काव्य: राम निवास बाँयला

राम निवास बाँयला
मैं जब महबूबा थी

मैं जब महबूबा थी 
उसकी दिलरुबा थी 
तब 
मेरे रूप-यौवन को पाने 
हाँ! हाँ!
मुझे पाने को रिझाने 

उसने
सजाए थे सब्ज़बाग़ 
कि
बिछाएगा चाँद-तारे मेरे कदमों में 
झुलाएगा बाँहों में 
बिठाएगा पलकों पर 
स्वर्ण पालकी में बिठा कर 
कराएगा स्वर्ग सैर 
बिना किसी रोक-टोक 

और भी किए थे 
अनगिनत वादे 
मनभावन 
लुभावने 

इन्हीं वादों के दावों से द्रवित 
मैंने सौंप दिया था 
मेरा सम्पूर्ण रक्षित, संचित

अब 
बन कर अर्धांगिनी
जब कर रही हूँ दावा 
वादे निभाने का 

तो 
मर्यादा मान
और 
संस्कारी शान के शीश पे 
झेल रही  हूँ 
उसकी सारी वादा-खिलाफ़ियाँ।
***


ये अश्वमेध के घोड़े

जिस-जिस को रही 
राज लालसा 
उसने छोड़े 
अश्वमेध के घोड़े 

क्योंकि 
साम्राज्य विस्तार हेतु
अवश्य ही छोड़े ही जाते हैं घोड़े 

अश्वमेध के घोड़े 

राजा ढूँढ कर लाता है 
हृष्ट-पुष्ट बछेरे
लुभावने और सुडौल  
फिर  
खिलाया जाता इन्हें
किसान की दाल, घास 
बेग़ारों से उठवाई जाती है लीद 
तफरीह करवाई जाती है सईस से 
और 
करवाई जाती है मालिश 

जब 
ये बन जाते हैं अश्वराज 
तब 
इनके लिए 
बनवाई जाती है ज़बर ज़ीन
हुक्म  की लगाम संग 
पहनाए जाते हैं लोहे के जूत
पीठ पर रखा जाता है स्वर्ण हत्थ 
राजछत्र रूप में 

ये घोड़े 
अपने से तो कुछ नहीं कर सकते
सिवाय खाने, लीद करने और हिनहिनाने के 
इनको भी 
क़ाबिल बनाते है सक्षम सईस 
सजाते हैं कुशल हुनरगीर

फिर 
राज निपुण 
सुनियोजित अनुष्ठान से 
साध कर बा-लगाम 
साम्राज्य विस्तार हेतु 
इन्हें 
छोड़ देता है बे-लगाम 
पुट्ठे ठोंक कर 

तब 
ये घास के ना-यार 
जिधर से गुजरते हैं 
रौंदते हैं घास, वन औषधियाँ
उसी किसान का खेत जिसमें उगते हैं चने 
लहलहाती है घास
 
और 
राजा उस हिस्से को 
समझता जाता है अपनी जागीर 

इन बे-लगाम घोड़ों की 
फ़ौलादी टाप से कम्पित 
हर निरीह हृदय स्वीकारता है 
राजा की आधीनता 

वैसे 
घोड़े दूध नहीं देते, वैसा 
जिसे पीता हो इंसान 
न ही घोड़े देते ऊन
कि कोई बना सके कम्बल 
बच सके ठंड से 
इनकी लीद भी नहीं होती खाद 
कि बढ़ाए धरा उर्वरा 
ये तो पाले जाते हैं 
और 
सिर्फ़ दौड़ाए जाते हैं 
साम्राज्य विस्तार हेतु  

इन राज विस्तारकों के 
इक़बाल का आलम यह 
कि
अब राजा को भी 
नहीं रखने देते पीठ पर हाथ 

वो भी नहीं कर सकता
सवारी अश्वमेध के घोड़े की 

फिर तो 
इनके लौह बूट से 
कुचले की गुहार भी 
हो जाती है राजद्रोह 
नतीजतन लहूलुहान भी 
करता है राज जयकार 

और 
यदि कोई आहत 
भरता भी है आह 
इनको रोकने-टोकने की 
तो 
इनके पिछलग्गू  
तान लेते हैं तीर तलवार 

असल में 
ये होते हैं वो राजकर्मी 
और 
इनको होता है अख़्तियार 
मरने का भी और मारने का।
***


ये अमरबेली दानव 

पीपल, बड़, जामुन,बेर, 
आम, इमली, कदम्ब, ख़ैर 
घास, फूस, पात-पताल
बेल-बेलड़ी, खींप-क़ैर
ये सब के सब 
और 
और भी सब 
हैं धरा पूत 
जिनको जन्म दिया 
इस धरामात ने 

जो 
बीजरूप से 
गला कर खुद को मिट्टी में 
बरसों- बरस सहते हैं 
धूप-छाँव, आँधी-तूफ़ान 
शीत-बरखा, कंप-अकाल 
तब कहीं 
तब कहीं बन पाते हैं पेड़ 

और 
जोड़ कर रखते हैं धरा 
अपनी जड़ों से 
करते हैं रखवाली 
बरखा-ताप से, आँधी-तूफ़ान से 
परोसते हैं फल-फूल-छाया 
बाँटते हैं ख़ुशहाली 
 
किंतु 
दूसरी ओर है 
यह अमरबेल 
बे-जड़-मूल 
जिसे 
नहीं धरा से कोई लगाव 

जिसे 
ज़मीन से जुड़ने में, 
गल कर उगने में 
आ जाती है मौत 

यह बे-रीढ़ 
अनायास / सयास
छिटक कर कहीं से 
आ पड़ता है माथे 

तथा 
आत्मीयता की नौटंकी संग 
चिपक कर हरियाली से 
चूसता रहता है संचित सत्व
वो प्रिय पर्णहरित पेड़ का 
और 
मारता रहता है पल-पल
इन धरापूतों को 

इसकी अज़ब बात 
ग़ज़ब करामात 
कि
अपने को अमर बनाने 
बिन जड़-मूल का 
यह 
तना विहीन बेल-दानव 
जिस पे छाता है 
जिस का खाता है 
उसी को खाता है 

तिस पर भी 
घोर विडम्बना यह 
कि 
चूसक की जगह 
यह ‘अमरबेल’ कहलाता है
***


गधे

गधे घोड़े नहीं हो सकते
और 
ना ही घोड़े कभी गधे 
सृष्टि का शाश्वत नियम
 
इनकी तुलना करना 
होना चाहिए 
सृष्टि का अपमान 

फिर भी 
गधे को कमतर आँकने हेतु ही 
की जाती है 
इसकी तुलना घोड़े से 

तो फिर
घोड़े की शक्ति को कमतर बताने भी तो 
कोई कर सकता हूँ 
घोड़े की तुलना हाथी से 

फिर तो 
निस्संदेह घोड़ा पड़ जाएगा कमजोर 
हाथी के मुक़ाबले 

वैसे 
जिनके यहाँ हैं गधे 
उनसे पूछिए जनाब?
किस तरह ये गधे 
बने हुए हैं उनकी जीवन रेखा 
उनके पालनहार

ये बेचारे 
रूखा-सूखा खा कर भी 
कर देते हैं अपना सर्वस्व उत्सर्ग 
मालिक के नाम 

और 
लट्ठों की मार भुलाने
राख में लोट कर 
मना लेते हैं जश्न वफ़ादारी का 

वहीं
घोड़ों के बारे में तो क्या बताना?
घोड़ों से अधिक तो 
उनके पैरोकार जानते ही होंगे।
***

6 comments :

  1. अश्वमेध के घोड़े
    अद्भुत है

    ReplyDelete
  2. जी हार्दिक धन्यवाद आपका ।

    ReplyDelete
  3. चारों कवितायें सटीक व्यंजनापूर्ण मार्मिक कवितायें हैं | अच्छी लगीं |

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छा जी बहुत अच्छा बेहतरीन कविता हृदय तल से निकले हुए जज्बात मानवीय संवेदनाओं को जिंदा रखने की लालसा और साम्राज्यवादी विस्तार वादी नीति का दिल दिल खोलकर विरोध आपके स्पष्ट वादी और मानवतावादी विचारों को उजागर करता है

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।