‘पथरीला सोना’ तथा ‘ढलते सूरज की रोशनी’ उपन्यासों का आलोचनात्मक अध्ययन

रामदेव धुरंधर
सुमित कुमार 

शोधार्थी, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय 
एवं सहायक आचार्य, महामाया राजकीय महाविद्यालय 
शेरकोट, बिजनौर, उत्तर प्रदेश 
ईमेल: sumitlamba828@gmail.com

शोध सार
रामदेव धुरंधर का उपन्यास साहित्य अपनी संवेदना एवं शिल्प में अनूठा है। सामंतवाद का औद्योगिक पूंजीवाद में रूपांतरण, मॉरिशस में महिलाओं का दोहरा शोषण और उनकी मुक्ति यज्ञ में हिस्सेदारी, पराये देश में बदलती सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों में भारतीय समाज के अन्तर्द्वन्द्व और उनकी स्मृतियों में जीवित धार्मिक और पौराणिक कथाओं जैसे आप्रवासी जीवन के मुख्य स्तम्भ तो उनके उपन्यासों में शामिल हैं ही साथ ही संक्रमणशीलता के दौर में बदलना मॉरिशस का समाज, बहुसांस्कृतिकवाद का स्वरूप और वैश्वीकरण तथा बाज़ारवाद का मॉरिशस के समाज पर प्रभाव भी उनके उपन्यासों के विस्तृत वितान में रच बस कर उपस्थित होता है।

बीज शब्द: गिरमिटिया, आप्रवासी, शोषण, संघर्ष, संक्रमणशीलता, भारतीयता, नोस्टालजिया, संस्कृति आदि

प्रस्तावना

मॉरिशस के प्रसिद्ध कथा शिल्पी रामदेव धुरंधर ने ‘चेहरों का आदमी, ‘छोटी मछली बड़ी मछली, ‘पूछो इस माटी से, ‘बनते बिगड़ते रिश्ते, ‘पथरीला सोना (सात खंडों में), ‘ढलते सूरज की रोशनी, ‘विराट गली के बाशिंदे’ उपन्यासों की रचना की है। रामदेव धुरंधर के विस्तृत लेखन संसार, विजन और रचनाधर्मिता को समझने की दृष्टि से इनके उपन्यास साहित्य का अध्ययन महत्वपूर्ण है। रामदेव धुरंधर का मन यूँ तो दुःख दर्द से अकुलाते गिरमिटिया मजदूरों के साथ बहता हुआ चलता है लेकिन उनके साहित्य में मॉरिशस के जीवन की उन समस्याओं का चित्रण भी बखूबी किया गया है। जो केवल मॉरिशस तक सीमित नहीं हैं और उनके साहित्य को विश्व साहित्य की श्रेणी में शामिल करती है।

रामदेव धुरंधर की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता उनकी संवेदनशीलता है। यूँ तो किसी भी साहित्यकार से संवेदनशील होने की अपेक्षा की ही जाती है परंतु रामदेव धुरंधर उक्तिप्रेरित वक्रता द्वारा शब्दों का चमकता भवन खड़ा करके चमत्कार उत्पन्न करने वाले साहित्यकार नहीं हैं बल्कि समाज और मनुष्यता की सूक्ष्मतम अभिव्यक्तियों को इतनी मार्मिकता और तीक्ष्ण संवेदनात्मकता के साथ प्रस्तुत करते हैं कि उनके “साहित्य से होकर गुजरना एक ऐसे भाव-सागर से होकर गुजरना है जिसमें समाज के सुख-दुख की अनंत भाव-तरंगें एक साथ हिलोरें लेती हैं”।1

मूल आलेख
आप्रवासियों के रूप में विदेशों में जाकर बस चुके भारतीय भी सांस्कृतिक, सामाजिक मूल्यों और परम्पराओं के रूप में किसी न किसी तरह भारतीयता से जुड़े हुए हैं। शताब्दियों पूर्व भारत से चले जाने के बाद भी उनकी जड़े यहीं हैं। परन्तु समय के साथ इन प्रवासियों की जीवन पद्धति और जीवन दर्शन में बदलाव भी आये हैं। रामदेव धुरंधर के कथा साहित्य में जहाँ एक तरफ मॉरिशस के आप्रवासियों का पूरा इतिहास मिलता है तो दूसरी तरफ उनके जीवन में आ रहे परिवर्तनों और समकालीन समय में उनकी समस्याओं का गंभीर और व्यंग्यपूर्ण दोनों रूपों में विस्तृत वर्णन दिखाई देता है। अस्मितावादी विमर्शों के दौर में आज आप्रवासी साहित्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गया है और रामदेव धुरंधर के कथा साहित्य में आप्रवासी जीवन का पूरा ब्यौरा देखा जा सकता है।

रामदेव धुरंधर के उपन्यासों में मुख्यतः दो पक्षों को देखा जा सकता है। एक तरफ उनके उपन्यासों तथा कहानियों में औपनिवेशिक काल से ही शोषण और अत्याचार सहते आ रहे गिरमिटिया मजदूरों की यातना की स्वेद एवं रक्तरंजित तस्वीरें हैं। ये गिरमिटिया लोग एक तरफ तो अपनी मातृभूमि से कट जाने के कारण सांस्कृतिक रूप से एक प्रकार के नास्टाल्जिया में जी रहे थे तो दूसरी ओर नये देशों में उनकी दयनीय स्थिति उनके आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण को बढ़ावा दे रही थी। रामदेव धुरंधर के साहित्य में इन दोनों ही पक्षों का विस्तृत विवेचन मिलता है।

उनके प्रमुख उपन्यास ‘पथरीला सोना’ जोकि 7 खण्डों में प्रकाशित है, जिसमें आप्रवासियों के मॉरिशस पहुँचने से समकालीन समय तक के संपूर्ण इतिहास का लेखा-जोखा मिलता है। इसे पढ़ना मॉरिशस के जीवन को एक बार जी लेने जैसा ही है। सांस्कृतिक स्मृतियों के आख्यान और यातना एवं शोषण के प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में रामदेव धुरंधर के कथा साहित्य को देखा जा सकता है। उनके कथा साहित्य का दूसरा पक्ष वह है, जहाँ वे आज के समय में मॉरिशस के समाज में फैली विद्रूपताओं का यथार्थ चित्रण करते हैं और व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विषमताओं तथा शोषण का हथियार बनी नीतियों पर गहरी चोट करते हैं।

आप्रवासियों के विभिन्न प्रकार और आप्रवास के विभिन्न कारण रहे हैं। दुनिया भर के आप्रवासियों का इतिहास और समस्याएं एक समान नहीं हैं। ऐसे में उनका साहित्य भी एक समान नहीं हो सकता। आप्रवास के लम्बे इतिहास में कभी धर्म और साम्प्रदायिकता कारण बने तो कभी आर्थिक मजबूरियों के कारण लोगों को घर छोड़ने पड़े। कभी उन्हें जबरदस्ती ले जाया गया तो कभी लोग अपनी मर्जी से एक बेहतर जीवन की तलाश में आप्रवासी बन गये। आधुनिक समय में साम्राज्यवाद ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। सस्ते मजदूरों की कमी पूरी करने के लिए भारत जैसे देशों से लोग धोखा देकर और तरह-तरह के झूठे वादे कर के मॉरिशस जैसे देशों में गिरमिटिया मजदूर बना कर ले जाये गये। भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों से ज्यादातर लोग वहाँ गये। लेकिन वहाँ पहुंचकर उनके सारे सपने और उम्मीदें रेत की दीवार की तरह बिखर गये। उस समय से यातना, पीड़ा और शोषण का जो अंतहीन दौर शुरू हुआ उसी का जीवंत दस्तावेज हैं रामदेव धुरंधर का उपन्यास ‘पथरीला सोना’। औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत चलने वाले संघर्ष से ही आप्रवासी समुदाय का अनुभव संसार मूलतः बना है। इसीलिए इस पक्ष की उपस्थिति उनके साहित्य में स्वाभाविक है। रामदेव धुरंधर के कथा साहित्य में एक ओर इन भारतीय मजदूरों की व्यथा कथा, उनका संघर्ष और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों के चित्र हैं तो दूसरी और स्वतंत्रता के बाद मॉरिशस की राजनीति में धर्म और जाति की विषाक्त हवा फैलाते और सांस्कृतिक उत्थान का स्वाँग रचते नेताओं का यथार्थवादी चित्रण भी है।

‘पथरीला सोना’ का केंद्र बिंदु औपनिवेशिक सत्ता के समय प्रवासी भारतीयों द्वारा सन 1834 से लेकर 1912 के बीच किया गया संघर्ष है। बाद के खण्डों में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मॉरिशस की परिस्थितियों का सुन्दर यथार्थवादी चित्रण है। कानून बना देने के बाद भी दास प्रथा खत्म नहीं हुई थी। गिरमिटिया मजदूरों ने इसके खात्मे के लिए जो लम्बी लड़ाई लड़ी है, वह संघर्ष पथरीला सोना की विषय वस्तु है। इतिहास का पुनर्सृजन करना उपन्यासकार का उद्देश्य रहा है। पत्थरों के नीचे दबा सोना खोजने का सपना आँखों में लाये इन लोगों ने किस तरह मिट्टी से सोना उगाया और अपने हक़ कि लड़ाई लड़ी, यह इस उपन्यास में साकार हो उठा है। सामंतवाद का औद्योगिक पूंजीवाद में रूपांतरण, मॉरिशस में महिलाओं का दोहरा शोषण और उनकी मुक्ति यज्ञ में हिस्सेदारी, पराये देश में बदलती सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों में भारतीय समाज के अन्तर्द्वन्द्व और उनकी स्मृतियों में जीवित धार्मिक और पौराणिक कथाओं जैसे आप्रवासी जीवन के मुख्य स्तम्भ इस उपन्यास के विस्तृत वितान में रच बस कर पाठक के सम्मुख उपस्थित होते हैं।

 रामदेव धुरंधर द्वारा लिखित उपन्यास ‘ढलते सूरज की रोशनी’ प्रबोध और आनी चंद्रन की जीवन कथा में आने वाले उतार-चढ़ाव को केंद्र में रखकर एक तरफ मॉरिशस के समाज में व्याप्त स्वार्थ, देह व्यापार, ड्रग्स की कालाबाजारी, पारिवारिक मूल्यों और संबंधों में हो रहे विघटन, चिकित्सा के क्षेत्र में बढ़ती स्वार्थ लोलुपता और आत्माविहीन चिकित्सक, राजनीति में फैले भयंकर अनाचार, द्वेष और भ्रष्टाचार, चमचमाती रंगीन फिल्मी दुनिया के पीछे गहरी दलदली गलियों में छटपटाती जिंदगी और देह व्यापार में अपना जीवन, सपने और स्वास्थ्य गँवाती स्त्रियों की जिंदगी की गहरी पड़ताल करता है तो दूसरी ओर मानवीय संवेदना के तंतुओं को झकझोरता हुआ उपन्यास के विभिन्न पात्रों के मनोविज्ञान का ऐसा वर्णन प्रस्तुत करता है कि यह पात्र अच्छे अथवा बुरे के ढाँचे से अलग हटकर उन ग्रे शेड पात्रों की श्रेणी में आ खड़े होते हैं जिनमें पाठक यथार्थवादी जीवन का अक्स देख पाता है। व्यक्तिगत संबंधों के बहाने यह उपन्यास सामाजिक संबंधों में फैलते जा रहे छल कपट और प्रपंच की सच्चाई पाठक के सामने रखता है तो चरित्रों में परिस्थितिजन्य संवेदना और सहानुभूति के उद्रेक के माध्यम से खत्म होती जा रहे मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की आशा भी पैदा करता है। मॉरिशस का शिक्षा मंत्री बन चुका प्रबोध जो कि एड्स और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से ग्रस्त है तथा पूर्व मिस मॉरिशस रह चुकी उसकी प्रेमिका आनी चंद्रन के माध्यम से लेखक ने उपन्यास की कथा को बुना है। कथानक के विकास के क्रम में मुख्य पात्र प्रबोध लेखक के हस्तक्षेप से मुक्त होकर अपने चरित्र का विकास स्वयं करता दिखाई देता है। उपन्यास का नायक प्रबोध परंपरागत प्रतिमानों के अनुरूप नैतिक या अनैतिक के खांचों में बँटा ना होकर मानवीय दुर्बलताओं से सहज प्रभावित निरंतर परिवर्तनशील और विकासमान चरित्र है जिसकी अपेक्षा आधुनिक उपन्यास करता है। बाख्तिन के अनुसार “उपन्यास का नायक न तो महाकाव्य के और न ही त्रासदी के नाटक की अनुकृति होना चाहिए, उसमें सकारात्मक और नकारात्मक, उत्कृष्ट और निकृष्ट, हास्यास्पद और गंभीर सभी गुण होने चाहिए; नायक को पूर्व निर्मित और अपरिवर्तनीय चरित्र के रूप में नहीं बल्कि विकासमान, परिवर्तनशील, जीवन द्वारा ढाले जा रहे चरित्र के रूप में दिखाया जाना चाहिए” । यौन स्वच्छंदता, राजनीतिक भ्रष्टाचार तथा नशे के धंधे में लिप्त प्रबोध उपन्यास के अंत में पहुंचते हुए अपना सब कुछ त्यागकर हरिद्वार चल जाता है और उसके जीवन की साध केवल आनी के मन में अपने प्रति विश्वास जगा पाने की आशा रह जाती है। आनी भी प्रबोध के साथ केवल प्रेम के स्तर पर नहीं बँधी है। प्रबोध के लिए आनी केवल प्रेम का आधार ना होकर सौंदर्य सुख का जरिया भी है तो आनी के लिए भी प्रबोध से संबंध भावनात्मक आधार पर कम आर्थिक सुरक्षा पर अधिक है। वह उससे संबंध भी सिर्फ इसलिए समाप्त नहीं करती कि उसने कर्णिका के साथ संबंध स्थापित करके उसे धोखा दिया बल्कि उसकी स्वयं को ड्रग्स के धंधे में अपराधी बनने से बचाने की कोशिश इस संबंध विच्छेद का ज़्यादा बड़ा आधार थी। ‘ढलते सूरज की रोशनी’ की विशेषता यह है कि इसमें आने वाले पात्र कथा के विकास में अपना योगदान देकर अपनी चरित्र की छाप छोड़ते हैं। पात्र कथा के विकास में स्वाभाविक तौर पर आते हैं और थोपे हुए प्रतीत नहीं होते।

राजनीति समाज को गहरे प्रभावित करती है। ‘ढलते सूरज की रोशनी’ में राजनीति के भ्रष्ट चरित्र और रिश्वतखोरी के साथ-साथ जाति धर्म के नाम पर फैलती जा रही विद्रूपता का अंकन प्रबोध और रचन बहादुर के माध्यम से किया गया है। “एम. एल. ए. रचन बहादुर ने विस्तार से उसे सुनाया था। वह प्रबोध की अपेक्षा ज्यादा ताकतवर राजनेता था। चुनाव से पहले बात हो गई थी पार्टी की जीत हो तो उसे शिक्षा मंत्री बनाया जाएगा। चुनाव हुआ और जीत हुई, लेकिन उसे मंत्री बनाया नहीं गया। दोगला प्रधानमंत्री तो पैसे के लिए मरता है। प्रबोध ने पैसा देने के लिए प्रधानमंत्री की ओर हाथ बढ़ाया। पैसे का कीड़ा प्रधानमंत्री कैसे न लेता। सौदा हो गया और प्रबोध शिक्षा मंत्री बन गया” । हालांकि राजनीति उपन्यास की मुख्य समस्या नहीं है परंतु मूल कथा के विस्तार के क्रम में राजनीतिक उठापटक और दाँव-पेंच का वर्णन उपन्यास बखूबी करता है। चिकित्सा जैसे पवित्र व्यवसाय में फैलते जा रहे भ्रष्टाचार और आत्माविहीन होते चिकित्सकों पर रामदेव धुरंधर गहरी चोट करते हैं। डॉक्टर जीवा के माध्यम से ऐसे चिकित्सकों का चित्रण किया गया है। “मिस्टर प्रबोध, डॉक्टरी मेरा पेशा होने से मैं ही जानता हूँ इसमें क्या-क्या होता है। समझिए इसमें ‘शर्म’ का जलजला होता है। राजे महाराजे, अरबपति किसे संक्रामक रोग नहीं होते। रोग का पता लग जाए तो वह ‘शर्म’ से मुँह छिपाते फिरें। किसी का दोष भी नहीं, कौन मान सम्मान से जीना न चाहेगा। ‘शर्म’ से टूटे हारे ऐसे लोग डॉक्टरों को करोड़ों रुपए देकर कहते हैं उनके संग्राम संक्रामक रोग को रहस्य बनाकर अपने पास रखें। डॉक्टर उनसे पैसे का लोभी बनकर फायदा उठाते हैं। यह डॉक्टरी शोषण है” । डॉक्टर जीवा स्वयं भी प्रबोध को उसकी बीमारी के कारण ब्लैकमेल करता है। पारिवारिक मूल्यों में हो रहे विघटन को सावी के चरित्र द्वारा प्रस्तुत किया गया है तथा कर्णिका के माध्यम से बॉलीवुड की फिल्मी दुनिया के चकाचौंध भरे आवरण तले घुटन भरी जिंदगी में अपना जीवन बर्बाद करने को मजबूर लड़कियों का मार्मिक चित्रण हुआ है।

मूल्यहीनता के संसार में पुरुषों की भाँति स्त्रियाँ भी विभिन्न मानवोचित दुर्बलताओं की शिकार हैं और कई स्थानों पर पुरुषों के समकक्ष खड़ी दिखाई देती हैं। लेकिन पुरुषवादी समाज से संचालित होने के बावजूद इनमें अपनी स्वतंत्र सत्ता के प्रति चेतना भी है और संघर्ष करने की शक्ति भी। प्रबोध से अलग होकर आनी फैक्ट्री का पूरा काम स्वयं देखती है। सावी पितृसत्ता के हथियारों द्वारा शोषित होने के बाद ही सही लेकिन शोषण की इस प्रक्रिया को जानकर विरोध के लिए तैयार हो जाती है। उम्मीद की किरण वहाँ दिखाई देती है जहाँ एक स्त्री को संकट में देख कर दूसरी स्त्री अपनी प्रतिष्ठा, सुविधा और फायदा भूल कर अपने प्राणों तक का संकट मोल ले लेती है। चंद्रकला आनी की रक्षा में खेदन को जेल भिजवा देती है तो आनी सावी के उत्थान की कोशिश में जेल तक पहुंचने का खतरा उठा लेती है। ध्यातव्य है कि यहाँ इन स्त्रियों में पूर्व पहचान का कोई ज्यादा महत्व नहीं है। ये केवल औरत होने के नाते दूसरी औरत की तरफ सहायता का हाथ बढ़ाती हैं।

 “सावी ने आनी को बताया उसका पति अपनी बेटी का शील हरण की कोशिश करने वाला महा पापी आदमी है। इस बात पर उसने उसे झाड़ू से मार कर घर से हमेशा के लिए दूर भगाया था। 
आनी ने उससे पूछा, “तुम पुलिस स्टेशन गईं कि नहीं?”
सावी ने भर आए कंठ से कहा, “मैं ऐसे रंज में पड़ना नहीं चाहती।”
“रंज तो न कहो। पुलिस सहायता के लिए होती है।”
सावी ने अपनी ओर से जैसे अकाट्य बात कही, “वहाँ जाने पर वे लोग रस ले लेकर अपनी ओर से न जाने क्या-क्या कहते चले जाएंगे। यह मर्दों की दुनिया है औरत तो उनके हाथों में बस फड़फड़ाने के लिए जन्म लेती है।” 
आनी को उसकी बातों से झटका लगा, क्योंकि उसका जीवन भी कमोबेश यही था। उसने अपने आप में डूबने से अपने को बचाकर सावी से पूछा, “अपने पति के बारे में सच कह रही हो” ?

आनी की बेटी शामिला उपन्यास के अंतिम दौर में आकर अपनी छोटी सी उपस्थिति से ही आधुनिक युग में सशक्त और मानसिक रूप से विस्तृत सोच अपना चुकी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो अपनी माँ के प्रेमी को सहजता से स्वीकारती ही नहीं बल्कि परिपक्वता का परिचय देते हुए प्रबोध से खुलकर बात करती है। 

इस प्रकार रामदेव धुरंधर के उपन्यास ‘ढलते सूरज की रोशनी’ में मनुष्य के जीवन संबंधों और सामाजिक विसंगतियों को मानवीय संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। प्रबोध और आनी के निजी द्वंद्वों तथा संबंधों की रस्साकशी के बीच रामदेव धुरंधर अपनी सृजनात्मकता तथा रचनात्मक कौशल के बल पर न केवल मानव जीवन के संघर्षों, दुर्बलताओं तथा बनते-टूटते मूल्यों का विश्वसनीय खाका खींचते हैं बल्कि सकारात्मक भविष्य के लिए अधिकाधिक संभावनाओं के प्रति आशान्वित भी करते हैं।

निष्कर्षतः हम देखते हैं कि रामदेव धुरंधर मॉरिशस में पहुँचे गिरमिटिया मजदूरों की व्यथा, संघर्ष और उद्दाम जिजीविषा के इतिहास को पूरी संवेदना के साथ पाठक तक पहुँचाने में सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त स्वातंत्रयोत्तर मॉरिशस की राजनीति, वैश्वीकरण के दौर में बदलते आप्रवासी समाज पर संक्रमणशीलता और बाजारवाद का प्रभाव और मानवीय मूल्यों में हो रहे परिवर्तनों के प्रति भी लेखक संजीदा है। रामदेव धुरंधर का लेखन भविष्य के प्रति आशा के द्वार खोलता है जिसमें भावी पीढ़ी के लिए रचनात्मकता की अपार संभावनाएँ हैं। 


संदर्भ 
1. रामदेव धुरंधर की रचनाधर्मिता, डॉ. दीपक पाण्डेय, डॉ. नूतन पाण्डेय (संपादकगण), साहित्यभूमि प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृष्ठ- 24 
2. रामदेव धुरंधर की रचनाधर्मिता, डॉ. दीपक पाण्डेय, डॉ. नूतन पाण्डेय (संपादकगण), साहित्यभूमि प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृष्ठ- 50 
3. रामदेव धुरंधर, ढलते सूरज की रोशनी, सामयिक बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ-15 
4. वही, पृष्ठ-30 
5. वही, पृष्ठ-64-66 
6. रामदेव धुरंधर, छोटी मछली बड़ी मछली, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, 1983
7. रोहिणी अग्रवाल,- ‘मॉरिशस का हिन्दी उपन्यास पुनर्मूल्यांकन’, ‘ आलोचना’ विशेषांक आलोचना का उत्तर समय, अक्टूबर-दिसंबर, 2005
8. रामदेव धुरंधर, पथरीला सोना (6 खंडों में), हिन्दी बुक सेंटर, नई दिल्ली, 2008 
9. कमलकिशोर गोयनका, हिन्दी का प्रवासी साहित्य, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद, 2011 
10. रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी उपन्यास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2006 
11. प्रह्लाद रामशरण, मॉरिशस का इतिहास (संपादक) प्रदीप कुमार, समानांतर प्रकाशन, नई दिल्ली, 1988 
12. रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी,27वाँ संस्करण, संवत 2050 वि. 

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