कहते हैं सितम्बर का है अंदाज़े बयाँ और

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
(15 सितम्बर, 1927 - 23 सितम्बर 1983)
दो अक्टूबर: अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस
नमस्कार,

दो दिन बाद अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस है। नोबल समिति गांधीजी को शांति पुरस्कार देने में असफल रही लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके जन्मदिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस बनाकर उस खाई को पाट दिया। कन्हैया त्रिपाठी जी का स्थायी स्तम्भ अहिंसा और गांधीजी के विचारों पर प्रकाश डालता है।

सितम्बर मास तीसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (15 सितम्बर, 1927 - 23 सितम्बर 1983) के जन्मदिन और पुण्यतिथि दोनों को याद करने का मास है। उन्हें और बाल साहित्य को समृद्ध करने वाले अन्य अनेक साहित्यकारों को सोना शर्मा इस अंक में याद कर रही हैं, प्रकाश मनु की पुस्तक 'हिंदी बाल साहित्य का इतिहास' के पारायण द्वारा।

इस अंक में प्रकाश मनु जी याद कर रहे हैं हिंदी व्याकरण को मानक स्वरूप प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले जुझारू व्यक्तित्व, ‘हिंदी शब्दानुशासन’ वाले आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को, जिनके कृतज्ञ हम सभी हैं।

समकालीन कवियों की रचनाओं के साथ-साथ इस अंक में स्वर्गीय प्रो. इंद्रबहादुर खरे की कविताएँ उपलब्ध कराने के लिये मलय खरे जी का धन्यवाद। दीवाली की बात चलने पर मेरे मन में हमेशा कौंधने वाला प्रश्न फिर उठ खड़ा हुआ है। वह यह कि लक्ष्मी का वाहन उल्लू होने की अफ़वाह किसने फैलाई है। यदि उल्लू पर लक्ष्मी की सवारी की बात शास्त्रीय होती तो कार्तिक अमावस्या की रात्रि को हम प्रकाशवान न करके उल्लू के अनुकूल अंधेरी ही रहने देते। भारतीय परम्परा लक्ष्मीनारायण को गरुडारोही मानती है। महालक्ष्मी अष्टक भी निम्न पंक्तियों में इसी की पुष्टि करता है - 
अनुराग शर्मा

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि।

सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते॥


उत्कृष्ट कहानियाँ, चित्रावली, कला, यात्रा-वृत्त, समीक्षाएँ, और शोध आलेख जैसी नियमित सामग्री के साथ सितम्बर 2022 का सेतु आपके हाथ में है। पढ़िये और अपने मित्रों व परिजनों को पढ़ाइये।

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
30 सितम्बर 2022 ✍️

1 comment :

  1. प्रिय भाई अनुराग जी,

    'सेतु' का सितंबर अंक नई सज्जा, ताजगी और विविधतापूर्ण सामग्री के कारण खासा आकर्षक बन गया है। 'सेतु' उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका है, पर कोरी साहित्यिक पत्रिका भी नहीं। साहित्य के साथ ही कला, विचार और चिंतन की नई दिशाएँ इसे काफी विविध आयामी बना देती हैं।

    साथ ही मुझे लगता है, पत्रिका का 'सेतु' नाम साहित्य की तीन पीढ़ियों के बीच निरंतर संवाद के कारण एक अलग ढंग से अर्थवाहक बन गया है।

    मैं कुछ देर से इससे जुड़ा। पर जितना भी थोड़ा यह जीवन बच रहा है, वह इसके सुखद सान्निध्य में बीते, यह सोचना मुझे अच्छा लगता है।

    अंक में कई मूल्यवान और चित्ताकर्षक रचनाएँ हैं। आपने कैसे श्रमपूर्वक इन्हें सँजोया होगा, यह सोचकर बार-बार मेरा स्नेह आप पर निसार होता है।

    बहुत-बहुत स्नेहिल शुभकामनाओं के साथ
    आपका ही, प्रकाश मनु

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