तादात्म्य से अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

पेड़-पौधों से कभी आपने बात नहीं की होगी। पेड़-पौधे भी हम मनुष्यों की तरह बहुत संवेदनशील होते हैं। बल्कि कभी-कभी मनुष्यों से भी कहीं ज्यादा। ये बहुत उद्दात्त होते हैं। ऑक्सीजन और दूसरी जीवनोपयोगी चीजें इन्हें देने की आदत होती है। कुछ पौधों से औषधियाँ व खुशबू मिलती है। देखा जाए तो सभी जीवों का जीवन इन्हीं पेड़-पौधों से सुरक्षित है। चिड़ियों का कलरव जब पेड़ों पर होता है, तो ये पेड़ खुश होते हैं। जब जंगल के अनेक पेड़ों का समूह हमारे पशु-पक्षियों से समृद्ध होता है तो इन पेड़ों को अपनी आयु जवान लगती हैं और पेड़ इनसे विभूषित होकर अपने आप पर इतरा रहे होते हैं। इन पेड़ों की आत्म-मुग्धता इनसे ही समझी जा सकती हैं। गोया, ये पेड़ हमसे सब कह देते और हमारे कान इनको सुनकर हृदय तक खुशहाली पाते। जब जंगल में आग लाग जाती है और जब पेड़ धू-धूकर जल उठते हैं। तो पता है...? इन पेड़ों के बीच जीवन जी रहे जन्तु-जगत बहुत रोते हैं। क्योंकि उनके जीवन का कोलाज जलकर खाक हो रहा होता है और सब निर्वात में बदल जाता है। यह दृश्य बहुत भयावह होता है। पीड़ादायी होता है। जो जला, उसके लिए भी। जो सहा, उसके लिए भी। इन पेड़-पौधों और जंगल के प्राणियों के बीच का तादात्म्य बहुत अहिंसक होता है और उस अहिंसक तादात्म्य का अपना एक- बहुत बारीक सा संबंध होता है, जो इनके बीच में प्रेम का प्रस्फुटन करता है। अचंभा करने वाली बात यह है कि इसे लोग कभी समझने की कोशिश नहीं करते, करते हैं तो बहुत कम करते हैं। 

दूसरी बात, जमीन के भीतर एक रेंगने वाला जीव होता है-केचुआ। जब किसान हल चलाता है तो अनेक केचुए के शरीर रुधिर-युक्त हो जाते हैं। केचुआ कुछ कह नहीं सकता। केचुआ जीता है अपने हिसाब से प्रकृति का दिया हुआ जीवन। केचुआ किसानों का मित्र कहा जाता है। वह असंख्य जख्म होने के बावजूद अपनी प्रकृति को नहीं छोड़ता। वह मिट्टी खाकर खाद बनाता है और किसान उसकी उर्वरा-शक्ति से अनाज की खूब पैदावार करके खुश होता है। उसे शायद इस बात का एहसास होता है की केचुओं ने हमारी खेत की इस लहलहाती फसल से हमें वह संपदा, इस सीजन में दिया है किन्तु वह केचुओं का कोई शुक्रिया नहीं कर सकता। वह फिर नए मौसम के अनुसार अपनी खेती-किसानी की नई फसल के लिए लौटते हुए केचुओं के महत्व को एक बार फिर अपने एहसास का हिस्सा बनाता है और फिर वही पुनरावृत्ति किसान के सुख का कारण और अंग बनती है। इनके बारीक रिश्ते और तादात्म्य का परीक्षण करें तो यह पता चलता है कि प्रवृत्ति के अनुसार जिसने जो किया वह किया किन्तु इनमें अहिंसक सुख प्रदान करने वाला जीव, अज्ञात किन्तु सुखद एहसास देकर प्रेम की वह बारीक सी, कणिका सी अपनी भूमिका तय कर जाता है जो बिलकुल अहिंसक है और प्रकृति की श्रेष्ठ अनुभूति है शायद। 

तीसरी चीज, किसी अज्ञात पहाड़ी में एक ऋषि का आश्रम और उसके सान्निध्य में रहने वाले उसके शिष्य यदि दुनियावी मोह-माया को नहीं जानते और अल्प-आयु में ऋषि सान्निध्य में आने वाले किसी भी अतिथि का आतिथ्य प्रेमपूर्वक करते हैं और उसके बदले में कुछ भी इच्छा नहीं रखते तो अतिथि का अंतस प्रसन्न हो उठता है। उसके भीतर के भाव और ऋषि आश्रम में रहने वाले श्रेष्ठ रहवासियों के उड़ेले गए प्रेम के बीच का तादात्म्य होता है। अब इसे पूर्णतया व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह एक निरपेक्ष रूप सा ही, परन्तु अनुभूति का प्रेम है जो अव्यक्त होकर भी प्रसन्नता में व्यक्त है। ऐसे तादात्म्य की कणिका बराबर, किन्तु प्रभावी अनुभूति पेड़ों के बीच रह रहे जीवों की अनुभूति से जोड़कर देखें। कुछ ज्यादा अंतर नहीं दिखेगा। अब यह मान लीजिए कि किसी कारण से आश्रम प्रभावित होता है तो उस आश्रम में किसी समय ठहरे हुए अतिथि के भीतर आश्रम की हानि जानकर कष्ट होंगे। इसकी भी कल्पना बहुत अनुभूति का विषय है क्योंकि उस बीच बना एक-दूसरे के बीच तादात्म्य अहिंसक और आत्मीय बुनियाद पर बना होता है। 

इस तादात्म्य की उस कड़ी को रेखांकित करना और उसकी व्याख्या करना कठिन है। यह तो अनुभूति का विषय है। ऐसे ही हमारे जीवन में जिनसे हमारा तादात्म्य बनता है, उसकी पृष्ठभूमि की यदि पड़ताल करेंगे तो वह भी अहिंसक होती हैं। इस तादात्म्य में अहिंसक सूत्र की बारीक, किन्तु प्रभावी अनुभूति संसार में जो भी कनेक्ट हैं, उसमें व्याप्त है. जिससे हम जुड़ाव महसूस करते हैं, वह अहिंसक होते हैं। अहिंसा इतनी सूक्ष्म है, और नाजुक है फिर भी वीरों के लिए वरेण्य है। कमजोर लोग इसको धारण नहीं कर पाते। क्योंकि कमजोर लोग हिंसा का सहारा लेकर तादात्म्य को अधिक मजबूती होने या पाने का भ्रम पाल लेते हैं। फलतः उन्हें हिंसा ही मिलती है। अहिंसा का उनसे संबंध ही नहीं बन पाता है। यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि अहिंसा प्रकृति में स्वतः-स्फूर्त अवस्था है।  यदि प्राणियों के भीतर कोई चालाकी न करे तो ऐसी अहिंसक अवस्था सभी के जीवन का हिस्सा बन जाए। किन्तु विडंबना यह है कि इस पर प्राणिजगत के लोग अविश्वास कर लेते हैं। इसलिए अहिंसा की स्वतःस्फूर्त अवस्था की तरंगें उन लोगों के जीवन का हिस्सा नहीं बन पाती जिन्हें वह सीधे बिना किसी रुकावट के प्राप्त हो जातीं। 

कहीं हमारे मानसिकता में हिंसा की विद्रूपता तो नहीं है, अब इस सवाल पर विचार करना पड़ेगा। निःसंदेह चालाकी भी तो इसी मानसिकता की उपज होती है। इसीलिए शास्त्र हमें निरपेक्ष प्रेम का आह्वान करते हैं। इसमें हिंसा का प्रादुर्भाव होता ही नहीं है। इसमें त्याग की असीम सम्भावना होती है। संसार की सबसे अनमोल प्रस्तुति है प्रकृति। उसके जैसा त्यागी कोई नहीं। वह तो सदा बांटती है। उलटा, यह देखने में आया है कि जो उद्दात्तभाव से प्रकृति हमें सबकुछ देती है उसके साथ भी हम चालाकी करते हैं। यहाँ हम का आशय मनुष्य से है। वह सबसे बुद्धिमान और सक्षम है तो वही अतिक्रमण करेगा, जाहिर सी बात है। इस प्रजाति ने सबसे ज्यादा प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है इसलिए अब वे लोग जो कदाचित अपने ज्ञान, धन और वैभव से ज्यादा स्वघोषित काबिल हो चुके हैं वे प्रकृति का दोहन करते हैं। उनके लिए प्रकृति एक दोहन की और भोग की विषय है। दुनिया में जितने भी कल-कारखाने लगे, प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। यहाँ तक कि, जितने भी परमाणविक हथियारों का सृजन हुआ (अब इसे उत्पादन कहते हैं), वे मनुष्य के द्वारा हुए हैं. इन उत्पादों से मनुष्यता की कितनी पीढ़ियों का तादात्म्य समाप्त हो चुका है और कितना होने वाला है, यह केवल हम आप नहीं पृथ्वी पर रहें वाले सभी आंकलन करें तो अच्छा है. यह घनिष्टता की जगह, बढ़ती दूरी हमारे लिए और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरनाक है। और आने वाले समय में ज्यादा खतरनाक होगी।

ऐतिहासिक साक्ष्य अनेकों हैं कि जब-जब हमारा तादात्म्य खत्म हुआ है हम टूटे हैं। हमने खोया है। अंग्रेजी में कहें तो डिटैच हुए हैं तो हम खंडित हुए हैं। अहिंसा की डोर तो अटैचमेंट में है, जुड़ाव में है। जुड़ाव यानी संबंध की स्थापना किंतु जुड़ाव अब कम हुआ है। एकल परिवार भी तो इसी पृथ्वी की संकल्पना है। इसे जुड़ाव कहेंगे कि अलगाव? इस प्रकार हम अपने रिश्ते-नाते और संबंधों को खोये हैं। जो अपनी कम्युनिटी-समुदाय में संबंध नहीं रख सकता वह तो प्रकृति से दूर हो ही सकता है। प्रथम प्रकृति तो हमारे लिए हम जहाँ जन्म लेते हैं और संस्कारित होते हैं, वही है। उसी से एक उम्र के बाद अलगाव कर लेते हैं। यह अलगाव ही तो हिंसा है। कुछ लोग इसे विकास का एक कदम कहेंगे लेकिन सम्बन्धों का विच्छेद प्रेम से भी विच्छेद का एक हिस्सा है। फलतः हम यह पाते हैं कि हिंसा व्यापक पैमाने पर हमारे आस-पास बढ़ रही है तो उसकी वजह यह है कि हम विलगाव से बढ़कर विवाद और हिंसा, संघर्ष की और एक नई गाथा की ओर बढ़ चुके हैं। ऊपर जो दो-तीन चित्र खींचे गए हैं वे लगाव के चित्र हैं और विखंडित मानसिकता से उपजी हिंसा का भी चित्र है। दोनों का मिलान करके देखें हिंसा ज्यादा बलवती हुई क्योंकि लगाव की जो बारीक सी, अनुभूति की कड़ी थी, उसे ही हमने खंडित किया और खंड-खंड होते गए। 

तादात्म्य से अहिंसा का जो सूत्रपात हुआ वह टूटी कड़ी से नहीं उपजता। वह तो एक अंतर्जगत का सार्वभौमिक सत्य है, ईश्वरानुभूति है, सत्यानुभूति है। सत्यानुभूति से तादात्म्य समाप्त होने का अर्थ समझा जा सकता है। जो सत्य की अनुभूति करने में असमर्थ है वह किसी मिथ्या-वार्ता, आचरण या जीवन को जी लेने वाला प्राणी तो हो सकता है किंतु अहिंसक नहीं हो सकता। उसकी अभिव्यक्ति में हिंसा ही होगी। वह अपना, अपने समाज का और राष्ट्र का कोई हित नहीं कर पाता। पूरी पृथ्वी का तो हित तो हो ही नहीं सकता। पृथ्वी के संसाधनों का भोगी और शोषक तो हो सकता है। ऐसे अनेकों पृथ्वी के भार प्रकृति का अहित करते हुए स्वयं को प्रकृति और पृथ्वी के सम्पूर्ण लोगों के सेवक होने का ढोंग फैलाते हैं जबकि उनके द्वारा तो कुछ भी सत्य के लिए किया ही नहीं जा रहा है और न वे कर सकते हैं। इस प्रकार के लोग मिथ्या-प्रचार करके आत्मश्लाघा करते नहीं थकते और इनके जरिये बड़े-बड़े संघर्ष जन्म लेते हैं और हिंसा की मात्रा पहले की अपेक्षा बढ़ती है।

हम पेड़-पौधे, जीव-जंतु और उनकी संवेदना को ही आत्मीयता से समझकर देखें। हो सकता है कि हमारी यह चेष्ठा हमारे सुंदर भविष्य में अहिंसक आस्वाद घोलकर जीवन को श्रेष्ठ बना दे।


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