मैला आंचल में स्त्री चेतना

नीलम वाधवानी

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237



फणीश्वर नाथ 'रेणु' का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले में फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना ग्राम स्थित जैसवार कुर्मी परिवार में हुआ था। उस समय यह पूर्णिया जिले में था। उनकी शिक्षा भारत और नेपाल में हुई। रेणु जी का बिहार के कटिहार से गहरा संबंध रहा है।

उनकी पहली शादी कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड अंतर्गत बलुआ ग्राम में काशी नाथ विश्वास की पुत्री रेखा रेणु से हुई। हसनगंज के ही गाँव महमदिया ग्राम में पद्मा रेणु की मायके हैं और रेणु जी के दो और पुत्री सबसे बड़ी कविता रॉय और सबसे छोटी वहीदा रॉय की शादी महमदिया और कवैया गाँव में हुई है। प्रारंभिक शिक्षा फारबिसगंज तथा अररिया में पूरी करने के बाद रेणु ने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की।

इन्होंने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में की जिसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई। पटना विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के साथ छात्र संघर्ष समिति में सक्रिय रूप से भाग लिया और जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति में अहम भूमिका निभाई। 1952-53 के समय वे भीषण रूप से रोगग्रस्त रहे थे जिसके बाद लेखन की ओर उनका झुकाव हुआ। उनके इस काल की झलक उनकी कहानी 'तबे एकला चलो रे' में मिलती है। उन्होने हिन्दी में आंचलिक कथा की नींव रखी। सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, एक समकालीन कवि, उनके परम मित्र थे। इनकी कई रचनाओं में कटिहार के रेलवे स्टेशन का उल्लेख मिलता है। वे एक हिन्दी भाषा के महान साहित्यकार थे। इनके पहले उपन्यास मैला आंचल को बहुत ख्याति मिली थी जिसके लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

मैला आंचल उपन्यास  तत्कालीन जातीय टोलों में बँटे देशज समाज की ओर दृष्टि करता है, लेखक ने राजनीति में जाति और जाति में राजनीति आदि को सहजता से उभारते हुए आंचलिक कथा को राष्ट्र से लेकर वैश्विक परिदृश्य पर ले जाते हुए साहित्य में नया कीर्तिमान रचा है। रेणु अपनी रचनाओं में सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय के संघर्ष को धार देते हुए दिखते हैं, वहीं लैंगिक न्याय, क्षेत्रीय न्याय, जात-वर्ग तथा क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल भी मुखरता से उठाते हैं। रेणु की रचनाओं में कई आंदोलनों की धमक भी सुनाई पड़ती है।

 रेणु का व्यक्तित्व एवं कृतित्व कई आयामों से रूबरू कराता हैं।  रेणु की रचनाएँ उनका साक्षात्कार कराती है। वे कहीं लोकरंग के चितेरे बन उभरते हैं। कहीं सामाजिक संघर्षों को राह दिखाते नजर आते हैं। कहीं सामाजिक आंदोलनों को धार देते हैं, तो समाज के हाशिए पर खड़े बेजुबानों की अवाज़ बन जाते हैं। राजनीतिक पार्टियों के चेहरे से नकाब हटाते हुए उन्हें चेताते भी हैं।

रेणु मानवीयता को सबसे ऊपर रखते हैं। उनकी रचनाओं में पात्र गढ़े हुए नहीं बल्कि रचे-बसे हैं। उन्होंने पात्रों के बीच रहते हुए लिखा है। जिस कारण पात्रों के भीतरी-बाहरी भाव भी बड़ी सच्चाई से सामने आ जाते हैं। पढ़ते हुए दृश्य भी उपस्थित हो जाते है और रचना यथार्थ से सीधे जुड़ जाती है। उनका “कितने चौराहे” मॉरिशस के युवाओं के बीच आज भी लोकप्रिय है। युवा उसमें अपने आपको खोजते और जोड़ते नजर आते हैं, वहीं फणीश्वर नाथ नेपाल में रेणु बनकर विस्तार पाते हैं।

नेपाल से उनका गहरा लगाव, नेपाल क्रांति में सक्रिय भूमिका के साथ रूस में भी रेणु की लोकप्रियता देखने को मिलती है। रेणु साहित्य में व्याप्त आंचलिकता, मानवीयता की तलाश, आँचलिकता बनाम राष्ट्रीयता, लोक जीवन, लोक संस्कृति, महिलाओं की दशा, महिला सशक्तीकरण, सामाजिक यथार्थ, “तीसरी कसम” कहानी से फिल्म तक, रेणु की जनपक्षीय पत्रकारिता भूमि. पर्यावरणीय चेतना, लोक संवेदना आदि कई पक्ष मजबूती से उभरते हैं।इनका लेखन प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को आगे बढाता है और इन्हें आजादी के बाद का प्रेमचंद की संज्ञा भी दी जाती है। अपनी कृतियों में उन्होंने आंचलिक पदों का बहुत प्रयोग किया है। रेणु को जितनी ख्याति हिंदी साहित्य में अपने उपन्यास मैला आँचल से मिली, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। इस उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें रातो-रात हिंदी के एक बड़े कथाकार के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। कुछ आलोचकों ने इसे गोदान के बाद इसे हिंदी का दूसरा सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित करने में भी देर नहीं की। हालाँकि विवाद भी कम नहीं खड़े किये उनकी प्रसिद्धि से जलनेवालों ने. इसे सतीनाथ भादुरी के बंगला उपन्यास 'धोधाई चरित मानस' की नक़ल बताने की कोशिश की गयी। पर समय के साथ इस तरह के झूठे आरोप ठण्डे पड़ते गए।

रेणु के उपन्यास लेखन में मैला आँचल और परती परिकथा तक लेखन का ग्राफ ऊपर की और जाता है पर इसके बाद के उपन्यासों में वह बात नहीं दिखी। इनके मुख्य उपन्यास 'मैला आंचल' 1954; 'परती परिकथा' 1957; 'जूलूस'; 'दीर्घतपा' 1964; 'कितने चौराहे' 1966; 'कलंक मुक्ति' 1972; 'पलटू बाबू रोड' 1979। कथा-संग्रहों में 'ठुमरी' 1959; 'एक आदिम रात्रि की महक' 1967; 'अग्निखोर' 1973; 'एक श्रावणी दोपहर की धूप', 1984; 'अच्छे आदमी', 1986।

रिपोर्ताजों में 'ऋणजल-धनजल', 'नेपाली क्रांतिकथा', 'वनतुलसी की गंध', 'श्रुत अश्रुत पूर्व तथा इनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ इस प्रकार है, 'मारे गये गुलफाम (तीसरी कसम)', 'एक आदिम रात्रि की महक', 'लाल पान की बेगम', 'पंचलाइट', 'तबे एकला चलो रे', 'ठेस', 'संवदिया'। 'तीसरी कसम' पर इसी नाम से राजकपूर और वहीदा रहमान की मुख्य भूमिका में प्रसिद्ध फिल्म बनी जिसे बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया और सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र इसके निर्माता थे। यह फिल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। हीरामन और हीराबाई की इस प्रेम कथा ने प्रेम का एक अद्भुत महाकाव्यात्मक पर दुखांत कसक से भरा आख्यान सा रचा जो आज भी पाठकों और दर्शकों को लुभाता है।

फणीश्वर नाथ रेणु जी के साहित्य को लेकर पुस्तक भी लिखी गई जिनमें रेणु शाह की  'फणीश्वर नाथ रेणु का कथा शिल्प', का प्रकाशन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के ग्रांट से 1990 में कराया गया है। समता पार्टी के महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव उदय मंडल ने भारत सरकार से फणीश्वरनाथ 'रेणु' को भारत रत्न देने की मांग भी की है।


तत्कालीन उपन्यासकारों में फणीश्वर नाथ रेणु का स्थान एवं स्त्री दृष्टि

भारत में उपन्यास विधा आधुनिक काल की नवीन विधा है। आरंभिक उपन्यासों की केंद्र में स्त्री की भूमिका को देखते हुए प्रमुख उपन्यास है- भाग्यवती देवरानी जेठानी की कहानी वामा शिक्षक सभी उपन्यासों में स्त्री के आदर्शवादी एवं नकारात्मक दोनों रूपों को उपस्थित किया गया है। अतः उपन्यास के प्रारम्भ से ही स्त्री-जीवन के विभिन्न पक्षों को लक्षित किया जाने लगा था। इस संदर्भ में मैनेजर पाण्डे का कहना है-"उपन्यास ने अपने उदयकाल से ही स्त्री की पराधीनता के बोध और स्वतन्त्रता की अवश्यकता की ओर संकेत किया है।"1

 हिन्दी में उपन्यास का उदय ही समाज में स्त्री की स्थिति के बोध के तथा उसकी समस्याओं के चित्रण के साथ हुआ था। परन्तु प्रारम्भिक दौर में स्त्री-जीवन के चित्रण में उपन्यासकारों को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई क्योंकि उपन्यासकारों की स्त्री-दृष्टि पर मुख्यतः सामन्ती प्रवृत्ति हावी थी। इसीलिए अधिकांश  उपन्यासकार सुधारवाद, मनोरंजन, उपदेश एवं कल्पनाओं की तर्ज़ पर स्त्री-जीवन के प्रश्नों को उठा रहे थे। स्त्रियों के बारे में एक नवीन सोच को लेकर जिस उपन्यासकार ने कदम रखा वह थे प्रेमचंद। जिस प्रकार प्रेमचंद के आगमन से उपन्यास विधा को परिपक्वता प्राप्त हुई उसी प्रकार स्त्री-जीवन का सजीव, आदर्श एवं यथार्थ रूप भी प्रेमचन्द के उपन्यासों से उत्कृष्टता प्राप्त कर सका। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में हर वर्ग की स्त्री के जीवन संघर्ष को प्रस्तुत किया है लेकिन ग्रामीण स्त्री के संघर्षों को उन्होंने अधिक मार्मिकता से उठाया है। गोदान उपन्यास के स्त्री पात्र धनिया, मिस मालती, गोविंदी इसका मुख्य उदाहरण माना जा सकता है। आज की तुलना में यदि उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में लेते हुए समझने का प्रयास किया जाए तो हम पाते हैं कि आज विमर्शों के दौर में स्त्री प्रश्न स्वयं महिलाएँ सशक्त वाणी में उठा रही हैं। किंतु जिस समय प्रेमचंद और रेणु अपने उपन्यासों का सृजन कर रहे थे,तब स्त्री समस्याएँ और जटिल थी। ग्रामीण स्त्री अपनी स्थिति को नियति मानकर जी रही थी। मध्यगर्वीय स्त्री तो स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हो रही थी, लेकिन ग्रामीण स्त्री अब भी अपने खोल में सिमटी हुई थी। वह अपने हर कष्ट को अपने भाग्य का परिणाम मानकर भुगतने के लिए तैयार थी। फणीश्वर नाथ रेणु का महत्त्व यह है कि अपने पूर्ववर्ती लेखकों से विषयवस्तु लेकर भी वे उसे उसी तरह से प्रस्तुत नहीं करते जैसे उनके पूर्ववर्ती लेखक करते थे। इनसे पहले लेखक सनातन हिंदू आदर्शों के समर्थन में भारतीय समाज में पुरुष वर्चस्व को ही महत्त्व दे रहे थे। प्रत्येक गुण की इच्छा सिर्फ स्त्री जाति से की जा रही थी। पुरुष अपनी बिलासी प्रवृत्ति में भी पूज्य था। यह मूलतः सामन्ती दृष्टि थी, जो स्त्री की पराधीनता को ही उसके जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानकर चलने को मजबूर कर रही थी। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज में नारी की व्यापक पराधीनता के सवाल को उठाया था। तथा फणीश्वर नाथ रेणु ने उसे गहराई के साथ अपने उपन्यासों में स्थान दिया। साहित्य में प्रेमचंद के आगमन से जहाँ उपन्यास विधा को परिपक्वता प्राप्त हुई, वही साहित्य से स्त्री संबंधी सामन्ती दृष्टिकोण की पकड़ भी शिथिल होने लगी थी। प्रेमचंद ने स्त्रियों को पुरुषों के समकक्ष रखा। पारिवारिक स्तर पर उसका शोषण भले ही कम न हुआ हो, परन्तु आर्थिक संघर्ष में वह पुरुष की सहगामी बनी जैसे गोदान की धनिया। जिस समय प्रेमचंद रचना कर रहे थे उस समय देश व्यापी स्वतंत्रता-आंदोलन हुआ था। प्रेमचंद ने स्वाधीनता आन्दोलन को महत्व देते हुए, इन आन्दोलनों में स्त्री की महिती भूमिका  की ओर ध्यान खींचा। प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशिष्टता यह थी कि इन्होंने हर वर्ग की स्त्री की समस्या को उठाया। भारतीय स्त्री को पारम्परिक अर्थों में परिभाषित कर उनके शोषण और संघर्ष को अभिव्यक्ति दी।फणीश्वरनाथ रेणु प्रेमचंद के बाद के उपन्यासकार रहे हैं। उनका आविर्भाव उपन्यास के तृतीय चरण में हुआ। रेणु के समय तक स्त्री अपना अस्तित्व खोजने हेतु सजग हो चुकी थी। इस समय उपन्यासों पर ‘व्यक्ति स्वतन्त्रता’ की अवधारणा पूरी तरह छाई हुई थी। स्त्री एक उपकरण वस्तु ना होकर अपनी इच्छाओं को समाज के बीच में रखने वाली सक्षम नारी के रूप में पहचानी जाने लगी थी। इस दौर में जिन स्त्रियों को व्यक्ति मानकर ‘व्यक्ति स्वतन्त्रता’ की बात की जा रही थी, हालांकि गुणों की दृष्टि से यह स्त्रियाँ रेणु के स्त्री पात्रों से भिन्न थी। उनकी भिन्नता वर्गगत थी। इन्हें हम मूलतः जैनेंद्र तथा अज्ञेय के उपन्यासों में देख सकते हैं क्योंकि जैनेन्द्र, अज्ञेय आदि उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों से जिस स्त्री को पाठकों से अवगत कराया वे स्त्रियाँ मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करती है।उसे ही इन उपन्यासकारों ने लक्ष्य किया। परन्तु इनकी दृष्टि में समग्रता का अभाव रहा। इनकी दृष्टि निम्नवर्गीय समाज की स्त्रियों की समस्याओं और इच्छाओं पर नहीं गई मध्यवर्गीय स्त्री पर सिमट कर रह गई। ग्रामीण तथा निम्न वर्ग की स्त्रियों की समस्याओं से रूबरू होने वाले मुख्य लेखक के रूप में फणीश्वर नाथ रेणु हमारे सामने आते हैं क्योंकि उस समय भारत की आधी से ज्यादा आबादी गाँवों में बसी थी।  

मैला आंचल उपन्यास एवं स्त्री चरित्र

मैला आंचल उपन्यास के माध्यम से हम जान सकते हैं कि किस प्रकार स्त्रियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है तथा उन्हें बहला-फुसलाकर पुरुष वर्ग अपनी आवश्यकता को पूर्ण करता है। गरीबो  की लाचारी से लाभ उठा कर उनकी बहू-बेटियों पर हाथ साफ करने वाले बाबुओं की मेरीगंज में कोई कमी नहीं है। फुलिया और सहदेव मिसर का एक प्रसंग उपन्यास में है। इसी प्रसंग को लेकर रमजूदास की स्त्री कहती है "अरे फूलिया की माये, तुम लोगों को न तो लाज है और न धरम कब तक जवान बेटी की कमाई पर लाल किनारी वाली साड़ी चमकाओगी ? ... मानती हूँ कि जवान बेवा बेटी दुधारू गाय के बराबर है। मगर इतना मत दूहो कि देह का खून भी सूख जाय। " 2 

यह वाक्य कम शब्दों में ही तत्कालीन स्त्री के जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करता है कि किस तरह स्त्री का शोषण  हो रहा था यह शोषण करने वाली कहीं स्वयं स्त्री थी तो, कहीं पुरुष। एक स्त्री स्वयं अपने ही घर के भीतर असुरक्षित हो इससे ज्यादा स्त्री की दयनीय स्थिति क्या हो सकती है। स्त्रियों की दशा को देखने हेतु उन पंक्तियों पर भी ध्यान दिया जा सकता है जो लेखक द्वारा स्वयं स्त्रियों के शब्दों में से ही प्रेषित की गई है। गाँव की स्त्रियों के आपसी झगड़ों में अनैतिक संबंधों की चर्चा करते हुए पूरे गाँव की पोल खोल देती है। "मुँह संभालकर बात कर नेंगड़ी बात बिगड़ जाएगी। खलासी हमारा बहन बेटा है। बहन-बेटा लगाकर गाली देती है ? गाली हमारे देह में नहीं लगेगी। तेरे देह में तो लगी हुई है। अपने खास भतीजा तेतरा के साथ भागी तू और गाली देती है हमको ? सरम नहीं आती है तुझको ! बेसरमी, बेलज्जी! भरी पंचायत में जो पीठ पर झाडू की मार लगी थी सो भूल गई ? गुअरटोली के कलरू के साथ रात-भर भैंस पर रसलील्ला करती थी सो नहीं जानता है। तूं बात करेगी हमसे ?... रे सिंघवा की रखेली। सिंधवा के बगान का बंबै आम का स्वाद भूल गईं। तरबन्ना में रात-रात भर लुकाचोरी मैं ही खेलती थी रे ? कुरआँखा बच्चा जब हुआ था तो कुरआँखा सिंधवा से मुँह देखौन में बाछी मिली थी, सो कौन नहीं जानता।" 3

 फुलिया सहदेव मिश्र के साथ, तहसीलदार हरगौरी अपनी मौसेरी बहन के साथ। इतना ही नहीं विचार करने योग्य बात तो यह है कि गाँव  की धार्मिकता का प्रमुख स्थान मठ भी इससे अछूता नहीं है। मठ का महंत सेवादास लछमी पर अपना अधिकार इस प्रकार समझता है जैसे वह स्त्री ना होकर कोई वस्तु हो। उपन्यास में दिखाया गया है कि इससे पहले वसुमतिया के महंत ने लछमी पर अधिकार जमाने के लिये मुकदमेबाजी की थी। इस मुकदमेबाजी में सेवादास जीते और उन्होंने अपने वकील साहब को आश्वासन दिया था "वकील साहब, लछमी हमारी बेटी की तरह होगी।"4 इसी लछमी के साथ बुड्ढे गिद्ध ने संबंध जोड़ लिया है। पाठक के मन को आघात तो तब लगता है जब स्वयं लछमी सेवादास को अपना मालिक समझ बैठती हैं। तहसीलदार की बेटी कमली विनव्याहे ही डॉ. प्रशांत के के प्रति आकर्षित होकर उसके बच्चे की माँ बनती है,  कालीचरण भी मास्टरनी मंगलादेवी के साथ अनैतिक रिश्ते  बनाता है। 

काम संबंधों का एक कारण आर्थिक विवशता भी हो सकता है। तथा दूसरा किंतु मुख्य कारण शरीर की आवश्यकता भी है। दोनों के ही उदाहरण हम यहाँ देख सकते हैं। फुलिया और सहदेव मिसर के संबंध का एक कारण परिवार की आर्थिक विवशता भी है। ऐसे संबंध उच्च जाति के पुरुषों और निम्न जाति की स्त्रियों के संबंध मजबूरी के कारण स्थापित हुए हैं। जबकि डॉ. प्रशांत और कमला कालीचरण और मंगला देवी के संबंध की जाँच-पड़ताल करने से लगता है कि उनका संबंध शारीरिक अनिवार्य आवश्यकताओं के कारण स्थापित हुआ है।

यहाँ रेणु ने दिखाने का प्रयत्न किया है कि मेरगंज में जहाँ जातिगत स्तरीकरण में ऊँच-नीच की भावना बहुत प्रबल दिखाई पड़ती है, वही स्त्री-पुरुष काम संबंध में यह आड़े आती नहीं दिखती। यह अपने आप में यथार्थ के बहुत ही अधिक निकट है। 

प्रशांत और कमली का संबंध अनैतिक संबंध से अलग प्रकार का है। कोई भी स्त्री सिर्फ देह नहीं है। देह के भीतर अच्छाई तथा बुराई की पहचान कर आकर्षित होने वाला मन भी होता है जो स्वयं स्त्री को किसी के प्रति मोहित कर सकता है। यहां यह भाव हमें कमला द्वारा प्रशांत से मोहित होते हुए दिखाई देता है।  तीन जगह बात चलने के बावजूद भी कमला कंवारी है क्योंकि उसका रिश्ता कहीं तय नहीं हुआ।  हिस्टीरियाग्रस्त कमली का इलाज करने के कारण कमली डॉ. प्रशांत के प्रति आकर्षित होती है। भउजिया का गीत सुनकर वह बेचैन हो उठती है। डॉ. प्रशांत के आने पर कमला गहरा आकर्षण अनुभव करने लगती है। डॉ. प्रशांत भी शास्त्र की जड़ता में बंधे हुए मन को समाज जीवन को समझने के लिए मानवीय संबंधों के विविध क्षेत्रों में विचरने का अवसर प्रदान करता है और प्रशांत भी कमला की ओर आकर्षण का अनुभव करता है इसलिए दोनों के बीच संबंध कायम होता है। गाँव वाले और कमली के परिवार वाले इस संबंध को बिना काना-फूसी किए स्वीकार कर लेते हैं। अंत में कमली प्रशांत के बच्चे की माँ बनने के बाद, प्रशांत द्वारा स्वीकृत होने पर मेरीगँज के लोग अवश्य कहते हैं- "अंग्रेजी फैशन वालों का सात खून माफ हैं।” 5

इस तरह हम देखते हैं कि रेणु के उपन्यासों में ग्रामीण स्त्री का जो स्वरूप हमारे सामने आता है। वह ग्रामीण दिनचर्या का हिस्सा बनकर आता है। वहां हमें कहीं भी अधिकारों के प्रति कोई सजगता नहीं दिखाई देती। वहाँ स्त्री सिर्फ एक ही भाव को लिए हुए दिखती है वह है देह तथा मन का भाव। रेणु के उपन्यासों को पढ़ने के बाद पता चलता है कि गाँव  में  सिर्फ एक जीवन साथी मिल जाना ही स्त्री जीवन की पूर्णता का परिचायक है। इसके अतिरिक्त उनमें नवीनता की कोई उमंग खोजना, अधिकारों के प्रति सजग होना, शोषण के विरोध में आवाज उठाना, सभी नामुमकिन चीजें हैं।

गाँवों में स्त्रियों की समस्याएँ शहरी स्त्री से अधिक जटिल होती हैं। जटिल इन अर्थों में कि वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं होती और परम्पराओं को ज्यों का त्यों बिना चिंतन के अपना लेती है इसीलिए वे शोषण को अपनी नियति मानकर उसमें पिसती रहती है। इसी कारण अधिकतर ग्रामीण स्त्रियाँ मुक्ति की कामना भी नहीं करती। इसका प्रमुख कारण शिक्षा का अभाव और ज्ञान-विज्ञान से सम्पर्कहीनता है। रेणु ने इस दौर के स्त्री विषयक मतों से भिन्न अपनी स्वतन्त्र स्त्री-दृष्टि का परिचय दिया। उन्होंने मुख्यतः ग्रामीण निम्नवर्गीय स्त्री को अपने उपन्यासों में विशेष स्थान दिया। यही उनका महत्व है और इन्हीं मुद्दों पर रेणु प्रासंगिक भी हैं।


संदर्भ ग्रंथ
1. आलोचना की सामाजिकता, पृष्ठ संख्या 253, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2005
2. मैला आंचल, फणीश्वर नाथ रेणु,पृष्ठ संख्या 59
3. वही, पृष्ठ संख्या 59
4. वही, पृष्ठ संख्या 26
5. वही, पृष्ठ संख्या 301

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