समीक्षा: 'पारिजात' की सुखद भाव-भूमि

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: पारिजात (कविता संग्रह)
कवि/साहित्यकार: पंकज त्रिवेदी
सम्पादक: गोपाल प्रसाद 'निर्दोष'
मूल्य: ₹ 150/-
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन


कविता में सौन्दर्य, मानवीय संवेदनात्मक अनुभूतियों के साथ हिलोर लेता रहता है। ऐसा न भी हो तो काव्य सौन्दर्यवान होता ही है क्योंकि कविता हमारे भीतर की मधुरतम भावनाओं से भरी होती है। समय, समाज और साहित्य सभी गतिशील हैं, हमारी समीक्षा भी अछूती नहीं है। हमारा जीवन, हमारा चिन्तन और हमारी सौन्दर्यानुभूति हर तरफ गतिशीलता है। जो ठहर गया, रुक गया, उसमें सड़ांध की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए कोई नहीं चाहता रुकना या ठहर जाना। प्रकृति में प्रवाह है, बदलाव और विकास है। मनुष्य की विकास यात्रा जितना बाह्यतौर पर दिखती है, उससे कहीं अधिक वह भीतरी यात्राएँ करता है। इन भीतरी यात्राओं के द्वारा वह चेतन-अचेतन और ईश्वरीय चेतना से जुड़ता चला जाता है। अपनी इन्हीं यात्राओं में उसे सुखानुभूति या आनंद मिलता है। कभी-कभी वह स्वयं या दूसरों को व्यथित होते देखता है और विचलित होता है। दोनों स्थितियों में उसकी अभिव्यक्ति काव्यमय होती है। जिस स्तर तक उसकी संवेदना जागती है, उसका काव्य-सौष्ठव उतना ही प्रभावशाली होता है। कवि की श्रेष्ठता इन्हीं मानकों पर सबसे पहले जाँची-परखी जाती है। हालांकि केवल इतना ही नहीं है, जाँचने-परखने के अन्य कई मानदण्ड होते हैं। साहित्य-समीक्षा या काव्य समीक्षा को लेकर व्यापक भेद-मतभेद चर्चा में हैं। किसी स्थायी सिद्धान्त या समीक्षा के प्रचलित तत्वों पर साहित्य चिन्तकों की सहमति नहीं बन सकी है। बननी भी नहीं चाहिए क्योंकि समीक्षा के तत्व भी प्रवहमान या गतिशील होते हैं। पुराने भोथरे हथियारों से काम चलने वाला नहीं है। समीक्षक का दायित्व बनता है, वह रचना को पूर्णता में, हर दृष्टिकोण से देखे, परखे, पढ़े और निष्कर्ष देते समय किन्हीं संभावनाओं का द्वार खुला रखे क्योंकि यहाँ अंतिम जैसा कुछ भी नहीं होता।

विजय कुमार तिवारी
कुछ महीनों पूर्व सुरेन्द्रनगर, गुजरात के बहुचर्चित लेखक, कवि, साहित्यकार और "विश्वगाथा" पत्रिका के संपादक पंकज त्रिवेदी का नवीनतम कविता संग्रह 'पारिजात' मिला। सुखद है, देर से ही सही, कोमल भावनाओं को संजोए किसी चर्चित कवि की कविताओं को पढ़ने का सुअवसर मिल रहा है। पंकज जी को सफल संपादक के तौर पर हम सबने देखा है। किसी अहिन्दी भाषी राज्य में, हिन्दी की लगातार 8-9 वर्षों से 'विश्वगाथा' पत्रिका निकालना साहस की बात है। वे कहानियाँ और लेख भी लिखते हैं। उनके कहानी संग्रह 'गुलाबड़ी' को पढ़ने और उस पर कुछ चिन्तन करने का अवसर मिला है। जयपुर की पत्रिका 'साहित्य समर्था' में वह समीक्षा छप चुकी है। 'पारिजात' कविता संग्रह की कविताओं का चयन और संपादन नवादा, बिहार के डा० गोपाल प्रसाद 'निर्दोष' ने किया है। इस संग्रह में कुल 77 कविताएँ हैं। डा० निर्दोष ने 'अपनी बात' के रुप में सुन्दर समीक्षकीय भूमिका लिखी है। पंकज त्रिवेदी की कविताओं पर उनके चिन्तन के बाद और कुछ लिखने, कहने के लिए शेष नहीं है। उन्होंने महत्वपूर्ण बिन्दुओं को रेखांकित किया है जिनकी चर्चा करना समीचीन होगा।

'पारिजात' नामकरण के पीछे का भाव बताते हुए डा० निर्दोष ने लिखा है, "पंकज त्रिवेदी जी की मेरे द्वारा संकलित लगभग सारी रचनाओं पर मैंने गौर किया कि इनकी अधिकांश कविताओं के केन्द्र में 'पारिजात' या 'हरसिंगार' अवश्य है। निस्संदेह, मैंने इसीलिए इस काव्य संकलन का नाम 'पारिजात' रखा।" 'पारिजात' पुष्प-तरु की दरवाजे पर उपस्थिति का हृदयस्पर्शी उल्लेख डा० निर्दोष करते हुए लिखते हैं, "इनकी कविताएँ बताती हैं कि इनके दरवाजे पर खड़ा पारिजात न सिर्फ इनके पिता के द्वारा प्यार से सींचा गया है बल्कि इन्होंने ने भी उसे बड़े प्यार से सहलाया-दुलराया है और इसी कारण पूरे संकलन में वह पारिजात तमाम सुधी पाठकों पर अपने प्यार के फूल बरसाता है।" डा० निर्दोष आगे लिखते हैं, "बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न पंकज त्रिवेदी जी जब कविता लिखते हैं तो उसमें भाव, भाषा एवं शिल्प की त्रिवेणी बहा देते हैं, जिसमें पाठक कभी डूबता है तो कभी उतराता है और दोनों ही स्थितियों में वह असीम आह्लाद से आप्लावित हो जाता है।" वे कहते हैं, "पंकज त्रिवेदी जी श्रृंगारसिक्त काव्य रचनाओं के बड़े सधे हुए शब्दकार हैं, भावों की अभिव्यक्ति के एक उम्दा कलाकार हैं और अपनी रचनाओं में चुनिंदा शब्दों को पिरोकर जिस प्रकार से ये भावों की प्रस्तुति करते हैं, उस आधार पर हम कह सकते हैं कि ये एक उच्च स्तरीय शब्द-चित्रकार भी हैं।" डा० गोपाल प्रसाद लिखते हैं, "इनकी कविताएं, प्रकृति, प्रेम एवं देशप्रेम से गुजरते हुए ईश प्रेम की ओर उन्मुख होती हुई स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती हैं।"

जो कुछ लिखा गया है, कविता हो, कहानी या साहित्य की कोई भी विधा, उसका पैमाना लोक-ग्राह्यता है। अपनी ग्रहणशीलता का आधार लोक ही तय करता है। कोई-कोई अपनी सामर्थ्य और क्षमता से, अपनी संवेदनात्मक अनुभूतियों से अनछुए पहलुओं को उजागर करता है, किसी चमत्कार की तरह लोक-चिन्तन में छा जाता है। कोई जन-सामान्य की अनुभूतियों को व्यापकता के साथ अपने लेखन में प्रस्तुत करता है, लोगों को लगता है, यह मेरी ही बात है, मेरा ही प्रेम है, मेरी ही पीड़ा है, लोकमत उसके पक्ष में बनने लगता है। पंकज त्रिवेदी के 'पारिजात' संग्रह की कविताएँ लोक में व्याप्त प्रेम संवेदना को कुछ इस तरह जगाती हैं, लोगों को अपनापन लगता है, धड़कन उभरती है और सबसे बड़ी अनुभूति यह होती है कि लोगों का सामान्य प्रेम ईश्वरीय प्रेम की ओर यात्रा करता दिखाई देता है। यहाँ भिन्न तरह की आकांक्षा है, उच्छृंखलता नहीं है बल्कि मर्यादा के साथ प्रकटीकरण है। किसी भी कविता में सामान्य भाषा तो होती ही है, यहाँ भाव के साथ प्रेम की भाषा पाठकों के हृदय तल में सीधे उतरती है। संयोग हो या वियोग, प्रेम अनेक आयामों में अपने पहलू में बाँध लेता है। किसी प्रेमी-मन की ऐसी अनुभूतियाँ सबके मन को गुदगुदाती है, सभी के हृदय को स्पंदित करती है, सबको उद्वेलित, आंदोलित करती है और जन-मानस चमत्कृत होता है। पंकज त्रिवेदी के 'पारिजात' संग्रह की कविताओं में वैसी ही संवेदनाएँ है, सामर्थ्य है और भावनाओं का सर्वतोभावेन अद्भुत आभा-विस्तार होता है।

पहली ही कविता 'हे पारिजात!' में कवि की संवेदना, स्थिति और पिता का जुड़ाव बहुत कुछ कहता है, सालता है और संवेदित करता है-जीवन अस्त-व्यस्त है/तुमसे संवाद नहीं कर पा रहा हूँ मैं। इन पंक्तियों की प्रगाढ़ भावना और साहस देखिए-तुम्हारे प्रति आसक्ति कोई कहे तो कहे/मगर तुझमें मैंने अपने ईश्वर का दर्शन किया है। पारिजात के बगैर आंगन की कल्पना नहीं है और पारिजात कवि के लिए पिता का ही रुप है। 'मैं दरख्त हूँ' कविता में पेड़ के बहुआयामी स्वरुप की विवेचना कोई संवेदनशील मन ही कर सकता है। पेड़ को पता है-एक ही जगह खड़ा रहकर कर्तव्य निभाना है, किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी है, जो बन पड़े सबके लिए करना है, भीतर की कड़वाहट को औषध बना लेना है, सबको ठंडक, सुख और सुकून देना है, वैभव, सुगन्ध फैलाना है और अपने अंतिम समय तक साथ देना है। अगली कविता की प्रबल भावना देखिए-हरसिंगार/मुझमें रहता है। कवि जैसा है, वैसा ही व्यक्त होना चाहता है और निमंत्रित करता है-एक काम करो न! तुम्हें जब/लगे कि मुझसे बात करनी है/कर लो न मन ही मन, मिलूँगा/या हरसिंगार छू लो एक बार। कवि सौभाग्यशाली मानता है स्वयं को क्योंकि हरसिंगार के पेड़ सा खुशियों में महकता है, उदासी में समाधिस्थ होता है और हर सुयोग के साथ कोई न कोई योग मानता है। 'नीम के पत्तों सी तुम' कविता में मां की स्मृति उभर आयी है। 'फूलों की तरह हम दोनों' कविता में दोनों का प्रेम फूलों की तरह खिल उठता है। प्रकृति के माध्यम से प्रेम की ऐसी अभिव्यक्ति दुर्लभ है। 'देखो न' कविता में कवि हरसिंगार के नये पत्तों और कोपलों को देखकर खुश है, पत्नी को आवाज देता है, चलो एक-दूसरे का हाथ थामकर चलें, सारी गलतफहमियाँ भूल जाएँ और याद रखें-नयी कोपलें, पत्ते और प्यार। 'मन और मनःस्थिति' कविता कवि के भीतर की हलचल दिखा रही है। यहाँ वियोग की अवस्था है, मन को मनाने की कोशिश नाकाम हो रही है-कभी तुम्हारे अतीत को महसूस करता हूँ तो कभी/मेरे अतीत में उलझ जाता हूँ जैसे धूधू के जाल में। कवि जीवन के गणितीय चिन्तन में उलझा हुआ है-मगर सोचूँ/अब कितनी लेन-देन की पूंजी बची है मेरे पास। जीवन के संघर्ष, विनाश और निर्माण के साथ कवि को सब पता है, वह बताना नहीं चाहता है, उसने जो किया है, सब तुम्हारे यानी पत्नी के लिए किया है। अपना गाँव छोड़ने की पीड़ा कवि की 'अपने-अपने उत्सव' कविता में उभरी है-मगर अब रोजी-रोटी ने मुझे/इतना मजबूर कर दिया है कि/ दौड़ शहर की ओर रहती है। गाँव और शहर की तुलना करते हुए कवि बहुत भावुक होता है और नाना जीवन्त बिम्बों के माध्यम से अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है।

'संवाद हो रहा है' कविता की गहराई देखिए- शब्द न हों तो भी क्या? यानी संवाद, शब्दों के बिना। कवि निहारता है, आमंत्रित करता है-तुम भी तो मुस्कराकर/पवन को लिए आओ/हल्के-से झुक जाओ। कवि स्वीकार करता है-इन्हीं अदाओं पर/हम मुहब्बत करते हैं। प्रेम की उच्चतर अवस्था देखिए-राग से वीतराग दर्शन/केसरी डंडी मानो/गेरुए रंग की ध्वजा। चूड़ियों की खनक, कवि को लगता है-जैसे/सूरज की पहली किरणों से/छँटने से पहले कोहरा हवा की/लहरों पर खेलता हुआ सा/फूलों के ओस बिंदुओं को/चूमता हुआ गुजर जाता है/और रह जाती है मुस्कराहट फूलों पर/तुम्हारे चेहरे-सी।

'नये जीवन की आस लिए' कविता में कवि देखता है-पेड़ों के पत्तों में खामोशी है, दिन मानो ठहरा हुआ है, पोखर का जल स्थिर है, पूरा गाँव जैसे गहन निद्रा में है, न किसी के घर में चूड़ियों की खनक है, न बरतनों की आवाज, न चूल्हा जल रहा है, न छप्पर से धुआँ उठ रहा है, क्योंकि आतंकवाद ने पूरी बस्ती को खत्म कर दिया था/मगर बच गया था एक ही बच्चा/एक नये जीवन की आस लिये। वैसे ही 'और हम दोनों मुस्कराए थे' कविता में जीवन दिखता है जब चिड़ियों ने फिर बसेरा किया है। 'कुछ कोरे पन्ने' आपसी प्रेम की कविता है। कवि आश्वासन देता है-कोरे पन्नों में सिर्फ तुम ही होगी, बेझिझक पढ़ती रहना/मैं आज नहीं रहा तो कल से ही। पंकज त्रिवेदी जी आपसी सम्बन्ध और प्रेमानुभूति को खूब गहराई से समझते हैं। 'तुम्हारी वो उदासी', 'कौन हो तुम मेरी?', 'तुम्हारी आँखें', 'क्या तुम जानती हो', 'आओ गले लग जाएँ', 'आओ हम भी बहने लगें' जैसी अनेक कविताएँ इसका उदाहरण हैं। आम घरों की जद्दोजहद, प्रेम, नोक-झोंक सब कुछ है इन कविताओं में और भाषा-शैली ऐसी कि पाठकों का मन मोह ले, देखिए-तुम्हारी आँखों में/मैंने वो चमक पायी है/जो किसी के दर्द से/नमी से भर जाती है/जो किसी की खुशी में/नाच उठती है। आगे लिखते हैं-प्रेम की तुम्हारी यही परिभाषा/प्रेरणा देती है। 'कच्चे धागे' कविता की पंक्तियाँ देखिए-तुम कच्चे धागे को लेकर/मेरे पास आकर/बोली, देखो न! मैं उलझ गयी हूँ इसमें। कवि सुलझाने के क्रम में कहता है-तुम्हें यह भी नहीं कह सकता/देखो न!/अब मैं भी कच्चे धागे में/उलझ गया हूँ। 'तुम्हारी तरह' कविता के बिम्ब देखिए-कोहरे ने/आगोश में ले लिया है मुझे/तुम्हारी तरह। कवि हर क्षण अपनी पत्नी के अस्तित्व को महत्व देता है-तुम ही मेरा जीवन हो/और तुम ही मेरे संग रहोगी सदा। 'शायद' कविता किसी के अंतिम समय की मनोदशा का चित्रण है और मनोविज्ञान भी। 'मन के भीतर' सच्चाई की अद्भुत गजलनुमा कविता है।

कवि ऐतिहासिक किला, राजाओं के ऐशों-आराम, रानियों के जौहर, गुलामों की यातनाएँ और नृत्यांगनाओं की थिरकन को याद करता है क्योंकि उसने देखा है तुम्हें पहा़ड़ियों में घूमते हुए, लोगों द्वारा तुम्हारे बारे में नाना तरह की बातें बनाते हुए, प्रत्येक होंठों को लगते थे पंख जैसे/बातें बेशुमार--अफवाहों की कड़वी गंध। कवि कोई रिश्ता अनुभव करता है और कहता है-हमारा भी रिश्ता अनंत काल से/पुनर्जन्म लेता हुआ हमेशा यहीं पर/मिलाता है हमें और यहीं से छूट जाते हैं/हम दोनों। कवि मौन तोड़ना चाहता है और कहता है- अब होंठों को पंख लगने दो। 'मैं' कविता में कवि की चाह और भावनाएँ अपने चरम पर हैं। कवि प्रेयसी की अपने लिए तरसती आँखों को, अपने आगमन की आहट पर खड़ा होते कानों को, खनकती चूड़ियों से भरे हाथों को, मेरी खुशियों की चिन्ता करते हुए तुम्हारे मन को, धड़कते हृदय को, सांसों को, पैरों को देखना चाहता है। कवि को विश्वास है, तुम अब भी चाहती हो मुझे और स्वयं कहता है- मैं तुम्हें अब भी बहुत चाहता हूँ। प्रेम ही प्रेम है इन कविताओं में।

पंकज त्रिवेदी प्रेम को सामान्य आकर्षण नहीं मानते, वे उसे गहन ऊँचाई तक ले जाते हैं, नाना रुपों, व्यवहारों में सामंजस्य टटोलते हैं, प्रेम को पा लेने के बजाय, पूरी जिन्दगी निर्वाह करना और ईश्वरीय अनुभूति करना चाहते हैं। वे प्रेयसी, प्रेमिका या पत्नी के लिए सम्बोधन हमेशा कविताओं में "तुम, तुम्हें, तुम्हारा" जैसे शब्दों के साथ करते हैं। 'तुम्हें देखता रहता हूँ' कविता में उनके प्रेम की विराटता देखिए-सन्ध्या की लालिमा को तुम्हारे चेहरे पर लीपना, गर्भित अर्थों से भरे/शब्दों को अपने में समाये तुम्हारा मौन सधता, स्मित, पर शबनमी शर्म लिए चेहरे की रेखाएँ/अंकित होती नहीं अब/खूबसूरती और खुशियों के प्रतिद्वन्द्व से पिघलती, लहराते फूलों की पत्तियों की फरफराहट सी/सुगन्ध की सवारी लिए, ये सारे बिम्ब कवि ने ही गढ़े हैं। अंतकाल का मार्मिक चित्रण देखिए-तुम्हें देखता हूँ/चंदन काष्ठ पर लेटते समय खाली देह से उठकर/सूक्ष्म संधान से अनुसंधान/सीमा-सम्बन्ध छोड़ अनंत यात्रा चरम अछूते हर कोई। 'ये इजहार कहीं तो है' कविता उनके प्रेम का विश्वास दिलाती है, तेरे शब्दों में, तेरे हुस्न में ये जादू कहीं तो है, तेरी पायल में, तेरी मुस्कान में ये संगीत कहीं तो है, तुम्हारे दीदार में, तुम्हारे विरह में ये बहते आँसू कहीं तो हैं और कभी स्वप्न में, कभी तुम्हें खोने के डर में ये इजहार कहीं तो है। सधी हुई, संयत भाषा में कवि प्रेमिका/पत्नी को अपना पक्ष समझा देता है। 'क्योंकि' कविता प्रेम का दर्शन समझाती है-मन/विचारशून्य/हो जाता है/तब/तुम्हारा होना/नहीं होना भी/एक सा/लगने लगता है/क्योंकि/जो दिल से/जुड़े होते हैं/वे हमेशा/शून्य में भी/साथ देते हैं। 'मेरी तुम', वो दोनों और मैं', 'मेरी आदत', 'एकाकार हो गये अब तो' जैसी कविताएँ प्रेम और मिलन का अद्भुत चित्र दिखाती हैं। कवि मुस्कराहट में, खनकती चूड़ियों में खोया रहता है और खोने का डर उसे विचलित करता है। कवि केवल पति नहीं है, वह प्रेमी पति है और नाना रुपों में प्रेम में डूबा रहता है क्योंकि उसकी प्रेमिका/पत्नी अमूल्य है, अलौकिक है और उसके जैसी सृष्टि में कोई नहीं है। वह कहता है-इतना भी प्यार मत करो/हम पल पल खुद से बिछ्ड़ जाएँ। कवि प्रेम की, इश्क की, मिलन की, विछोह की परिभाषाएँ गढ़ता है और दुनिया के तमाम प्रेमियों को अलौकिक प्रेम-संसार दिखाता है। इस संग्रह में अनेक गजलनुमा कविताएँ हैं जिनकी आभा अलग ही चमत्कार दिखा रही है।

'मैं निरंकुश हूँ' कविता में अनुशासन को कवि अंकुश की तरह समझता है और तोड़ता रहता है-प्यार करना वैसे तो इस समाज में/अनुशासन को तोड़ना ही है। प्रेम के दौर की कस्मकश को कवि खूब समझता है और अपनी कविताओं में उलीचता रहता है। ऐसे क्षणों में कवि द्वारा शब्दों का सहज चयन चमत्कृत करता है। उन्हें हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी के शब्द भी समझ में आते हैं, उर्दू और अंग्रेजी तो हैं ही। 'बहुत दूर चली गयी थी तुम' और 'हाँ तुम जरूर आओगी' कविताओं में कवि बिछोह के दिनों को जिन बिम्बों, भावनाओं के साथ चित्रित करता है, किसी पाषाण हृदय में भी करुणा, संवेदना भर देते हैं। कवि जीवन के हर क्षण को प्रेम में जीता है। उसका संयोग चमत्कृत करता ही है, वियोग प्रेम की पराकाष्ठा दिखा देता है। 'आज की शाम' प्रतीक्षा की शाम है, कवि भावनाओं के साथ बिम्बों के द्वारा प्रेम, ललक, भय, विस्मय और न जाने क्या-क्या रच देता है। 'यादें', 'याद है तुम्हें?', 'तुम्हें याद है?' जैसी कविताओं में पत्नी/प्रेमिका को बीते प्रेम के पलों में ले जाता है और अपना प्रेम जीवन्त करता है। कवि विश्वास से भरा रहता है और कविता लिखता है 'तुम हो मेरे लिए सदा।' पंक्तियाँ देखिए-मेरे लिए/किसी ईश्वर से कम नहीं हो तुम। 'शाम', 'थकी हुई शाम', 'सुप्रभात', 'वो झूला', 'मेरी आँखों में' जैसी कविताओं में संयोग-वियोग खूब निखर कर शब्दबद्ध हुए हैं। कवि की अनाम, अपरिचित नायिका के प्रति का भाव 'दो बूँदें' कविता में करुणा से भर देता है। कवि प्रेमी है, उसका प्रेम सांसारिकता से उपर उठता है, भारतीय आध्यात्मिकता से आप्लावित होता है, तब कवि ऐसी कविताएँ लिखता है-'मैं पानी का बुलबुला हूँ', 'जाए तो बस कोरी आत्मा', 'जल/वायु/पृथ्वी/आकाश/अग्नि', 'प्रेम पानी जैसा है', 'मन या शरीर', 'स्व से सर्वस्व', 'पुनर्जीवित' और 'मैं जानता हूँ'। ये कविताएँ सामान्य प्रेमी को सामान्य नहीं रहने देतीं और सम्पूर्ण सृष्टि में अद्भुत प्रेम की सीख देती हैं। पंकज त्रिवेदी का आध्यात्मिक अनुभव प्रेम को ईश्वरमय बना देता है। उनके पास आध्यात्मिक अनुभूतियों के साथ-साथ अभिव्यक्त होने के लिए सशक्त, परिपूर्ण आध्यात्मिक चिन्तन और शब्दावली भी है जो उन्हें बड़ा कवि बनाती है।

'या' कविता में पत्तों के माध्यम से कवि प्रश्न करता है-यह उनकी जिजीविषा है/या जीवन के अंतिम पल तक/खुशी से जीने की ललक। 'गोश्त की हेराफेरी' कविता बहुत कुछ कहती है, कवि कहना चाहता है-काश! दो मुट्ठी धान में गोश्त की खुशबू/महकाने इंसान पसीना बहाता तो गोश्त की/न कीमत होती और न हेराफेरी। 'मजदूर का पसीना' कविता में कवि समाज के अन्तर्विरोध व वर्ग संघर्ष का चिन्तन करता है और कहता है-इस मंत्र में प्राण फूँकना/मजदूर के बिना असंभव। कवि 'उसकी मासूम-सी हँसी' व 'फीनिक्स की तरह' कविताओं के माध्यम से स्मृतियों को जीवन्त करता है। कवि में संवेदना भरी पड़ी है और उनकी कविताएँ पाठकों को डुबाती है, सराबोर करती है। 'एक औरत', 'कविता', 'चावल, पंक्षी और बच्ची', 'पाँव मेरे', 'छोटे से बच्चे का संस्कार' जैसी कविताएँ हमारे भीतर करुणा, संवेदना जगाती हैं। कवि का आत्म संतोष झलकता है 'खुश हूँ मैं इस जिंदगी से' कविता में और पत्तों की सरसराहट जीवन का सत्य लगता है। कवि को पता है, एक दिन जवानी, जोश, हरियाली सब खत्म हो जायेंगे, वक्त का पहिया, हवा का रुख स्थिर नहीं होता और न किसी का होता है, इसलिए इस सरसराहट की मधुरता को मन के कोने में सँजोकर रखना चाहता है, अपने पुरखों को याद करता है। कवि की पंक्तियाँ पढ़िए-अब जीवन को समझने लगा हूँ/कोई शिकायत नहीं/किसी खुशी का अतिरेक नहीं/समय के प्रत्येक काल खण्ड से ताल मिलाकर/मैं जी रहा हूँ/खुश हूँ मैं इस जिंदगी से।

कवि में अल्हड़पन भी है और प्रेमी होने के संस्कार भी। उनका प्रेम भावनाओं में बहता रहता है, ठोस धरातल की अनुभूति के समय आध्यात्मिकता हावी हो जाती है। पाठकों पर ही निर्भर करेगा कि वे इसे कैसे ग्रहण करते हैं। बड़ा कवि वह है जो जीवन के अनुभवों से मुहावरे गढ़ता है और अपने द्वारा सृजित मानदण्डों को स्वयं तोड़ता और बड़ा करता है। भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, जीवन की यथार्थता कहीं ज्यादे महत्वपूर्ण है। कवि ऐसे क्षणों में बचने के रास्ते खोजता है और बिम्बों में उलझता है। भाषा और शैली उसका साथ देती है। पंकज त्रिवेदी की कविताओं में साहित्य के रस उभरते हैं और जीवन के भी। अंत में डा० गोपाल प्रसाद निर्दोष जी को ही उद्धृत करना चाहता हूँ, उन्होंने लिखा है, "स्पष्ट है, पंकज त्रिवेदी जी ने प्रकृति के प्रतीक के रुप में पारिजात को लक्ष्य करके अपनी बात जो रखनी शुरू की तो अंत में इस निष्कर्ष के रुप में उभर कर सामने आयी कि व्यक्ति जब मनःमस्तिष्क से परिपक्व हो जाता है तो वह माया-मोह से निर्लिप्त हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह अपने-पराए एवं लोभ-मोह से मुक्त हो जाता है और तब उसका प्रेम अपने प्रियतम के प्रेम से आगे बढ़कर समस्त जीव-प्रेम, ईश-प्रेम, प्रकृति-प्रेम आदि में परिणत हो जाता है।"

1 comment :

  1. बहुत ही सुन्दर और दिल से लिखी गई समीक्षा। कवि श्री पंकज त्रिवेदी जी बहुत ही अच्छे कवि हैं और विजय तिवारी जी बहुत ही अच्छे समीक्षक है। दोनों को बधाई।

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