आभारी हूँ बहुत दोस्तो, मुझे तुम्हारा प्यार मिला! - रामदरश मिश्र

प्रकाश मनु

संस्मरण: प्रकाश मनु

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इसी पंद्रह अगस्त को हिंदी के बड़े कद के बड़े साहित्यकार रामदरश मिश्र जी ने अपनी उम्र के अठानबे बरस पूरे कर लिए। यह उनका निन्यानबेवाँ जन्मदिन है। इस अवस्था में भी वे खूब सक्रिय, स्वस्थ हैं। लिखते-पढ़ते हैं, पाठकों और साहित्यिकों से निरंतर संवाद भी बनाए रखते हैं। अभी हाल में उन्हें हिंदी का अत्यंत प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान मिला है, और यह उनसे ज्यादा पूरे हिंदी जगत का सम्मान है। इसलिए कि अरसे बाद किसी हिंदी साहित्यकार को यह सम्मान मिला है। इससे पहले हिंदी के लेखकों में केवल हरिवंशराय बच्चन और गोविंद मिश्र को ही यह सम्मान प्राप्त हुआ है।

रामदरश मिश्र
रामदरश जी मेरे गुरु हैं। उनसे बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया है। बरसों से उनका आत्मीय स्नेह और सान्निध्य मुझे मिलता रहा है। भला मेरे लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है?

आज उन पर लिखने बैठा हूँ तो यादों का पूरा एक कारवाँ चल पड़ा है और सर्दियों का वह धूप भरा दिन मेरी स्मृतियों में दस्तक देने लगा है, जब मैं एक भीतरी उमंग से भरकर यों ही रामदरश जी के यहाँ पहुँच गया था बातचीत करने के लिए। उस दिन रामदरश जी के जीवन के तमाम पन्ने खुले और खुलते ही चले गए। मैं लगभग पूरे दिन उनकी बातों और उनके अनुभवों की आँच में सीझा उनके पास बैठा रहा। उनकी जिंदगी और लेखन-यात्रा तथा संघर्षों के बहुत-से मर्म-बिंदु जानता था, लेकिन उनकी आधार-पीठिका पहली बार खुली। और उस खुली बातचीत में रामदरश जी को ज्यादा खुलेपन से और कहीं ज्यादा करीब से जाना।

खास बात यह थी कि उनके यहाँ बड़े लेखकों वाली दिखावटी व्यस्तता का ताम-झाम मुझे बिल्कुल नजर नहीं आया। उनका वह पूरा दिन जैसे मुझे दे दिया गया। वे पूरी तरह प्रफुल्ल थे और बातचीत के मूड में थे। और वह बातचीत इस तरह अनौपचारिक थी कि एक प्रसंग में से तमाम प्रसंग निकलते चले जा रहे थे। फिर एकाएक रामदरश जी के साथ-साथ उनके तमाम साथियों और सहयात्रियों के चेहरे उनमें से झाँकने लगे। खासकर निराला और अपने गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी का जिक्र आने पर तो वे बेहद भावुक हो गए थे। तमाम वरिष्ठ लेखकों का जिक्र हुआ और उनके तमाम संस्मरणात्मक प्रसंग इस लंबी बातचीत में खुल-खुलकर सामने आने लगे। लेकिन सबसे बढ़िया प्रसंग वे थे, जिनमें गाँव के मामूली और अनपढ़ लोगों का जिक्र था और वे उनकी अद्भुत शख्सियत का बखान सा करते थे कि उस समय उन लोगों ने मुझे बचाया न होता तो आज मैं कुछ न होता, कहीं न होता।

प्रकाश मनु व रामदरश मिश्र
यह बात कोई कम काबिले-तारीफ नहीं कि राजधानी में इतने बरसों से रहते हुए भी रामदरश जी ने अपनी सहजता और गाँव के आदमी का खरापन खोया नहीं। इससे उन्हें नुकसान चाहे जो भी हुए हों, लेकिन एक फायदा भी हुआ है कि वे छोटे-बड़े हर नए आदमी से प्यार से धधाकर मिलते हैं और पूरी तरह उससे समरस हो जाते हैं। इसीलिए तथाकथित बड़े जब एकांत की चारदीवारियों में कैद हैं, रामदरश जी ने खुद को खुला छोड़ दिया है। अब वे खुद के ही नहीं रहे, उन सभी के हैं जो उन्हें प्यार करते हैं और उन्हें प्यार करने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जाती है। खासकर युवा पीढ़ी को उनसे जो प्यार मिला है, उसकी तो मिसाल ही मुश्किल है। शायद ही उनके अलावा कोई दूसरा साहित्यकार हो, जो नई पीढ़ी के लेखकों से इतना खुलकर संवाद रख पाता है।

रामदरश मिश्र
यहीं एक प्रसंग और याद आता है। रामदरश जी से एक बार किसी ने पूछा, “आपकी नजर में महानता क्या है... या महान आदमी कौन है?” इसके जवाब में रामदरश जी ने सहजता से कहा था, “मेरे खयाल से महान व्यक्ति वह है, जो अपने संपर्क में आने वाले छोटे-बड़े सभी को अपनाकर मिलता है और उन पर अपने बड़े होने का आंतक बिल्कुल नहीं डालता।”

इस लिहाज से अगर देखें तो आज के साहित्यिक परिवेश में रामदरश जी अकेले लेखक हैं, जो इतना अधिक नए लेखकों को पढ़ते हैं और निरंतर उनकी हौसला अफजाई करते हैं। आज के समय में जबकि न पढ़ने का ही चलन है और न पढ़ना कहीं ज्यादा बड़प्पन और रोब-दाब का सूचक बन गया है, वहाँ रामदरश जी की खोज-खोजकर नयों का पढ़ने और उन्हें आगे लाने की तत्परता चकित जरूर करती है।

मुझे सुखद आश्चर्य होता है, जब किसी पत्रिका में मेरा कोई लेख या रचना देखकर वे मुझे सूचना देते हैं, और साथ ही अपनी राय भी बता देते हैं। मेरे लिए ये क्षण जीवन के सर्वाधिक आनंद के क्षण होते हैं। और सार्थकता के भी। इन्हीं क्षणों में लगता है कि आज जब साहित्य में इतनी आपाधापी और टाँगखिंचाई चल रही है, तब रामदरश जी जैसे लेखक भी हैं जो एक व्यक्ति होते हुए भी, एक परंपरा की सदेह उपस्थिति जैसे लगते हैं। यही शायद किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास है जो निरंतर सचेत भाव से जीते-जीते आता है।


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यह बात मुझे सुखद विस्मय से भर देती है कि इस अवस्था में भी, जब रामदरश जी सौ का आँकड़ा छूने के काफी निकट आ गए हैं, वे तन-मन से काफी स्वस्थ और सचेत हैं। कभी-कभार आ जाने वाली छोटी-मोटी व्याधियों के अलावा कोई ऐसी चीज नहीं, जो उन्हें काम करने से रोक सके। यहाँ तक कि उम्र की नवीं दहाई में उन्होंने तीन उपन्यास लिख डाले और ये तीनों रस विभोर कर देने वाले उपन्यास हैं। ये उपन्यास हैं—‘बचपन भास्कर का’, ‘एक बचपन यह भी’ और ‘एक था कलाकार’। इनमें एक उपन्यास में स्वयं रामदरश जी का बचपन है। ‘बचपन भास्कर का’ शीर्षक से लिखे गए इस उपन्यास में रामदरश जी ने हमें अपने बचपन में ले जाकर उन दिनों की सैर कराई है, जहाँ आज की दुनिया से अलग एक निराली ही दुनिया थी और उसकी कुछ अजब सी मुश्किलें।

‘बचपन भास्कर का’ में रामदरश जी के बचपन की बड़ी आत्मीय झाँकी है। और न सिर्फ उनके बचपन, बल्कि उनके समय में गाँव-देहात में घोर अभावों के बीच पलते हिंदुस्तानी बचपन की भी बड़ी प्रामाणिक तसवीर है। ऐसा बचपन जिसने घोर गरीबी और दारिद्र्य देखा, फिर भी मस्ती की खिलखिलाहट वहाँ कम न थी। जो लोग रामदरश जी की आत्मकथा पढ़ चुके हैं, वे उनके बचपन की ऐसी रोचक और विस्मयकारी घटनाओं से वाकिफ हैं, जिनमें किसी उपन्यास से अधिक रस और आकर्षण है। सच पूछिए तो मुझे वही उनकी आत्मकथा का सबसे सुंदर और बेजोड़ हिस्सा लगता है। ‘बचपन भास्कर का’ उपन्यास में वही सब एक अनोखी किस्सागोई में ढलकर हमारे सामने आता है, और सच ही बाल पाठकों के साथ-साथ बड़ों को भी विभोर कर देता है।

इसी कालखंड में लिखे गए दूसरे उपन्यास ‘एक बचपन यह भी’ में भी बचपन है। भाभी सरस्वती मिश्र जी का बचपन। जब-जब मैं उनके घर गया हूँ, भाभी जी के सतेज व्यक्तित्व की बड़ी मनोहर छवियाँ मेरे आगे खुलती हैं। रामदरश जी की कविता, डायरी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और निबंधों में भी सरस्वती जी की अनेक छवियाँ हैं, जिन्हें जाने बगैर आप रामदरश जी को ठीक-ठीक जान नहीं सकते। दोनों सही मायने में सहचर हैं, हरसफर कह लीजिए। इस नाते सरस्वती जी का बचपन भी रामदरश जी के लिए अपरिचित न रहा होगा। पति-पत्नी के नित्य संवाद में उसके नए-नए अबूझ पन्ने खुलते होंगे। और बहुत सा तो रामदरश जी का खुद अपनी आँखों देखा भी है।...पर उस बचपन का साधारणीकरण करके, रामदरश जी उसे भी एक नए रूप में जीकर, अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा से पुनर्नवा कर देंगे, और फिर उसे एक रोचक उपन्यास के रूप में अपने पाठकों के आगे प्रस्तुत कर देंगे, यह कम-से-कम मेरे लिए तो अकल्पनीय ही था।

और ‘एक बचपन यह भी’ कोई मामूली नहीं, बड़ा अच्छा और अंत तक पाठकों को बाँधे रखने वाला उपन्यास है। उसमें रस भी है, रोचकता भी और गाँव के यथार्थ का ऐसा जीवंत चित्रण कि पढ़ते हुए पाठक मुग्ध और चकित सा उसके साथ बहता चला जाता है। खासकर उपन्यास की नायिका, जिसमें सरस्वती जी के अक्स बहुत साफ दिखाई देते हैं, गाँव की होते हुए भी अपनी स्वतंत्र चेतना, निर्भीकता, दबंगी और गहन संवेदना के कारण पाठकों के चित्त पर छा सी जाती है, और उपन्यास पढ़ने के बाद भी आप उसे भूल नहीं पाते।

तीसरा उपन्यास ‘एक था कलाकार’ में रामदरश जी ने असमय गुजर गए अपने कलाकार बेटे हेमंत को मानो ट्रिब्यूट दिया है। हेमंत बड़े संभावनाशील अभिनेता थे और दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैल चुकी थी। अनेक जाने-माने धारावाहिकों में आकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का अहसास लोगों को कराया था। उनकी असमय मृत्यु ने रामदरश जी को कैसे भीतर से तोड़ दिया और किस धीरज के साथ उन्होंने इस दुख को झेला, इसे तो थोड़ा-थोड़ा जानता था। पर ‘एक था कलाकार’ पढ़कर बहुत कुछ सामने आया, जिसमें उस कलाकार के दुख और वेदना के साथ-साथ उनके हृदय में जगमगाते सपने भी झलमलाते नजर आए, जिन्हें मृत्यु के करुण आघात ने बिखरा दिया। रामदरश जी ने बड़े धीरज के साथ खुद को सँभालते हुए यह उपन्यास लिखा है। इसीलिए यह इस कदर पठनीय बन गया है कि इसमें जीवन का एक सहज प्रवाह नजर आता है।

इतना ही नहीं, कुछ अरसा पहले मेरे आग्रह पर अपने बचपन को आधार बनाकर रामदरश जी ने बच्चों के लिए सुंदर कहानियाँ लिखी हैं, जिनका संचयन ‘बचपन की कुछ यादें’ नाम से छपा है।

लेकिन इससे भी अचरज भरी चीज इस दौर की उनकी कविताएँ हैं। इस दौर में छपी उनकी कविता पुस्तकों ‘आम के पत्ते’ और ‘आग की हँसी’ में बड़े ही सहज ढंग से रामदरश जी की कविता एक नया मोड़ लेती है। मुझे सबसे अच्छी बात यह लगी कि उम्र की दहाई तक आते-आते रामदरश जी इस कदर कवि-सिद्धता हासिल कर चुके हैं कि उनकी कविताएँ बड़ी सहज और अनौपचारिक हो चली हैं। अपने आसपास का जो जीवन वे डूबकर जीते हैं, वह सहज ही उनके शब्दों की संवेदना में घुल-घुलकर बहता दीख पड़ता है। इतना सहज कि उन्हें कविता लिखने के लिए विषय ढूँढ़ने की दरकार नहीं है। बल्कि उनके आसपास जो कुछ भी है, वह खुद-ब-खुद कविता की ओर खिंचा चला जाता है, और फिर कवितामय होकर हमारी आँखों के आगे आता है तो हम चौंक पड़ते हैं कि अरे, यहाँ तक आते-आते तो रामदरश जी के लिए मानो सारा जीवन ही कवितामय हो उठा है। जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो उनकी कविता की चौहद्दी से बाहर हो।

जैसे प्रेमचंद ने अपनी कहानी और उपन्यासों में उस दौर की परिस्थतियों के साथ-साथ पूरा जीवन ही उतार दिया और उसे कथामय कर दिया। ऐसे ही रामदरश जी अपनी अपूर्व सिद्धता से जीवन के हर रंग, हर रेशे को कविताई के रंग में ढालते जा रहे हैं। और इसके लिए उन्हें कुछ करना नहीं पड़ता। कविता तो हर समय उनके साथ बहती ही है, और जो कुछ वे देखते हैं, पास से महसूस करते हैं, वह खुद-ब-खुद कवितामय हो उठता है। जैसे अगर आप हरिद्वार या ऋषिकेष जाएँ, तो आपको पता चलेगा कि गंगा की धारा के आसपास जो भी जीवन है, वह भी मानो गंगामय है। गंगा तो गंगा है ही, गंगा के चारों ओर जो जीवन बहता है, वह भी गंगा ही है, गंगा की पवित्रता में भीतर तक नहाया हुआ सा है।

तुलसीदास ने ‘सियाराममय सब जग जानी’ कहा तो यह सिर्फ एक चौपाई ही न थी, बल्कि पूरे संसार को सच ही उन्होंने सियाराममय देखा था। उसी तरह रामदरश जी ने पूरे जग-जीवन को ही कवितामय कर डाला। क्या यह सिद्धता यों ही मिल जाती है...? अगर जीवन में बड़ी संवेदना और हदय विस्तार न हो, तो क्या आप उसे इस तरह सहज हासिल कर सकते हैं?

रामदरश जी की एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें वे अपनी कविता की जमीन तथा अपने कवि की ‘प्राणशक्ति’ और निजीपन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने आँगन का एक कोना कच्चा छोड़ दिया है, इसलिए न वे बनावटी हुए और न जमीन से उनका रिश्ता ही खत्म हुआ! रामदरश जी की कविताओं में यह कविता सबसे अलग और खास मुझे इसलिए लगती है, क्योंकि यह अकेली कविता रामदरश जी के कवि का ‘सही और संपूर्ण परिचय’ भी है!

और मुझे तो रामदरश जी की कविता की असली शक्ति यही लगती है कि दिल्ली में इतने बरस रहते हो गए, पर न वे कभी अपनी जमीन को भूले और न मिट्टी और पानी की गंध उनके साहित्य में कमतर हुई। इसीलिए आज के तमाम कवि-लेखक जब देखते ही देखते बासी और पुराने होते जा रहे हैं, रामदरश जी उन लेखकों में से हैं जो आने वाली शताब्दियों में भी मानवता के साथ रहेंगे और उसे सही रास्ते तक पहुँचाने में मदद देते रहेंगे।


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कई बार मैं सोचता हूँ, रामदरश जी से मैंने क्या सीखा? रामदरश जी से मैंने क्या पाया? तो कुछ देर के लिए मानो मैं स्मृतिबिद्ध और कुछ-कुछ विमूढ़ सा रह जाता हूँ। अपने आसपास देखता हूँ तो सब ओर से वही तो मुझ पर छाए हुए हैं। बड़े बेमालूम ढंग से आहिस्ता-आहिस्ता मुझे गढ़ते हुए, मुझे भीतर-बाहर से सँवारते और पग-पग पर मेरी चिंता करते हुए कि कहीं मैं अपनी कुछ अतिरिक्त भावुकता में टूट न जाऊँ। अकसर बगैर मुझे जताए वे मेरी राहें आसान करते रहे हैं। और मिलने पर या फिर फोन पर हमेशा हिम्मत और हौसला बढ़ाते हैं। मैं बहत्तर बरस का हो गया, पर अब भी वे किसी आत्मीय अभिभावक की तरह मुझे सँभालते रहते हैं।

कई बार मैं सोचता हूँ, मैंने प्रेमचंद को नहीं देखा, पर रामदरश जी में मैंने जिस प्रेमचंद को देखा, या रामदरश जी के विपुल साहित्य में जिस प्रेमचंद को पुनर्नवा होते हुए देखा और पाया, वह क्या भुलाने की चीज है? प्रेमचंद गाँवों के कथाकार थे तो रामदरश जी भी जब गाँव की बात करते हैं, तो पूरा गाँव एकदम आँखों के आगे आ जाता है। दिल्ली में बरसोंबरस रहते के बावजूद अगर आज भी वे गाँव के हैं, गाँव की मिट्टी तथा पानियों की गंध और आस्वाद आज भी अगर उनकी कहानी और कविताओं में आता है, तो मन को अपने साथ बहा ले जाता है।

मुझे कहने दीजिए कि प्रेमचंद और उनके साहित्य ने आजादी से पहले जो काम किया था, आजादी के बाद वही काम साहित्यकार रामदरश जी ने और नए विचारों की संवाहक उनकी कृतियों ने किया। आजाद भारत में उन्होंने गाँव की जनता को सच्ची आजादी का मतलब बताया और उसके लिए अपने आप से और व्यवस्था से लड़ने की प्रेरणा दी। अशिक्षा, दैन्य, जातिगत भेदभाव और रूढ़ियों से ग्रस्त ग्राम्य समाज में उनकी कृतियाँ नई सोच का पैगाम और नया जीवन लेकर पहुँचीं, और उन्होंने जनता को युग-परिवर्तन की राह पर आगे आने के लिए पुकारा। रामदरश जी के साहित्य के माध्यम से रूढ़ियों से मुक्ति की यह कोशिश एक नई आजादी का स्वप्न बनकर गाँव-गाँव में पहुँची। यों भी रामदरश जी कोई नफरत या धिक्कारवादी साहित्यकार नहीं हैं। बल्कि उनके मन में अपने लोगों से एक गहरा, बहुत गहरा प्रेम है, जो उनके साहित्य में बड़ा अद्भुत समावेशी स्वर बनकर उभरता है। इसीलिए वे कविता लिखें, कहानी या उपन्यास, उसमें आम जनता के गौरव की गाथा तो आएगी ही। साथ ही जीवन की तलछट से निकले ऐसे जीवंत पात्र भी, जो रामदरश जी की कलम से निकलकर, सही अर्थों में अमरत्व पा गए।
इस मानी में मुझे मुक्ति दिलाने वाले भी रामदरश जी ही हैं। मैं स्वीकार करूँगा कि एक समय था, जब कुछ-कुछ कलावादी व्यामोह मेरे मन और चेतना पर जाले बुनने लगे थे। पर रामदरश जी ने बहुत इशारों में मुझे समझाया तो मेरी आँखें खुल गईं, और कुछ अरसे के लिए मन में कलावाद का जो नशा चढ़ा था, उसे उतरते भी देर नहीं लगी।
तभी मुझे समझ में आया कि रामदरश जी ने क्यों ऐसी चीजों की परवाह नहीं की। बहुत से फैशनेबल आंदोलन उनके सामने आए-गए, पर रामदरश जी बिना उनसे प्रभावित हुए, बड़े धीरज और विश्वास के साथ अपनी राह पर चलते रहे। आज उनके असंख्य पाठक देश के कोने-कोने में फैले हैं। देश का कोई विश्वविद्यालय नहीं है, जहाँ उन पर शोधकार्य न हुआ हो। जहाँ भी वे जाते हैं, छात्र ही नहीं, अध्यापक भी उनके पैरों पर झुक जाते हैं। वे सबके गुरु, सबके आदरणीय हैं। अपनी विविधतापूर्ण रचनाओं और साहित्य से पूरे हिंदी जगत में उन्होंने अपना ऊँचा स्थान बनाया है। अब वे इतने बड़े हैं कि उन्हें यश की भी परवाह नहीं।...लेकिन अगर उन्होंने आलोचकों की परवाह की होती तो केवल चार आलोचकों के मुखापेक्षी होकर रह जाते, और हर वक्त इसी चिंता में दुबले होते रहते कि कहीं उनके चेहरे की रेखाएँ तन न जाएँ। हमारे लिखने और साहित्य को अर्थवत्ता तभी मिलती है, जब हमारी रचनाएँ व्यापक रूप से जनता तक पहुँचती हैं, और उनके दिलों में अपनी जगह बनाती हैं। इसलिए अगर लेखक केवल चार लोगों के कॉकस में बंदी होकर रह जाए, तो यह न केवल साहित्य का अपमान है, बल्कि जनता का भी तिरस्कार है। और ऐसा लेखक कभी अपनी जनता का वैसा प्यार और सम्मान हासिल नहीं कर सकता, जो रामदरश जी को मिला है।

सच पूछिए तो रामदरश जी का पूरा साहित्य ही मानो आम आदमी का महाकाव्य या आम आदमी की महागाथा है। उन्होंने न सिर्फ एक मामूली आदमी को नायक के सिंहासन पर बैठाया, बल्कि उसे गरिमा दी, मान-सम्मान दिया। जनता का दुख-दर्द, जनता की बेचैनी और परेशानियाँ, जनता की आहत पीड़ा उनकी कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत समेत हर विधा में अपनी सूची करुणा के साथ बह रही है। वे सिर्फ कहने के लिए अपनी जनता के लेखक नहीं हैं, बल्कि सही मायनों में अपनी जनता से एकाकार हो चुके हैं। इससे बड़ी किसी लेखक की चरितार्थता भला क्या हो सकती है?

फिर रामदरश जी एक बड़े परिवार के मुखिया की तरह हमेशा उन सबकी परवाह करते नजर आते हैं, जिनसे वे भावनात्मक रूप से करीब से जुड़े हैं। इधर जब भी उनसे मेरी बात होती है, वे हमेशा मेरी कविताओं की चिंता करते नजर आते हैं। वे बार-बार याद दिलाते हैं कि “मनु जी, आपकी कविताओं में एक अलग रंग है, उनमें कुछ अलग बात है। आपने कविता लिखना क्यों छोड़ दिया?” उनकी बात सुनता हूँ तो भीतर उथल-पुथल सी मच जाती है। सच ही बहुत तरह के काम मैंने ओढ़ लिए हैं। इनमें कविता, जो शुरू से ही मेरी सहयात्री, बल्कि मेरी पहचान रही है—वह छूटती सी जा रही है। हालाँकि कविताएँ लिखना बंद नहीं हुआ, पर वे कुछ पीछे तो जरूर छूट गई हैं। 
मेरे बहुत से मित्र और आत्मीय जन हैं, जो मुझसे प्यार करते हैं। पर मेरी सहयात्री सुनीता के अलावा, यह बात कहने वाले केवल रामदरश जी हैं, जो बार-बार इस ओर मेरा ध्यान खींचते हैं। वे आपको प्यार करते हैं तो यह भी जानते हैं कि आपका कौन सा ऐसा पक्ष है, जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, या फिर जिसमें आपने सबसे अधिक सशक्त ढंग से खुद को व्यक्त किया है। वे घर भी आए हैं, बड़े प्यार से सुनीता से भी मिले हैं। घर-परिवार के वरिष्ठ सदस्य की तरह वे घर में सभी की चिंता करते हैं।

फिर रामदरश जी ने जैसा लिखा, खुद वैसा ही सीधा-सादा जीवन भी जिया है। उनके यहाँ लिखने और जीने में कम से कम फर्क है। इसीलिए वे बड़े आत्मविश्वास के साथ आने वाली पीढ़ी से यह कह भी सकते हैं कि साहित्य जल्दी-जल्दी सब कुछ बटोरने के लिए नहीं है। यह लंबी दूरी की दौड़ है, इसलिए धीरे चलना चाहिए। अपने समय और आसपास के परिवेश को समझते हुए, आहिस्ता-आहिस्ता कदम आगे रखना चाहिए, और अपने ढंग से अपने लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए। दूसरों को देखकर, उनकी नकल, प्रतिस्पर्धा या हबड़-तबड़ में अपने आप को नहीं भूल जाना चाहिए। क्योंकि ऐसे हड़बड़िए बहुत जल्दी थोड़ा-बहुत पाकर रुक जाते हैं। उन्हें भ्रम हो जाता है कि बहुत कुछ पा लिया। तो अब आगे और लिखने से क्या फायदा? पर लिखने वाला, जिसे केवल अपने लिखने पर भरोसा है, वह अपनी कलम के बूते पहचान बनाता है, और आगे चलता जाता है। अंत में वह उस जगह पहुँचता है, जहाँ पहँचना उसे एक लेखक होने के गौरव से भर देता है।

रामदरश जी मुझसे कोई छब्बीस बरस बड़े हैं। उनमें और मुझमें एक पीढ़ी का फर्क है। फिर भी वे हमेशा प्यार से, बराबरी से मिलते हैं। कभी उन्होंने मुझे लघुता का अहसास नहीं कराया। वे मेरे गुरु हैं, इसके बावजूद उन्होंने हमेशा बराबरी का सम्मान दिया, प्यार दिया। एक लेखक होने का गौरव दिया। और वे मुझसे कितने बड़े हैं, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनका गीत संग्रह ‘पथ के गीत’, जिसकी भूमिका आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखी है, प्रकाशित हुआ, उस समय मैं कोई दो बरस का था। इसी वर्ष उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।

इसी तरह जब ‘हिंदी आलोचना की प्रवृत्तियाँ और उसकी आधार-भूमि’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि के लिए रामदरश मिश्र का शोध संपन्न हुआ, तब मैं केवल सात बरस का था और कक्षा दो में वर्णमाला और गिनती लिखना सीख रहा था। अगले वर्ष, जब मैं आठ बरस का था, वे गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध होकर, पढ़ाने लगे थे।
यह सब सोचता हूँ तो मन में आता है कि कहाँ रामदरश जी और कहाँ मैं! अपनी लघुता के बोझ से दबने सा लगता हूँ।...पर फिर थोड़े ही समय बाद उनका फोन आता है और वे “मनु जी, कल एक पत्रिका में आपका लेख पढ़ा। बहुत अच्छा लिखा है आपने...!” कहकर बात शुरू करते हैं तो बीच के सारे फासले गायब हो जाते हैं। मानो रामदरश जी ने मुझे भी सहारा देकर अपने पास बैठा लिया हो।


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कई बार मुझे लगता है, मुझमें और रामदरश जी में कई समानताएँ हैं, जो हमें एक-दूसरे के इतना निकट ले आईं। रामदरश जी बचपन से ही भावुक हैं और उन्हीं के शब्दों में, कुछ-कुछ घरघुसरे भी। मेरी स्थिति भी इस मामले में उनसे कुछ अलग नहीं है। बचपन से ही मेरा हाल यह है कि किसी करुण प्रसंग को सुनते ही आँखों से टप-टप आँसू टपकने लगते हैं। गला रुँध जाता है।

मुझे याद है, किशोरावस्था में प्रेमचंद के उपन्यास पढ़ते हुए मेरे पूरे गाल आँसुओं से भीग जाते थे। एक हाथ से किताब पकड़े हुए, मैं दूसरे हाथ से आँसू पोंछता जाता। हालाँकि आगे क्या हुआ, यह जानने की उत्सुकता तनिक भी कम न होती। यही हालत अकसर फिल्में देखते हुए हो जाती। वहाँ कोई मार्मिक दृश्य आ जाता तो न सिर्फ आँसू बहने लगते, बल्कि कई बार तो रोते-रोते हिचकियाँ तक बँध जातीं। श्याम भैया जो मुझे फिल्म दिखाने ले जाते थे, बार-बार टोकते। पर फिर भी अपने आँसुओं पर मेरा बस नहीं था। तब श्याम भैया गुस्से में आकर डपटते हुए कहते, “देख कुक्कू, अगर तू अब रोया न, तो अभी तुझे हॉल से बाहर ले जाऊँगा और फिर कभी फिल्म दिखाने नहीं लाऊँगा।...”

सुनकर कुछ देर के लिए मजबूरन अपनी सिसकियों पर रोक लगाता, पर फिर उसी तरह आँखों से आँसू बरसने लगते। हलकी सिसकियाँ भी शुरू हो जातीं, जिन्हें बाहर निकलने से रोकने की मैं भरसक कोशिश करता। पर फिर भी वे घुटी-घुटी सी आवाज में बाहर आ ही जातीं, उन पर मेरा कोई बस नहीं था।

श्याम भैया यह जानते थे। वे मेरी भावुकता को समझते थे, इसीलिए मुझसे प्यार भी करते थे। पर ऊपर-ऊपर से गुस्सा भी करते, जिससे अपनी भावुकता पर थोड़ा सा नियंत्रण करने की कोशिश अलबता मैं जरूर करता। हालाँकि पूरी तरह सफल तो कभी नहीं हो पाया। आज भी जब सत्तर पार कर चुका हूँ, यह हालत बदली नहीं है।...
इसी तरह रामदरश जी की तरह मैं दुनियादारी से दूर ही रहा। और मुँह दिखाई तो कभी सीख ही नहीं सका। कहीं बाहर बहुत आना-जाना भी मुझे पसंद नहीं है। बस, लिखने-पढ़ने में ही सुख मिलता है। लगता है, इससे दुर्लभ चीज कुछ और नहीं है। आदमी दुनिया में बाकी सब पा सकता है, पर यह लिखने-पढ़ने का सुख तो एक मानी में ईश्वरीय ही है। अगर भीतर गहरी अंतःप्रेरणा और चेतना है, तभी आप लिखने-पढ़ने में आकंठ डूबे रह सकते हैं। लेकिन अगर संवेदना ही नहीं है, तो फिर कुछ नहीं है। धरती पर अगर कुछ स्वर्गिक या स्वर्गोपम है, तो मैं कहूँगा कि वह यही है, यही है, यही है!

मेरा और रामदरश जी का परिवेश बेशक एक सा नहीं रहा। वे ग्रामीण अंचल के हैं, मैं शहराती बंदा। किशोरावस्था तक मुझे पता ही नहीं कि गाँव क्या चीज है। मैं शायद दसवीं में था, जब मेरा एक सहपाठी मुझे अपना गाँव दिखाने ले गया। तब गाँव को थोड़ा-बहुत जाना। पर गाँव में क्या सुंदर है, तब भी नहीं समझ सका था। गाँव को सच में जानने की शुरुआत तब हुई, जब मैंने प्रेमचंद के उपन्यासों को दुबारा-तिबारा पढ़ा। ऐसे ही आजादी के बाद के गाँवों को मैंने जाना रामदरश जी के उपन्यासों को पढ़कर। इस रूप में उनका ऋणी हूँ कि असली हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी संस्कति को मैं उनके उपन्यास पढ़कर ही समझ पाया, जिसके बिना शायद मैं अधूरा ही रहता।
पिछले दिनों रामदरश जी को याद कर रहा था, तो अनायास कविता की कुछ पंक्तियाँ बनीं, और वे मेरे शब्दों में उतरते चले गए। वे पंक्तियाँ तो कुछ खास नहीं, पर उनमें रामदरश जी हैं, यही खास है। शायद आप भी उनका आनंद लेना चाहें। तो लीजिए, आप भी उन्हें पढ़ लीजिए—

मेरे अंदर रामदरश जी, मेरे बाहर रामदरश जी,
आगे चलते रामदरश जी, पीछे दिखते रामदरश जी।
सुख में, दुख में, फाकामस्ती में भी हँसते और हँसाते—
अंदर-बाहर, बाहर-अंदर रामदरश जी, रामदरश जी।

कविता वाले रामदरश जी, किस्से वाले रामदरश जी,
इस अँधियारे जग के उजले हिस्से वाले रामदरश जी,
चुप-चुप कुछ कहते, कह करके बस मुसकाते रामदरश जी,
एक पुराना गीत, उसी को फिर-फिर गाते रामदरश जी।

मिला राह में जो उसको, घिस-घिस चमकाते रामदरश जी,
सारे ही घर उनके, जिनमें आते-जाते रामदरश जी,
बैठ गए वे जहाँ, छाँह का वृक्ष उगाते रामदरश जी,
डुगुर-डुगुर अब चले हवा से कुछ बतियाते रामदरश जी। 

जब से आए रामदरश जी, मन में कितना हुआ उजीता,
कहती बड़की, कहती छुटकी, कहती चुप-चुप यही सुनीता।
खुले द्वार, खुल गईं खिड़कियाँ, जब से आए रामदरश जी,
टूट गईं सारी हथकड़ियाँ, जब से आए रामदरश जी।

चह-चह करतीं घर में चिड़ियाँ, जब से आए रामदरश जी।
बिन दीवाली के फुलझड़ियाँ, जब से आए रामदरश जी।
एक रोशनी का कतरा था, बढ़ते-बढ़ते वह खूब बढ़ा,
छोटा सा था मेरा आँगन, लेकिन खुद ही हुआ बड़ा।

ठंडी छाया बरगद की सी, ममता की हैं कोमल बाँहें,
चलता हूँ जिस ओर, वहीं से खुल जाती हैं उनकी राहें। 
वे ही अंदर, वे ही बाहर, कितने रूपों में छाए हैं, 
लंबा था रस्ता पर चलकर खुद ही मेरे घर आए हैं।

जो सीखे हैं पाठ अनोखे, भूल न पाता रामदरश जी,
गीत सुरीले जो सीखे हैं, फिर-फिर गाता रामदरश जी।
अर्थ महकते नए-नए से, नई-नई मोहक छवियाँ हैं,
यादों में हैं आप, आपमें कितनी सारी स्मृतियाँ हैं!

शिष्य आपका, पाठक भी हूँ, चाहे थोड़ा अटपट सा हूँ,
ढाई आखर पढ़े प्यार के, तब से थोड़ा लटपट सा हूँ।
थोड़ा झक्की, थोड़ा खब्ती, थोड़ा-थोड़ा प्यारा भी हूँ,
इसी प्यार से जीता भी हूँ, इसी प्यार से हारा भी हूँ।

एक खुशी है मगर, आपने खुले हृदय से अपनाया है,
कुछ गड़बड़ गर लगा, प्यार से उसको भी समझाया है।
यह उदारता, यही बड़प्पन भूल न पाता रामदरश जी,
विह्वल मन ले, इसीलिए चुप सा हो जाता रामदरश जी। 

जो कुछ सीखा, जो कुछ पाया, वह कविता में ढाल लिया है,
एक दीप उजली निर्मलता का अंतस में बाल लिया है।
चाहे आँधी आए, मन का दीप नहीं यह बुझ पाएगा,
अंगड़-बंगड़ छूटेगा, पर उजियारा तो रह जाएगा।

अंतर्मन में दीप जला तो कहाँ अँधेरा रह पाएगा,
यहाँ उजाला, वहाँ उजाला, अंदर-बाहर छा जाएगा।
आप साथ हैं तो जैसे यह सारी धरती अपनी है,
इस मन-आँगन में भी कोई गंगा अब तो बहनी है!

पता नहीं कि मैं अपने मन की बात कितनी कह पाया हूँ, कितनी नहीं। पर इन पंक्तियों को लिखने के बाद जो सुकून मिला, और मन कुछ हलका सा हो गया, वह अहसास शायद मैं कभी भूल न पाऊँगा।


[5]
रामदरश जी के साथ कभी यात्रा का भी संयोग बनेगा, यह तो मैं कभी सोच भी नहीं सकता था।
पर यह भी हुआ, और मुझे याद है, रामदरश जी के मुझ पर अतिरिक्त स्नेह के कारण ही यह संभव हो सका था। असल में कानपुर में एस.एन. बाल विद्यालय के प्रबंधक अरुणप्रकाश अग्निहोत्री रामदरश जी के साहित्य के बड़े प्रशंसक और मुरीद हैं। एक बार वे उन्हें खोजते हुए, घर आए। उनका मन था कि कानपुर में उनके स्कूल के परिसर में एक व्यापक पुस्तक मेले का आयोजन हो। साथ ही उस अवसर पर बड़ा सुंदर साहित्यिक कार्यक्रम भी हो, जिसमें लेखक अपने विचार और अनुभव पाठकों से साझा करें।

रामदरश जी ने सहमति दे दी तो पूरे आयोजन की तैयारी कर ली गई। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता रामदरश जी को करनी थी। साथ ही महीप सिंह, कन्हैयालाल नंदन, प्रदीप पंत समेत कई वरिष्ठ साहित्यकारों को इसमें शिरकत करनी थी।

रामदरश जी का आग्रह था कि मैं भी इस आयोजन में भाग लेने के लिए उनके साथ चलूँ। मैं थोड़ा यात्रा-भीरु हूँ, और कहीं आने-जाने से कन्नी कटता हूँ। पर रामदरश जी ने कहा कि वे मेरे साथ रहेंगे। इसलिए मुझे कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। फिर घर से निकलने पर थोड़ा एक भिन्न सा अनुभव होगा। उन्होंने बताया कि कन्हैयालाल नंदन और महीप सिंह भी साथ ही रहेंगे। हम सभी लोग एक साथ सुबह-सुबह शताब्दी एक्सप्रेस से चलेंगे।

रामदरश जी का ढंग इतना स्नेहपूरित और पारिवारिक सा था कि न कहने का तो प्रश्न ही नहीं था। मन में थोड़ा उत्साह भी पैदा हुआ कि रामदरश जी के साथ रहूँगा तो यह बड़े सुख की बात होगी। फिर नंदन जी और महीप जी भी हैं, तो एक अच्छा साहित्यिक सत्संग सा हो जाएगा।

जैसा कि तय था, मैं यात्रा से एक दिन पहले ही रात के समय रामदरश जी के घर पहुँच गया। रात का खाना भी वहीं खाया। वहाँ उनका जो आत्मीयता भरा पारिवारिक रूप देखा, उसे कह सकूँ, ऐसे शब्द मेरे पास नहीं हैं। कानपुर का वह कार्यक्रम तो बड़ा सुरुचिपूर्ण था ही, पर साथ ही उसमें रामदरश जी की बड़े भाई सरीखी आत्मीयता के भी बहुत सारे रंग देखने को मिले। एक ही कमरे में हमें ठहराया गया था। सारी व्यवस्था काफी अच्छी थी। लेकिन रामदरश जी खुद से ज्यादा मेरी चिंता कर रहे थे। पूरे कार्यक्रम के दौरान उनका जो अभिभावक वाला रूप देखने को मिला, उसे कभी भूल न पाऊँगा।

फिर सभी साहित्यिकों का शताब्दी से आना-जाना खुद में एक अलग अनुभव था। उसमें रामदरश जी के साथ ही नंदन जी और महीप जी का भरपूर साहचर्य मिला। आने-जाने में खूब प्रसन्नता भरी, खुली साहित्यिक चर्चा। इन स्नेही साहित्यकारों की पारिवारिक किस्म की आत्मीयता को मैं इतने निकट से महसूस न कर पाता, अगर रामदरश जी के साथ कानपुर न गया होता।

कानपुर प्रवास की बहुत स्मृतियाँ हैं, जिनकी चर्चा फिर कभी।...हाँ, जिस कमरे में हमें ठहराया गया था, उसमें सुबह उठते ही प्रभात रश्मियों के साथ रामदरश जी का जो गीतमय गुनगुनाता हुआ रूप दिखाई दिया, वह अब भी मेरी स्मृतियों में बसा है। वे बहुत हलके स्वर में भीतर ही भीतर अपने किसी पुराने गीत का आनंद लेते हुए गा रहे थे। मैंने महसूस किया, इस उम्र में भी उनका कंठ बहुत मधुर है। वे बहुत सुरीले ढंग से गीत पढ़ते हैं।

यों कविता सुनाने का उनका ढंग भी इतना प्रभावी है कि शब्द आपके भीतर उतरते चले जाते हैं। जो सादगी उनके लिखने में है, वही सुनाने में। बगैर किसी अतिरिक्त नाटकीयता के, संवेदना से लिपटा उनका स्वर मन में एक तरंग सी पैदा करता है, और फिर आप कविता के साथ बहते चले जाते हैं। कविता सुनाने का शायद सबसे अच्छा तरीका भी यही है, जिससे सुनने वाले और सुनाने वाले के बीच कोई दूरी, कोई दीवार नहीं रह जाती।


[6]
मैं साहित्यिक आयोजनों में प्रायः जा नहीं पाता। बहुत अधिक रुचि भी नहीं है। इसके बजाय चुपचाप लिखना-पढ़ना ही मुझे सुहाता है। पर इसे अपना सौभाग्य ही मानता हूँ कि रामदरश जी से जुड़े कुछ आत्मीयता भरे कार्यकमों में मुझे शामिल होने का सौभाग्य मिला है। ऐसा ही एक अवसर था, दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान मिलने पर उनके सम्मान में वाणी विहार में, उनके घर के निकट ही, एक अंतरंग गोष्ठी का आयोजन।

मुझे उसमें कुछ बोलना था, पर मुझे लगता है, लिखने में जैसी सहज लय मेरी बन जाती है, वह बोलने में नहीं बनती। तो मैंने सोचा कि जो कुछ मन में उमड़ रहा है, वह अगर एक कविता में बाँध सकूँ, तो यह कहीं बेहतर होगा। और फिर रामदरश जी पर एक लंबी, मुक्त लय और निर्बंध आवेग वाली कविता लिखी गई— ‘हमारी दुनिया में एक सीधा आदमी’। एक स्वतःस्फूर्त कविता, जिसमें उनके सहज, स्वभाव और खुद्दार गँवई व्यक्तित्व को बाँधने की कोशिश मैंने की। रामदरश जी में ऐसा क्या है, जो बरसों दिल्ली में रहते हुए भी उन्हें दिल्ली शहर का नहीं बना सका। आज भी वे जैसे गाँव को ही जी रहे हैं, और गाँव-कसबे में ही उनका मन बहता है। ऐसा क्यों भला? कविता थोड़ा-थोड़ा इसकी तलाश करती जान पड़ती है।

‘हमारी दुनिया में एक सीधा आदमी’ कविता की शुरुआत एक तरह की बतकही से होती हैं। लीजिए, जरा आप भी पढ़ लीजिए ये पंक्तियाँ—

बुरा न मानिए, जितने सीधे हैं
उतने ही मुश्किल हैं आप रामदरश जी,
जितने सीधे हैं उतने ही जरा टेढ़े... ऊबडख़ाबड़,
गूढ़-निगूढ़।

कि जैसे हरियाली और दरख्तों की हँसी से भरपूर
एक सीधा-सादा पठार
जो मेरी कलम में बँधा ही नहीं आज तलक,
जबकि सोचा था, आपका भी क्या!
जब भी चाहूँगा, पा लूँगा—
लगाकर दौड़ या कि दो-चार छलाँगें भरकर
छू ही लूँगा आपका हाथ!

पता न था कि
छोटे-छोटे हाथ-पैरों वाले बुभुक्षित दैत्यों की इस नगरी में
सड़क पर सीधे तनकर चलता है कोई सीधा आदमी
तो उसकी छाती में बनते हैं ऐसे-ऐसे भँवर
ऐसे बला के भँवर...कि राम बचाए!...

इस कार्यक्रम में डा. नित्यानंद तिवारी, कमलेश्वर और कन्हैयालाल नंदन भी उपस्थित थे। सबने कविता को बड़ी रुचि से सुना, पसंद भी किया।

बाद में कुछ अंतरंग मित्रों को सुनाने का अवसर मिला। सबने काफी सराहा कि इस कविता में मानो रामदरश जी अपनी पूरी जीवंतता के साथ सामने आ जाते हैं। इसके कुछ समय बाद कुरुक्षेत्र गया तो ब्रजेश भाई को तो यह कविता मैंने सुनाई ही। फिर उनके साथ ही जनवादी विचारक डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल जी के घर भी जाना हुआ। वहाँ जाने-माने आलोचक डा. शिवकुमार मिश्र भी बैठे थे। ग्रेवाल जी और शिवकुमार मिश्र जी ने, कविता खूब पसंद की। खासकर शिवकुमार मिश्र तो इस कविता को सुनते हुए झूम से रहे थे। बाद में उन्होंने कहा, “बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने। मैं तो मिश्र जी के निकट रहा हूँ तो कह सकता हूँ कि इसे सुनते हुए उनकी पूरी छवि सामने आ जाती है।...मिश्र जी कभी मिले तो उनसे भी इसकी चर्चा करूँगा।”

इसी तरह रामदरश जी की रचनावली के लोकार्पण के अवसर पर भी एक सुंदर कार्यक्रम हुआ था, जिसमें शामिल होने का अवसर मुझे मिला। इसमें कमलेश्वर और विष्णुचंद्र शर्मा जी भी उपस्थित थे। मैं कमलेश्वर जी के साथ ही इस कार्यक्रम में गया था, और रामदरश जी की सादा लेकिन पुरअसर कविताओं पर बोला था। विष्णुचंद्र शर्मा और कमलेश्वर जी के साथ-साथ कुछ और साहित्यकारों ने भी रामदरश जी के व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान की बड़े सम्मान से चर्चा की थी। रामदरश जी जो अपनी लंबी सृजन-यात्रा में बिना किसी से आतंकित हुए, आहिस्ता-आहिस्ता अपनी राह पर चलते रहे, उन्होंने आखिर बहुत अनायास ढंग से अपना होना सिद्ध कर दिया था। इस कार्यक्रम में इसकी सुंदर प्रतिध्वनियाँ गूँजती नजर आईं।

कुछ अरसे बाद के.के. बिरला फाउंडेशन की ओर से रामदरश जी को अत्यंत प्रतिष्ठित व्यास सम्मान मिलना भी एक खुशी और आनंद का अवसर था। तीन मूर्ति भवन में हुए बड़े गरिमामय कार्यक्रम में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। इसी कार्यक्रम में नरेंद्र कोहली को भी व्यास सम्मान प्रदान किया गया, जिन्हें संभवतः अगले बरस का व्यास सम्मान मिला था। और फिर इसी कार्यक्रम में दोनों साहित्यकारों को दो अलग-अलग वर्षों के लिए व्यास सम्मान प्रदान किया गया। कार्यक्रम में रामदरश जी की सहज ऊष्मा से भरी अनौपचारिक वक्तृता ने सबका मन मोह लिया।

साहित्य अकादेमी द्वारा रामदरश जी के व्यक्तित्व पर फिल्म निर्माण भी एक अच्छा और स्वागत योग्य निर्णय था। रामदरश जी ने मुझे यह सूचना देते हुए कहा कि मनु जी, यदि आप भी इस अवसर पर उपस्थित रहें, तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। तो मैं सुबह-सुबह ही उनके घर पहुँच गया था। रामदरश जी की अत्यंत स्नेहिल और बुद्धिमती बेटी स्मिता भी साथ थी। यह दिन एक बिल्कुल अलग तरह का दिन था, जिसमें रामदरश जी के कई अनौपचारिक मूड्स का मैं गवाह बना।

सन् 2004 में वाणी प्रकाशन से रामदरश जी की शख्सियत और और सर्जना पर केंद्रित मेरी पुस्तक आई, ‘रामदरश मिश्र : एक अंतर्यात्रा’। हालाँकि इस पुस्तक की भी एक कहानी है। असल में विष्णु खरे पर वाणी प्रकाशन से मेरी पुस्तक आ रही थी, ‘एक दुर्जेय मेधा : विष्णु खरे’। पुस्तक पूरी होने से पहले ही रामदरश जी की पुस्तक की पांडुलिपि भी मैं तैयार कर चुका था। मैंने अरुण माहेश्वरी से इसका जिक्र किया, और कहा कि “मेरा मन है, रामदरश जी पर लिखी गई मेरी यह पुस्तक भी वाणी से ही आए, और मिश्र जी के जन्मदिन पर इस पुस्तक का लोकार्पण हो।” अरुण माहेश्वरी ने मुसकराते हुए कहा, “मनु जी, पुस्तक हम करेंगे और उनके जन्मदिन पर यह आएगी भी। पर...मैं चाहता हूँ कि अभी आप डाक्साब से जिक्र न करें। उनके जन्मदिन पर हम लोग उन्हें सरप्राइज देंगे...!”

मुझे भी अरुण माहेश्वरी का यह विचार भा गया। यों पुस्तक पर काम ठीक समय पर शुरू हो गया था, जुलाई के पहले-दूसरे हफ्ते तक मैंने उसके प्रूफ वगैरह भी पढ़ लिए थे। अब कोई विशेष काम बाकी न था। रामदरश जी का जन्मदिन निकट ही था। पर मैंने राज को राज ही रखा था, और अभी तक उनसे पुस्तक की चर्चा नहीं की थी। हालाँकि फिर मुझे यह राज खोलना ही पड़ा, जब पुस्तक के आवरण के लिए रामदरश जी के कुछ फोटो लेने मैं उनके घर गया।

रामदरश जी के विविध मूड्स के फोटो लेकर मैं वाणी प्रकाशन में गया, तो अरुण माहेश्वरी ने उनका एक चित्र पसंद करते हुए कहा, “यह कुछ अलग सा है मनु जी। इसी को लेंगे।...आप चाहें तो आज ही आवरण फाइल करवा लें। ताकि आपको दुबारा न आना पड़े।”

मुझे याद है, उस दिन कोई दो-ढाई घंटे मैं वहाँ रुका। फ्लैप मैटर समेत पुस्तक का आवरण फाइनल कराया। पुस्तक का आवरण सच ही बहुत सुंदर बना था। रामदरश जी की प्रसन्न छवि आवरण पर थी। यों भी यह पुस्तक किसी रूढ़ किस्म की आलोचना से आक्रांत हुए बगैर, अपने मन की मौज में लिखी गई थी। लिहाजा कथित आलोचना से भिन्न, यह एक सर्जनात्मक किस्म की पुस्तक थी। ऐसी पुस्तक, जिसे पढ़ते हुए पाठक की मनुष्य और साहित्यकार रामदरश जी से बड़ी प्रीतिकर दोस्ती हो जाती है, और उसके तार मन में खुद-ब-खुद एक संगीतमय तान छेड़ते हैं। पुस्तक लिखते हुए मेरे मन में कल्पना थी कि इसे पढ़ने पर रामदरश जी के सीधे, सहज व्यक्तित्व में छिपी ऊष्मिल आभा और उदात्त भाव-तरंगों को समझने के अनंत रास्ते खुलने लगें। हर कोई अपने ढंग से अपने रामदरश जी को जान सकें, और पुस्तक इसके लिए एक भावनात्मक संबल का सा काम करे।

मेरे लिए खुशी की बात यह है कि वाकई रामदरश जी के जन्मदिन पर, उनके घर पर हुए एक अनौपचारिक आयोजन में ही ‘रामदरश मिश्र : एक अंतर्यात्रा’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम खासा गरिमामय था। एकदम पारिवारिक किस्म का कार्यक्रम, जिसमें सब एक ही भावना में बह रहे थे। रामविलास जी के छोटे भाई तथा जाने-माने लेखक, संपादक रामशरण मुंशी जी ने पुस्तक का लाकार्पण किया, और वे बहुत अच्छा बोले। रामदरश जी की नौसर्गिक सृजन प्रतिभा और खुली मानवीय दृष्टि के साथ-साथ उनमें जो एक उदार किस्म की मार्क्सवादी दृष्टि है, उसकी ओर मुंशी जी ने सबका ध्यान खींचा। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रकाश मनु जी की पुस्तक व्यक्ति और साहित्यकार रामदरश मिश्र को जानने का एक प्रीतिकर रास्ता खोल देती है। इसलिए कि इस पुस्तक में प्रकाश मनु निरंतर रामदरश जी के साथ-साथ चलते नजर आते हैं। बल्कि नई और पुरानी पीढ़ी के दो लेखकों के इसी स्नेहपूर्ण साहचर्य का नतीजा यह पुस्तक है, जो दूसरों को भी राह दिखाएगा। कवि और आलोचक ओम निश्चल ने बहुत आत्मीय लहजे में कार्यक्रम का संचालन किया।

अब जरा एक क्षण के लिए पुस्तक के नाम की चर्चा करें। ‘रामदरश मिश्र: एक अंतर्यात्रा’— भला पुस्तक का नाम यही क्यों? असल में रामदरश जी के साहित्य का अध्ययन करते-करते यह नाम मुझे एकबारगी जँच गया था, और फिर दूसरा कोई नाम जेहन में आया ही नहीं। रामदरश जी की एक आलोचनापरक पुस्तक है, ‘हिंदी उपन्यास : एक अंतर्यात्रा’। मुझे पुस्तक का नाम इतना सुंदर और अर्थपूर्ण लगा कि मन में आया, मैं भी तो रामदरश जी को समझने की यात्रा पर हूँ। तो फिर पुस्तक का नाम ‘रामदरश मिश : एक अंतर्यात्रा’ क्यों नहीं हो सकता? जाहिर है, इसके बाद पुस्तक के लिए कोई सही नाम ढूँढ़ने की सारी कोशिशें रुक गईं, और यही नाम फाइनल हो गया। इसे मित्रों और अन्य साहित्यिकों ने भी बहुत पसंद किया।


[7]
यहीं प्रसंगवश इस बात की चर्चा की जा सकती है कि रामदरश जी की किताबों के नाम बहुत सुंदर और सुरुचिपूर्ण हैं। लीक से हटकर भी। लेखक रामदरश ऊपर से चाहे जितने सादा लगते हों, पर उनके भीतर कितनी गहरी कलादृष्टि और सौंदर्य चेतना है, इसे उनकी पुस्तकों के नामों से ही जाना जा सकता है। उनके उपन्यासों की बात की जाए तो ‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’ और ‘अपने लोग’ बहुत खूबसूरत नाम हैं। ऐसे ही उनकी कहानियों के नाम ‘वसंत का एक दिन’, ‘आज का दिन भी’ और ‘फिर कब आएँगे’ मुझे बहुत आकर्षक लगते हैं। और कविता-संकलनों के नामों की तो बात ही क्या की जाए। ‘पथ के गीत’, ‘बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ’, ‘पक गई है धूप’, ‘कंधे पर सूरज’, ‘दिन एक नदी बन गया’, ‘जुलूस कहाँ जा रहा है’, ‘बारिश में भीगते बच्चे’, ‘ऐसे में जब कभी’, ‘आम के पत्ते’ ये सभी एक से एक सुंदर और मानीखेज नाम हैं।

रामदरश जी की अन्य विधाओं की पुस्तकों के नाम भी तरह मोहते हैं। उनकी संस्मरणों की पुस्तक का नाम है, ‘स्मृतियों के छंद’। ललित निबंधों की पुस्तक का नाम है, ‘कितने बजे हैं’, यात्रा-वृत्तांत की पुस्तकों के नाम हैं, ‘तना हुआ इंद्रधनुष’ और ‘पड़ोस की खुशबू’। रामदरश जी की आत्मकथा का नाम ‘सहचर है समय’ भी मुझे बहुत लुभाता है। इसमें एक धीरता और स्वाभाविक गांभीर्य है, जो स्वयं रामदरश जी के व्यक्तित्व में भी है। इस आत्मकथा के अलग-अलग खंडों के नाम भी इतने ही सुंदर और अर्थ-व्यंजक हैं। जरा एक नजर डालें—‘जहाँ मैं खड़ा हूँ’, ‘रोशनी की पगडंडियाँ’, ‘टूटते-बनते दिन’, ‘उत्तर कथा’, ‘फुरसत के दिन’। ये वाकई ऐसे नाम हैं, जिनमें अलग-अलग दौर के रामदरश जी के संवेदनापूरित चेहरे अपनी पूरी धज के साथ झाँकते नजर आते हैं।

ऐसे ही एक लेखक, एक बड़े साहित्यकार के रूप में रामदरश मिश्र का जीवन बहुत सुंदर है। हमारी आदरणीया भाभी सरस्वती जी सही मायने में उनकी सहधर्मिणी हैं। उनके सुख-दुख और संघर्षों की हमसफर भी। पत्नी को जितना मान-सम्मान रामदरश जी ने दिया है, वैसा आदर देने वाले कितने साहित्यकार हमारे समय में हैं? यहाँ रामदरश जी का कद मुझे बहुत ऊँचा लगता है। हमारे दौर में शायद ही कोई साहित्यकार हो, जिसे उनकी बराबरी पर रखा जा सके।

मुझे याद है कि जिन दिनों मैं रामदरश जी की आत्मकथा पढ़ रहा था, उसका एक बहुत गहरा सम्मोहन मुझ पर तारी हो गया था। वह आनंद जहाँ-तहाँ छलकता रहता था। पर जहाँ कहीं मैं मिश्र जी की आत्मकथा की चर्चा करता, लोग बड़े व्यंग्य से मेरी ओर देखते। फिर धीरे से हँसते हुए कह भी देते कि “मनु जी, ऐसा लेखक भला क्या लिखेगा, जिसने सिवा अपनी पत्नी के, किसी से प्रेम न किया हो...? न उन्होंने कभी शराब पी और न इश्क किया। तो उनके पास ऐसा लिखने को है ही क्या, जिसे कोई पढ़ना चाहे!...”

मैं भला इस बात का क्या जवाब देता? मैं खुद ऐसा ही था। न कभी एक बूँद शराब की चखी, और न कभी मेरा प्रेम यहाँ-वहाँ बहका किया। पत्नी से मेरा प्रेम पति-पत्नी वाला कम, एक अनन्य दोस्ती वाला ही ज्यादा है, और यही सुख मुझे अंदर-बाहर से भरता रहता है। सो उन साहित्यिकों के व्यंग्य-वचनों का जवाब देने के बजाय मैं अकसर चुप हो जाता। पर आज देखता हूँ, अपने दौर में तमाम दंद-फंदों के जरिए नाम चमकाने वाले ऐसे मजावादी लेखक आज कहीं नहीं हैं। कोई उनका नामलेवा भी नहीं। दूसरी ओर सहज पथ पर चलते साहित्यकार रामदरश मिश्र का लेखक आज अपने पूरे कद के साथ सामने आया, तो पता चलता है कि एक बड़ा लेखक कैसा होता है। रामदरश जी की आदमकद शख्सियत के आगे अपने-अपने दौर में तालियाँ पिटवाने वाले तमाम चिकने-चतुर सूरमाओं को बड़ी बेचारगी से समय की बाढ़ में बहते देखता हूँ, तो उनकी वे फब्तियाँ, वे व्यंग्योक्तियाँ मुझे याद आती हैं। उनसे रामदरश जी का तो कुछ बिगड़ा नहीं, पर जिन्होंने ऐसी फब्तियों के छींटे इस सीधे, सहज लेखक पर डाले, वे खुद कितने छिछले थे, यह जरूर खुद-ब-खुद प्रकट हो गया।

आज के दौर में भी रामदरश जी का परिवार एक भरा-पूरा सामूहिक परिवार है। उनके बेटे-बेटियाँ, बहुएँ, बच्चे सभी इस घर-परिवार को आनंद से भरते हैं। रामदरश जी ने सिर्फ अच्छा लिखा ही नहीं है, बल्कि एक सुंदर घर भी बनाया है, जिसमें सादगी के साथ-साथ हिंदुस्तानियत की गंध है। और इसीलिए वह घर बार-बार हमें बुलाता है। पुकार-पुकारकर बुलाता है। वहाँ जाकर हमें एक अलग तरह की शांति और शीतलता मिलती है, इसलिए कि वह सच ही में एक साहित्यकार का घर है।

और इसके साथ ही वे घर में मिलने आने-जाने वालों से, फिर चाहे वे एकदम उदीयमान लेखक ही क्यों न हों, बड़े प्रेम से मिलते हैं और उन पर अपनी विद्वत्ता और बड़प्पन का कोई बोझ नहीं डालते। इसके बजाय जो भी मिला, उससे सुख-दुख का हाल वे लेते हैं, दुख में सीझते, सुख में खुश होते हैं, और हर किसी को आगे बढ़ने और अच्छा लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

इसके साथ-साथ उनकी कलम भी निरंतर चलती रहती है। जो भी मन में आया, वह रामदरश जी पूरे मन से लिखते हैं। कुछ और नहीं तो डायरी लेखन और संस्मरण, ये दो आत्मीयता भरा विधाएँ तो हैं ही, जिनमें उनका मन आजकल बहुत बहता है। चाहे थोड़ा लिखें या अधिक, पर कुछ न कुछ लिखना रामदरश जी को प्रिय है। डायरी लेखन और संस्मरण अपेक्षाकृत खुली विधाएँ हैं, जिन्हें साधने में विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता। इसलिए इन दो विधाओं में वे निरंतर ही कुछ न कुछ लिखते हैं। यह बात मुझे बहुत चकित करती है कि रामदरश जी ने न सिर्फ अपने से बड़ों और समकालीनों, बल्कि जो उनसे बहुत छोटे हैं, शिष्य सरीखे हैं, उन पर भी बड़ी रुचि से लिखा है। हिंदी में ऐसा साहित्यकार कोई और है, मुझे याद नहीं पड़ता। ऐसा ही एक प्रीतिकर संस्मरण रामदरश जी ने मुझ पर भी लिखा है, और उसमें उनका प्रेम जिस तरह बहता है, उसकी याद ही मुझे कृतज्ञता से भर देती है।

मुझ पर केंद्रित ‘सृजन मूल्यांकन’ पत्रिका के विशेषांक में वह पाठकों के सामने आया, तो सभी ने उसे जी भरकर सराहा। कहना न होगा कि उस विशेषांक के जिन लेखों और संस्मरणों की सर्वाधिक चर्चा हुई, उनमें रामदरश जी का यह सुंदर संस्मरण भी है। इसलिए कि वे सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखते, बल्कि जो भी लिखते हैं, उसमें अपने आप को समूचा उड़ेल देते हैं। वे दूसरों की तरह एक खास दूरी रखकर मिलने वाले साहित्यकारों में से नहीं हैं, बल्कि हृदय के सारे कपाट खोलकर बड़े प्यार से मिलते हैं, और जब मिलते हैं, तो समय जैसे थम जाता है। यही बात उनके लिखे संस्मरणों के बारे में कही जा सकती है, जिन्हें वे लिखते नहीं है, बल्कि साथ-साथ बहते हैं, और इस बहने के दौरान संस्मरण तो मानो खुद-ब-खुद लिखे जाते हैं।

हाँ, उनके इधर लिखे की बात कह रहा हूँ तो उनकी एक गजल याद आती है। इस गजल में रामदरश जी ने बड़ी खूबसूरती से अपने मन की कुछ बातें कही हैं। बहुतों को इस बात पर हैरानी होती है कि भला इस वय में भी रामदरश जी निरंतर कैसे लिख पाते हैं। इसका उत्तर भी उन्होंने इस गजल में गूँथ दिया है। असल में, मन में कुछ कहने के लिए हो, तो फिर राह भी निकल ही आती है। पर मन में संवेदना ही न हो, दूसरों के सुख-दुख के साथ कोई भावनात्मक लगाव न हो, तो आप न लिखने के कारण पर बहसें भले ही करते रहें, पर जब लिखने की बारी आती है, तो आईना आपको बता देता है कि आप कहाँ खड़े हैं। खुद रामदरश जी की यह गजल भी ऐसे लोगों को आईना दिखाने का काम करती है—

चाहता हूँ कुछ लिखूँ, पर कुछ निकलता ही नहीं है,
दोस्त, भीतर आपके कोई विकलता ही नहीं है!
तब लिखेंगे आप जब भीतर कहीं जीवन बजेगा,
दूसरों के सुख-दुखों से आपका होना सजेगा।
टूट जाते एक साबुत रोशनी की खोज में जो,
जानते हैं जिंदगी केवल सफलता ही नहीं है!...

बगैर कठोर शब्दों का इस्तेमाल किए, इतनी सीधी और खरी बात कैसे कही जा सकती है, यह हमें रामददरश जी से सीखना चाहिए।


[8]
रामदरश जी मेरे गुरु हैं। उन्होंने कभी पढ़ाया नहीं, पर मेरे वे ऐसे गुरु हैं, जिन्होंने मेरे अंतःकरण को प्रकाशित किया है, और मैं अपने समूचे व्यक्तित्व पर उनकी अनुराग भरी छाया महसूस करता हूँ।

आज इस अवस्था में भी, वे गुरु की तरह मेरे पथ को प्रकाशित करते, और जहाँ कहीं झाड़-झंखाड़ है, वहाँ भी रास्ता बनाते नजर आते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूँ, अगर संयोगवश दिल्ली आते ही रामदरश जी के बड़प्पन की स्नेह छाया को मैंने करीब से महसूस न किया होता, और उनके इतने निकट न आया होता, तो यकीनन मैं ऐसा न होता, जैसा आज हूँ। मुझे बनाने में जिन्होंने अपना बहुत कुछ खर्च किया, उनमें रामदरश जी भी हैं। अपने स्नेह से माँज-माँजकर उन्होंने मुझे उजला किया है। तब शायद इतना न समझ सका होऊँ, पर आज मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि उनके निकट आने पर मेरी फालतू अहम् की बहुत सारी केंचुलें छूटती गई हैं, और मैंने महसूस किया है, कि भीतर-बाहर से सरल होने का सुख क्या होता। इसके आगे दुनिया के सारे सुख और बड़ी से बड़ी सफलताएँ भी पोच हैं। 

रामदरश जी को मेरे सरीखे कुछ अटपट-लटपट से शिष्य को पाकर कितनी खुशी हुई या नहीं, कह नहीं सकता। क्योंकि मैं तो हर जगह खुद को नाकामयाब और मिसफिट ही पाता हूँ। कामयाबी की कोई खास चाह भी मुझे नहीं है और न उसके लिए कोई बड़ी इज्जत मेरे मन में है। पर मुझे इस बात का गर्व और गौरव जरूर महसूस होता है कि हाँ, मैं रामदरश मिश्र का शिष्य हूँ, और यह बात मेरे भीतर अजब सी हिम्मत और हौसला भर देती है।...सच कहूँ तो मैं रामदरश जी का शिष्य हूँ, यह अहसास होते ही, मेरी झुकी हुई पीठ तन जाती है और मैं महसूस करता हूँ, जिंदगी के इस कठिन दौर में भी मैं सीधी चाल, और निष्कंप कदमों से चलना सीख रहा हूँ। और यह सीख लूँ तो मेरी जिंदगी की शायद इससे बड़ी चरितार्थता भी कोई और न होगी।

कबीर ने गुरु की उपमा कुम्हार से दी है। इससे सुंदर उपमा गुरु के लिए शायद कुछ और हो ही नहीं सकती। जैसे कुम्हार बाहर से कच्चे घड़े पर थाप लगाता है, लेकिन भीतर ही भीतर उसे सहारा भी देता है, वैसे ही गुरु भी शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। जितना सुंदर उसका स्नेह है, वैसी ही उसकी सख्ती और कठोरता भी। मुझे याद है कि ‘कविता और कविता के बीच’ कविता-संग्रह पर हुई गोष्ठी में रामदरश जी ने मेरी कविताओं की बहुत कड़ी आलोचना की थी। इसी संग्रह में शामिल देवेंद्र जी की कविताएँ उन्हें अच्छी लगी थीं, पर मेरी कविताएँ उन्हें पसंद नहीं आई थीं। उनकी अतिरिक्त तुर्शी और ज्यादा लाउड होना उन्हें खल रहा था। पर मेरा संग्रह ‘छूटता हुआ घर’ आया तो उस पर रामदरश जी की एक बहुत प्यारी सी चिट्ठी मुझे मिली थी, जिसमें उन्होंने मेरी कविताओं की तारीफ करते हुए, इस बात की खुशी प्रकट की थी कि मैंने अपनी कविता की धारा को सार्थक मोड़ दिया है। इस कारण ये कविताएँ अपने गहरे संवेदन से पाठक के हृदय को छू लेती हैं।

बाद में ‘छूटता हुआ घर’ संग्रह पर ही मुझे प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार मिला। इसके निर्णायकों में जगदीश चतुर्वेदी और अजितकुमार के साथ रामदरश जी भी थे। और उन्होंने ही फोन पर मुझे इस पुरस्कार की सूचना भी दी थी।

सच पूछिए तो रामदरश जी की कठोर आलोचना हो या सराहने वाला कोमल, मृदुल रूप, मेरे लिए तो ये दोनों ही आत्मीय हैं, मूल्यवान भी। मेरे मन में उन दोनों के लिए ही आदर का भाव है। आज सोचता हूँ कि ‘कविता और कविता के बीच’ संकलन पर हुई संगोष्ठी में बोलते हुए जब उन्होंने मेरी कविताओं की कठोर आलोचना की थी, तब मैं छिटककर उनसे दूर चला गया होता तो कितना कुछ खो देता। कितने ही दुर्लभ सुख-आनंद के पलों और आत्मिक उपलब्धियों से दूर ही रहता। पर मैं विनम्र होकर कुछ सीखने, और सच में कुछ पाने की चाह से रामदरश जी के निकट गया, तो उन्होंने मेरी झोली सुच्चे मोती और बेशकीमती मणियों से भर दी।...

यह काम कोई और नहीं, एक सच्चा गुरु ही कर सकता है। तो फिर रामदरश जी जो हैं, जिस तरह मेरे और मुझ सरीखे बहुत सारे लेखकों के दिल में वे विराजते हैं, और कहीं न कहीं अंदर से हमें भरते रहते हैं, उसे मैं कैसे भूल सकता हूँ? क्योंकि उसे भलने का मतलब तो जो कुछ उनसे सीखा, उस सबसे वंचित हो जाना ही होगा न! पर मैं तो यह सोच भी नहीं सकता।


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वैसे इस समय जब रामदरश जी अपनी उम्र के आखिरी चरण में हैं, और अब भी अपनी धुन में जी रहे हैं, लिख और पढ़ रहे हैं, मैं कई बार उन्हें टटोलने की कोशिश करता हूँ। उन्हें बहुत देर से वे चीजें मिलीं, जो बहुतों को शुरू-शुरू में और अनायास ही मिल गई थीं, तो क्या उन्हें साहित्य जगत से इस बात की शिकायत है? उनकी कृतियों का उचित मूल्यांकन भी नहीं हो सका, या बहुत देर से हुआ—क्या उनके मन में इस बात को लेकर कोई गिला-शिकवा है? विगत में नामी आलोचकों के साथ-साथ आंदोलन के रथ पर सवार तमाम फैशनेबल लोगों द्वारा भी उनकी उपेक्षा और अवमानना हुई। और कुछ ने तो चलताऊ जुमलों में लपेटकर, उन्हें फूँक में उड़ाने की कोशिश की। क्या इसका दर्द वे अब भी महसूस करते हैं?

पर मेरे लिए यह एक सुखद आश्चर्य की बात है कि रामदरश जी इस सबसे बहुत ऊपर उठ चुके हैं। हाँ, जो उनके निकट हैं, उनमें कोई कितना ही मामूली आदमी क्यों न हो, उसके प्रति एक भावनात्मक लगाव उन्हें हर वक्त तरंगित करता है। इस मैत्री और अपनत्व के सुख को वे अंदर तक महसूस करते हैं। और यहाँ तक कि अपने निकटस्थ मित्रों और आत्मीय जनों के लिए वे कृतज्ञता से भरे हुए जान पड़ते हैं। उनकी एक प्रगीतात्मक कविता उनकी इस भावस्थिति को बड़ी सुंदरता से अभिव्यक्त करती है। जरा आप भी पढ़ें इस कविता की ये पंक्तियाँ—

आभारी हूँ बहुत दोस्तो, मुझे तुम्हारा प्यार मिला,
सुख में, दुख में, हार-जीत में एक नहीं सौ बार मिला!

सावन गरजा, भादों बरसा, घिर-घिर आई अँधियारी,
कीचड़-काँदों से लथपथ हो, बोझ हुई घड़ियाँ सारी।
तुम आए तो लगा कि कोई कातिक का त्योहार मिला!

इतना लंबा सफर रहा, थे मोड़ भयानक राहों में,
ठोकर लगी, लड़खड़ाया, फिर गिरा तुम्हारी बाँहों में,
तुम थे तो मेरे पाँवों को छिन-छिनकर आधार मिला!

आया नहीं फरिश्ता कोई, मुझको कभी दुआ देने,
मैंने भी कब चाहा, दूँ इनको अपनी नौका खेने,
बहे हवा-से तुम, साँसों को सुंदर बंदनवार मिला!

हर पल लगता रहा कि तुम हो पास कहीं दाएँ-बाएँ,
तुम हो साथ सदा तो आवारा सुख-दुख आए-जाए,
मृत्यु-गंध से भरे समय में जीवन का स्वीकार मिला!

ये ऐसी पंक्तियाँ हैं, जिनमें हृदय की संवेदना छल-छल कर रही है। इसलिए इन्हें पढ़ते हुए कभी आँखें भीगती हैं तो कभी अनायास अपने समय के इस बड़े कवि के लिए आदर से भरकर, दोनों हाथ जुड़ जाते हैं, और मैं थोड़ी देर के लिए एकदम चुप और निःशब्द खड़ा रह जाता हूँ।...

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हम सबके अपने और ऐसे प्यारे रामदरश जी ने निश्चय ही दिल्ली में एक लंबा और समृद्ध जीवन जिया है और गाँव के आदमी के ठाट और स्वाभिमान के साथ दिल्ली को जिया है। लिहाजा उनके पास अनुभवों की कोई कमी नहीं है। इस पकी हुई उम्र में भी, वे जिस विधा को हाथ लगाते हैं, उसमें कुछ न कुछ नयापन ले आते हैं।

कोई भी बड़ी और समर्थ प्रतिभा अपने स्पर्श से चीजों को नया कर देती है। रामदरश जी के बारे में भी यह काफी हद तक सही है। वे जीवन के कवि-कथाकार हैं, इसलिए चुके नहीं हैं। जीवन के कवि और कथाकार कभी चुकते नहीं। चुकते तो वे फैशनपरस्त कलावादी हैं, जिनका शिल्प कुछ आगे जाकर दिशाभ्रम का शिकार हो, भौचक्का और भोथरा हो जाता है।

बड़ी ही गहरी संवेदना से थरथराती रामदरश जी की एक कविता अकसर मुझे याद आती है, ‘छोड़ जाऊँगा’। इसे पढ़ें तो पता चलता है कि रामदरश जी जीवन की इस अवस्था में करीब-करीब जीवन-मुक्ति की सी अवस्था में पहुँच गए हैं। इसीलिए भीतर की सारी उथल-पुथल से मुक्ति पाकर, अब वे बड़ी निस्पृहता के साथ कह सकते हैं कि—

कुछ कविता, कुछ कहानियाँ, कुछ विचार
जिनमें होंगे
कुछ प्यार के फूल
कुछ तुम्हारे उसके दर्द की कथाएँ
कुछ समय–चिंताएँ
मेरे जाने के बाद ये मेरे नहीं होंगे
मै कहाँ जाऊँगा, किधर जाऊँगा
लौटकर आऊँगा कि नहीं
कुछ पता नहीं...

तुम नम्र होकर इनके पास जाओगे
इनसे बोलोगे, बतियाओगे
तो तुम्हें लगेगा, ये सब तुम्हारे ही हैं
तुम्ही में धीरे-धीरे उतर रहे हैं
और तुम्हारे अनजाने ही तुम्हें
भीतर से भर रहे हैं।
मेरा क्या….
भर्त्सना हो या जय-जयकार,
कोई मुझ तक नहीं पहुँचेगी...

हालाँकि जो सहृदय पाठक केवल शब्दों को ही कविता नहीं मानते, बल्कि शब्द और शब्द तथा पंक्ति और पंक्ति के बीच के खाली स्थान को भी पढ़ना जानते हैं, उनके लिए यह बात अबूझ न होगी कि रामदरश जी की इस निस्पृहता के भीतर बहुत गहरी रागात्मकता की एक नदी बह रही है। वे कितना भी चाहें, उससे मुक्त हो ही नहीं सकते।

रामदरश जी ने पूरी शिद्दत से इस दुनिया को चाहा है, जी भरकर प्यार किया है, और शायद सपने में भी इससे परे जाने की बात नहीं सोच सकते। वे तो इस दुनिया के हैं, इसकी धूल. मिट्टी, खेत, नदी, रेत और कछारों से जुड़े हैं, इसलिए हमेशा-हमेशा इस दुनिया में ही रहेंगे। जिस कवि-कथाकार ने अपने अस्तित्व का कण-कण, रेशा-रेशा इस दुनिया को दे दिया हो, वह भला शतायु होने के दुर्लभ सुख-आनंद के पलों में अपनों से दूर जा भी कहाँ सकता है? तो रामदरश जी हमेशा से इस दुनिया के थे और इस दुनिया के ही रहेंगे। यही उनकी कविता और सर्जना की चरम सार्थकता भी होगी।

हाँ, हम सब भी, जो रामदरश जी को इस कदर सक्रिय और कर्मलीन रहते हुए, धीरे-धीरे शतायु होने के करीब जाते देख रहे हैं, कम सौभाग्यशाली नहीं हैं। यह हमारे लिए गौरव ही है कि हमने अपने समय के एक बड़े कवि-कथाकार को धीरे-धीरे किसी फूल की तरह खिलते-खुलते और चारों ओर अपनी गंध बिखराते देखा है। और मैं तो अपने आप को इसलिए भी बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मैंने उन्हें बहुत निकट से देखा है, उनसे खुलकर बातें की हैं। उनसे बहुत कुछ सीखा और पाया भी है। एक बड़े कद के संवेदनापूरित गुरु की तरह वे मेरे भीतर भी हैं, बाहर भी। यह सुख क्या मैं कभी शब्दों में बाँध सकूँगा?

ईश्वर ने चाहा तो रामदरश जी इसी तरह बरसोंबरस तक हमारे बीच रहेंगे, और हम सबके प्रेरणा संबल बने रहेंगे। फिलहाल तो आप और हम यही कामना कर सकते हैं कि वे स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें, और निरंतर लिखते रहें। उन्हें देखकर लगता है, हिंदी साहित्य में प्रेम और अपनत्व की धारा मानो साकार हो उठी हो!
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1 comment :

  1. अत्यंत सुंदर एवं जीवंत संस्मरण । प्रकाश मनु की संवेदनशील कलम ने महान साहित्यकार रामदरश मिश्र जी के व्यक्तित्व - कृतित्व को जिस प्रकार शब्दबद्ध किया है, वह पूरी रचना को तत्काल पढ़वा लेता है। मिश्र जी को सादर प्रणाम तथा मनु जी को हार्दिक बधाई।

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