व्यंग्य: कवि का आक्रोश

नफे सिंह कादयान

- नफे सिंह कादयान 


 हमारे मोहल्ले का फेसबुकिया गुमनाम कवि ‘शायर तूफानी’ आजकल आक्रोशित है। वह गहरी सोच में बड़बड़ाता हुआ हर समय चहल-कदमी करता रहता है। घूंसा बना उसके हाथ इधर-उधर झटकने का अंदाज ऐसा होता है जैसे किसी को जान से मारना चाहता है। विवादित फिल्मों की सफलता देख उसके दिल का ज्वालामुखी लावा उगल रहा है। उसे लगता है जब तक उसके साहित्य के खिलाफ कोई धरना प्रदर्शन नही होगा वह गुमनाम ही बना रहेगा। उसे केवल फेसबुक पर ही दस-बीस लाइक मिलेंगे, वह कभी राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त नहीं कर सकेगा।

 अपने घर पर पत्थर फिंकवाने, मुँह पर स्याही, कालिख पुतवाने, अपना पुतला जलवाने जैसा कुछ बड़ा करने का उद्देश्य ले वह दो-तीन विवादित कृतियाँ लिख चुका है मगर अफसोस विरोध एक का भी नहीं हुआ। अलबता उसकी हर पुस्तक पर स्थानीय तुकबाज साहित्य मंचों द्वारा विमोचन अवसर पर वाह-वाह की गई। दो-पेजी अखबारों, थर्ड डिग्री पत्रिकाओं द्वारा समीक्षाएँ लगाई गई। कई बार तो वो ये देख हैरान रह गया कि जो कविता उसने पुस्तक में लिखी ही नहीं उसकी भी समीक्षा उसके नाम से लग कर आ गई।

 हैरान परेशान कवि महोदय की ये समझ में नहीं आ रहा था कि उसके लेखन में गलती कहाँ हुई। वह तो हमारे मौहल्ले में पहली पुस्तक के बाद ही शपथ-पत्रीय दावा कर रहा था कि देखना इसकी समीक्षा लगते ही देश में उबाल आ जायेगा। उस पर जानलेवा हमले होंगे और वह राष्ट्रीय स्तर के अखबार, टी.वी चैनलों पर छा जायेगा। उसे ज़ैड प्लस सुरक्षा मिलेगी और उसके नाम पर देश भर के साहित्यिक मंचों पर चर्चा चलेगी, संगोष्ठियाँ व सम्मेलन होंगे, न्यूज चैनलों पर थूक बिलोते हुए गर्मागर्म बहसें होगी।

 अपनी पहली पुस्तक में विवाद का तड़का लगाते हुए शायर तूफानी ने देश के बाबाओं, मुल्लाओं, तांत्रिक, पोगे पंडितों के खिलाफ जमकर जहर उगला। डेरे, आश्रम गुफाओं, तहखानों में, उनके, चेलियों के साथ रास-रंग के रंगीन महाकाव्य लिख डाले, भगवान के नाम पर चेलों की दौलत हड़पने के कई उदाहरण दे डाले। उनके खिलाफ अखबारों में छपने वाली तमाम बलात्कार की घटनाओं को आधार बना दावा कर दिया कि ये लोग दुष्कर्मी, फ्रॉड, मानवता पर कलंक हैं।

 शायर तूफानी के इतना जहर उगलने के बाद भी किसी धार्मिक संस्थान के चेले-चपाटों ने उसे न तो जान से मारने की धमकी दी और न ही किसी मौलवी ने फतवा जारी किया। वह धमकी के खिलाफ थाने में रिर्पोट दर्ज करवा, अखबार, टी.वी चैनलों पर आक्रोश उत्पन कर वाह-वाही लूट सकता था पर ऐसा कुछ नही हुआ। यह देख शायर थोड़ा मुरझाने के बाद ये सोच दूसरी विवादित पुस्तक लिखने लगा कि इन बाब्बे, मौलवियों में इतना साहस ही नही जो एक कलमकार का विरोध कर सकें। अब वो संत महात्मा नहीं रहे जो अपने विरोधियों को गोलियाँ मरवा देते थे, अपने चेलों को जन्नत की हूरें देने का लालच दे मानव बम बना चिथड़े उड़ा देते थे, बाजारों में आगजनी करवा देते थे।

 दूसरी पुस्तक शायर तूफानी ने देश के नेताओं के खिलाफ पोत कर मोहल्ले में घोषणा कर डाली कि इसकी समीक्षा लगते ही चहुँ ओर सनसनी फैल जाएगी। अबकी बार पक्का विवाद होगा। इस पुस्तक में उसने केंद्र व राज्यों में कार्यरत कई दिग्गज नेताओं द्वारा किये गए तथाकथित महाघोटालों की बखिया उधेड़ कर रख दीं। उसने दूसरों के फटे में टांग फंसाने वाले सूचना जनसेवक कार्यकर्ताओं से सम्पर्क कर आंकड़ों सहित घपलेबाजियों का पूरा विवरण अपनी पुस्तक में लिख डाला। 

 नेताओं के झूठे-सच्चे प्रेम प्रसंग, अय्याशियों के किस्सों, उनकी अथाह दौलत पर भी जमकर कलम चलाई। कवि महोदय ने इस बार एक कदम और आगे बढ़ाते हुए नेताओं के खिलाफ लिखी पुस्तक का विमोचन एक नामी नेता से ही करवा डाला। उसे यकीन था नेता जी पुस्तक देखते ही उसे अपने कार्यकर्ताओं द्वारा मंच से नीचे फिंकवा देंगे और वहाँ मौजूद पत्रकार इस मुद्दे को उछाल देंगे पर हाय री! बेचारे कवि की बदकिस्मती। 

 विमोचन के समय अपने कार्यकर्ताओं से बात करते हुए नेता जी ने पुस्तक के दो-चार पन्ने पलटे और खड़ा होकर शायर तुफानी को समाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाला कलम का सच्चा सिपाही घोषित करते हुए उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर डाली। विमोचन के बाद इस पुस्तक की कई पत्र-पत्रिकाओं में उल्टी-सीधी समीक्षा भी लग कर आई पर इस बार भी कोई हंगामा बरपा न हुआ। उसे न तो किसी टी.वी. चैनल वाले ने भाव दिया और न ही नेताओं के चमचों ने धरना प्रदर्शन किया।

 कवि शायर तूफानी की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी पर उसे अपना तय किया लक्ष्य प्राप्त नहीं हो रहा था। अपना विरोध न होने के चलते वह बहुत निराश, हताश, व्यथित हुआ। आक्रोशित हो आखिरकार उसने अपनी आगमी पुस्तक में ईश निंदा कर लोगों से अपना जीवन समाप्त करवाने की ठान ली। सोचा कि चलो जिंदा नहीं तो मरकर ही सुर्खियों में आ जाऊंगा। कुछ साहित्य की आजादी के नाम पर उसकी जय-जय कार करेंगे तो कुछ गालियाँ देंगे। 

 पहले वह अपनी हर पुस्तक का शुभारंभ करने से पहले ईश वंदना करता था मगर इस बार उसने दुनिया भर के ईश्वरों के खिलाफ एक काव्य महाग्रंथ रच डाला। उसे पक्का यकीन था कि लोग अब उसे पत्थर मार-मार कर संगसार करने आएंगे मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। विमोचन अवसर पर पिछली पुस्तकों की तरह इस बार भी उसका स्थानीय स्तर पर गुणगान किया गया। 

 अब हमारे मोहल्ले का कवि शायर तूफानी आहें भरते हुए शपथपूर्वक घोषणा करता फिर रहा है कि ये फिल्म वाले कुछ संगठनो, लोगों को पैसा दे अपनी फिल्मों का विरोध करवाते हैं ताकि उनकी फिल्मों का अधिक प्रचार हो जिससे उनकी करोड़ों की कमाई हो जाये।

 हमारे मोहल्ले का कवि विचारवान तो बहुत है पर उसे ये ज्ञान नहीं है कि संत-महात्मा दूसरों की लिखी पुस्तकें नहीं पढ़ते बल्कि अपने लिखे धर्मग्रंथों को लोगों से पढ़वाते हैं, उन्हे पवित्र घोषित करवा उनकी पूजा करवाते हैं और नेताओं के पास तो इतना समय ही नही कि वे मोहल्ला लेखकों की पुस्तकें पढ़ने बैठ जाएँ। आम लोग भी अब पुस्तकें पढ़ने के लिये नहीं बल्कि अपने ड्राईंग रूम में सजाने के लिये खरीदते हैं। 

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