तीन गीत: मनोहर अभय

मनोहर अभय
(एक)

फूल- फूल झर गए
पात -पात रह गए
आँधियाँ चली कि-
झुक गई टहनियाँ।
पेड़ थे बड़े- बड़े
देखते खड़े- खड़े
आँख कान बंद थे
बँधी मिली पट्टियाँ।

राहगीर चल पड़े
रास्ते खुले नहीं
दीप था तेल था
दीवले जले नहीं
मेघडे उमड़ रहे
कड़क रहीं बिजलियाँ।

किसी का घर बना नहीं
किसी का घर बसा नहीं
किसी के घास -फूस की
उड़ गईं छपरियाँ।

क्या पता सवेर हो
क्या पता अंधेर हो
आदमी की जात को
खा रहा कुबेर हो
हँस रही गरीबियाँ।
खेल हार जीत का
नीति का अनीति का
घातकों की प्रीति का
भेदभाव की सजी
बहंगियाँ।
कुछ करो डरो नहीं
कीच में गिरो नहीं
काट दो कुरीतियाँ।
***


(दो)

रह गई खिड़की खुली
रात पिछली।
पखेरू चाँदनी के
पंख फड़फड़ाते रहे
धुँधले अँधेरों के
पाँव लड़खड़ाते रहे
सुबह के सपने
करते रहे गुलगुली।
झाँकती थी दूर से
चौंधियाती रोशनी
जैसे कि आई हो
शहर से न्यौंतनी
मावसी कमरों में
आती -जाती रही
बिजली।

आपकी धूप में
पैदाइशी करिश्में हैं
बड़ी- बड़ी आँखोँ पर
छोटे चढ़े चश्मे हैं
सूखे खुले वंजर में
दीखते,
आम फसली।

अजीब सा रिश्ता है
आपका बस्तियों से
लगाई आग
नलकूप में
जले आदमी भिश्तियों से
देखती गली- गली।
जिंदगी का चुकाया
क्या कभी महसूल है
खाया -पिया सो गए
बिस्तर मिला माकूल है
वक्त की
टाँग फिसली।
पींजरा तोड़ कर
उड़ेंगी सारिकाएँ
रोक नहीं पाएगी
रास्ता नीहारिकाएँ
देखती रह जाएँगी
हवाएँ संदली।
***


(तीन )

राग ढलते रहे
स्वर बदलते रहे
यूँ ही बजती रही
दर्द की बाँसुरी।
आशा- निराशा
कुतरती रही
उम्र सीढ़ी से नीचे
उतरती रही
चुभती रही
- पाँव में काँकरी।
कब किसी ने सुनी
बात बीती हुई
माखन की मटुकी
क्यों रीती हुई
यमुना की लहरें हुई आसुरी।

कहाँ किसको कितना
दाना मिलेगा
सर खपाने को कैसा
ठिकाना मिलेगा
पूछती है पुरानी फटी घाघरी।

फूलों की चितवन से
कुछ सीखिए
सौरभ लुटा कर
जगत जीतिए
सहलाइए प्यार से पाँखुरी।

जो तुमने पिया है
हमें भी पिलाओ
नफरत की ज्वाला
जल्दी बुझाओ
कहना यही है हमें आखरी।

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