भाषायी ताना-बाना: [2] शब्द-डोर और उसकी बुनावट

चंद्र मोहन भण्डारी
हम तो बचिगे साहब दया से
शब्द डोर गहि उतरे पार।
-       कबीर [1]

शब्द डोर थामे कबीर पार उतर गये; एक अलग संदर्भ में उसी डोर (शब्द या भाषा की) के सहारे मानव पार उतर गया और पीछे छोड़ आया वह संसार, जिसमें सभी जीवों की श्रेणी में वह भी एक था। पार उतरने के प्रयासों में डोर वही है पर संदर्भ अलग। वैसे देह के स्तर पर मानव आज भी वहीं है जहाँ पहले था पर मन के स्तर पर शब्द डोर थामे वह बहुत आगे जा पहुँचा।

आज इंसान इस पायदान पर पहुँचा है न जाने किन किन रास्तों से गुजरता हुआ जिसमें एकदम करीबी पायदान में नजर आता है बोनोबो चिंपाजी, हमारा सबसे करीबी रिश्तेदार। विज्ञान की मानें तो जीन या वंशाणु के आधार पर मानव और चिंपांजी में 98.6% समानता है। लेकिन दोनों में इतनी समानता होते भी मानसिक स्तर पर विराट अंतर साफ नजर आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह छोटा सा अंतर भाषाई ताने-बाने की बुनावट [2] का था जिसने हमें ‘शब्द डोर’ थमा दी। हमने उस डोर को थामने में देर न की, और जंतु जगत की पुरानी बिरादरी छोड़ एक अलग राह पर चल पड़े।

जो भी हो मानसिक स्तर पर यह अंतर मस्तिष्क की संरचना से जुड़ा है। हो सकता है उन 1.5% जीन्स में कुछ खास हो जो इस अंतर को समझा सके। इसके विस्तार में न जाकर हमारा उद्देश्य इस अंतर के कारण मानव मस्तिष्क से जुड़े कुछ बिंदुओं पर होगा जो उसकी भाषा क्षमता के लिये जिम्मेदार हैं। डारविन [3] ने 150 साल पहले ही विकासवाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते समय इशारा किया था कि मानव की भाषागत क्षमता एक अंतर्निहित प्रवृत्ति है जो प्रभावी संप्रेषण की कला यानी भाषा के सीखने में सहायक होती है। स्टीवेन पिंकर की सारगर्भित व रोचक पुस्तक ‘द लैंगुएज इंस्टिंक्ट’ [4] में अंतर्निहित भाषाई सहजज्ञान से जुड़े मुख्य बिंदुवों पर विस्तृत चर्चा की गई है।

आज किसी भाषा जैसे हिंदी का जो स्वरूप हम जानते हैं वह न जाने कितने रूपांतरणों से गुजरा है आने वाले समय में रूपांतरण की यह प्रक्रिया चलती रहेगी। किसी भी जीवंत भाषा की विकास यात्रा सरिता की तरह है जो निरंतर प्रवाहमान है और जिसमें छोटी-बड़ी सहायक नदियों का अपना योगदान रहता है। इस विषय पर संक्षिप्त चर्चा अगले पृष्ठों पर होगी।

भाषागत क्षमता या अक्षमता (Language Impairment) की बात

भाषाई ताने-बाने की बारीकियों को समझने में भाषा से जुड़ी समस्याओं एवं अक्षमताओं का वर्णन उपयोगी सिद्ध हुवा। यह सोचना स्वाभाविक है कि जब भाषा की बात हो रही हो तब जिक्र भाषागत अक्षमताओं का क्यों?

बात सरल और सीधी है सामान्य से अलग हालात ही मस्तिष्क की असामान्य अवस्था को इंगित करते हैं जो चोटिल होने, या बीमारी के कारण या जन्म से ही विद्यमान हो सकते हैं। दूसरी बात यह है कि सामान्य इंसान पर सभी तरह के प्रयोग करना संभव नहीं, एवं नैतिक आधार पर भी स्वीकार्य नहीं जबकि रोगी की जांच एवं चिकित्सा एक जरूरत है जो हमारी जानकारी में वृद्धि कर सकती है। मनोरोग की पहचान एवं निदान हमें मस्तिष्क के बारे में सूचना देने में सक्षम हैं। बात चूंकि भाषा की हो रही है हम भाषा से जुड़ी कुछ असामान्य अवस्थाओं का जिक्र करना चाहेंगे।

यह तो अब विदित ही है कि हर कार्य के लिये मस्तिष्क में क्षेत्र निर्धारित होता है। मस्तिष्क के बायें गोलार्द्ध में भाषा से जुड़े दो क्षेत्र [2] पहचाने गये हैं जिनमें एक अग्र भाग में, जिसे ब्रोका क्षेत्र (Broca’s area) कहते हैं और दूसरा मध्य भाग में, जिसे वेरनिक क्षेत्र (Wernicke’s area) का नाम दिया गया है जिनकी संक्षिप्त चर्चा पिछले लेख [2] में की जा चुकी है। यह नामकरण पाँल ब्रोका और वेरनिक के महत्वपूर्ण योगदान के कारण उनके सम्मान में किये गये। आधुनिक प्रौद्योगिकी ने मस्तिष्क संबंधी हमारी जानकारी में वृद्धि की है। पहले समस्या निदान के लिये मनोरोग चिकित्सक लक्षणों के आधार पर रोग की प्रकृति एवं अवस्था की जानकारी प्राप्त करते थे क्योंकि तब विकल्प नहीं थे। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास के साथ न्यूरोलाँजी का विज्ञान पल्लवित हुआ और मस्तिष्क क्रियाओं को न्यूरोन तंतुवों की कार्यविधि के आधार पर समझने[5] में मदद मिली।

ब्रोका एफेसिया, वेरनिक एफेसिया (Broca’s aphasia, Wernicke’s aphasia)

भाषा से जुड़े दोनों क्षेत्रों के कार्य अलग हैं ब्रोक‍ा क्षेत्र भाषा उच्चारण के लिये जिम्मेदार है जबकि वेरनिक क्षेत्र भाषाई समझ के लिये। किसी भी कारण से ब्रोका क्षेत्र प्रभावित होने पर उस की कार्य क्षमता में कमी आना स्वाभाविक है। ऐसा इंसान कही गई बात को सामान्य लोगों की तरह समझ लेगा पर अपनी बात कहना उसके लिये मुश्किल होगा। उसके वाक्य अक्सर छोटे होंगे, वह शब्द तलाशने में कठिनाई महसूस करेगा, और रुक-रुक कर बोलेगा। एक या बहुवचन और वर्तमान या भूतकाल की गलतियाँ होना आम है।

कुछ उदाहरण:*

यह पूछने पर कि तुम्हारी मेज पर कितनी किताबे हैं, ब्रोका एफेसिया वाले इंसान का जवाब कुछ ऐसा होगा-

किताब किताब, .- - मेज दो दो किताब।

मैं कुत्ते को घुमाने ले गया था यह कहने के प्रयास में उसका अनुमानित कथन:

मैं जाया कुत्ते घुमाना।

जब वेरनिक क्षेत्र किसी कारणवश प्रभावित होता है तब वह इंसान अपनी बात कहने में कठिनाई अनुभव नहीं करेगा और सामान्य इंसान की तरह शब्दों का उच्चारण कर लेगा, पर उसकी बातों में समझ का अभाव साफ दिखाई देगा। उसका वाक्य एवं उच्चारण ग्रामर की दृष्टि से सही होते हुए भी बात अस्पष्ट होगी जिसका शायद अर्थ निकालना भी मुश्किल हो, जैसे-

मेरी बिल्ली चली गई मैं भी अपने भाई के साथ चला गया, फिर हम वापस लौट आये। मैं उसका ध्यान रखने में कसर नहीं करूंगा।

विलियम सिंड्रोम

ब्रोका व वेरनिक क्षेत्रों के अतिरिक्त भी कुछ स्थल हैं जो इंसान की बौद्धिक व भाषाई क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं [4]। यहाँ हम बात करेंगे एक खास सिंड्रोम की जिसे विलियम सिंड्रोम कहा जाता है और जो विशेष प्रकार के मंदबुद्धि लोगों में पाया जाता है। मेरुदण्ड के उपरी भाग में जहाँ उसका मस्तिष्क में जुड़ाव होता है विशेष तरह की समस्या कुछ कार्यों की क्रियाशीलता को प्रभावित करती है। मेरुदंड में खास तरह के विकार के कारण कुछ मामलों में हाइड्रोसिफेलस (hydrocephalus) की स्थिति आ जाती है जिसमें मस्तिष्क के कुछ हिस्सों पर दबाव बढ़ जाता है और कार्यक्षमता प्रभावित होती है। ऐसे लोगों का आइ क्यू कम होता है करीब 50 या उसके नीचे। ऐसे कई बच्चों पर अध्ययन से उनके बारे में काफी कुछ जानकारी [4] अब ज्ञात हो सकी है। अक्सर ऐसे लोगों को देखने पर भी आभास हो सकता है कि वे हाइड्रोसिफेलस से प्रभावित हैं। वे सामान्य से अलग दिखते हैं जैसे चेहरा कम चौड़ा, माथा चौड़ा, संकरी नासिका और मोटे होंठ। ऐसे लोग सामान्य काम करने में भी कठिनाई अनुभव करते हैं जैसे जूते का फीता बांधना या आलमारी से कोई सामान निकाल कर लाना। अगर उनसे कहा जाय कि अमुक चीज आलमारी में रखी है उसे ले आओ तब वे प्रयास करेंगे जरूर, पर अगर वहाँ कई तरह की चीजें रखी हों तो वे दुविधा में पड़ सकते हैं और उन्हें सामान्य इंसान की तुलना में ज्यादा देर हो सकती है। लेकिन यह एक रोचक जानकारी है कि इन लोगों में में कुछ खास तरह की भाषागत क्षमता सामान्य की तुलना में अधिक होती है खासकर वाचन क्षमता। उसी उम्र के सामान्य बच्चों की तुलना में विलियम सिंड्रोम वाले अधिक वाकपटु होते हैं और वाक्य बनाने एवं उनके उच्चारण में अपेक्षाकृत अधिक सक्षम होते हैं। अगर उनसे कहा जाय कि वे किसी विषय में कुछ बतलायें मसलन गाय, घोड़े या हाथी के बारे में तो वे धारा प्रवाह बोल सकते हैं इसके बावजूद कि वे मंदबु्द्धि हैं और उनका आइ क्यू 50 से कम होता है। सामान्य काम जैसे जूते का फीता बांधना या आलमारी से कोई सामान निकाल लाने में वे दुविधा‍ में रहते हैं पर अपने परिवेश से जुड़ी वस्तुओं के बारे में वर्णन करने को कहा जाय वे तेजी से बोल सकते हैं और उनका व्याकरण सही होता है। जो वे बोल रहे हैं वह सामान्य वाक्य ही होते हैं और कुछ पुनरावृत्ति भी हो सकती है और कथ्य में कोई बौद्धिक क्षमता नजर नहीं आती। पर वे लगभग धाराप्रवाह बोल सकते हैं जो ग्रामर की द्दष्टि से सही होता है। मसलन अगर ऐसे इंसान से घोड़े पर बोलने को कहा जाय तो अनुमानित उत्तर कुछ इस प्रकार हो सकता है एक उदाहरण:*

घोड़ा क्या है एक जानवर है और आप यह भी पूछेंगे कि घोड़ा कहाँ रहता है वह अपने अस्तबल में रहता है। घोड़ा ज्यादातर खड़ा रहता है। वह रात को भी खड़ा ही रहता है और खड़े खड़े सोता भी है। घोड़ा गाय या कु्ते की तरह बैठता नहीं। इसकी वजह यही है कि उसके पैरों की ताकत ज्यादा होती है और इसीलिये वह तेजी से दौड़ सकता है। चूंकि वह तेजी से दौड़ सकता है लोग उसकी सवारी करते हैं। बहुत से लोग घुड़दौड़ के शौकीन होते हैं। घुड़दौड़ का शौक भी एक नशे की तरह है। वैसे घोड़ा बड़े काम का जानवर है पहले जब कारें या मोटर गाड़ियाँ नहीं थीं तब घोड़ागाड़ी का चलन हुआ करता था। घोड़ा वैसे तो सीधा जानवर है पर उसे गुस्सा भी आ सकता है और ऐसे में वह सवार को गिरा सकता है। सवारी करते वक्त पूरी सावधानी से काम लेना चाहिये नहीं तो सवार गिर सकता है।

भाषाई सहजज्ञान

सब मिलाकर यह कुछ हद तक हैरत में डालने वाली बात है। एक इंसान, जो मंदबुद्धि हो, और अपना सामान्य काम करने में कठिनाई अनुभव करता हो वह इस तरह लगभग धारा प्रवाह बोल सकता है। माना कि इस वर्णन में कोई विद्वता वाली बात नहीं, पर भाषा एकदम सही है और ग्रामर भी। आज मस्तिष्क की जो जानकारी मिल रही है और मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा का जो अनुभव है उस से यह संकेत मिलता है कि भाषा के लिये प्रावधान मस्तिष्क में मौजूद हैं। एक बच्चे को भाषा ज्ञान देते हैं और दो या तीन सालों में वह बोलना सीख जाता है लेकिन हम किसी पालतू जानवर को बोलना नहीं सिखा सकते सिवाय तोते के और वह भी अत्यंत सीमित संदर्भ में। बात साफ है भाषा सीख सकने की सामर्थ्य अंतर्निहित है। भाषा के इतर भी अंतर्निहित ज्ञान होते हैं जैसे एक चिड़िया का बच्चा जन्म लेता है और तीन चार दिनों के अंदर उड़ना शुरू कर देता है जिसे सिखाने की ज्यादा जरूरत नहीं होती पर आरंभ में कुछ प्रशिक्षण की जरूरत होती है जो उसे मां से मिल जाती है। हर जंतु के लिये अंतर्निहित ज्ञान की बात सही है ऐसा ज्ञान बुद्धि आधारित न होकर सहजज्ञान या instinct कहा जाता है। यहाँ यह स्पष्ट करना होगा कि अंतर्निहित भाषा ज्ञान की प्रवृत्ति विद्यमान होते भी आरंभिक वर्षों में मानवीय संपर्क [2] आवश्यक है।

निष्कर्ष यह है कि जैसे उड़ना चिड़िया के शिशु को सिखाना नहीं पड़ता वह सहज रूप में आ जाता है क्योंकि यह ज्ञान अंतर्निहित है उसी तरह भाषा ज्ञान मानव में सहज ही आता है लेकिन उसे थोड़ा आरंभिक सहारे की दरकार है। अंतर्निहित होने के बावजूद पहले दो-तीन सालों में मानव शिशु को मानव का सान्निध्य आवश्यक है। इस विषय पर पिछले लेख [2] में चर्चा की गई है।

भाषागत क्षमता का सवाल

मस्तिष्क में भाषाज्ञान संबंधी प्रावधान का मामला जटिल है और हमारी जानकारी अभी आरंभिक चरण में है। कुछ जानकारी मस्तिष्क संबंधी रोगों से मिलती है और कुछ असम्पृक्त मानव समूहों के संपर्क से। यह एक रोचक प्रश्न हो सकता है कि दो मानव समूह जो अलग भाषाऐं बोलते हों अगर साथ रख दिये जायें तो कैसे बातें करेंगें?

सामान्यतया इस तरह का प्रयोग कर पाना आसान नहीं पर कभी ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं किन्हीं अन्य कारणों से, और ऐसा जब होता है उसका लाभ उठाया जा सकता है। यूरोपीय देशों ने दुनिया भर में अपने उपनिवेश स्थापित किये और उनका जमकर शोषण किया। कई बार सुदूर अंचलों या द्वीपों में अपने विभिन्न उपनिवेशों से मजदूर ले जाना आम बात हुआ करती थी। किसी ऐसे अंचल में दो या अधिक मजदूरो के समूह संपर्क में आये जो अलग भाषाऐं बोलते थे। इन स्थानों पर उपरोक्त सवाल का जवाब ढूंढा जा सकता है कि दो अलग भाषाऐं बोलने वाले मानव समूह संपर्क में आने पर क्या होगा? भाषाविदों के लिये भी यह अवसर था जहाँ वे भाषा के विकास संबंधी कुछ सवालों के जवाब तलाशें और ऐसा हुआ भी।

ऐसे मानव समूहों के बीच भी संप्रेषण होगा पहले संकेतों में और उसके बाद कुछ ध्वनियों के माध्यम से जो दोनों की भाषाओं से चयनित होंगे। यह काम समय लेगा और धीरे धीरे एक मिश्रित या खिचड़ी कामचलाऊ भाषा प्रयोग में आने लगेगी। सच देखा जाय तो आरम्भ में आज की विकसित भाषाऐं भी कामचलाऊ ही थीं और कुछ सीमा तक आज भी हैं। यह कामचलाऊ खिचड़ी भाषा पिजिन (pidgin) कही जाने लगी। माना जाता है कि इस शब्द की उतपत्ति दक्षिणी चीन में हुई जहाँ के निवासी अंग्रेजों के संपर्क में आये और भाषाई आदान प्रदान में ‘बिजनेस’ शब्द को चीनी श्रमिक ‘पिजिन’ या उस से मिलता कोई उच्चारण करने लगे। आज पिजिन शब्द मिश्रित भाषा के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

भाषागत विकास के चरण

भाषागत विकास में जानकारों के अनुसार दो चरण हैं जो महत्व के हैं: पहला है ध्वनि का स्वैच्छिक या मनमाना प्रयोग [6], अपनी सूचना दूसरे तक पहुँचाने हेतु। मान लें मुझे हाथी के बारे में कुछ कहना है यह शब्द हाथी उस जानवर की तरह नहीं और बैक्टीरिया शब्द बैक्टीरिया की तरह नहीं; हाथी एक छोटा शब्द है जो बडे जंतु के लिये प्रयोग हो रहा है और बैक्टीरिया बड़ा शब्द बहुत छोटे के लिये। यह ध्वनि का मनमाना या स्वैच्छिक प्रयोग है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जिस उद्देश्य से यह किया जा है उसमें सफलता प्राप्त हो रही है। शर्त एक है कि एक क्षेत्र में सभी लोग एक ही शब्द प्रयोग करें एक खास जंतु के लिये। इस आधार पर यह समझा जा सकता है कि दुनिया की सैकड़ों भाषाओं में ध्वनि संबंधी समानता कम ही है। बोलने में जो मनमानापन या स्वैच्छिकता दिखायी देती है लेखन में वही वैविध्य बिम्बित होता है। न केवल विभिन्न भाषा ध्वनियों में अंतर एवं मनमानापन है उनकी लिपियों में भी है। इसके अतिरिक्त भी और तरह की स्वैच्छिकता दिखाई देती है लिखावट की दिशा के संबंध में। अधिकतर लिपियाँ बायीं ओर से दाहिनी ओर को लिखी जाती हैं और कई दाहिनी से बायीं ओर। कुछ हैं जो ऊपर से नीचे की ओर लिखी जाती हैं। इसके बावजूद आधारभूत स्तर पर उनमें समानता भी है जो दिखायी देती है ग्रामर में। शायद इसीलिये नोम चोमस्की ने यूनिवर्सल ग्रामर [7] की बात की, जो ध्वनि या लिपि के लिये नहीं कही जा सकती। यूनिवर्सल ग्रामर से तात्पर्य है कि ग्रामर मूलत: आंतर्निहित ज्ञान है जबकि ध्वनि या लिपि के लिये ऐसा नहीं कहा जा सकता।

दूसरा चरण जिसने भाषाई विकास को गति और विस्तार दिया वह है – सीमित ध्वनियों का असीमित लगभग अनंत उपयोग# [4, 6]। भाषा सीमित अक्षरों के असीमित उपयोग करने में सक्षम है। यह बात मोर्स कोड के आधार पर आसानी से समझी जा सकती है। पहले जब टेलीफोन सुविधा नहीं थी संप्रेषण मोर्स कोड की सहायता से किया जाता था जो केवल दो ध्वनियों पर अधारित होता है जिन्हे डैश और डौट कहा जाता है डौट एक बिंदु की तरह है और डैश एक लघु रेखा जैसा। लेखन में डैश एक लघुरेखा से दर्शाया जाता है और ध्वनि में एक लघु अंतराल ध्वनि द्वारा। इन दो ध्वनियों के मध्य खाली समय भी महत्वपूर्ण है और इस तरह शब्द, वाक्य बनाये जा सकते हैं।

एक और उदाहरण डिजिटल संसार में प्रयुक्त बाइनरी सिस्टम है जिसमें केवल दो अंकों का प्रयोग कर कोई भी अंक बनाया जा सकता है और यह आधुनिक डिजिटल प्रणाली का आधार है। इसमें महत्व उस अंक के स्थान का है। अंक दो के घातों के हिसाब से मान बदलता है:

0 0 0 1 तुल्य अंक= 1 ( 2 घात 0)
0 0 1 0 मान = 2 ( 2 घात 1)
0 1 0 0 मान= 4 ( 2 घात 2)
1 0 0 0 मान = 8 ( 2 घात 3)

हम जानते हैं कि दशमलव पद्धति में दस अंकों के आधार पर सारे अंक लिखे जा सकते हैं जबकि बाइनरी में केवल दो अंकों के आधार पर। यह भी एक अच्छा उदाहरण है जहाँ सीमित अंकों का असीमित उपयोग नजर आता है।

अंग्रेजी भाषा में 26 अक्षर हैं जिनसे शब्द बनते हैं और फिर वाक्य। अंग्रेजी भाषा का सारा साहित्य- पौराणिक, ऐतिहासिक से लेकर गल्प, और वैज्ञानिक जानकारी तक – इन्हीं सीमित संसाधनों का असीमित उपयोग नही तो और क्या है।

ध्वनि, शब्द और शब्दार्थ रूपांतरण

ध्वनि के स्वैच्छिक उपयोग के साथ ही दो या अधिक भाषाओं के मध्य संपर्क न केवल नये शब्दों के लिये भाषा में स्थान बनाते हैं अपितु उनके अर्थों का भी रूपांतरण संभव कर सकते हैं। अपने दैनिक जीवन में हमें ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। मुझे एक उदाहरण रोचक लगा करता है।

गौर करें शब्द है गिलास। ‘एक गिलास पानी लाना।‘ ग्लास (glass)’ या कांच से गिलास तक का सफर रोचक है क्योंकि इसमें अर्थ भी रूपांतरित हो जाता है। ग्लास यानि कांच, लेकिन गिलास स्टील या कांसे का हो सकता है या फिर कांच का भी। कांच नामक पदार्थ से आरंभ होकर गिलास शब्द एक विशेष आकृति वाले बर्तन का सूचक बन गया जिसे अंग्रेजी में टम्बलर कहा जाता है। दक्षिण चीन में अंग्रेजी शब्द बिजनेस उच्चारण की कठिनाई ने कालांतर में पिजिन शब्द को जन्म दिया जो मिश्रित या खिचड़ी भाषा का पर्याय बन गया। उपनिवेशवाद के वर्षों में यूरोपीय भाषाओं और उपनिवेशों के मूल निवासियों की भाषाओं के मध्य संपर्क से दर्जनों खिचड़ी भाषाओं का प्रयोग होने लगा। शब्द यूरोपीय भाषा से और ग्रामर स्थानीय भाषा से, जो मिलकर एक पिजिन भाषा का प्रयोग संभव कर देते हैं। हिंदी और इंग्लिश मिलकर हिंग्लिश बनाते हैं या बंगला और ईंगलिश से बिंग्लिश अस्तित्व में आती है।

 अपने देश में मिश्रित भाषा के उदाहरण मौजूद हैं जबकि यहा़ं पर स्थानीय भाषाएं समृद्ध एवं सक्षम हैं पर बात केवल भाषाई सामर्थ्य की नहीं अपितु शासक और शासित की शक्ति और सामर्थ्य की है। हिंदी और अंग्रेजी की खिचड़ी भाषा आरम्भिक समय में बहुत प्रयोग होती रही लेकिन बाद में एक बड़ा वर्ग अंग्रेजी में भी पारंगत हो गया और वह हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों को समझ या बोल सकता था। लेकिन बढ़ते वैश्वीकरण और अंग्रेजी के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की भाषा बन जाने के कारण सामान्य बातचीत में भी अंग्रेजी के शब्दों का बाहुल्य कुछ लोगों के लिये आम हो चुका है। आजकल ऐसी भाषा [8] अक्सर सुन पड़ती है जहाँ मुख्य शब्द अंग्रेजी के होते हैं और वाक्य-विन्यास हिंदी के। ऐसी खिचड़ी या पिजिन का एक नमूना;

इस प्रोफेशन में फाँरवर्ड मूवमेंट और अपवर्ड मोबिलिटी का ज्यादा स्कोप नहीं है इसलिए निहायत जरूरी है तुम कोई ओल्टरनेटिव भी माइंड में रखो। याद रखना मेरी बेस्ट विशेज आर आँलवेज विद यू।

हम में से अधिकांश द्विभाषी या त्रिभाषी हैं और मिश्रित भाषा प्रयोग से कुछ हद तक परिचित भी हैं। ऊपर दिये गये उदाहरण की तर्ज पर मिश्रित भाषा का बातचीत में प्रयोग आम बात है। हाँ, जब बात लिखने की होती है तब हम ध्यान रख लेते हैं कि खिचड़ी भाषा का प्रयोग कम से कम हों।

अंग्रेजी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के संपर्क से कई पिजिन भाषाओं का चलन होता रहा है हिंगलिश (हिंदी-अंग्रेजी) और बिंग्लिश (बांग्ला-अंग्रेजी) इसी के सटीक उदाहरण हैं।
 

संदर्भ:

* दिये गये अनुमानित उदाहरण वास्तविक प्रयोगों के आधार पर प्रस्तुत किये गये हैं जिनमें से कुछ संदर्भ [4] में वर्णित हैं।

[1] कबीर दास की रचना: रमैया की दुलहन लूटल बजार, की पंक्तियाँ।
[2] चंद्रमोहन भंडारी, भाषाई ताना-बाना: [1] विकास यात्रा का प्रथम अध्याय, सेतु, जुलाई 2022.
[3] C Darwin, The descent of man and selection in relation to Sex, ( 2 nd ed),   Hurst and Co., New York, 1874.
[4] Steven Pinker, The Language Instinct, Penguin Books, 1994.
[5] V. Ramchandran, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., 2003
[6] * -स्वीडन के भाषाविद Ferdinand de Saussure ने इस बात को इंगित करने में पहल की। # Wilhelm Von Humboldt द्वारा इस रूप में प्रस्तुत
[7] Nom Chomski, Syntactic Structures, Mouton and Co., 1957.
[8] ब्लाँग, hinditathakuchaurbhiindpress.com/2010


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