कहानी: जन्मभूमि

धरोहर

[विलक्षण लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी (28.5.1908-12.2.2003) हिंदी साहित्य के बड़े अद्भुत कथाशिल्पी और किस्सागो थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस विशाल देश की धरती से उपजे लोकगीतों की खोज में लगाया, और इसके लिए देश का चप्पा-चप्पा छान मारा। यहाँ तक कि जेब में चार पैसे भी न होते, पर इस फक्कड़ फकीर की उत्साह भरी यात्राएँ अनवरत जारी रहती थीं। धरती उनका बिछौना था और आकाश छत, जिसके नीचे उन्हें आश्रय मिल जाता। घोर तंगहाली में दूर-दूर की यात्राएँ करके, उन्होंने देश के हर जनपद के लोकगीत एकत्र किए और उन पर सुंदर भावनात्मक लेख लिखे, तो देश भर में फैले हजारों पाठकों के साथ-साथ महात्मा गाँधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, महामना मालवीय, राजगोपालाचार्य और महापंडित राहुल सांकृत्यायन तक उनके लेखन के मुरीद बने।
इन्हीं लोकयात्राओं में हासिल हुए अनुभवों की अकूत संपदा ने सत्यार्थी जी को कहानीकार भी बनाया। ‘जन्मभूमि’ सत्यार्थी जी की बड़ी मर्मस्पर्शी कहानी है, जिसे पढ़ते हुए देश-विभाजन की वह करुण त्रासदी सामने आ जाती है, जिसने पूरे देश को झिंझोड़ दिया था। आजादी के पचहत्तर बरसों बाद भी इतिहास के उन रक्त-रंजित पन्नों की कराहें सामने आती हैं तो हम स्तब्ध से रह जाते हैं।]
गाड़ी हरबंसपुरा के स्टेशन पर खड़ी थी। इसे यहाँ रुके पचास घंटे से ऊपर हो चुके थे। पानी का भाव पाँच रुपए गिलास से एकदम पचास रुपए गिलास तक चढ़ गया। और पचास रुपए गिलास के हिसाब से पानी खरीदते समय लोगों को बड़ी नरमी से बात करनी पड़ती थी। वे डरते थे कि पानी का भाव और न चढ़ जाए। कुछ लोग अपने दिल को तसल्ली दे रहे थे कि जो इधर हिंदुओं पर बीत रही है, वही उधर मुसलमानों पर भी बीत रही होगी। उन्हें भी पानी इससे सस्ते भाव पर नहीं मिल रहा होगा, उन्हें भी नानी याद आ रही होगी।
प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े मिलिटरी वाले भी तंग आ चुके थे। ये लोग सवारियों को हिफाजत से नए देश में ले जाने के लिए जिम्मेदार थे। पर उनके लिए पानी कहाँ से लाते? उनका अपना राशन भी कम था। फिर भी बचे-खुचे बिस्कुट और मूँगफली के दाने डिब्बों में बाँटकर उन्होंने हमदर्दी जताने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। इस पर सवारियों में छीना-झपटी देखकर उन्हें आश्चर्य होता और वे बिना कुछ कहे-सुने परे को घूम जाते।
जैसे सवारियों के मन में यमदूतों की कल्पना उभर रही हो, और जन्म-जन्म के पाप उनकी आँखों के सामने नाच रहे हों। जैसे जन्मभूमि से प्रेम करना ही उनका सबसे बड़ा दोष हो। इसीलिए तो वे जन्मभूमि को छोड़कर यों भाग निकले थे। कहकहे और हँसी-ठिठोली जन्मभूमि ने अपने पास रख लिए थे। गोरी स्त्रियों के चेहरों पर जैसे किसी ने काले-काले धब्बे डाल दिए हों। अभी तक उन्हें अपने सिरों पर चमकती हुई छुरियाँ लटकती महसूस होती थीं। युवतियों के कानों में गोलियों की सनसनाहट गूँज उठती और वे काँप-काँप जातीं। उनकी कल्पना में विवाह के गीत बलवाइयों के नारों और मारधाड़ के शोर में हमेशा के लिए दब गए थे। पायल की झंकार घायल हो गई थी। उनके गालों की लालिमा मटमैली होती चली गई। जीवन का संगीत मृत्यु की खाइयों में भटककर रह गया। कहकहे शोक में डूब गए और हँसी-ठिठोली पर मानो श्मशान की राख उड़ने लगी। पाँच दिन की यात्रा में सभी के चेहरों की रौनक खत्म हो गई थी।
यह सब क्यों हुआ? कैसे हुआ? इस पर विचार करने की किसे फुरसत थी? यह सब कैसे हुआ कि लोग अपनी ही जन्मभूमि में बेगाने हो गए? हर चेहरे पर खौफ था, त्रास था। बहुतों को इतना इत्मीनान जरूर था कि जान पर आ बनने के बाद वे भाग निकलने में सफल हो गए। एक ही धरती का अन्न खाने वाले लोग कैसे एक-दूसरे के खून से हाथ रँगने लगे। यह सब क्यों हुआ? कैसे हुआ?
नए देश की कल्पना उन्हें इस गाड़ी में ले आई थी। अब यह गाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ती? सुनने में तो यहाँ तक आया था कि स्टेशन पर बलवाइयों ने गाड़ी की पूरी की पूरी सवारियों के खून से हाथ रँग लिए थे। पर अब हालात काबू में थे। यद्यपि कुछ लोग पचास रुपए गिलास के हिसाब से पानी बेचने वालों को बदमाश बलवाइयों के शरीफ भाई मानने के लिए तैयार न थे। नए देश में ये सब मुसीबतें तो न होंगी। वहाँ सब एक-दूसरे पर भरोसा कर सकेंगे। पर जब प्यास के मारे होंठ सूखने लगते और गले में प्यास के मारे साँस अटकने लगती तो वे तड़पकर रह जाते।
इनमें ऐसे लोग भी थे, जिनके घर जला दिए गए। वे बिल्कुल खामोश थे। जैसे उनके दिल बुझ गए हों, दिमाग बुझ गए हों। कुछ ऐसे भी थे, जिनकी हालत पर झट यह कहा जा सकता था कि न आषाढ़ में हरे, न सावन में सूखे।
जन्मभूमि में हाथ हमेशा खाली रहे। अब नए देश में भी कौन-से उनके हाथ भर जाएँगे? वे बढ़-बढ़कर बातें करने लगते। सौ से छूटते ही उनके बोल लाखों पर आकर रुकते। पर प्यास के मारे उनका बुरा हाल था।
खचाखच भरे हुए डिब्बे पर आलुओं की बोरी का गुमान होता था। एक अधेड़ आयु की स्त्री जो बहुत दिनों से बीमार थी, एक कोने में बैठी थी। उसके तीन बच्चे थे। एक लड़की सात बरस की थी, एक पाँच बरस की, और तीसरा बच्चा अभी दूध पीता था। यह गोद का बच्चा ही उसे बुरी तरह परेशान कर रहा था। कभी-कभी तंग आकर वह उसका मुँह झटक देती। इस स्त्री का पति कई बार बच्चे को अपनी बाँहों में थामकर खड़ा हो जाता, और अपनी पत्नी की आँखों में झाँककर यह कहना चाहता कि यह तीसरा बच्चा पैदा ही न हुआ होता तो बहुत अच्छा होता।
बच्चे को अपनी गोद में लेते हुए बीमार स्त्री का पति कह उठा, “तुम घबराओ मत। तुम ठीक हो जाओगी। बस, अब थोड़ा-सा फासला और रहता है।”
बीमार स्त्री खामोश बैठी रही। शायद वह कहना चाहती थी कि यदि गाड़ी और रुकी रही तो बलवाई आ पहुँचेंगे और ये गिनती के मिलिटरी वाले भला कैसे हमारी जान बचा सकेंगे? जैसे ये सब सवारियाँ लाशें हों और गिद्ध इनकी बू सूँघ सकते हों।
पास से किसी ने पूछा, “बहिन जी को क्या कष्ट है?”
“उस गाँव में कोई डॉक्टर न था, जहाँ मैं पढ़ाता था।” बीमार स्त्री का पति कह उठा।
“तो आप स्कूल मास्टर हैं?”
“यह कहिए कि स्कूल मास्टर था!” बीमार स्त्री के पति ने एक लंबी आह भरते हुए कहा, “अब भगवान जाने, नए देश में हम पर क्या बीतेगी!”

(दो)
वह अपने मन को समझाता रहा। जरा गाड़ी चले तो सही। वे बहुत जल्द अपने राज में पहुँचने वाले हैं। वहाँ डॉक्टरों की कमी न होगी। कहीं न कहीं उसे स्कूल मास्टर की जगह मिल ही जाएगी। उसकी आमदनी पहले से बढ़ जाएगी। वह अपनी पत्नी से कहना चाहता था कि जो चीज जन्मभूमि में आज तक नहीं मिल सकी, अब नए देश और जनता के राज में उसकी कुछ कमी न होगी।
बड़ी लड़की कांता ने बीमार माँ के समीप सरककर पूछा, “माँ, गाड़ी कब चलेगी?”
छोटी लडकी शांता खिड़की के बाहर झाँक रही थी।
कांता और शांता का छोटा भाई ललित पिता की बाँहों में बराबर रोए जा रहा था।
स्कूल मास्टर को अपने स्कूल का ध्यान आ गया, जहाँ वह पिछले दस बरस से हैडमास्टर था। टैक्सला के समीप के इस गाँव को शुरू-शुरू में यह स्वीकार न था कि वहाँ कोई स्कूल मास्टर टिक सके। उसने बड़े प्रेम से लोगों को समझाया था कि यह गाँव टैक्सला से दूर नहीं—टैक्सला, जिसका प्राचीन नाम तक्षशिला है, और जहाँ एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था और जहाँ दूर-दूर के देशों के विद्यार्थी शिक्षा पाने आया करते थे। यह विचार आते ही उसकी कल्पना को झटका-सा लगा, क्योंकि इस युग के लोगों ने एक-दूसरे के खून से हाथ रँगने की कसमें खाईं और अत्याचार की ये घटनाएँ ढोलों और शहनाइयों के संगीत के साथ-साथ हुईं। शिक्षित लोग भी बलवाइयों के संग-सँगाती बनते चले गए। शायद उन्हें भूलकर भी खयाल न आया कि अभी तो प्राचीन तक्षशिला की खुदाई के बाद हाथ आने वाले मूर्ति-कला के बहुमूल्य नमूने भी बराबर अपना संदेश सुनाए जा रहे थे। यह कैसी जन्मभूमि थी? इस जन्मभूमि पर किसे गर्व हो सकता था, जहाँ कत्लेआम के लिए ढोल और शहनाइयाँ बजाना जरूरी समझा गया।
इतिहास पढ़ाते समय उसने अनेक बार विद्यार्थियों को बताया कि यही वह उनकी जन्मभूमि है, जहाँ कभी कनिष्क का राज्य था, जहाँ अहिंसा का मंत्र फूँका गया था। जहाँ भिक्षुओं ने त्याग, शांति और निर्वाण के उपदेश दिए और अनेक बार गौतम बुद्ध के बताए हुए मार्ग की ओर उँगली उठाई। आज उसी धरती पर घर जलाए जा रहे थे, और शायद ढलती बर्फों के शीतल जल से भरपूर नदियों के साथ-साथ गरम-गरम खून की नदी बहाने का मन्सूबा बाँधा जा रहा था।
डिब्बे में बैठे हुए लोगों के कंधे झिंझोड़-झिंझोड़कर वह कहना चाहता था कि गौतम बुद्ध को संसार में बार-बार आने की आवश्यकता नहीं। अब गौतम बुद्ध कभी जन्म नहीं लेगा, क्योंकि उसकी अहिंसा का सदा के लिए अंत हो गया। अब लोग निर्वाण नहीं चाहते। उन्हें दूसरों की आबरू उतारने में आनंद आता है।
अब तो नग्न स्त्रियों और युवतियों के जुलूस निकालने की बात किसी के टाले टल नहीं सकती। आज जन्मभूमि को ग्रहण लग गया। आज जन्मभूमि के भाग्य फूट गए। आज जन्मभूमि अपनी संतानों की लाशों से पटी पड़ी है। अब यह इनसान के मांस और रक्त की सड़ांध कभी खत्म नहीं होगी।
नन्हा ललित रो-रोकर सो गया था। कांता और शांता बराबर सहमी-सहमी निगाहों से कभी माँ की तरफ और कभी खिड़की के बाहर देखने लगती थीं। एक-दो बार उनकी निगाह ललित की तरफ भी उठ गई। वे चाहती थीं कि थोड़ी देर और उनका पिता ललित को उठाए खड़ा रहे, क्योंकि उसकी जगह उन्हें आराम से टाँगें फैलाने का अवसर मिल गया था।
शांता ने कांता के बाल नोंच डाले और कांता रोने लगी। पास से माँ ने शांता को चपत दे मारी, और इस पर शांता भी रोने लगी। उधर ललित भी जाग उठा और वह बेसुरे अंदाज से रोने-चीखने लगा।
स्कूल मास्टर के विचारों का क्रम टूट गया। प्राचीन तक्षशिला के विश्वविद्यालय और भिक्षुओं के उपदेश से हटकर वह यह कहने के लिए तैयार हो गया कि कौन कहता है कि इस देश में कभी गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। वह कांता और शांता से कहना चाहता था कि रोने से कुछ लाभ नहीं। नन्हा ललित तो बेसमझ है और इसलिए बार-बार रोने लगता है, तुम तो समझदार हो। तुम्हें तो बिल्कुल नहीं रोना चाहिए। क्योंकि यदि तुम इसी तरह रोती रहोगी तो बताओ, तुम्हारे चेहरो पर कमल के फूल कैसे खिल सकते हैं? पास से किसी की आवाज आई, “यह सब फिरंगी की चाल है। जिन बस्तियों ने बड़े-बड़े हमलावरों के हमले बरदाश्त किए, अनगिनत सदियों से अपनी जगह पर कायम रहीं, आज वे भी लुट गईं।”
“ऐसे-ऐसे कत्लेआम तो उन हमलावरों ने भी न किए होंगे। हमारे स्कूल में झूठा और मनगढ़ंत इतिहास पढ़ाया जाता रहा है!” एक और मुसाफिर ने ज्ञान बघारा।
स्कूल मास्टर ने चौंककर उस मुसाफिर की तरफ देखा। वह कहना चाहता था कि तुम सच कहते हो। मुझे मालूम न था। नहीं तो मैं कभी इस झूठे मनगढ़ंत इतिहास का समर्थन न करता। वह यह भी कहना चाहता था कि इसमें उसका तो कोई दोष नहीं। क्योंकि सभ्यता के चेहरे से सुंदर खोल साँप की केंचुली की तरह अभी-अभी उतरा है, और अभी-अभी मालूम हुआ है कि मानव ने कुछ भी उन्नति नहीं की, बल्कि यह कहना होगा कि उसने पतन की तरफ ही बड़े वेग से पग बढ़ाए हैं।
“जिन्होंने बलवाइयों और हत्यारों का साथ दिया, और मानवता की परंपरा का अपमान किया,” स्कूल मास्टर ने साहस दिखाते हुए कहा, “जिन्होंने नग्न स्त्रियों और युवतियों के जुलूस निकाले, जिन्होंने अपनी इन माताओं और बहनों की आबरू पर हाथ डाला, जिन्होंने माताओं के दूध भरे स्तन काट डाले और जिन्होंने बच्चों की लाशों को नेजों पर उछालकर कहकहे लगाए, उनकी आत्माएँ सदा अपवित्र रहेंगी। और फिर यह सब-कुछ यहाँ भी हुआ और वहाँ भी, जन्मभूमि में भी और नए देश में भी!”
इसके उत्तर में सामने वाला मुसाफिर चुप बैठा रहा। उसकी खामोशी ही उसका उत्तर थी। शायद वह कहना चाहता था कि इन बातों से क्या लाभ? ऊपर से उसने इतना ही कहा, “हमें यह कैसी आजादी मिली है?”

(तीन)
कांता और शांता के आँसू थम गए थे। ललित भी कुछ क्षणों के लिए खामोश हो गया। स्कूल मास्टर की निगाहें अपनी बीमार पत्नी की ओर गईं, जो खिड़की के बाहर देख रही थी। शायद वह पूछना चाहती थी कि जन्मभूमि छोड़ने पर हम क्यों मजबूर हुए? या क्या यह गाड़ी यहाँ इसलिए रुक गई है कि हमें फिर से अपने गाँव लौट चलने का विचार आ जाए?
स्कूल मास्टर के होंठ बुरी तरह सूख रहे थे, उसका गला बुरी तरह खुश्क हो चुका था। उसे यह महसूस हो रहा था कि कोई उसकी आत्मा में काँटे चुभो रहा है। एक हाथ सामने वाले मुसाफिर के कंधे पर रखते हुए बोला, “सरदार जी, बताओ तो सही कि कल का इनसान उस अन्न को भला कैसे अपना भोजन बनाएगा, जिसका जन्म उस धरती की कोख से होगा, जिसे अनगिनत मासूम बेगुनाहों की लाशों की खाद प्राप्त हुई?”
सरदार जी का चेहरा तमतमा उठा। जैसे वे ऐसे विचित्र प्रश्न के लिए तैयार न हों। किसी कदर सँभलकर उन्होंने भी प्रश्न कर डाला, “आप बताओ, इसमें धरती का क्या दोष है?”
“हाँ-हाँ, इसमें धरती का क्या दोष है?” स्कूल मास्टर कह उठा, “धरती को तो खाद चाहिए। फिर वह कहीं से भी क्यों न मिले!”
सरदार जी प्लेटफार्म की ओर देखने लगे। बोले, “यह गाड़ी भी अजीब ढीठ है, चलती ही नहीं। बलवाई जाने कब आ जाएँ!”
स्कूल मास्टर के मन में अनगिनत लाशों का दृश्य घूम गया, जिनके बीचोंबीच बच्चे रेंग रहे हों। वह इन बच्चों के भविष्य पर विचार करने लगा। यह कैसी नई पौध है? वह पूछना चाहता था। यह नई पौध भी किस तरह की होगी? उसे उन अनगिनत युवतियों का ध्यान आया, जिनकी इज्जत पर हाथ डाला गया था। पुरुष की दहशत के सिवा इन युवतियों की कल्पना में और क्या उभर सकता है? उनके लिए निश्चय ही यह आजादी बरबादी बनकर आई। वे निश्चय ही आजादी के नाम पर थूकने से भी नहीं कतराएँगी। उसे उन युवतियों का ध्यान आया, जो अब माताएँ बनने वाली थीं। ये कैसी माताएँ बनेंगी? वह पूछना चाहता था। ये घृणा के बीज भला क्या फल लाएँगे? उसने सोचा, इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास न होगा। वह डिब्बे में एक-एक व्यक्ति का कंधा झिंझोड़कर कहना चाहता था कि मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो। नहीं तो यदि यह गाड़ी पचास-पचपन घंटों तक रुकने के बाद आगे चलने के लिए तैयार भी होगी तो मैं जंजीर खींचकर गाड़ी को रोक लूँगा।
“क्या यह गाड़ी अब आगे नहीं जाएगी? हे भगवान!” बीमार स्त्री ने अपने चेहरे से मक्खियाँ उड़ाते हुए पूछ लिया।
“निराश होने की क्या जरूरत है? गाड़ी आखिर चलेगी ही।” स्कूल मास्टर कह उठा।
स्कूल मास्टर खिड़की से सिर निकालकर बाहर की ओर देखने लगा। एक-दो बार उसका हाथ जेब की तरफ बढ़ा, अंदर गया और फिर बाहर आ गया। इतना महँगा पानी खरीदने का उसे साहस न हुआ। जाने क्या सोचकर उसने कहा, “गाड़ी अभी चल पड़े तो नए देश की सीमा में घुसते उसे देर न लगेगी। फिर पानी की कुछ कमी न होगी। ये कष्ट के क्षण बहुत शीघ्र बीत जाएँगे।”

(चार)
कंधों पर पड़ी हुई फटी-पुरानी चादर को वह बार-बार सँभालता था। इसे वह अपनी जन्मभूमि से बचाकर लाया था। बलवाइयों के अचानक गाँव में आ जाने के कारण वह कुछ भी तो नहीं निकाल सका था। बड़ी कठिनाई से वह अपनी बीमार पत्नी और बच्चों के साथ भाग निकला था। अब इस चादर पर उँगलियाँ घुमाते हुए उसे गाँव का जीवन याद आने लगा। एक-एक घटना मानो एक-एक तार थी, और इन्हीं तारों की सहायता से समय के जुलाहे ने जीवन की चादर बुन डाली थी। इसी चादर पर उँगलियाँ घुमाते हुए उसे मानो उस मिट्टी की सुगंध आने लगी, जिसे वह वर्षों से सूँघता आया था। जैसे किसी ने उसे जन्मभूमि की कोख से जबरदस्ती उखाड़कर इतनी दूर फेंक दिया। जाने अब गाड़ी कब चलेगी?
अब यह जन्मभूमि नहीं रह गई। देश का बँटवारा हो गया। अच्छा चाहे बुरा। जो होना था, सो हो गया। अब देश के बँटवारे को झुठलाना सहज नहीं। पर क्या जीवन का बँटवारा भी हो गया?
अपनी बीमार पत्नी के समीप झुककर वह उसे दिलासा देने लगा, “इतनी चिंता नहीं किया करते। नए देश में पहुँचने भर की देर है। एक अच्छे से डॉक्टर से तुम्हारा इलाज कराएँगे। मैं फिर किसी स्कूल में पढ़ाने लगूँगा। तुम्हारे लिए फिर से सोने की बालियाँ गढ़वा दूँगा।” 
कोई और समय होता तो वह अपनी पत्नी से उलझ जाता कि भागते समय इतना भी न हुआ कि चुड़ैल अपनी सोने की बालियाँ ही उठा लाती। बल्कि वह उस कजलौटी तक के लिए झगड़ा खड़ा कर देता, जिसे वह दर्पण के समीप छोड़ आई थी—कजलौटी, जिसकी सहायता से वह इस अधेड़ आयु में भी कभी-कभी अपनी आँखों में बीते सपनों की याद ताजा कर लेती थी।
कांता ने झुककर शांता की आँखों में कुछ देखने का प्रयास किया। जैसे वह पूछना चाहती हो कि ‘बताओ पगली, हम कहाँ जा रहे हैं?’
“मेरा झुनझुना?” शांता ने पूछ लिया।
“मेरी गुड़िया!” कांता बोली।
“यहाँ न झुनझुना है, न गुड़िया!” स्कूल मास्टर ने अपनी आँसू भरी आँखों से अपनी बच्चियों की ओर देखते हुए कहा, “मेरी बेटियो! झुनझुने बहुतेरे, गुड़ियाँ बहुतेरी। नए देश में हर चीज मिलेगी।”
पर रह-रहकर उसका मन पीछे की तरफ मुड़ने लगता। यह कैसा खिंचाव है? यह जन्मभूमि का आकर्षण है! 
जैसे वह स्वयं ही उत्तर देने का प्रयास करता। जन्मभूमि पीछे रह गई। अब नया देश समीप है। गाड़ी चलने भर की देर है। उसने झुँझलाकर इधर-उधर देखा। जैसे वह डिब्बे में बैठे हुए एक-एक व्यक्ति से पूछना चाहता हो कि बताओ, गाड़ी कब चलेगी?
‘जन्मभूमि हमेशा के लिए छूट रही है!’ उसने अपने कंधों पर पड़ी हुए चादर को बाएँ हाथ की उँगलियों से सहलाते हुए कहना चाहा। जैसे इस चादर के भी कान हों, और वह सब सुन सकती हो। खिड़की से सिर निकालकर उसने पीछे की तरफ देखा और उसे यों लगा जैसे जन्मभूमि अपनी बाँहें फैलाकर उसे बुला रही हो। जैसे वह कह रही हो कि मुझे यों छोड़कर चले जाओगे? मेरा आशीर्वाद तो तुम्हारे लिए हमेशा था और हमेशा रहेगा!
स्कूल मास्टर की बीमार पत्नी ने नन्हे ललित से समझौता कर लिया था। इस दूध की एक-एक बूँद पर पचासों रुपए निछावर किए जा सकते थे। यह दूध पचास रुपए गिलास के हिसाब से बिकने वाले दूध से अवश्य महँगा था।
चादर पर दाएँ हाथ की उँगलियाँ फेरते हुए स्कूल मास्टर को जन्मभूमि का ध्यान आ गया, जो शताब्दियों से रुई की खेती के लिए विख्यात थी।
उसकी कल्पना में कपास के दूर तक फैले हुए खेत उभरे। यह इसी कपास का जादू ही तो था कि जन्मभूमि रुई के अनगिनत ढेरों पर गर्व कर सकती थी।
जन्मभूमि में रुई से कैसे-कैसे बारीक तार निकाले जाते थे! घर-घर चरखे चलते थे। चरखा कातने की होड़! वे सूत की अंटियाँ तैयार करने वाले हाथ! वे जुलाहे जो लोककथाओं में मूर्ख समझे जाते थे, पर जिनकी उँगलियों को महीन से महीन कपड़ा बुनने की कला आती थी। जैसे जन्मभूमि पुकार-पुकाकर कह रही हो—तुम कद के लंबे हो और शरीर के गठे हुए। तुम्हारे हाथ-पाँव मजबूत हैं। तुम्हारा सीना कितना चौड़ा है। तुम्हारे जबड़े इतने सख्त हैं कि पत्थर तक चबा जाओ। यह सब मेरे कारण ही तो है। देखो, तुम मुझे छोड़कर मत जाओ।...स्कूल मास्टर ने झट खिड़की के बाहर देखना बंद कर दिया, और उसकी आँखें अपनी बीमार पत्नी के चेहरे पर जम गईं।

(पाँच)
वह कहना चाहता था कि मुझे वे दिन अभी तक याद हैं, ललित की माँ! जब तुम्हारी आँखें काजल के बिना ही काली-काली और बड़ी-बड़ी नजर आया करती थीं। मुझे याद हैं वे दिन, जब तुम्हारे शरीर में हिरनी की-सी मस्ती थी। उन दिनों तुम्हारे चेहरे पर चाँद की चाँदनी थी, सितारों की चमक थी। मुसकान, हँसी, कहकहा—तुम्हारे चेहरे पर खुशी के तीनों रंग थिरक उठते थे। तुम पर जन्मभूमि कितनी दयालु थी। तुम्हारे सिर पर वे काले घुँघराले केश! उन सावन के काले-काले मेघों को अपने कंधों पर सँभाले तुम मटक-मटककर चला करती थीं, गाँव की गलियों में और पगडंडियों पर! घुर-घुर, धाँ-भाँ—जैसे मटकी में गिरते समय ताजा दुहे जाने वाला दूध बोल उठे। स्कूल मास्टर को यों लगा, जैसे अभी बहुत कुछ बाकी हो। 
जैसे वह वर्षों के घूमते हुए भँवर में चमकती हुई किरन के दिल की बात भाँपकर कह सकता हो कि बीते सपने कल्पना के कला-भवन में सदैव थिरकते रहेंगे। जैसे वह ताक में पड़ी सुराही से कह सकती हो—ओ सुराही, तेरी गरदन टेढ़ी है। भला मैं वे दिन कैसे भूल सकता हूँ, जब तुम नई-नई इस घर में आई थीं?
वह चाहता था कि गाड़ी जल्दी से जल्दी नए देश की सीमा में प्रवेश कर जाए। फिर उसके सब कष्ट मिट जाएँगे। पत्नी का इलाज भी हो सकेगा। जन्मभूमि पीछे रह जाने के विचार से कुछ उलझन-सी अवश्य महसूस हुई। पर उसने तुरंत अपने मन को समझा लिया। वह यह प्रयास करने लगा कि नए देश में जन्मभूमि की कल्पना कायम रख सके। आखिर एक गाँव को तो जन्मभूमि नहीं कहते! जन्मभूमि तो बहुत विशाल है, बहुत महान है। उसकी महिमा का गान तो देवता भी पूरी तरह नहीं कर सकते। जिधर से गाड़ी यहाँ तक आई थी, और जिधर गाड़ी को जाना था, दोनों तरफ एक-जैसी भूमि दूर तक चली गई थी। उसे विचार आया कि भूमि तो सब जगह एक-जैसी है। जन्मभूमि और नए देश की भूमि में बहुत अधिक अंतर तो नहीं हो सकता। वह चाहता था कि जन्मभूमि की वास्तविक कल्पना कायम रहे। पौ फटने से पहले का दृश्य—दूर तक फैला हुआ क्षितिज—किनारे-किनारे पहाड़ियों की झालर—आकाश पर बगुलों की पंक्ति खुली कैंची के रूप में उड़ती हुई—पूरब की ओर उषा का उजाला!...
धरती ऐसी जैसी किसी युवती की गरदन के नीचे ऊँची घाटियों के बीचोंबीच ताजा श्वेत मक्खन दूर तक फैला हुआ हो। वह ऊँची आवाज में कहना चाहता था कि जन्मभूमि का यह दृश्य नए देश में भी नजर आएगा। अपने कंधों पर पड़ी हुई चादर को वह दाएँ हाथ की उँगलियों से सहलाने लगा।
जैसे वह इस चादर के मुख से अपना समर्थन चाहता हो। 
लटकती डालियाँ, महकती कलियाँ, इंद्रधनुष के रंग, आकाश-गंगा का दूधिया सौंदर्य, युवतियों के कहकहे, नव कुलवधुओं की लाज—जन्मभूमि का रूप इन्हीं पर कायम था।
अपने खमीर पर, अपनी तासीर पर जन्मभूमि मुसकराती आई है और मुसकराती रहेगी। वह कहना चाहता था कि नए देश में भी जन्मभूमि का रूप किसी से कम थोड़े ही होगा। वहाँ भी गेहूँ के खेत दूर तक फैले हुए नजर आएँगे।
जन्मभूमि का यह दृश्य नए देश में भी उसके साथ-साथ जाएगा, उसे विश्वास था।
उसके दाएँ हाथ की अँगुलियाँ बराबर कंधे पर पड़ी हुई फटी-पुरानी और मैली चादर से खेलती रहीं। जैसे ले-देकर आज यही चादर जन्मभूमि की प्रतीक बन गई हो।
“फिरंगी ने देश का नक्शा बदल डाला,” सरदार जी कह रहे थे।
पास से कोई बोला, “यह उसकी पुरानी चाल है।”
एक बुढ़िया ने कहा, “फिरंगी तो बहुत दिनों से इस देश में बस गया था। मैं न कहती थी कि हम बुरा कर रहे हैं जो फिरंगी को उनके बंगलों से निकालने की सोच रहे हैं? मैं न कहती थी कि फिरंगी का सराप लगेगा?”
दूसरी बुढ़िया बोली, “यह सब फिरंगी का सराप ही तो है, बहिन जी!”
स्कूल मास्टर को पहली बुढ़िया पर बहुत क्रोध आया। उसकी आवाज में जन्मभूमि के संदेह बोल उठे, उसने सोचा। दूसरी बुढिय़ा उससे भी कहीं अधिक मूर्ख थी, जो बिना सोचे हाँ में हाँ मिलाए जा रही थी।
परे कोने में एक लड़की चीथड़ों में लिपटी हुई बैठी थी। जैसे उसकी सहमी-सहमी निगाहें इस डिब्बे के प्रत्येक यात्री से पूछना चाहती हों—क्या ये मेरे आखिरी घाव हैं? उसके दाईं तरफ उसकी माँ बैठी थी, जो शायद फिरंगी से कहना चाहती थी कि मेरी गुलामी मुझे लौटा दो, क्योंकि गुलामी में मेरी बिटिया की आबरू नहीं लुटी थी।
डिब्बे में बैठे हुए जो लोग भीड़ के कारण बेहद भिंचे हुए थे, उनकी आँखों में भय की यह दशा थी कि वे प्रतिक्षण बड़े वेग से बुड्ढे हो रहे थे। सरदार जी बोले, “इतनी लूट तो बाहर से आने वाले हमलावरों ने भी न की होगी।”
पास से किसी ने कहा, “इतना सोना लूट लिया गया कि सौ-सौ पीढ़ियों तक खत्म नहीं होगा।”
“लूट का सोना ज्यादा दिन नहीं ठहरता।” एक और यात्री बोल उठा।
सरदार जी का चेहरा तमतमा उठा। बोले, “पुलिस के सिपाही भी तो सोना लूटने वालों के साथ रहते थे। पर लूट का सोना पुलिस के सिपाहियों के पास भी कितने दिन ठहरेगा? आज भी दुनिया सतगुरु नानकदेव जी महाराज की आज्ञा पर चले तो शांति हो सकती है।”

(छह)
छप्पन, सत्तावन, अट्ठावन—इतने घंटों से गाड़ी हरबंसपुरा के स्टेशन पर रुकी खड़ी थी! अब तो प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े मिलिटरी वालों के तने हुए शरीर भी ढीले पड़ गए थे। किसी में इतनी हिम्मत न थी कि डिब्बे से नीचे जाकर देखे कि आखिर गाड़ी रुकने का कारण क्या है? डिब्बे में हर किसी का दम घुटा जा रहा था, और हर कोई चाहता था कि और नहीं तो इस डिब्बे से निकलकर किसी दूसरे डिब्बे में कोई अच्छी-सी जगह ढूँढ़ ले। पर यह डर भी तो था कि कहीं यह न हो कि न इधर के रहें, न उधर के और गाड़ी चल पड़े।
“फिरंगी का सराप खत्म होने पर ही चलेगी गाड़ी!” बुढ़िया बोली।
“सच है, बहिन जी!” दूसरी बुढ़िया कह उठी।
स्कूल मास्टर ने उड़ने वाले पक्षी के समान बाँहें हवा में उछालते हुए कहा, “फिरंगी को दोष देते रहने से तो न जन्मभूमि का भला होगा, न नए देश का।”
पहली बुढ़िया ने रूखी हँसी हँसते हुए कहा, “फिरंगी चाहे तो गाड़ी अभी चल पड़े।”
कांता ने खिड़की से झाँककर दूसरे डिब्बे की खिड़की में किसी को पानी पीते देख लिया था। वह भी पानी के लिए मचलने लगी। उसकी बीमार माँ ने कराहती हुई आवाज में कहा, “पानी का तो अकाल पड़ रहा है, बिटिया!”
अब शांता भी पानी की रट लगाने लगी। सरदार जी ने जेब में हाथ डालकर कुछ नोट निकाले और पाँच-पाँच रुपए के पाँच नोट स्कूल मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “इससे आधा गिलास पानी ले लिया जाए।”
स्कूल मास्टर ने झिझकते हाथों से नोट स्वीकार किए। आधा गिलास पानी की कल्पना से उसकी आँखें चमक उठीं। खाली गिलास उठाकर वह पानी की तलाश में नीचे प्लेटफार्म पर उतर गया। अब ‘हिंदू पानी!’ और ‘मुस्लिम पानी!’ का भेद नहीं रह गया था। बड़ी कठिनाई से एक व्यक्ति के पास पानी नजर आया।
बावन रुपए गिलास के हिसाब से पच्चीस रुपए का पानी आधे गिलास से कुछ कम ही आना चाहिए था। पानी बेचने वाले ने पेशगी रुपए वसूल कर लिए और बड़ी मुश्किल से एक-तिहाई गिलास पानी दिया।
डिब्बे में जाकर सरदार जी के गिलास में थोड़ा पानी उड़ेलते समय जल्दी में कोई एक घूँट पानी फर्श पर गिर गया। झट से पानी का गिलास कांता के मुँह से लगाते हुए उसने कहा, “पी ले बेटा!” उधर से शांता ने हाथ बढ़ाए। स्कूल मास्टर ने कांता के मुँह से गिलास हटाकर उसे शांता के मुँह से लगा दिया।
फिर काँपते हाथों से यह गिलास उसने अपनी बीमार पत्नी के होंठों की तरफ बढ़ाया, जिसने आँखों ही आँखों में अपने पति से कहा कि पहले आप भी अपने होंठ गीले कर लेते। पर पति इसके लिए तैयार न था।
कांता और शांता ने मिलकर जोर से गिलास पर हाथ मारे। बीमार माँ के कमजोर हाथों से छूटकर गिलास फर्श पर गिर पड़ा। स्कूल मास्टर ने झट लपककर गिलास उठा लिया। बड़ी मुश्किल से इसमें एक घूँट पानी बच पाया था। यह एक घूँट पानी उसने झट अपने गले में उड़ेल लिया।
सरदार जी कह रहे थे, “इतना कुछ होने पर भी इनसान जिंदा है और जिंदा रहेगा।”
स्कूल मास्टर कह उठा, “इन्सानियत जन्मभूमि का सबसे बड़ा वरदान है। जैसे एक पौधे को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर लगाया जाता है, ऐसे ही हम नए देश में जन्मभूमि का पौधा लगाएँगे। हमें इसकी देखभाल करनी पड़ेगी और इस पौधे को नई जमीन में जड़ पकड़ते कुछ समय अवश्य लगेगा।”
यह कहना कठिन था कि बीमार औरत के गले में कितने घूँट पानी गया होगा। पर इतना तो प्रत्यक्ष था कि पानी पीने के बाद उसकी अवस्था और भी डावाँडोल हो गई। अब उसमें इतनी शक्ति न थी कि बैठी रह सके। सरदार जी ने न जाने क्या सोचकर कहा, “दरिया भले ही सूख जाए, पर दिलों के दरिया तो सदा बहते रहेंगे। दिल दरिया समंदरों डूँगे!”

(सात)
स्कूल मास्टर कह उठा, “कभी ये दिलों के दरिया जन्मभूमि में बहते थे। अब ये दरिया नए देश में बहा करेंगे।”
बीमार स्त्री बुखार से काँपने लगी। सरदार जी बोले, “यह अच्छा होगा कि इसे थोड़ी देर के लिए नीचे प्लेटफार्म पर लिटा दिया जाए। बाहर की खुली हवा इसके लिए अच्छी रहेगी।”
स्कूल मास्टर ने अहसान भरी निगाहों से सरदार जी की तरफ देखा और उनकी मदद से बीमार पत्नी को डिब्बे से उतारकर प्लेटफार्म पर लिटा दिया। नन्हा ललित माँ की छाती पर सोया हुआ था।
सरदार जी फिर अपनी जगह पर जा बैठे और स्कूलमास्टर अपनी पत्नी के चेहरे पर रूमाल से पंखा करने लगा। वह धीरे-धीरे उसे दिलासा देने लगा, “तुम अच्छी हो जाओगी। हम बहुत जल्दी नए देश में पहुँचने वाले हैं। वहाँ मैं अच्छे से अच्छे डॉक्टरों से तुम्हारा इलाज करवाऊँगा।”
बीमार औरत के चेहरे पर दबी-दबी-सी मुसकान उभरी। पर उसके मुख से एक भी शब्द न निकला, मानो उसकी खुली-खुली आँखें कह रही हों—मैं जन्मभूमि को नहीं छोड़ सकती। मैं नए देश में नहीं जाना चाहती। मैं इस धरती की कोख से जनमी और इसी में समा जाना चाहती हूँ।
उसकी साँस जोर-जोर से चलने लगी। उसकी आँखें पथराने लगीं। स्कूल मास्टर घबराकर बोला, “यह तुम्हें क्या हो रहा है? गाड़ी अब और नहीं रुकेगी। नया देश समीप ही तो है। अब जन्मभूमि का विचार छोड़ दो।...हम आगे जाएँगे।”
खिड़की से कांता और शांता फटी-फटी आँखों से देख रही थीं। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। सरदार जी ने खिड़की से सिर बाहर निकालकर पूछा, “अब बहिन जी का क्या हाल है?”
स्कूल मास्टर बोला, “यह अब जन्मभूमि में ही रहेंगी।”
सरदार जी बोले, “कहो तो थोड़ा पानी खरीद लें?”
बीमार औरत ने बुझते दीए की तरह साँस लिया, और उसके प्राण-पखेरू निकल गए। नन्हा ललित शायद पहले ही अंतिम साँस ले चुका था।
माँ-बेटे की लाशों के समीप खड़े-खड़े स्कूल मास्टर ने बड़े ध्यान से देखा और कहा, “अब वह पानी नहीं पिएगी।”
उधर इंजन ने सीटी दी। गाड़ी धीरे-धीरे प्लेटफार्म के साथ-साथ रेंगने लगी। उसने एक बार पत्नी और बेटे की लाशों की तरफ देखा, फिर उसकी निगाहें गाड़ी की तरफ उठ गईं। खिड़की से कांता और शांता उसकी तरफ देख रही थीं। लाश के साथ रह जाए या लपककर डिब्बे में जा बैठे? यह प्रश्न बिजली की कौंध की तरह उसके हृदय और मस्तिष्क को चीरता चला गया।
उसने अपनी कंधे से झट यह फटी-पुरानी मैली चादर उतारी, जिसे वह जन्मभूमि से बचाकर लाया था और जिसके धागे-धागे में अभी तक जन्मभूमि साँस ले रही थी।
इस चादर को उसने अपने सामने पड़ी हुई लाशों पर फैला दिया और गाड़ी की तरफ लपका। कांता की आवाज एक क्षण के लिए वातावरण में लहराई, “माँ!”
गाड़ी तेज हो गई थी। कांता की आवाज हवा में उछलकर रह गई। स्कूल मास्टर ने शांता को गोद में उठा लिया, और पलटकर लाश की तरफ नहीं देखा।
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प्रस्तुति – अलका सोईं
5-सी/ 46, नई रोहतक रोड, नई दिल्ली-110005,
चलभाष: +91 987 133 6616

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