भारत जोड़ो: बात जुड़ने -जोड़ने और समझने की

चंद्र मोहन भण्डारी
ताना-बाना –
मानव दिगंत की किरणों का,
मैंने तुम में – जन-जन में जिस दिन पहचाना
उस दिन, उस क्षण, 
नीले नभ का सूरज हँसते हँसते उतरा
मेरे आंगन।
  -मुक्तिबोध

यहाँ हमारी चर्चा का विषय है वह ताना-बाना जिसे लोकतंत्र के नाम से जाना जाता है। आदर्श स्थिति तो यही है कि लोकतंत्र का ताना-बाना सही अर्थों-संदर्भों में जन-जन को स्पर्श करे और अपने उत्कर्षी पलों में उन्हें आप्लावित कर सके। जिस दिन ऐसा संभव होगा हमारा आंगन जगमगाता नजर आयेगा। पर मुश्किल यह है कि उस ताने-बाने की बुनावट जन-जन को ही करनी होगी+। वह वृक्ष हमें ही लगाना होगा और परवरिश भी करनी होगी।


भारत जोड़ो

आजकल सुर्खियों में है भारत जोड़ो यात्रा की चर्चा; एक प्रस्तावित पदयात्रा करीब 3750 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए कन्याकुमारी से कश्मीर तक, जिसे लगभग 150 दिनों में सम्पन्न किया जाना है। आयोजन कांग्रेस पार्टी की ओर से है जिसने स्वातंत्र्योत्तर दशकों में देश को लगभग साठ वर्षों के दीर्घ अंतराल में प्रशासन दिया, और स्वतंत्रता के संघर्ष-काल में स्वतंत्रता संग्राम को आवश्यक आधार प्रदान किया। इतने बड़े पैमाने पर इतनी बड़ी यात्रा देश के इतिहास में संभवत: अपने तरह की पहली है। ऐसी पदयात्रा की बात याद दिला देती है नमक सत्याग्रह से जुड़ी डांडी यात्रा की जो आधुनिक भारत की महत्वपूर्ण घटनाओं में एक है। पंजाब में 1987 में सदभावना यात्रा का आयोजन भी ताजा है बहुतों की स्मृति में। इस तरह के आयोजन एक बड़े देश व लोकतंत्र की विकास यात्रा में अहम भूमिका अदा करते हैं और इस संदर्भ में उनका स्वागत होना ही चाहिये। बात और भी सारगर्भित एवं प्रभावकारी हो सकती थी अगर सत्तापक्ष में रहते कांग्रेस और अन्य पार्टियां ऐसी यात्राओं की बात सोचने में समर्थ होतीं और उन्हें कार्यान्वित कर सकती। यदि कभी ऐसा संभव हो सका तब इस लोकतंत्र की विकास यात्रा को एक नया आयाम मिल सकेगा और उसका ताना-बाना जन-मन को स्पर्श कर सकेगा। 

भारत जोड़ो यात्रा से कुछ लोग उत्साहित हैं, आशावान हैं और कुछ बहुत अधिक आशावान; एक बड़ा वर्ग तटस्थ है। कुछ लोग चकित हैं और यकीन नहीं कर पा रहे कि इतना बड़ा आयोजन क्या सफल हो सकेगा? इस यात्रा के उद्देश्यों एवं प्रभावों पर हर एक के अपने विचार और विश्लेषण हैं अपने रुझान हैं और अपनी समझ है। यह विविधता से परिपूर्ण सामाजिक एवं राजनैतिक वर्णपट इंसान के मन के सारे आयामों को पूरे वैविध्य एवं जटिलता में प्रस्तुत करता है कुछ वैसे ही जैसे महाभारत की कथा में। महाभारत के सारे पात्र इन सब में मौजूद हैं अलग अनुपातों में। सब मिलाकर हम सब के अंदर व बाहर एक संघर्षमय स्थिति हर पल बनी हुई है जो जीवन का यथार्थ है।

इस विविधता से परिपूर्ण यथार्थ को कुछ और विस्तार प्रदान करता मेरा अपना नजरिया है जिसे यहाँ पर प्रस्तुत करने का प्रयास होगा। नि:संदेह भारत जोड़ो यात्रा का स्वागत किया जाना चाहिये जो समय और परिस्थिति को देखते हुए प्रासंगिक, सामयिक और प्रेरक है। कुछ कह सकते हैं कि यह चुनावी राजनीति का एक पैंतरा है, पार्टी की गिरती साख को संवारने का भगीरथ प्रयास है और चूंकि यह लेख लिखते समय यात्रा अपने प्रारम्भिक दौर में है इसके राजनैतिक प्रभावों पर चर्चा अभी गैरजरूरी होगी और वह मेरा उद्देश्य भी नहीं। लेकिन इस आरम्भिक दौर में भी कुछ बातें साफ उभरती नजर आ रही हैं जो यहाँ पर चर्चा का विषय होगा।


जुड़ने-जोड़ने की बात

देश में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि भारत जोड़ो जैसे अभियानों की जरूरत है भले ही कुछ लोग यह भी कहेंगे कि पदयात्रा से थोड़े ही देश को जोड़ने का काम सम्पन्न हो सकता है। वे यह भी कहेंगे कि उनके अपने दलों के पास कुछ कार्यक्रम ऐसे हैं जो जोड़ने के प्रयास में अधिक कारगर हैं। हो सकता है उनकी यह बात किसी सीमा तक सच हो पर यह भी सच है कि देश को जोड़ने की प्रक्रिया में इस तरह के आयोजन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी यात्रा के पहले चरण के दौरान कई ऐसे प्रसंग देखने को मिले जो ह्रदयस्पर्शी थे और अपनी सहजता में अत्यंत प्रभावी। आज फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की उपलब्धता के कारण ऐसे मार्मिक द्दश्य जन-जन तक पहुंचाना संभव है।

इस यात्रा से जुड़ने वाले लोगों में आयोजन कर्ताओं के अतिरिक्त अधिकतर लोग सामान्य नागरिक हैं जो सरल एवं संघर्षपूर्ण जिंदगी जीते हैं और आजीविका अर्जन में उनका समय निकल जाता है। यह सब होते भी उनका भारत जोड़ने की बात से उत्साहित होना यह दर्शाता है कि उनमें वह गहन समझ है जो अक्सर राजनैतिक उठा पटक में किनारे कर दी जाती हैं। छोटे गरीब बच्चे, छात्र, युवा, महिलाएँ, बुजुर्ग और यहाँ तक कि बंजारा समुदाय के लोग भी गर्मजोशी के साथ इस यात्रा से आकर जुड़े और आयोजन कर्ताओं से गर्मजोशी से मिले। अधिकांश के लिये उस दिन कमाई नहीं हो सकी होगी पर इस यात्रा से जुड़ने का उनका संकल्प भारत की असली पहचान और ताकत की झलक दिखाने मे पूरी तरह सफल रहा। कांग्रेस को इसका चुनावी लाभ मिलेगा या नहीं, और मिलेगा भी तो किस सीमा तक - यह सवाल मीडिया के लिये अहम हो सकता है और राजनैतिक रूप में सक्रिय लोगों के लिये भी, पर मेरे और मुझ जैसों के लिये यह मुख्य मुद्दा नहीं।

मेरे लिये मुख्य मुद्दा है कि राजनीति का ऊंट चाहे जिस करवट बैठे, मैं जानने का प्रयास करूंगा कि भारत को जोड़ने की बात में कितनी सफलता मिलने की संभावना है? यात्रा के आयोजक राजनीति के लोग हैं लेकिन ऐसा आयोजन विशुद्ध राजनीति से ही प्रेरित हो यह भी जरूरी नहीं। और राजनीति अगर स्वस्थ व सहज रहे तब वह भी आज की लोकतांत्रिक जीवन पद्धति का अंतरंग हिस्सा है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

जो भी हो यात्रा के पहले चरण में ही लोगों के जुड़ने-जोड़ने की बात सार्थक होती दिखायी दी। मेरी नजर में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। समाज के गरीब, पिछड़े, मजदूर, किसान, शिक्षित,अशिक्षित और बेरोजगार युवा - सभी उत्साहित हैं क्यों? उनको कोई तुरंत लाभ मिल सकेगा इसका सवाल ही नहीं उठता, दीर्घ अंतराल में क्या होगा यह उतना ही अनिश्चित है जितना कि मौसम का हाल। यह अप्रत्याशित उत्साह भारत को जोड़ सकता है, जोड़ता रहा है और जोड़ता रहेगा सारी कमियों, विसंगतियों एवं विड़म्बनाओं के बावजूद।

दरअसल, हम में से हर एक के मन में भारत की एक छवि है जो मन अभ्यंतर में गहरे पैठ बना चुकी है। बचपन में माता पिता से, बाद के वर्षों में पुस्तकों व पत्रिकाओं से या फिर पौराणिक आख्यानों, ऐतिहासिक जानकारियों से; पर दुविधा तब होती है जब मन में बसी वह छवि उस भारत से अक्सर मेल नहीं खाती जो जमीनी हकीकत में उनके सामने उदभाषित होता है। जमीनी हकीकत उस छवि के अनुरूप नहीं, अपितु उस से बहुत कमतर है और कहीं-कहीं उसके एकदम विपरीत है। एक किशोर या युवा मन अक्सर भ्रमित हो जाता है। विचारक-लेखक आँल्डस हक्सली का कथन गौर करने योग्य है:
यथार्थ कभी अर्थपूर्ण नहीं होता, कथा या निबंध अर्थपूर्ण हुआ करते हैं।
( Reality never makes sense; it is the fiction that makes sense.)

जमीनी हकीकत ही यथार्थ है और यथार्थ में चीजें गड्ड मड्ड, बेतरतीब और उलझी हुआ करती हैं जबकि किसी लेखन में घटनाक्रम लेखक के विचारों के अ़नुसार चलता है। इतिहास की बात करें। अपने देश के बारे में हम प्रत्यक्ष रूप से जितना जानते हैं वह आज का है पहले का भारत इतिहासकार या लेखक के नजरिये से ही जान पाते हैं। इस संदर्भ में दो सारगर्भित एवं रोचक पुस्तकों [1, 2] का जिक्र करना समीचीन होगा; जवाहरलाल नेहरू रचित - भारत की खोज (Discovery of India) और बाशम की पुस्तक- अद्भुत भारत (The Wonder that was India)। नायपाँल की पुस्तक [३] भारत- एक चोटिल सभ्यता (India- A wounded civilisation) का जिक्र भी होना आवश्यक है। 
आज की बात करें तो कहना होगा कि आज की भी बहुत कुछ जानकारी अप्रत्यक्ष ही होती है जो मीडिया के द्वारा हम तक पहुंचाई जाती है जिसमें मीडियाकर्मी का नजरिया शामिल हो जाता है। इतना सब जान लेने के पास हम स्वतंत्र होते हैं अपने नजरिये से उन सारी सुनी, पढ़ी और देखी गई बातों पर मनन करने और अपने स्तर पर भारत की एक छवि बनाने के लिये। यह छवि बना लेना मेरे लिये ‘भारत की खोज’ जैसा ही है पर सिर्फ खोज ही पर्याप्त नहीं, हमें आविष्कार की भी जरूरत है। हमने खोजा वह जो अब तक था या है पर हमें मालूम न था आविष्कार में प्रयास [4] इस बात पर होगा कि भविष्य में हम कैसा भारत चाहते हैं और उस दिशा में कैसे आगे बढ़ा जा सकता है?


मेरा नजरिया

जुड़ने व जोड़ने के साथ एक और बात जरूरी है - समझने की। देश के अतीत और वर्तमान के बारे में हम जो जानते हैं उसका वस्तुपरक यानी आँब्जेक्टिव आकलन करना और उस आकलन का देश के प्रति भावात्मक लगाव से तालमेल करना हमारे नजरिये को पहचान देता है। हम जो जानते आये हैं उसमें कई बार अतिरंजित चित्रण भी होता है जिससे बचने की जरूरत है। साथ ही अच्छाइयों के साथ कमियों पर भी ध्यान देते रहना जरूरी है। वैविध्य की स्वीकृति का भाव हमारी पहचान रही है और शरणागत को हमने कभी निराश नहीं किया। पारसी और यहूदी लोग यहाँ आकर बसे और उन्हें पूरे सम्मान ओर बराबरी का हक मिला। पर यह भी सही है कि वैसा सम्मान और बराबरी का भाव हम अपने ही समाज के कमजोर वर्ग के प्रति न रख सके। आज भी हम पूरी तरह उस मानसिकता [4, 5] से उबर नहीं पाये हैं। आज इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भी जातिगत समीकरण हमारी पहली प्राथमिकता हैं। भारत की जो छवि हमारे मन में है उसमें कुछ ऐसा भी है जिसमें आधारभूत बदलाव अपेक्षित है। जोड़ने व जुड़ने में सभी घटकों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

भारत की सबसे अहम और प्रभावी पहचान उसकी विविधता को स्वीकार करने एवं उसे आत्मसात करने की रही है और उसे कमजोर नहीं होने देना है। जबकि सचाई यह है कि हाल के वर्षों में उसका अवमूल्यन हुआ है और भारत जोड़ो यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है ताकि उस भावना को सही अर्थों में वापस पहले जैसी स्थिति में बहाल किया जा सके। यह सच है और इसलिये भारत जोड़ो यात्रा के उद्देश्य की सार्थकता से इंकार नहीं किया जा सकता।
साथ ही यह भी स्वीकारना होगा कि विविधता की स्वीकृति समाज के सभी घटकों की जिम्मेदारी है और कुछ घटकों द्वारा इसे अस्वीकार करने पर उसकी प्रतिक्रिया होना भी स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है कि कोई भी राजनैतिक व्यवस्था इसपर संतुलित निर्णय लेने के बाद ही आगे बढ़े। जब हम अपने निकटवर्ती भोगोलिक परिवेश पर नजर डालते हैं तब जो बात साफ नजर आती है वह यह कि विविधता के प्रति सहिष्णुता का भाव लगभग नगण्य है और शायद इसका भी असर है कि प्रतिक्रियात्मक आधार पर हमारे समाज में वह असहिष्णुता का भाव कभी उभरता नजर आ जाता है जो हमारी वास्तविक पहचान नहीं है। ये मसले कठिन जरूर हैं पर एक स्वस्थ संवाद निरंतर होते रहने की जरूरत है। गहन राष्ट्रीय मसलों पर ठोस व सकारात्मक संवाद होते रहना जरूरी है पर यह दुर्भाग्य है कि संवाद या तो होता ही नहीं, और कभी होता है तब सभी दल अपने पूर्वाग्रहों से चिपके रहते हैं। कुछ धृतराष्ट्र की तरह हैं जो देख नहीं सकते और कई गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधे हैं। कभी-कभी मैं अपने आप को स्वप्निल भावलोक के महान भारत और बीहड़ यथार्थ के ‘महाभारतों’ [4] के बीच भटकता पाता हूँ। कभी लगता है भारत सदा से अपरिभाषित रहा है और आज भी वहीं है जूझता हुआ अपने आप से एक अनोखे महाभारत में; शायद यही उसकी आज की पहचान है।


बात पर्यावरण की: बाहरी व अंदरूनी

पदयात्राओं की लम्बी परम्परा रही है इस देश में; देश की हकीकत को समझने, सामान्य जन से संवाद कर उसकी पीड़ा अनुभव करने, और देश की विविधता को आत्मसात करने का इससे अच्छा कोई और उपाय नही, खासकर जब देश इतना विशाल ओर विविधता से परिपूर्ण हो। इंसान ने धरती पर अपनी लम्बी उपस्थिति के बड़े कालखंड में पदयात्रा ही तो की थी जिसे आने वाले समय में अलग संदर्भों में लेने की जरूरत है। इसके तुरंत लाभ हों या न हों, दीर्घकाल में निश्चय ही होंगे। पर्यावरण का जिस तरह विघटन होता रहा है वह आने वाले समय में जीव अस्तित्व के लिये खतरा बन सकता है। मौसम के अप्रत्याशित परिवर्तन इंसान को चेतावनी दे रहे हैं और उसके लिये आज की औद्योगिक शहरी सभ्यता में पनप रही उपभोक्ता संस्कृति को अस्वीकार कर अधिक संतुलित जीवनशैली की दिशा में सोचना जरूरी है। भौतिक पर्यावरण प्रदूषण के साथ हमारा वैचारिक पर्यावरण भी प्रदूषित हुआ है जो समाज में पनप रही असमानता, अनुशासनहीनता, असहिष्णुता से पोषित होता रहा है।


पदयात्रा, पर्यावरण और लोकतंत्र

हाल के दशकों में हमारा पर्यावरण चिंता एवं गहन चर्चा का विषय रहा है। पर्यावरणीय गुणवत्ता में जो गिरावट आई है उसका कोई सरल निदान समझ नहीं आता। बढ़ती आबादी की दिनोंदिन बढ़ती जरूरतें धरती के संसाधनों पर भारी बोझ डाल रही हैं। स्वच्छ हवा और पानी जैसी चीजें भी अब सबको उपलब्ध नहीं और जिनको उपलब्ध हैं उन्हें आगे भी इसी तरह मिलती रहेंगी यह नहीं कहा जा सकता। भारत की वर्तमान लगभग 130 करोड़ आबादी की मूलभूत जरूरतें पूरी कर पाना आसान नहीं होगा। आज की तारीख में भी भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है जबकि यह रेखा स्वीकृत मानकों के आधार पर सामान्य औसत से नीचे है।
यह सब देखते हुए अगर समाज व देश को किसी संभावित विस्फोटक स्थिति या अशांति से बचाना है तब इन सवालों के उत्तर ढूंढने होंगे और समय रहते उचित कार्यवाही करनी होगी। यह बात महज कल्पना नहीं। श्रीलंका का उदाहरण सामने है जिसके दो करोड़ निवासियों की मदद करना १३0 करोड़ आबादी वाले पड़ोसी के लिये किसी हद तक संभव था। अगर वैसे हालात हमारे देश में उत्पन्न हो जायें तब कौन हमारी जरूरतें पूरी कर सकेगा? 
लेकिन हमारा नेतृत्व बेखबर है। उसे आज भर दिखाई देता है उसके आगे सब बेमानी हो जाता है। हमारे लोकतंत्र में दलों के हित देश के भी ऊपर दिखाई दे रहे हैं। मिल बैठकर, विचार मंथन कर देश की समस्याओं पर बात करना और आवश्यक निर्णय लेना उन्हें नहीं सुहाता। ऐसा प्रतीत होता है कि हम एक बंद गली की और बढ़ रहे हैं। कौन हमें इस दलदल से बाहर निकालेगा?

यह काम केवल सामान्य जन ही कर सकते हैं भारत की जनता ने समय समय पर अपने सोच की परिपक्वता का प्रदर्शन किया है और भविष्य में भी प्रकाश की किरण उन्हीं से आनी है।


पदयात्रा की प्रासंगिकता, अनिवार्यता और निरंतरता

जमीन पर चलने में जमीनी हकीकत का अनुभव बेहतर हो सकता है। यह भी जरूरी है कि वैचारिक भ्रमण भी साथ-साथ चलता रहे। ऐसे हालात में संवाद अधिक उद्देश्यपूर्ण, प्रभावी और सार्थक होने की संभावना अधिक है और यह संवाद जन समस्याओं, पर्यावरणीय संदर्भों एवं लोकतंत्र के भविष्य के बारे में होते रहने की जरूरत है। एक बात और महत्वपूर्ण है पदयात्रा का आयोजन राष्ट्रीय जीवन का एक अनिवार्य अंग बनाये जाने की जरूरत है। आज कांग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित पदयात्रा है तो कल सतापक्ष द्वारा भी ऐसा या किसी और तरह का आयोजन हो सकता है। कभी सभी दलों की संयुक्त यात्रा की बात सोची जा सकती है। साथ ही राजनैतिक दलों के इतर शिक्षण संस्थानों द्वारा भी इस तरह के आयोजन किये जा सकते हैं।

पहले जब साधन नहीं थे तब अधिकतर लोगों के लिये पदयात्रा ही एक विकल्प था। चीनी यात्री ह्वेन सांग की लगभग दस हजार मील की यात्रा कैसी रही होगी? वह सामान्य यात्रा नहीं थी अपितु वह एक वैचारिक यात्रा भी थी। हमें ऐसी ही यात्राओं की जरूरत है जिसमें वैचारिक आदान-प्रदान की एक निरंतरता बनी रहे। मेरे विचार से पदयात्रा की अवधारणा भारत की अस्मिता एवं मूल भावना के अनुकूल है और पर्यावर्णीय संदर्भों से भी आसानी से जुड़ सकती है। यदि कोई पूछे कि मेरे लिये ‘भारत जोड़ो पदयात्रा का क्या अभिप्राय है’ इसके उत्तर में मैं यही कहूंगा:

मेरी एक चुनौती के सौ अभिप्राय
मालूम मुझे क्या था कि खड़ा मेरे भीतर
फावड़ा टेक कर 
विश्व-युगांतर महाकाय।
 -मुक्तिबोध

पदयात्रा के भी कई अभिप्राय आसानी से समझ आ सकते हैं बशर्ते हम समझने की कोशिश करें जिनमें से कुछ का जिक्र किया जा चुका है। यह जरूरी नहीं कि हर यात्रा इतनी लम्बी हो और इस पैमाने पर हो। देश व समाज को जानने समझने के लिये ही नहीं खुद को समझने में भी यह कारगर हो सकेगी ऐसा मैं समझता हूँ।
अक्सर मुझे लगता है मैं एक शाश्वत पदयात्री हूँ जो निरंतर संवाद की स्थिति में है स्वयं से, दूसरों से, अतीत और वर्तमान का पूरा कैनवस मेरे सामने है और मैं सोचता रहता हूँ:

 रखना याद - उपजना, पलना 
नकारात्मक वृत्तियों का
नहीं सीमित मात्र एकल व्यक्तियों में
जडें उनकी दूर तक हैं
मन की विकृतियों औ कुरीतियों तक
अचेतन की अतल गहराइयों तक।
 
संतुलित औ विवेकी समदृष्टि लेना 
सभीका, तुम्हारा भी फर्ज होगा 
अतिरंजित सभी वे कल्पनाऐं
न भटकायें कभी फिर से
ध्यान रखना तुम्हारा संकल्प होगा।

और भी कुछ याद है रखना तुम्हें
मानव मूलत: पशु एक
मस्तिष्क विकसित कर प्रकृति ने
चेतन मन उसे उपहार देकर
द्वन्दमय जीवन दिया है
जो कहीं विकृतियों का स्रोत है
तो सृजन का उत्कर्ष भी है।

विरासत में बोध मिल सकता नहीं 
हर एक को राह खुद ही ढूंढना है
इतिहास को ढोते चले जाना नहीं
उससे जहाँ तक हो, सीखना है।
यही गलती सदा हम करते रहे
झूठे दम्भ से पथभ्रष्ट होते ही रहे
उन गलतियों की श्रंखला को तोड़ना है
स्वीकार त्रुटियाँ कर स्वयं को जोड़ना है।
 (सेतु, जून 2019 में प्रकाशित ‘ये जो है देश मेरा’ कविता से उद्धृत)


संदर्भ:
[1] जवाहरलाल नेहरू , Discovery of India, Penguin India, 2008 (First published 1946).
[2] A L Basham, The Wonder that was India, Sidgwick and Jackson, London, 1954.
[3] V S Naipaul, India: A Wounded Civilisation, Picador 2010.
[4] चंद्रमोहन भंडारी, भारत की एक और खोज, सेतु, दिसम्बर 2019.
[5] चंद्रमोहन भंडारी, मानव के उभयचरीय अस्तित्व की कथा:[1] एक विशिष्ट पर अधूरा अभियान, मार्च, 2022.


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