काव्य: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

चार कविताएँ


(1) हमने बाबा को देखा है

सादतपुर की इन गलियों में,
हमने बाबा को देखा है!

कभी चमकती सी आँखों से
गुपचुप कुछ कहते, बतियाते,
कभी खीजते, कभी झिड़कते
कभी तुनककर गुस्सा खाते।
कभी घूरकर मोह-प्यार से
घनी उदासी में घुस आते,
कभी जरा सी किसी बात पर
टप-टप-टप आँसू टपकाते।
कभी रीझकर चुम्मी लेते
कभी फुदककर आगे आते,
घूम-घूमकर नाच-नाचकर
उछल-उछलकर कविता गाते,
लाठी तक को संग नचाते,
सादतपुर की इन गलियों में,
हमने बाबा को देखा है!

जर्जर सी इक कृश काया वह
लटपट बातें, बिखरी दाढ़ी,
ठेठ किसानी उन बातों में
मिट्टी की है खुशबू गाढ़ी।
ठेठ किसानी उन किस्सों में
नाच रहीं कुछ अटपट यादें,
कालिदास, जयदेव वहाँ हैं
विद्यापति की विलासित रातें।
एक शरारत सी है जैसे
उस बुड्ढे की भ्रमित हँसी में,
कुछ ठसका, कुछ नाटक भी है
उस बुड्ढे की चकित हँसी में।

सोचो, उस बुड्ढे के संग-संग,
उसकी उन घुच्ची आँखों से,
हमने कितना कुछ देखा है!

सादतपुर की इन गलियों में,
हमने बाबा को देखा है!

कहते हैं, अब चले गए हैं,
क्या सचमुच ही चले गए वे?
जा सकते हैं छोड़ कभी वे
सादतपुर की इन गलियों को,
सादतपुर की लटपट ममता
शाक-पात, फूलों-फलियों को?

तो फिर ठाट बिछा है जो यह
त्यागी के सादा चित्रों का,
और कृषक की गजलें, या फिर
दर्पण से बढिय़ा मित्रों का।
विष्णुचंद्र शर्मा जी में जो
कविताई का तंज छिपा है,
युव पीढ़ी की बेचैनी में
जो गुस्सा और रंज छिपा है।
वह सब क्या है, छलक रहा जो
सादतपुर की इन गलियों में,
मृगछौनों सा भटक रहा जो
सादतपुर की इन गलियों में।

यह तो सचमुच छंद तुम्हारा
गुस्से वाली चाल तुम्हारी,
यही प्यार की अमिट कलाएँ
बन जाती थीं ढाल तुम्हारी।
समझ गए हम बाबा, इनमें
एक मीठी ललकार छिपी है,
बेसुध खुद में, भीत जनों को
इक तीखी फटकार छिपी है!

जो भी हो, सच तो इतना है
(बात बढ़ाएँ क्यों हम अपनी!)
सादतपुर के घर-आँगन में
सादतपुर की धूप-हवा में,
सादतपुर के मृदु पानी में
सादतपुर की गुड़धानी में,
सादतपुर के चूल्हे-चक्की
और उदास कुतिया कानी में—
हमने बाबा को देखा है!

सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है!

करते हैं अब यही प्रतिज्ञा
भूल नहीं जाएँगे बाबा,
तुमसे मिलने सादतपुर में
हम फिर-फिर आएँगे बाबा,
जो हमसे छूटे हैं, वे स्वर
हम फिर-फिर गाएँगे बाबा।

स्मृतियों में उमड़-घुमड़कर
आएँगी ही मीठी बातें,
फिर मन को ताजा कर देंगी
बड़े प्यार में सीझी बातें!

कई युगों के किस्से वे सब
राहुल के, कोसल्यायन के,
सत्यार्थी के संग बिताए
लाहौरी वे दिन पावन-से।
बड़ी पुरानी उन बातों को
छेड़ेंगे हम, दुहराएँगे,
दुक्ख हमारे, जख्म हमारे
उन सबमें हँस, खिल जाएँगे।

तब मन ही मन यही कहेंगे
उनसे जो हैं खड़े परिधि पर,
तुम क्या जानो सादतपुर में
हमने कितना-कुछ देखा है!
काव्य-कला की धूम-धाम का
एक अनोखा युग देखा है।
कविताई के, और क्रांति के
मक्का-काबा को देखा है!

सादतपुर की इन गलियों में,
हमने बाबा को देखा है!

हम बाबा के शिष्य लाड़ले
हम बाबा के खूब दुलारे,
बाबा के नाती-पोते हम
बाबा की आँखों के तारे।
हम बाबा की पुष्पित खेती
हममें ही वे खिलते-मिलते,
हमसे लड़ते और रीझते
हममें ही हँस-हँसकर घुलते।

हमको वे जो सिखा गए हैं
कविताई के मंत्र अनोखे,
हमको वे जो दिखा गए हैं
पूँजीपति सेठों के धोखे।
और धार देकर उनको अब
कविताई में हम लाएँगे,
दुश्मन के जो दुर्ग हिला दें
ऐसी लपटें बन जाएँगे।
खिंची हुई उनसे हम तक ही
लाल अग्नि की सी रेखा है!
हमने बाबा को देखा है!

सादतपुर की इन गलियों में,
हमने बाबा को देखा है!
**

(2) मेरे अपने रामदरश जी

मेरे अंदर रामदरश जी, मेरे बाहर रामदरश जी,
आगे चलते रामदरश जी, पीछे दिखते रामदरश जी।
सुख में, दुख में, फाकामस्ती में भी हँसते और हँसाते—
अंदर-बाहर, बाहर-अंदर रामदरश जी, रामदरश जी।

कविता वाले रामदरश जी, किस्से वाले रामदरश जी,
इस अँधियारे जग के उजले हिस्से वाले रामदरश जी,
चुप-चुप कुछ कहते, कह करके बस मुसकाते रामदरश जी,
एक पुराना गीत, उसी को फिर-फिर गाते रामदरश जी।

मिला राह में जो उसको, घिस-घिस चमकाते रामदरश जी,
सारे ही घर उनके, जिनमें आते-जाते रामदरश जी,
बैठ गए वे जहाँ, छाँह का वृक्ष उगाते रामदरश जी,
डुगुर-डुगुर अब चले हवा से कुछ बतियाते रामदरश जी। 

जब से आए रामदरश जी, मन में कितना हुआ उजीता,
कहती बड़की, कहती छुटकी, कहती चुप-चुप यही सुनीता।
खुले द्वार, खुल गईं खिड़कियाँ, जब से आए रामदरश जी,
टूट गईं सारी हथकड़ियाँ, जब से आए रामदरश जी।

चह-चह करतीं घर में चिड़ियाँ, जब से आए रामदरश जी।
बिन दीवाली के फुलझड़ियाँ, जब से आए रामदरश जी।
एक रोशनी का कतरा था, बढ़ते-बढ़ते वह खूब बढ़ा,
छोटा सा था मेरा आँगन, लेकिन खुद ही हुआ बड़ा।

ठंडी छाया बरगद की सी, ममता की हैं कोमल बाँहें,
चलता हूँ जिस ओर, वहीं से खुल जाती हैं उनकी राहें। 
वे ही अंदर, वे ही बाहर, कितने रूपों में छाए हैं, 
लंबा था रस्ता पर चलकर खुद ही मेरे घर आए हैं।

जो सीखे हैं पाठ अनोखे, भूल न पाता रामदरश जी,
गीत सुरीले जो सीखे हैं, फिर-फिर गाता रामदरश जी।
अर्थ महकते नए-नए से, नई-नई मोहक छवियाँ हैं,
यादों में हैं आप, आपमें कितनी सारी स्मृतियाँ हैं!

शिष्य आपका, पाठक भी हूँ, चाहे थोड़ा अटपट सा हूँ,
ढाई आखर पढ़े प्यार के, तब से थोड़ा लटपट सा हूँ।
थोड़ा झक्की, थोड़ा खब्ती, थोड़ा-थोड़ा प्यारा भी हूँ,
इसी प्यार से जीता भी हूँ, इसी प्यार से हारा भी हूँ।

एक खुशी है मगर, आपने खुले हृदय से अपनाया है,
कुछ गड़बड़ गर लगा, प्यार से उसको भी समझाया है।
यह उदारता, यही बड़प्पन भूल न पाता रामदरश जी,
विह्वल मन ले, इसीलिए चुप सा हो जाता रामदरश जी। 

जो कुछ सीखा, जो कुछ पाया, वह कविता में ढाल लिया है,
एक दीप उजली निर्मलता का अंतस में बाल लिया है।
चाहे आँधी आए, मन का दीप नहीं यह बुझ पाएगा,
अंगड़-बंगड़ छूटेगा, पर उजियारा तो रह जाएगा।

अंतर्मन में दीप जला तो कहाँ अँधेरा रह पाएगा,
यहाँ उजाला, वहाँ उजाला, अंदर-बाहर छा जाएगा।
आप साथ हैं तो जैसे यह सारी धरती अपनी है,
इस मन-आँगन में भी कोई गंगा अब तो बहनी है!
**

(3) कवि मित्र ब्रजेश कृष्ण के लिए एक कविता

तुम मेरे भीतर ही थे कहीं ब्रजेश भाई
कहीं अधिक ठोस, सबल और धैर्यवान
बुरे वक्तों में भी टिकाए पैर ढलानों पर खूब हिम्मत से
शिखर की ओर मिलाए आँख से आँख

तुम थे मेरी आत्मा का कोई धीरजवान हिस्सा
कहीं अधिक शक्तिमान
मैं हवा-हवाई सा कि आर्त, थोड़ा जिद्दी किसी पेंचदार पतंग सा 
उड़ता-उड़ाता यहाँ-वहाँ
हर मुसीबत में धँसाए सिर किसी और बड़ी आफत को न्योतता सा 
खुद मुझे होश नहीं कि न जाने कब कहाँ मुट्ठियाँ भाँजू 
चमकाऊँ तलवार
और बिजलियों की कौंध की तरह घुल जाऊँ हवा में

पर मुझे अपनी ही राह टटोलने के लिए
तुम्हारे सहारे की दरकार थी ब्रजेश भाई
मुझे चाहिए था तुम्हारा कंधा हर मुसीबत में सिर टिकाने के लिए
पोंछने के लिए आँख के आँसू
मैं जानता था कि तुम मुझे सहार लोगे

यों आज तलक तुम्हारे सहारे ही तो चला किया
जैसे दीवार पकड़-पकड़कर चलता है कुछ डगमगाता सा दीवाना कोई
और किसी असंभव करिश्मे किसी चमत्कार की तरह
पूरा कर लेता है जिंदगी का सफर...

यों लगता रहा हर पल कि मैं आज गया या कल
कभी-कभी लगता, यही बस यही होगा आखिरी दिन मेरी जिंदगी का
खुद अपना उद्वेग थामने की हिम्मत कभी आई ही नहीं भीतर
लगता रहा विचित्र उबाल से फूलता-फालता यह पागल गुब्बारा
फूटेगा किसी घड़ी बीच राह में जोर से फुस्स करता
कि न जाने कहाँ किस मोड़ पर सिर से फूट पड़ेगा लावा 
और मैं जाऊँगा

मैं जाऊँगा कि जैसे मैं कभी था ही नहीं

यह राज आज मैं खोलता हूँ ब्रजेश भाई
कि चलते-चलते अकस्मात एक दिन सफर में
न होती मुलाकात मेरी अपने ही उस सबलतर अंश से
जो कि तुम हो
तो यह प्रकाश मनु आज कहीं न होता, कुछ न होता

पूरे पैंतालीस बरसों की अनकही कहानी है यह मेरे प्यारे दोस्त
कि इसमें दो दो नहीं, बस एक ही हैं
मैं तुम्हारा ही भावुक कुछ-कुछ आर्त हिस्सा जिसे तुमने न दबाया होता
तो होते तुम भी आज बेकाबू प्रकाश मनु की तरह हवा में
टक्करें खाते

और तुम मेरे वह सबाल सबलतर धीरजवान हिस्से
जिसके पास थे मेरे खोए हुए प्रश्नों के जवाब
जिससे न होती मुलाकात तो कब का जा चुका होता बापुरो यह चंद्र!

दोस्ती तुमसे मेरी खुद से ही दोस्ती थी ब्रजेश भाई
और मेरा होना तुम्हारे ही उस भावुक उन्मन हिस्से का पुनर्नवा होना
जो आकाश में घूमना चाहता था आवारा मेघों सा
पर तुम्हारे दृढ़ अनुशासन की कड़ियाँ उसे रोकती थीं

और इस दोस्तविहीन दुनिया में
यह दोस्ती थी कुछ ऐसी बिरली जो चली आई पिछले पैंतालीस बरसों से
कुछ छोटे-मोटे धचके खाकर भी सहते हुए अंदर का ताप
और चलेगी तब तक कि जब तलक न छूटेंगे प्रान
एक ऐसी दोस्ती
इस दुनिया में जैसी बस किसी ब्रजेश भाई और कवि भाई की ही
हो सकती है...!
**

(4) श्याम सुशील के लिए एक कविता

तुम इस कदर धँसे हुए हो मुझमें 
कि तुम्हारे बिना पूरी नहीं होती मेरी तसवीर
प्यारे मित्र

कि मित्रता की एक अनकही कहानी हो तुम
लिखी मन की स्लेट पर
जिसका कोई आदि अंत ही नहीं
पर रोशनियों से नहाया है हर आखर उसका
महकता दिल के कोठार में

तुम हर रंग में हो हर जगह हो 
मेरी कहानी में
शब्दों और शब्दों के बीच के अंतराल में भी
उसमें एक गुनगुना संगीत भरते हुए

तुम मेरी आत्मा में हो
आत्मा की उजास की तरह
मेरी आँखों में आर्द्रता और दिल में 
दिल की शीतलता और सुकून की तरह

तुम दोस्ती की छाँह हो निर्व्याज
साथ मेरे 
जाने कब से चलते आ रहे चुपचाप 
एक धीमी सी उजली मुसकान के साथ
हर टूटन हर उदासी में
फिर से खोज लाते जीवन की धारा निर्बंध
राहत बन जाते दुख-दाह आतप में
एक उम्मीद और सपनों भरे क्षितिज की तरह

तुम मेरे मन में हो श्याम
मन के विश्वास
और थके प्राणों में बच रही उमंग की तरह
जो चलाए जा रही है मुझे आगे और आगे
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों अबूझ रास्तों पर
एक नई खोज की विकलता के साथ

मेरी आँखों में चमक है अभी
जीने कुछ कर गुजरने की
पैरों के नीचे जमीन
क्योंकि तुम साथ हो मेरे यह यकीन है

तुम हो साथ मेरे तो दुनिया प्यारी लगती है 
किसी बच्चे की भोली और मासूम 
मुसकराहट की तरह
और लगता है अभी तो जी ही लूँगा 
कमजकम दस बरस और

छोटे भाई हो तुम मेरे
धनुर्धर लक्ष्मण सरीखे
लेकिन कभी बड़े बहुत बड़े भी हो जाते है
मेरा सुपरिचित आश्रयस्थल 
मेरे अंदर की पुकार और ताकत बनकर
 
कि तुम्हारी उँगली पकड़ डगमगाकर चल रहा हूँ राह में
आश्वस्त कि देर-सवेर पहुँच ही जाऊँगा घर
क्योंकि तुम हो मेरे साथ
मेरे प्राणों की ऊर्जा और मन का विश्वास बनकर
जिससे कहीं भी जाऊँ
घर सामने नजर आता है
*

प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
मो. 09810602327,
ईमेल – prakashmanu333@gmail.com

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