डॉ मस्ताना उसी परम्परा का निर्वहन करते हैं और अपने गीति काव्य में राष्ट्र चेतना के समर्थन में लिखते हैं :

“अनगिन बलिदानों का ही फक है अपनी आजादी 
हों स्वतंत्र हम इसलिए लाखों ने प्राण गँवा दी 
जननी जन्म धराहित अपना, सदा समर्पित प्राण रहे” (10) ( ‘गीत मरते नहीं’ काव्य संग्रह, ‘समर्पण’ कविता)

किसी भी रचनाकार की कवितायें, कथा-कहानियाँ और गीतों में यदि राष्ट्रीयता का भाव है तो इसका अर्थ है कि उसे अपनी रचनाधर्मिता का ध्यान है। एक कवि या गीतकार का कर्तव्य हो जाता है कि वह न केवल प्रेम या प्रकृति पर ही अपनी रचनात्मक दृष्टि डाले अपितु उसे अपनी रचनाओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम और जिम्मेदारियों का एहसास कराने का दायित्व भी रखना चाहिए। डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना ने अपने गीति काव्यों में राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय चेतना का उल्लेख करके यह साबित किया है कि वह स्वयं राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत कवि हैं और अपनी रचनाओ से चेतना जगाने का कार्य कर रहे हैं। वे लिखते हैं-
            “सुनो शहीदों की पुकार उतर रही अम्बर से 
            दशों दिशाओं से सागर, नदियों से हिम गहव्वर से 
            देश निमित सर्वस्व लुटा, चल नव इतिहास बनाने को” (11) (‘रेत में फुहार’ काव्य संग्रह, ‘पुन:चीन ललकार रहा’ कविता)

उपरोक्त रचना के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि डॉ मस्ताना राष्ट्रीय चेतना के एक सबल कवि व गीतकार हैं और उनकी कृतियाँ राष्ट्रीय भावो से परिपूर्ण हैं जिन्हें सुनकर हममें राष्ट्रीय चेतना का संचार होता है।

संदर्भ-  
1) रेत में फुहार-‘हे धरती’, जे.बी.एस पब्लिकेशन, नई दिल्ली, संस्करण 2017, पृष्ठ 59,
2) रेत में फुहार-‘गाँव’, जे.बी.एस पब्लिकेशन, नई दिल्ली, संस्करण 2017, पृष्ठ 57
3) गीत मरते नहीं- ‘हिंदुस्तानी’, शारदा पुस्तक मंदिर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2014’
4) अक्षर अक्षर बोलेगा’- ‘खेती फूलों की’’, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.40
5) तथागत-‘चिंतन सर्ग’, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2017, पृ. 40
6) बिदुं से सिंधु तक- ‘जन्मदिन’, जे.बी. एस पब्लिकेशन, नई दिल्ली, संस्करण 2016, पृ.65
7) गीत मरते नहीं- ‘समर्पण’, शारदा पुस्तक मंदिर, नई दिल्ली, संस्करण 2014, पृ.56
8) ’गीत मरते नहीं- ‘मेरा देश’, शारदा पुस्तक मंदिर, नई दिल्ली, संस्करण 2014, पृ.86
9) ‘गीत मरते नहीं’-, ‘निमंत्रण’, शारदा पुस्तक मंदिर, नई दिल्ली, संस्करण 2014, पृष्ठ 55
10) ‘गीत मरते नहीं’ काव्य संग्रह, ‘समर्पण’ कविता) शारदा पुस्तक मंदिर,नई दिल्ली, संस्करण 2014, पृ.सं 68
11) रेत में फुहार-‘पुन:चीन ललकार रहा’, जे.बी.एस पब्लिकेशन, नई दिल्ली, संस्करण 2017, पृष्ठ 34

1 comment :

  1. सम्यक समीक्षा। डॉ.ममता ने डॉ मस्ताना के गीतों को सूक्ष्मता से अध्ययन कर उसकी उत्तम विवेचना की है। बधाई

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