प्रगतिशील आलोचक नामवर सिंह का ‘छायावादी काव्य-चिंतन’

डॉ. सितारे हिन्द

- सितारे हिन्द

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में चले काव्य आंदोलनों में ‘छायावाद’ का महत्वपूर्ण स्थान है। छायावादी काव्यधारा का समय 1916 ई. से 1936 (उच्छ्वास से युगांत) तक माना जाता है। हालाँकि इस दौर में ऐसे और भी कवि हैं जिनकी कविताएँ किसी न किसी रूप में छायावादी कही जा सकती हैं, लेकिन मुख्य रूप से जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा छायावादी काव्यधारा के मुख्य स्तंभ माने जाते हैं। ‘छायावाद’ के संबंध में नामवर सिंह लिखते हैं कि “छायावाद का आरंभ सामान्यतः 1920 ई. के आसपास से माना जाता है। तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं से पता चलता है कि 1920 ई.तक ‘छायावाद’संज्ञा का प्रचलन हो चुका था। मुकुटधर पाण्डेय ने 1920 की जुलाई, सितंबर, नवंबर और दिसंबर की श्रीशारदा(जबलपुर) में ‘हिन्दी में छायावाद’ शीर्षक से चार निबंधों की एक लेखमाला छपवाई थी। जबतक किसी प्राचीनतर सामग्री का पता नहीं चलता, इसी को छायावाद-संबंधी सर्वप्रथम निबंध कहा जा सकता है।”1 नामवर जी ने ये बातें 1955 ई.में कही थी। आज भी मुकुटधर पाण्डेय को ही छायावाद का प्रथम प्रयोक्ता कहा जाता है।
 
नामवर सिंह
          हम सभी इस बात से पूर्ण परिचित हैं कि छायावादी कविताओं में स्वच्छंद कल्पना, आध्यात्मिक छाया, अतिशय भावप्रबलता के कारण वेदना आदि की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। देखा जाए तो आध्यात्मिक छाया और भाषिक क्लिष्टता के बावजूद ‘छायावाद’ की कविता पाठकों को आज भी उतनी ही आकर्षित करती है, जितनी कि उस दौर में! छायावाद के संबंध में हर एक प्रकार के आलोचकों की आपनी-अपनी राय है। ऐतिहासिकता की दृष्टि से देखें तो ‘छायावाद’ के बाद प्रगतिवादी काव्य आन्दोलन सामने आता है, जिसका वैचारिक आधार ‘मार्क्सवाद’ है। अतः यह देखना बेहद दिलचस्प है कि प्रगतिशील आलोचकों ने छायावाद का मूल्यांकन कैसे किया है? इस आलेख में हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना की रीढ़ माने जाने वाले आलोचक डॉ.नामवर सिंह के छायावाद के संबंध में दिए गए मंतव्यों को रेखांकित करने की कोशिश की गई है।
प्रगतिशील आलोचना के ‘टूल्स’ के रूप में यह महत्वपूर्ण माना जाता है कि कोई साहित्यिक आंदोलन या किसी साहित्यकार ने सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली जड़ता, उसकी रूढ़िवादिता, उसके कूपमंडूक संस्कार आदि को बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं या कि नहीं। प्रगतिशील विचारधारा स्थितियों को बदलने में विश्वास रखता है। अगर कोई पाठ(Text) अपने अंदर सामाजिक सोद्देश्यता से परे है तो प्रगतिशील समीक्षक के लिए उसका कोई विशेष महत्व नहीं है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि प्रगतिशील समीक्षा सिर्फ और सिर्फ वस्तु पक्ष (Content) को महत्वपूर्ण मानती है तथा रूप पक्ष या शिल्प पक्ष (Form)उसकी नजरों से ओझल रहता है। वास्तविकता यह है कि प्रगतिशील समीक्षा ‘वस्तु’ तथा ‘रूप’ के उचित संघटन पर बल देती है। 
डॉ.नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ का प्रकाशन 1955 ई.में हुआ था। इस पुस्तक में ‘छायावाद’ के संबंध में नामवर सिंह के विचार खुलकर सामने आए हैं। शुरुआती दौर में छायावादी काव्य प्रवृत्ति के लिए ‘छायावाद’ के अलावा ‘स्वच्छंदतावाद’ तथा ‘रहस्यवाद’ नाम भी प्रचालन में था। नामवर जी ने तमाम तथ्यों की न सिर्फ छानबीन की, बल्कि तर्कसम्मत ढंग से विचार करते हुए कहा कि इस काव्यप्रवृत्ति का नाम ‘छायावाद’ ही उचित है। वो लिखते हैं “रहस्यवाद, छायावाद और स्वच्छंदतावाद तीनों एक ही काव्यधारा की विविध प्रवृत्तियाँ मालूम होती हैं। वस्तुतः ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं जिनमें एक ही जगह रहस्यवाद, छायावाद और स्वच्छंदतावाद तीनों हैं। उदाहरणस्वरूप पंत के मौन निमंत्रण को लें। इसमें ‘अज्ञात की जिज्ञासा’ होने के कारण रहस्यवाद है, अभिव्यक्ति की सूक्ष्मता के कारण छायावाद है और कल्पना-लोक में स्वच्छंद विचरण करने के कारण स्वच्छंदतावाद भी है।”2 मैं यह बताता चलूँ कि ‘मौन निमंत्रण’ कविता का प्रकाशन वर्ष नवम्बर -1923  है। यह कविता ‘पल्लव’ में संकलित है। कविता का कुछ हिस्सा इस प्रकार है –
                         “  स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार 
                            चकित रहता शिशु-सा नादान, 
                            विश्व के पलकों पर सुकुमार 
                            विचरते हैं जब स्वप्न अजान, 
                                           न जाने नक्षत्रों से कौन 
                                           निमंत्रण देता मुझको मौन।
                          सघन मेघों का भीमाकाश 
                          गरजता है जब तमसाकार, 
                          दीर्घ भरता समीर निःश्वास 
                          प्रखर झरती जब पावस धार, 
                                           न जाने, तपक तड़ित में कौन 
                                           मुझे इंगित करता तब मौन। ”3

                     नामवर सिंह मानते हैं कि छायावाद न सिर्फ पुराना नाम है, बल्कि छायावादी कवियों की कविताओं के लिए यह रूढ़ भी है अतः मनमानी परिभाषा गढ़ने के बजाय इसके व्यावहारिक तथा ऐतिहासिक अर्थ को स्वीकार करना अधिक वैज्ञानिक है। नामवर सिंह से पूर्व आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने  छायावाद के सम्बन्ध में कुछ मत दिए हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल  का कथन है –
                  “ ‘छायावाद’ शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहाँ उसका सम्बन्ध काव्यवस्तु से  होता है अर्थात् जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है। रहस्यवाद से अंतर्भूत रचनाएँ हुए पुराने संतों या साधकों की उसी वाणी के अनुकरण पर होती है जो तुरीयावस्था या समाधिदशा में नाना रूपकों के रूप में उपलब्ध आध्यात्मिक ज्ञान का आभास देती हुई मानी जाती थी।इस रूपात्मक आभास को यूरोप में छाया(फैंटसमाटा) कहते थे। इसी से बंगाल में ब्रह्मसमाज के बीच उक्त वाणी के अनुकरण पर जो आध्यात्मिक गीत या भजन बनते थे वे ‘छायावाद’ कहलाने लगे। धीरे-धीरे यह शब्द धार्मिक क्षेत्र में वहाँ के साहित्य में आया और फिर रवीन्द्र बाबू की धूम मचने पर हिंदी के साहित्य क्षेत्र में भी प्रकट हुआ।”4
     आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘छायावाद’ शब्द के दूसरे अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहते हैं – 
“ ‘छायावाद’ शब्द का दूसरा प्रयोग काव्यशैली या पद्धतिविशेष के व्यापक अर्थ में है। सन् 1885 में फ्रांस में रहस्यवादी कवियों का एक दल खड़ा हुआ जो प्रतीकवाद(सिंबालिस्ट्स) कहलाया। वे अपनी रचनाओं में प्रस्तुतों के स्थान पर अधिकतर अप्रस्तुत प्रतीकों को लेकर चलते थे। इसी से उनकी शैली की ओर लक्ष्य करके ‘प्रतीकवाद’ शब्द का व्यवहार होने लगा। ...हिंदी में ‘छायावाद’ शब्द का जो व्यापक अर्थ में –रहस्यवादी रचनाओं के अतिरिक्त और प्रकार की रचनाओं के सम्बन्ध में भी- ग्रहण हुआ वह इसी प्रतीक शैली के अर्थ में। छायावाद का सामान्यतः अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत कथन। इस शैली के भीतर किसी वस्तु या विषय का वर्णन किया जा सकता है।”5  
                        प्रतीक या प्रस्तुत पर अप्रस्तुत  की योजना साम्यभावना पर आधारित होती है। शुक्ल जी लिखते हैं – “हमारे यहाँ साम्य मुख्यतः तीन प्रकार का माना गया है। सादृश्य(रूप या आकार का साम्य), साधर्म्य(गुण या क्रिया का साम्य) और केवल शब्द साम्य(दो भिन्न वस्तुओं का एक ही नाम होना)।”6
                        शुक्ल जी मानते हैं कि शब्द साम्य का प्रयोग श्लेष की शब्द क्रीड़ा दिखाने वालों का काम है। छायावाद में ‘सादृश्य’ तथा ‘साधर्म्य’ का प्रयोग बड़ी सहृदयता के साथ हुआ है। जैसे – प्रिया के स्थान पर मुकुल, दीप्तिमान या कान्तिमान के स्थान पर स्वर्ण, विषाद या अवसाद के स्थान पर अन्धकार, मानसिक आकुलता के स्थान पर झंझा या तूफ़ान, भावतरंग के लिए झंकार आदि। इस लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति के प्रगल्भ और प्रचुर विकास को शुक्ल जी छायावाद की काव्यशैली की असली विशेषता मानते हैं।   
                       नामवर सिंह, छायावादी काव्य को राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति मानते हैं, जो कि एक साथ विदेशी पराधीनता तथा पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था। अपने इस तथ्य की पुष्टि हेतु उन्होंने काफी तर्क दिए। उनका मानना है कि छायावादी कवि आत्माभिव्यक्ति के लिए निर्वैयक्तिक होना जरूरी नहीं मानता। कवि अपने मन की बात सीधे-सीधे उत्तम पुरुष और उसके विविध रूपों (मैं, मुझे, मेरा, मेरी आदि) में कहता है। ‘छायावाद’ में इसके अनेक उदाहरण मिल सकते हैं –   
               “मैंने ‘मैं’ शैली अपनाई” – निराला
               “ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे” – जयशंकर प्रसाद 
               “बालिका मेरी मनोरम मित्र थी” – सुमित्रानंदन पंत 
               “बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागनी भी हूँ” – महादेवी वर्मा 
               “मधुर-मधुर मेरे दीपक जल” – महादेवी वर्मा 
नामवर सिंह के अनुसार इस तरह के प्रयोग व्यक्ति की सामाजिक स्वाधीनता के द्योतक हैं। देखा जाए तो छायावादी कवियों की वैयक्तिकता का यह आग्रह पुरानी काव्यगत रूढ़ियों तथा सामाजिक गुलामी के प्रति तीखा विद्रोह है। छायावादी कवियों ने अपनी नग्न आत्माभिव्यक्ति के लिए भक्तिकाल या रीतिकाल के कवियों की तरह किसी भी प्रकार का धार्मिक आवरण या मिथकीय चरित्र का सहारा नहीं लिया है। नामवर सिंह लिखते हैं “आधुनिक युग की वैयक्तिक अभिव्यक्ति भक्तों के आत्मनिवेदन से कहीं आगे की चीज है। भक्तों ने जो आत्मनिवेदन किया, उसपर धर्म का आवरण था। और धर्म का यह आवरण ही उसे तटस्थता प्रदान करने के लिए काफी था, लेकिन आधुनिक विज्ञान तथा उससे प्रभावित सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक मान्यताओं ने तो नई पीढ़ी के मन से वह धार्मिक आवरण भी एक हद तक उतार फेंका। मध्ययुग की धार्मिकता का स्थान आधुनिक युग की ऐहिकता ने ले लिया। फलतः छायावादी कवि की वैयक्तिक अभिव्यक्ति के लिए इस ऐहिक युग में कोई आवरण नहीं रह गया।”7 देवताओं के प्रेम के चित्रण की जगह साधारण मनुष्य के प्रेम का चित्रण होने लगा। इसे नामवर सिंह जनतान्त्रिक भाव की विजय के रूप में रेखांकित करते हैं। नामवर सिंह ने ‘छायावाद’ के एक महत्वपूर्ण पक्ष को उद्घाटित किया है कि इस आत्माभिव्यक्ति वाली शैली का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर इतना अधिक पड़ा कि इस युग में अनेक लेखकों ने ‘आत्मकथा’ लिखी। नामवर सिंह लिखते हैं “यह आत्माभिव्यक्ति की भावना इस युग में कितनी व्याप्त रही है, इसका पता इसी से चलता है कि ‘आत्मकथा’ लिखने की परंपरा-सी चल पड़ी। गांधी, नेहरू, रवीन्द्रनाथ, श्रद्धानंद, श्यामसुंदर दास, वियोगी हरि, राहुल सांकृत्यायन आदि न जाने कितने राजनीतिज्ञों, धर्म सुधारकों और साहित्यकारों ने अपनी आत्मकथा अथवा जीवन स्मृति लिखी।”8 नामवर सिंह ने इसे अनावश्यक और अनैतिहासिक नहीं, बल्कि आवश्यक और ऐतिहासिक पहल के रूप में रेखांकित किया है। वास्तव में खुद के विचारों को प्रकट करने की चाहत या व्यक्ति की आत्माभिव्यक्ति की आकुलता को छायावाद ने एक दिशा दी, एक ‘स्पेस’ दिया। इस अर्थ में इसे क्रांतिकारी कहा जा सकता है। नामवर सिंह मानते हैं कि “उसकी इस आकांक्षा में स्वाधीनता की कामना थी और अभिव्यंजना में साहस। हर देश में ‘रोमेन्टिसिज़्म’ का अभ्युदय प्रायः इसी आकांक्षा के साथ हुआ है।”9 अतः मध्यवर्ग को मुक्ति के लिए रास्ता सुझाना पराधीन सामाजिक-राजनीतिक समय में कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। इसे निश्चित रूप से रेखांकित करने की जरूरत है। 
छायावादी कविता में बहुधा यह देखने को मिलता है कि आत्माभिव्यक्ति के साथ-साथ आत्म-प्रसार के भाव भी सामने आए हैं। यह आत्म प्रसार तभी संभव है जब व्यक्ति रूढ़ि का विरोध करे, विश्व मानवता की बात करे और ‘प्रेम’ का समर्थन करे। नामवर सिंह के अनुसार –
“छायावादी कवि हर तरह के जाति-भेद और देश-भेद के विरुद्ध था।”10  
“कवि सदियों से जकड़े हुए हृदय-कपाट को खोलकर नव्य विराट के आगमन की आकांक्षा कर रहा था।”11
नामवर जी ने निराला के ‘पंचवटी-प्रसंग’ का उद्धरण दिया है। इसमें निराला के राम एकदम आधुनिक लगते हैं तथा सीता को आत्म-प्रसार का उपदेश देते हैं। कविता है – 
“छोटे-से घर की लघु सीमा में 
             बंधे हैं छुद्र भाव 
             यह सच है प्रिये 
             प्रेम का पयोनिधि तो उमड़ता है 
             सदा ही निःसीम भू पर। ”12 
प्रेम जैसी चीज कभी भी संकीर्णताओं को स्वीकार नहीं करती। यह हमेशा से जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, वर्ग, रंग आदि से मुक्त है। यही वजह है कि सामंती सत्ता से इसे हमेशा से चुनौती मिलती रही है। प्रेम का समर्थक सामंती तथा रूढ़िवादी सोच से मुक्त होगा। इस अर्थ में छायावादी कवि निःसंदेह प्रगतिशील हैं। निराला ने इंग्लैंड के सम्राट अष्टम एडवर्ड की प्रशंसा की तथा उनका गौरव गान इसलिए किया कि उन्होंने धन और मान की परवाह किए बिना अमरीका की एक विधवा स्त्री से प्रेम किया। 
नामवर सिंह के अनुसार छायावादी कवियों ने निर्झर पर बहुत सी कविताएँ लिखीं। ऐसा इसलिए कि “निर्झर छायावादी स्वच्छंदतावाद का प्रतीक बन गया; वह शिला-खंडों के गतिरोध को तोड़ता हुआ, घन-वन-अंधकार को पार करके वेग से अनंत जल-निधि की ओर चल देता है।”13 छायावादी कविता में ‘असीम’, ‘अंतहीन’, ‘मुक्त नभ’ जैसे शब्द बार-बार मिलते हैं। नामवर सिंह मानते हैं कि चूँकि छायावादी युग विज्ञान के प्रवेश का भी युग है, मध्यवर्गीय घरों में नई शिक्षा के प्रवेश का भी युग है अतः नवयुवकों में असीम को जानने की एक नई जिज्ञासा है। अतः वे अपने ज्ञान और अपनी बौद्धिकता का प्रसार चाहते हैं। ये शब्द उनके आत्मप्रसार की आकांक्षा के ही प्रतीक हैं। “चूँकि छायावादी कवि अपने इस आत्म-विकास के बारे में अधिक स्पष्ट नहीं थे। इसीलिए जहाँ वे अपने असीम, अज्ञात और विराट को प्रियतम के रूप में व्यक्त करते हैं, उस पर वे एक आवरण डाल देते हैं।” 14   
               “रजत रश्मियों की छाया में धूमिल घन-सा वह आता।”15 
प्रकृति चित्रण छायावादी कविता की एक प्रमुख विशेषता मानी जाती है। छायावादी कवियों ने प्रकृति चित्रण में पुराने कवियों को पीछे छोड़ कहीं और नवीन ढंग से इसका चित्रण किया है। निराला की ‘जूही की कली’, पंत की ‘नौका विहार’, प्रसाद की ‘बीती विभावरी जाग री’ जैसी कविताएँ प्रकृति चित्रण के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन कविताओं के अलावा भी ऐसी बहुत सी कविताएँ मिल जाएँगी जिनमें प्रकृति पर चेतनता का आरोप (मानवीकरण) किया गया है। छायावादी कवियों की नजर में प्रकृति की हर एक छवि विस्मय से पूर्ण है। 
नामवर सिंह ने ‘छायावाद’ पुस्तक के ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश’ नामक अध्याय में छायावादी कवियों के प्रकृति प्रेम के संबंध में लिखा है “आधुनिक कवि की सामाजिक स्वाधीनता और वैयक्तिक विकास की भावना यदि एक ओर प्राचीन रूढ़ मर्यादाओं के विरोध के रूप में प्रकट हुई तो दूसरी ओर प्रकृति-प्रेम के रूप में।”16 इन्होंने प्रकृति-प्रेम को छायावाद के तात्कालिक संदर्भ से जोड़ा है। नामवर जी का मानना है कि “देश-प्रेम की भावना प्रकृति-प्रेम से ही उत्पन्न हुई और फिर उसके  परिणामस्वरूप भावुक हृदय देश-सेवा तथा देशोद्धार के लिए प्रवृत्त हुए।”17  आलोचक नामवर सिंह चंडी प्रसाद ‘हृदयेश’ की कहानी ‘संकल्प’ तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘काव्य में प्राकृतिक दृश्य’ की चर्चा करते हुए स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य का प्रकृति-प्रेम ही उसके देश प्रेम का कारण बनता है। इन्होंने यह भी माना है कि छायावादी कवियों ने धर्म के बरअक्स विज्ञान को ज्यादा महत्व दिया। नामवर सिंह लिखते हैं “छायावादी कवियों का प्रकृति की ओर झुकना, प्रकृति को इतना महत्व देना, प्रकृति की स्वतंत्र सत्ता को काव्य में प्रतिष्ठित करना और प्रकृति के सौन्दर्य को उद्घाटित करना - यह सब आधुनिक विज्ञान का परिणाम है। .... धर्म ने प्रकृति के प्रति अंधश्रद्धा का भाव जगाकर जहाँ प्रकृति को जानने से रोका, वहाँ विज्ञान ने विवेक के द्वारा उसका रहस्योद्घाटन किया।”18 
छायावादी कवियों ने नारी-चित्रण में एक अलग प्रकार के दृष्टिकोण का परिचय दिया है। नारी-संबंधी दृष्टिकोण का यह परिवर्तन इस मायने में भिन्न है कि यहाँ की नारी भोग्या ना होकर सहचर, सखी या फिर साथी है। रीतिकालीन कवियों का स्त्री संबंधी दृष्टिकोण किसी से छुपा हुआ नहीं है। सामंती प्रवृत्ति ने स्त्री को सिर्फ मांसल सुंदरता का प्रतीक बनाकर छोड़ दिया। यह प्रवृत्ति कमोबेश द्विवेदी युग में भी दिखाई देती है। द्विवेदीयुगीन हिन्दी कविता के अग्रिम पंक्ति के लेखक मैथिलीशरण गुप्त ने ‘साकेत’ में लिखा है-  
                          “सौ बार धन्य वह एक लाल की माई, 
      जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।”19       
यहाँ अर्थ यह निकाल रहा है कि कैकेयी इसलिए धन्य है कि उसने भरत जैसे आदर्श भाई को जन्म दिया। एक स्त्री के रूप में कैकेयी की गरिमा को लगभग नकार सा दिया गया है। इससे अलग छायावाद में स्त्री के संबंध में समानतावादी दृष्टिकोण मुखरता के साथ सामने आया है। नारी के प्रति बदली इस दृष्टि के पीछे उस युग में हुए राजनीतिक एवं सामाजिक सुधारवादी आंदोलन थे। नामवर सिंह लिखते हैं “नारी-शिक्षा में बड़ी तेजी से प्रगति हुई। ...... नई शिक्षा के द्वारा लड़कियों को नई दुनिया का ज्ञान हुआ और उनमें नए विचारों का अभ्युदय हुआ। इससे लड़कियों में स्त्री-स्वतंत्रता का भाव पैदा हुआ।”20 द्विवेदी युग में कवियों ने जहाँ स्त्रियों के प्रति दया की भावना दिखाई वह अब अधिकार की माँग में बदल गया। नामवर जी ने ‘विधवा-स्त्री’ के संबंध में दोनों युगों (द्विवेदी युग तथा छायावाद) में अंतर स्पष्ट किया है। द्विवेदी युग की कविता में विधवा के लिए भोजन और कपड़ा उपलब्ध करवाने का भाव था, लेकिन छायावाद में उसकी मानसिक स्वतंत्रता की वकालत की गयी। नामवर सिंह लिखते हैं “छायावाद युग के कवियों ने विधवा पर कविताएँ नहीं लिखीं। उन्होंने सवाल को नए सिरे से उठाया। उन्होंने अनुभव किया कि मूल प्रश्न नारी-स्वाधीनता का है। प्रश्न विवाह का नहीं, प्रेम का है, बंधन का नहीं, मुक्ति का है। यदि विवाह में बंधन है तो चाहे वह विधवा-विवाह हो अथवा कुमारी का दोनों का आग्रह व्यर्थ है।”21 
                 नामवर सिंह छायावादी कवियों की प्रेम कविताओं पर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। यहाँ प्रेम का रूप पहले से भिन्न है। यहाँ का प्रेम स्वच्छंद प्रेम है। छायावाद का प्रेम नीरस जीवन में रस का संचार करने वाला प्रेम है। देखा जाए तो सामंती समाज प्रेम पर अंकुश लगाने का कार्य करता है। जो कवि सामंती व्यवस्था का विरोध करेगा वह प्रेम का उतना ही बड़ा समर्थक होगा। इस प्रेम तत्व के कारण भी भक्तिकाल के कवि हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ‘प्रेम’ की भावना मनुष्य को अधिक संवेदनशील और मानवीय बनाती है। मनुष्य स्वार्थपन से ऊपर उठ स्वतंत्रता और विश्व बंधुत्व का हामी हो जाता है। बिना प्रेम के क्रांति असंभव है जो कवि जितना बड़ा क्रांति का कवि होगा वह उतनी ही अच्छी प्रेम कविताएँ भी लिखेगा। पाब्लो नेरुदा जैसे कवि इसके उदाहरण हैं। छायावाद के प्रेम के संबंध में नामवर सिंह ने लिखा है “स्त्री-पुरुष के बीच प्रणय संबंध के क्षेत्र में छायावाद ने परस्पर सहकारिता तथा स्वच्छंदता का सूत्रपात किया। प्रणय संबंधी कविताएँ तो पहले से ही होती आ रही हैं, लेकिन छायावादी कविता में प्रणय का जो आवेगपूर्ण तथा प्रगाढ़ रूप मिलता है, वह अनूठा है। इसका मुख्य कारण यह है कि छायावादी प्रणय भावना स्त्री और पुरुष दोनों के पारस्परिक मानस-द्वंद का परिणाम है। इस युग में स्त्री-स्वातंत्र्य के कारण दोनों पक्षों को मुक्त हृदय से भाव-विनिमय तथा साहचर्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ। इससे प्रेम के पूर्ण विकास तथा उन्मुक्त अभिव्यक्ति के लिए द्वार खुल गया। एक ही कोटि के दो स्वतंत्र सत्ताओं के योग से प्रेम का अधिक गूढ़ और समृद्ध होना स्वाभाविक है।”22 छायावादी समाज मध्ययुगीन समाज से स्वच्छंदता के मामले में भिन्न है। नई शिक्षा और नारी सुधार आंदोलनों से स्त्रियाँ घर के बंदी जीवन से थोड़ी मुक्त हुईं। वह खुद को अभिव्यक्त करने लगीं। पुरुष को स्त्री के इस रूप का दर्शन पहली बार हुआ। आपस में परिचय और समझदारी में इजाफा हुआ। देखा जाए तो प्रेम के लिए परिचय की आवश्यकता है। इस संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘लोभ और प्रीति’ में लिखा है “परिचय प्रेम का प्रवर्तक है। बिना परिचय का प्रेम नहीं हो सकता।”23 अतः छायावादी कविता में प्रेम का स्वरूप बदला तो यह कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। छायावादी स्त्री प्रेम की वस्तु नहीं है, बल्कि वह सहचर तथा मित्र है। छायावादी नारी को नामवर जी ने ‘आधी मानवी और आधी कल्पना’ माना है। छायावादी प्रेम भावना की एक प्रमुख विशेषता को रेखांकित करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं “छायावादी प्रेम भावना की एक विशेषता उसका भावावेग है। मध्ययुगीन कवि प्रेम व्यंजना में बहुत कुछ मर्यादित और मितव्ययी थे ;.... छायावादी कवि की प्रणायानुभूति अनुभवों की दृष्टि से न कुछ होते हुए भी भावों की दृष्टि से समृद्ध थी। छायावादी कवि शारीरिक चेष्टाएँ तो कम करता था, परंतु अपना हृदय खोलकर रख देने में कोई कसर नहीं रहने देता था।...... छायावाद की इस नवीन प्रणय भावना ने प्रेम के आलंबन सौन्दर्य का मानदंड ही बदल दिया। जिस प्रणय संबंध में भाव की प्रधानता हो, उसमें स्थूल यंग-यष्टि को महत्व मिलना असंभव है।”24 देखा जा सकता है कि छायावादी कविता में भाव की प्रधानता है न कि स्थूल यंग-यष्टि का। 
छायावाद को भारतीय राष्ट्रीय जागरण की साहित्यिक अभियक्ति भी कहा जाता है। छायावाद में ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं जो या तो भारत की गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है या फिर पुनुरुत्थान की प्रवृत्ति से संपृक्त है चूँकि अंग्रेजों ने भारतीयों के आत्मगौरव को कुचलने का भिन्न-भिन्न तरीकों से तथा बार-बार प्रयास किया तो बात स्वाभाविक ही थी कि साहित्यकार चुप नहीं बैठते। नामवर सिंह लिखते हैं “भारतवासियों ने वर्तमान पराधीनता के अपमान को भूलने के लिए अतीत के स्वर्णयुग का सहारा लिया। वर्तमान की हार का उत्तर उन्होंने अतीत की जीत से दिया। हीनता का भाव दूर हुआ। जो जाति वर्तमान में विभाजित थी, वह अतीत की पृष्ठभूमि पर एक हो उठी। इस तरह अतीत के पुनुरुत्थान ने सम्पूर्ण देश में एक जातीय अथवा राष्ट्रीय भावना का सूत्रपात किया।”25 देखा जाए तो अतीत का गौरवगान एवं पुनुरुत्थान के द्वारा छायावादी कवियों ने अपनी विभिन्न रचनाओं के द्वारा भारतीयों को पुनः जागृत करने का प्रयास किया। जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चन्द्रगुप्त’, ‘स्कंदगुप्त’ तथा ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’, ‘शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण’ या निराला की ‘छत्रपति शिवाजी का पत्र’, ‘जागो फिर एक बार’ या ‘तुलसीदास’ आदि कविताएँ न सिर्फ राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हैं, बल्कि जागरण का संदेश भी लिए हुई हैं। 
छायावादी कविता में काल्पनिकता का प्रचुर समावेश है। इसे लेकर कतिपय आलोचकों ने छायावादी कविता को सिर्फ कल्पना की उड़ान भी माना है। आलोचक नामवर सिंह ने छायावादी कल्पना की न सिर्फ नवीन व्याख्या की, बल्कि इसे काव्योचित भी ठहराया। नामवर सिंह छायावादी कल्पना की व्याख्या ‘जिज्ञासा’ तथा ‘कुतूहल’ से जोड़कर की है। उनका कथन है “हर चीज के प्रति अथक जिज्ञासा और कुतूहल छायावाद का मंगलाचरण है, और यही वह रचनात्मक शक्ति है जिसके द्वारा कवि, दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक अपने-अपने क्षेत्र में कोई नई चीज दे जाता है। .... दबे हुए मन में जिज्ञासा का उदय असंभव है। रीतिकाल के कवियों के मन पर परिपाटियों का चिर-संचित भार था। इसलिए उनमें जीवन और जगत के रहस्यों के प्रति कोई कुतूहल ही न था।  इसके विपरीत छायावादी कवियों का मन उनमुक्त था। इसलिए उनका मन हर दिशा में दौर लगाने के लिए तैयार रहता था। इस स्वच्छंद जिज्ञासा की ही बदौलत छायावादी कवियों ने प्रकृति और नारी-सौन्दर्य के अनेक रहस्यों का उद्घाटन किया।”26 इसी जिज्ञासा के कारण छायावादी कविता में कल्पना की प्रधानता है। 
नामवर सिंह ने छायावादी कविता के रूप विन्यास, छंद विधान, अलंकारिकता आदि पर भी विचार किया है।  चूँकि छायावादी कविता, अभिव्यंजना की रोचक प्रणाली को लेकर उपस्थित हुआ था अतः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचक भी चकित हो गए। छायावाद का घोषणापत्र माने जाने वाले ‘पल्लव की भूमिका’ में अलंकार के संबंध में पंत ने लिखा है कि “अलंकार केवल वाणी की सजावट के लिए नहीं, वे भाव की अभिव्यक्ति के विशेष द्वार हैं। भाषा की पुष्टि के लिए, राग की परिपूर्णता के लिए आवश्यक उपादान हैं, वे वाणी के आचार, व्यवहार, रीति-नीति हैं, पृथक स्थितियों के पृथक स्वरूप, भिन्न अवस्थाओं के भिन्न चित्र हैं।”27 द्विवेदीयुगीन कविता अत्यंत सीधी-सादी तथा अनलंकृति दिखाई पड़ती है, लेकिन इसके उलट छायावादी कविता संस्कृतनिष्ठ तथा अलंकारिकता से पूर्ण। नामवर जी ने अलंकारों के प्रयोग में छायावादी नवीनता को रेखांकित किया है। रीतिकालीन कवि अलंकारों को कविता पर आरोपित करते थे, लेकिन छायावादी कवियों के लिए अलंकार सहज तथा स्वाभाविक चीज है। कहीं भी आरोपित जैसा कुछ भी नहीं है। छायावादी कवियों ने रूप विन्यास तथा पद विन्यास में पूर्व की काव्य रीति का अनुकरण नहीं किया है। नामवर जी लिखते हैं “शब्द-रचना में छायावादी कवियों ने, भावों की ही तरह, कभी-कभी काफी स्वच्छंदता दिखलाई। जो विचारों और भावों की दुनियाँ में रूढ़ि तोड़ने वाले हैं, वे भाषा के क्षेत्र में ही व्याकरण की रूढ़ियों में बँधकर कैसे चल सकते हैं? फलतः पंत ने ‘प्रियाह्लाद’ की जगह ‘प्रि आह्लाद’ और ‘मारुदाकाश’ की जगह ‘मारुताकाश’ संधियाँ कीं।”28 छायावादी कवि अर्थ के मामले में काफी सम्पन्न थे। सभी छायावादी कवियों ने पर्यायवाची शब्दों का अद्भुत प्रयोग किया है। नामवर जी के अनुसार छायावादी कवियों ने शब्द-चयन में मुख्य रूप से दो सिद्धांतों को अपनाया है -
    1. श्रुति माधुर्य 
    2. सुंदर-सुंदर स्मृति-चित्र(एसोसिएशंस)

कहने का निहितार्थ यह कि ऐसे शब्द जो सुनने में मधुर लगे तथा जिनसे सुंदर स्मृति-चित्र जगे। 
छायावाद में ‘मुक्त छंद’ की प्रवृत्ति भी देखी जा सकती है। लेकिन मुक्त छंद होते हुए भी लय एवं नाद सौन्दर्य में कहीं भी कमी नहीं दिखाई देती है। नामवर जी ने इसे भी रेखांकित किया है। 
        हिंदी आलोचना की परम्परा में पूर्व के आलोचकों की बातों को व्यंग्यात्मक लहजे में खंडित करने की पुरानी परम्परा रही है। इसे  आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के हिंदी साहित्येतिहास में देखा जा सकता है। नामवर सिंह ने ‘छायावाद’ पुस्तक के अंतिम अध्याय ‘परम्परा और प्रगति’ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के छायावादी मतों और उनके अंतर्विरोधों को सामने लाया है। नामवर जी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उन मंतव्यों के साथ नहीं हैं जो उन्होंने ‘छायावाद’ के संबध में दिया था, लेकिन नामवर जी के खंडन में शुक्ल जी के प्रति कहीं भी व्यंग्यात्मक लहजे का प्रयोग या असम्मान की भावना नहीं दिखाई देती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ‘छायावाद’ के सम्बन्ध में मत था कि-
मैथिलीशरण गुप्त, मुकुटधर पाण्डेय आदि कवियों के द्वारा जो खड़ी बोली की कविता की परम्परा चली आ रही थी, छायावादी कवियों की रहस्यवादी  कविता उसकी स्वाभाविक परम्परा नहीं है।
 फिर आगे शुक्ल जी का मत है कि -
“ छायावाद का चलन द्विवेदीकाल की रूखी इतिवृतात्मक्ता की प्रतिक्रया के रूप में हुआ था।” 29
           आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इन्हीं अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हुए नामवर सिंह ने कहा कि “विरोध और प्रतिक्रिया परम्परा के स्वाभाविक विकास के ही सूचक हैं; क्योंकि विकास का अर्थ सदैव परिपाटी - पालन ही नहीं होता। कोई भी विकास विरोध के बिना घटित नहीं होता। इस तरह शुक्ल जी अनजाने ही छायावाद को हिंदी साहित्य की परम्परा का स्वाभाविक विकास सिद्ध करते गए। ” 30
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल छायावादी कविता की रहस्यात्मकता तथा वैचित्रय्ता की आलोचना की है। वो लिखते हैं -
 “मनमाने आरोप, जिसका विधान प्रकृति के संकेत पर नहीं होता, ह्रदय के मर्मस्थल का स्पर्श नहीं करते, केवल वैचित्र्य का कुतूहल मात्र उत्पन्न करके रह जाते हैं। छायावाद की कविता पर कल्पनावाद, कलावाद, अभिव्यंजनावाद आदि का भी प्रभाव ज्ञात या अज्ञात के रूप में पड़ता रहा है। इससे बहुत - सा अप्रस्तुत विधान मनमाने आरोप के रूप में भी सामने आता है।”31 
            आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने इसी सन्दर्भ में लिखा है कि “छायावाद की कविता में सबसे खटकने वाली बात उनके भावों की अप्रासादकता है। संसार के उस पार जो जीवन है उसका रहस्य जान लेना सबके लिए सुगम नहीं है। दार्शनिक सिद्धांतों की अनुभूति भी सबका काम नहीं है। इस समय बहुत सी रचनाएँ हो रही हैं, जो इन दोषों से मुक्त नहीं कही जा सकतीं।”32
           आचार्य रामचंद्र शुक्ल जहाँ छायावादी कविता की रहस्यात्मकता की आलोचना करते हैं वहीं आचार्य नंददुलारे वाजपेयी छायावादी कविता में भावों की अप्रासादकता मानते हैं। दरअसल आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कविता के सम्बन्ध में एक साफ-साफ धारणा थी, जो कि इनके आलोचनात्मक निबंध ‘कविता क्या है’, में स्पष्ट है। कविता की परिभाषा स्थिर करते समय शुक्ल जी के ये कथन बहुत महत्वपूर्ण हैं  –
“जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।” 33
“ ज्ञान-प्रसार के भीतर ही भाव-प्रसार होता है। ”34   
“कविता का अंतिम लक्ष्य जगत् के मार्मिक पक्षों का प्रत्यक्षीकरण करके उसके साथ मनुष्य-हृदय का सामंजस्य-स्थापन है।”35 
           ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मानना है कि रहस्यवाद के प्रभाव से कविता ज्ञान की पकड़ से बाहर हो जायेगी अतः भाव का प्रसार बाधित हो जाएगा और कविता का जो मुख्य लक्ष्य है वो पूर्ण नहीं हो पायेगा। क्योंकि जगत् के मार्मिक पक्षों के साथ मनुष्य-हृदय का सामंजस्य तभी स्थापित होगा जब कविता का भावबोध हो।
           नामवर सिंह छायावाद के अभ्युदय पर विचार करते हुए लिखते हैं – “छायावाद हमारी विशेष सामाजिक-साहित्यिक आवश्यकता से पैदा हुआ और उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उसने एतिहासिक कार्य किया। समाज और साहित्य को उसने जिस तरह पुरानी रूढ़ियों से मुक्त किया, उसी तरह आधुनिक राष्ट्रीय और मानवतावादी भावनाओं की ओर भी प्रेरित किया।” 36  नामवर सिंह ने छायावाद की ठीक-ठीक और नवीन व्याख्या की है। इन्होंने सामाजिक विकास-क्रम में छायावाद को न सिर्फ देखा बल्कि इसकी प्रगतिशील व्याख्या की। 
         

संदर्भ सूची

 1. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली, वर्ष-2011(ग्यारहवीं आवृत्ति), पृष्ठ संख्या-11 
 2. वही, पृष्ठ संख्या – 16
 3. पंत, स., 2012. मौन-निमन्त्रण/सुमित्रानंदन पंत - कविता कोश. [online] Kavitakosh.org. Available at: <http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A3_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4> [Accessed 30 July 2022].
  4. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, वर्ष – 2014, पृष्ठ संख्या – 467-468 
  5. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, वर्ष – 2014, पृष्ठ संख्या –468
  6. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, वर्ष – 2014, पृष्ठ संख्या –469
 7. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली, वर्ष-2011(ग्यारहवीं आवृत्ति), पृष्ठ संख्या –19
 8. वही, पृष्ठ संख्या – 22 
 9. वही, पृष्ठ संख्या – 22
10. वही, पृष्ठ संख्या – 22
11. वही, पृष्ठ संख्या – 22
12. वही
13. वही, पृष्ठ संख्या – 27 
14. वही, पृष्ठ संख्या – 33 
15. वही 
16. वही, पृष्ठ संख्या- 35 
17. वही, पृष्ठ संख्या- 35
18. वही, पृष्ठ संख्या- 37-38 
19. गुप्त मैथिलीशरण, “साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / अष्ठम सर्ग / पृष्ठ ६.” साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / अष्ठम सर्ग / पृष्ठ ६ - कविता कोश, कविता कोश, 29 July 2020, http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A4_/_%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A4%A3_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_/_%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_/_%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0_%E0%A5%AC. 
20. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली, वर्ष- 2011(ग्यारहवीं आवृत्ति), पृष्ठ संख्या - 11
21. वही, पृष्ठ संख्या – 51
22. वही, पृष्ठ संख्या – 57-58
23. रामचन्द्र शुक्ल.“लोभ और प्रीति/ साहित्यशास्त्र / रामचन्द्र शुक्ल.” गद्यकोश, Gadyakosh, 3 May 2013, gadyakosh.org/gk/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%AD_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF_/_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_/_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2.
24. वही, पृष्ठ संख्या – 64 
25. वही, पृष्ठ संख्या – 73 
26. वही, पृष्ठ संख्या – 83
27. डॉ. कुसुम राय, हिन्दी साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास, खंड-3, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी, वर्ष-2016 (द्वितीय संस्करण), पृष्ठ संख्या-45 (उद्धृत)
28. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, वर्ष- 2011(ग्यारहवीं आवृत्ति), पृष्ठ संख्या – 114 
29. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, वर्ष – 2014, पृष्ठ संख्या - 468 
30. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, वर्ष- 2011(ग्यारहवीं आवृत्ति), पृष्ठ संख्या – 150-151
31. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, वर्ष – 2014, पृष्ठ संख्या - 471 
32. नंददुलारे वाजपेयी, हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष-2013, पृष्ठ संख्या – 51-52
33. शुक्ल, र., 1930. रामचंद्र शुक्ल:: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली :: भाग 3 :: साहित्य शास्त्र : सिद्धांत और व्यवहार पक्ष :: आलोचना. [online] Hindisamay.com. Available at: <https://www.hindisamay.com/content/4646/5/-%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2-%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-3%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8-%E0%A4%93%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88.cspx> [Accessed 30 July 2022].
34. वही 
35. वही 
36. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, वर्ष- 2011(ग्यारहवीं आवृत्ति), पृष्ठ संख्या –151

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