साहित्य और समाज का अंतर्संबंध

सैयद दाऊद रिज़वी
सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत


साहित्य समाज की पीठिका पर टिका है और समाज वह संगठन या इकाई है जिसकी स्थापना और स्वरूप के विषय में कई मत, विचार और अर्थ हैं। सहज भाषा में कहें तो मनुष्य जिस गली-मुहल्लों में अपने परिवार-जनों, मित्रों एवं संबंधियों के साथ रहता है, वही उसका समाज कहलाता है । समाज एक ऐसा संगठन एवं इकाई है, जिसके केंद्र में मनुष्य है किंतु केवल अनेक मनुष्य मिलकर ही समाज का निर्माण नहीं करते हैं। एक समाज अपना पूर्ण स्वरूप तब तक नहीं पा सकता है जब तक कि मनुष्यों में पारस्परिक संबंध न हों, उनके बीच किसी भी प्रकार का लेन-देन न हो, कोई क्रिया-प्रतिक्रिया न हो । श्री संपूर्णानंद ‘समाजवाद’ पुस्तक में कहते हैं, ”समम् अजन्ति जनाः अस्मित् इति, यह समाज शब्द का अर्थ है। जिसमें लोग मिलकर, एक साथ, एक गति से, एक-से चलें।“ यानी मनुष्य समाज की मूलभूत इकाई है और जब यही इकाई दूसरी इकाइयों से संबंध स्थापित करके संसार का निर्माण करती है, समाज के अस्तित्व की परिकल्पना तभी संभव नज़र आती है परंतु यह सामाजिक संबंधों की सहज नहीं वरन एक जटिल व्यवस्था है। राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं, “समाज व्यक्तियों के समूह से बढ़कर है और उसी तरह जैसे पुर्जों के ढेर से घड़ी बढ़कर है। इस तरह समाज=मनुष्य+मनुष्य नहीं है, समाज=मनुष्यxमनुष्य है।” एक मनुष्य का समाज में जन्म लेना उस समाज के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ अपनी महत्ता भी उत्पन्न कर देता है। जिस तरह से बूंद और समुद्र का संबंध होता है ठीक उसी प्रकार मनुष्य और समाज का संबंध है।

पाश्चात्य लेखकों के अनुसार समाज वह साधन है, जिसे मनुष्य ने स्वयं अपनी अनियन्त्रित प्रकृतियों के परिणामों के विरुद्ध अपनी रक्षा के लिए बनाया है । समाज सामाजिकता को सुविधा और सरंक्षण प्रदान करता है इसीलिये वह उसके लिये अनिवार्य हो जाता है। हडसन लिखते हैं, “साहित्य युग-युगांतरों से किसी भी समाज के मन और चरित्र के क्रमिक विकास का चित्र है।” इ.एच.कार ने स्पष्ट किया है, “व्यक्ति और समाज अविभाजीय हैं। दोनों एक दूसरे की आवश्यकता के पूरक हैं, विरोधी नहीं।” मैकाइवर समाज के स्वरूप पर लिखते हैं, “समाज विभिन्न समूहों में उपयोगिता और व्यवस्था, अधिकार एवं परस्पर सहकार्य से युक्त एक व्यवस्था है, जिसमें मानव व्यवहार एवं स्वातंत्र्य का विभाजन रहता है। ऐसी निरंतर परिवर्तनशील सम्मिश्र व्यवस्था को हम समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का एक ताना-बाना है जो निरंतर बदलता रहता है।” इन सभी परिभाषाओं में बहुत अंतर नहीं है, सभी में सामाजिक संबंधों की व्याख्या को समाज का मूल स्वीकारा गया है। वास्तव में, “समाज एक शरीर की भांति है और इसीलिये इसके विभिन्न अंग एक दूसरे से सम्बन्धित तथा एक दूसरे पर आधारित हैं।"

कुछ लोग एडम स्मिथ और उसके अनुयायियों के आर्थिक दर्शन के आधार पर यह मानते हैं कि "समाज पारस्परिक अर्थ व्यवस्था के लिये मनुष्यों से निर्मित एक कृत्रिम योजना है।" परंतु यदि कोई समाज को कृत्रिम योजना मात्र मानता है तो यह गलत होगा क्योंकि समाज व्यक्ति की अनिवार्यता है। समाज कृत्रिम नहीं अपितु सहज है । समाज कोई सोच समझ कर बनायी गई संस्था नहीं है बल्कि समाज स्वत: निर्मित संघ है, एक संगठन है, एक इकाई है और औपचारिक तथा अनौपचारिक सम्बन्धों का तानाबाना है, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से आपसी सहयोग, आवश्यकताओं, बाध्यताओं और सीमाओं के माध्यम से जुड़े होते हैं। सभी मनुष्य इसी समाज में आपसी दुःख-सुख, मेले-ठेले, तीज-त्यौहार, विचार-व्यवहार, क्रिया-प्रक्रिया और सोच-संस्कृति बांटते और मानते हैं। कुले ने कहा है कि “समाज रीतियों या प्रक्रियाओं का जटिल ढांचा है। यहां दोनों जीवित रहती हैं और एक दूसरे के प्रभाव के कारण बढ़ती रहती हैं एवं पूर्ण अस्तित्व में इस प्रकार की एकरूपता पायी जाती है कि जो कुछ एक भाग में होता है, वह शेष पर प्रभाव डालता है।" भौगोलिक स्थितियां भी समाज को प्रभावित करती हैं। भौगोलिक बदलावों से समाज में अनेकों परिवर्तन और विविधताएँ देखने को मिलती हैं। इन्हीं परिवर्तनों और विविधताओं के कारण ही हमको एक ही समय में दो अलग-अलग समाज देखने को मिलते हैं। लेकिन ये अलग-अलग समाज एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभाव डालते दिखाई देते हैं।

वास्तव में समाज अपनी सम्पूर्ण परम्पराओं, संस्थाओं एवं संगठनों को सहजे हुये भी सामाजिक जीवन की एक परिवर्तनशील और प्रगतिशील व्यवस्था है। यह व्यवस्था ऐसी है जिसमें मनुष्य जन्म लेता है और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये इस व्यवस्था और आवश्यकताओं को संजो कर रखता है क्योंकि समाज में अनेकों प्रकार की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अस्तित्व होता है और साहित्य इन्हीं क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं को सहजता है अतएव साहित्य समाज के बगैर अधूरा है तथा समाज साहित्य के बिना। इसीलिए विद्वान साहित्य को समाज का प्रतिबिंब कहते हैं। एक साहित्यकार का निर्माण उसके व्यक्तिगत परिवेश और सामाजिक परिवेश के द्वंद्व से होता है। कृति के द्वारा वह समाज में घटित आम जनमानस के सुख-दुख को उद्घघाटित करता है। साहित्य का मूल उद्देश्य मात्र मनोरंजन या भोगविलास नहीं बल्कि लोकमंगल का विधान करना होता है, इसलिए जिस साहित्य में ‘बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय’ की भावना और वास्तविकता होती है, वही कालजयी होता है।

साहित्य समाज को एक नई दिशा, दृष्टि और अर्थवत्ता प्रदान करता है। साहित्य के द्वारा ही साहित्यकार समाज में व्याप्त विकृत व्यवस्था के विरूद्ध आवाज़ उठता है यही समाज में परिवर्तन लाने का मूल औजार बनता है। मनुष्य ने समाज में जो परिवर्तनशील व्यवस्थाएं निर्मित की हैं । साहित्यकार अपने साहित्य में उन परिवर्तनों पर टिप्पणी करता है। बालकृष्ण भट्ट लिखते हैं- “प्रत्येक देश का साहित्य उस देश के मनुष्यों के हृदय का आदर्श रूप है, जो जाति जिस समय जिस भाव से परिपूर्ण या परिलुप्त रहती है, वे सब भाव उस समय के साहित्य की समालोचना से अच्छी तरह प्रकट हो सकते हैं।” इसी क्रम में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी कहते हैं, “साहित्य और जीवन का संबंध क्या है,यह प्रश्न आज तक एक विशेष प्रयोजन से पूछा जाता है। वर्तमान भारतीय समाज एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया है जिसकी नवयुवकों के लिए एक क्रांति की घड़ी है।”

समाज और साहित्य एक-दूसरे के इतने पूरक हैं कि आदिकाल से आज तक वे एक-दूसरे पर आश्रित हैं और एक दूसरे के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। प्राचीन समय से ही मनुष्य साहित्य-प्रेमी रहा है। समाज की प्रत्येक छोटी-बड़ी धड़कन, स्थिति-परिस्थिति, समता-विषमता, भावना और विचारधारा को साहित्य ने समाहित किया है। “कवि या लेखक अपने समय का प्रतिनिधि होता है, उसे जैसा मानसिक खाद मिलता है, वैसी ही उसकी कृति होती है। वह अपने समय के वायुमंडल में घूमते हुए विचारों को मुखरित कर देता है।’’ किंतु यहां प्रश्न उभरता है कि यदि साहित्य समाज का चित्रण करता है तो क्या वह समाज का दर्पण मात्र है या उससे कुछ भिन्न है? दर्पण में ज्यों का त्यों दिखाई देता है लेकिन साहित्यकार समाज में निहित केवल बुराइयों और कुरीतियों का ही चित्रण नहीं करता है, वरन समाज में जो सकारात्मक वातावरण है, प्रकृति चित्रण है, समाज की कला-संस्कृति है उसको भी अपनी रचनाओं में नये रंगों के साथ सामने लाता है। साहित्यकार समाज के समक्ष ऐसे मापदंड रखता है जो समाज के निर्माण और उसके विकास में सहायक होते हैं। कालांतर से ही साहित्य में बुराई पर अच्छाई की जीत दर्शायी जाती रही है; जैसे, कवि तुलसीदास ने रामचरितमानस के द्वारा समाज में ऐसे मानदण्ड स्थापित किए हैं कि वह आज तक समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं। मैथिलीशरण गुप्त अपने गौरवशाली अतीत और युग-पुरुषों का स्मरण करते हुए कहते हैं-
 “हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगें अभी
 आओ विचार करें, आज मिलकर यह समस्याएँ सभी’’

 समाज का प्रतिबिंब साहित्य में दिखाई देता है। साहित्यकार समाज से जो अनुभव और भावनाएं ग्रहण करता है, उन्हें दस्तावेज के रूप में उकेर देता है। वह समाज की सभ्यता-संस्कृति, समय और समाज का आत्म-मंथन, आत्मालोचन होता है न कि निष्क्रय प्रतिबंब। कालजयी रचना युगबोध और जीवन-मूल्यों को केंद्र में रखती है। वह जादूगर के जादू की भांति क्षणजीवी नहीं होती। डॉ. अर्जुन चव्हाण लिखते हैं- “कालजयी साहित्य परिवर्तन का प्रेरक किंतु गति से अलक्षित होता है। कालजयी रचना प्रतिबंध और लक्ष्य केंद्रित तो होती ही है साथ-साथ उसके जरिए परिवर्तन की प्रेरणा भी प्राप्त हो सकती है किंतु वह प्रेरणा इतनी सूक्ष्म और परोक्ष होती है कि उसकी कोई सुनिश्चित गति या दिशा परिलक्षित नहीं होती।” इसलिए यह कहना उचित होगा कि साहित्य समाज के दर्पण से अधिक जीवंत होता है क्योंकि साहित्य ही मनुष्य को भूतकाल से लेकर वर्तमान तक जोड़ता है और भविष्य के समाज के निर्माण के लिए मनुष्य को नई दिशा और आयाम प्रदान करता है।

 निःसंदेह समाज के समस्त घटक साहित्य के लिए उसके अंग के समान होते हैं क्योंकि यदि ये घटक न हों तो साहित्य का सृजन किस आधार पर होगा। फिर तो साहित्यकार सिर्फ कल्पनाओं के आसमान में ही विचरण करता रह जाएगा और काल्पनिक साहित्य ही रच पाएगा और यह काल्पनिक साहित्य तो सिर्फ मनुष्य का मनोरंजन ही कर सकेगा, समाज का उद्धार नहीं। डॉ. रामरतन भटनागर कहते हैं- “साहित्य ने समाज पर अंकुश रखा है, उसे बल दिया है। वह समाज का मेरुदंड है। उससे हम जातीय गौरव का अनुभव करते हैं। उसके द्वारा प्रत्येक समाज प्राचीन संस्कृति की आत्मा को पहचानता है और इसी कारण प्रत्येक पीढ़ी में विकास को प्राप्त करते हुए भी समाज की जातिगत विशेषताएं नष्ट नहीं हो जाती।’’

 अतः साहित्य समाज की आत्मा होता है। साहित्य के द्वारा ही एक सभ्य समाज का निर्माण संभव हो पाता है। वह मनुष्य को जीवन जीने की राह दिखाता है। साहित्य ही समाज की सूक्ष्म और विकट परिस्थितियों और विषमताओं को विश्लेषित करता है और समाज के लिए एक नई दिशा और मार्ग का निर्माण करता है। साहित्य और समाज सुई धागे के सामान है जो एक दूसरे के बिना निरर्थक है। समाज को अगर समझना है तो हमको साहित्य के पास जाना होगा और साहित्य को समझना है तो समाज में जाना होगा। साहित्य समाज की वह कृति है जो समाज और मनुष्य को मनुष्यता, सभ्यता और संस्कृति की ओर ले जाती है। साहित्य का एक-एक पहलू समाज के धागों से बुना हुआ होता है। साहित्य समाज और मनुष्य के लिए एक अमृत प्याले के समान होता है।
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संदर्भ

[1] श्री संपूर्णानंद, समाजवाद, पृ. 1, काशी विद्यापीठ बनारस, संवत् 2004
[2] राहुल सांकृत्यायन, मानव-समाज, पृ. 21, किताब महल, इलाहबाद,1942
[3] H. Hudson, An Introduction to the study of literature, P. 37
[4] E. H. Carr, What is History?, P.31
[5] R. M. Maciver and C.M, Society, P.5
[6] रविन्द्रनाथ मुखर्जी, सामाजिक विचारधारा,मसूरी,सरस्वती सदन, 1964, पृ०27
[7] मेकाइवर और पेज, समाज- एक परिचयात्मक विश्लेषण, पृ. 45
[8] उद्धृत, रामबिहारी सिंह तोमर, समाजशास्त्र की रूपरेखा, आगरा, श्रीराम मेहरा एण्ड कम्पनी, 1970, पृ० 106
[9] साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका- मैनेजर पांडे, पृ-13
[10] हिन्दी साहित्य रचना और विचार- नन्द दुलारे वाजपेयी, पृ- 20
[11] विजयेंद्र स्नातक, विचार के क्षण, पृष्ठ-13
[12] मैथिलीशरण गुप्त, भारत-भारती, पृष्ठ-10
[13] आधुनिक हिंदी कालजयी साहित्य- संपा.डॉ अर्जुन चव्हाण, पृ-XIII राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पहली आवृति -2009
[14] निबंध प्रबोध, डॉ रामरतन, पृ-402

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