काव्य: राज व्योमकेश

राज व्योमकेश
1) तुम और पलाश...

निराशा के अंधियार का छोड़कर पीछे गलियारा
पतझर के मुहल्ले के आखिरी कोने पर
बाईं तरफ, वृक्ष पर आश के
उग आए हैं लाल लाल सूर्य से
फूल पलाश के।

चटक रंगों को समेटे लहरा रहे हैं हवा में उन्मुक्त
किसी राज्य की विजय पताका की तरह ही।
जिसके शस्त्रागार में नहीं हैं,
गन्ध की भांति दिग्भ्रमित करने वाले 
एक भी मायावी अस्त्र या शस्त्र।
जीत लेते जो सबके मन 
बिना चलाये ही तीर झूठे गन्ध पाश के 
खिल आए हैं फूल पलाश के।

बिल्कुल इन फूलों जैसे हो तुम भी।
प्रत्यक्ष, शाश्वत, सत्य और त्वरित समर्पित भी।
केवल अंतर इतना है तुम दोनों में
दूर बहुत हूँ मैं तुमसे
और पास हूँ इन फूलों के।
कभी नहीं आते हो तुम मिलने मुझसे 
हर वर्ष किन्तु आ जाते हैं ये फूल,
दिए जलाने तुम्हारे होने के अहसास के।
फिर से मिलने आये हैं देखो
फूल पलाश के।
***


2) सपना...

बीती रात के चौथे पहर
खटखटाया किसी ने अचानक,
दरवाजा मेरे घर का।
सो रहे थे घर के सब लोग
गहरी नींद में।
अपनी आँखे मिचमिचाते हुए खोला
मैंने दरवाजा।
और रह गया स्तब्ध,
क्योंकि सामने थे तुम!
इससे पहले कि मैं कुछ बोलता तुमसे,
बज उठा अलार्म
खुल गयीं आँखे
टूट गया स्वप्न।
सच होते हैं सुबह के सपने 
कहते हैं ऐसा बूढ़े लोग
***


3) जब मिले थे हम पहली बार...

जब मिले थे हम पहली बार
सर्द शाम में,
ठंडी रेत पर चलते हुए।
           जब मिले थे हम पहली बार।

ढलता सूरज, तरु-डालियों पर चहचहाते पक्षी।
प्राणों में नव-ऊर्जा भरती सुगंधित मलयानिल।
कितना अलौकिक था वह अनुभव।
            जब मिले थे  हम पहली बार।

संसार से अनिभिज्ञ, एक दूजे की बातो में
खोये से हम
प्रकाश की चाल से भागता समय
अलकापुरी से भी ज्यादा सुंदर थे 
सजाये वे ख्वाब।
           जब मिले थे हम पहली बार।

चले गए जाने कहाँ अचानक तुम।
जलाती है मेरे पाँव, अब वही ठंडी रेत 
दम घोटने को दौड़ती पवन।
बैठा रहता घण्टों
घाट की सीढियों पर,
लेकिन पाता नहीं कुछ भी वैसा
जैसा था तब...
         जब मिले थे हम पहली बार
***

निवास: शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश, भारत  242001
चलभाष: +91 737 662 2386
ईमेल: rudrapathak200@gmail.com

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